मन के मुखौटे, एपिसोड 02: रहोगी तुम वही

मानसिक स्वास्थ्य के तयशुदा खांचे से बाहर निकल, उसे आप बीती और जग बीती के अनुभवों एवं कहानियों के चश्में से समझने की एक महत्वाकांक्षी पहल – मन के मुखौटे- के दूसरे एपिसोड में हम लेकर आए हैं कथाकार सुधा अरोड़ा की कहानी ‘रहोगी तुम वही’. सुनिए कैसे भावनात्मक हिंसा की छोटी-छोटी किरचें इस कहानी में साफ-साफ दिखाई देती हैं.

घर के भीतर होने वाले ख़राब व्यवहार और उससे बचने के लिए औरत द्वारा इजाद किए गए अपने तरीकें आश्चर्यजनक रूप से इस कहानी में सामने आते है. सोचने पर मजबूर करने और हमें आईना दिखाने का काम करने वाले ‘मन के मुखौटे’ का यह दूसरा एपिसोड घर के भीतर की दुनिया की परतों को एक-एक कर छीलता हुआ उस सच्चाई से रू-ब-रू करवा रहा है जिसे औरत सदियों से घर के भीतर झेल रही है.

विशेष साभार- पूर्णिमा गुप्ता निरंतर ट्रस्ट से
आवरण चित्र: तबस्सुम अंसारी
आवरण : सादिया सईद

माधुरी को कहानियां सुनाने में मज़ा आता है और वे अपने इस हुनर का इस्तेमाल महिलाओं के विभिन्न समुदायों और पीढ़ियों के बीच संवाद स्थापित करने के माध्यम के रूप में करती हैं. जब वे रिकार्डिंग या साक्षात्कार नहीं कर रही होतीं तब माधुरी को यू ट्यूब चैनल पर अपने कहानियों का अड्डा पर समाज में चल रही बगावत की घटनाओं को ढूंढते और उनका दस्तावेज़ीकरण करते पाया जा सकता है. समाज शास्त्र की छात्रा होने के नाते, वे हमेशा अपने चारों ओर गढ़े गए सामाजिक ढांचों को आलोचनात्मक नज़र से तब तक परखती रहती हैं, जब तक कॉफ़ी पर चर्चा के लिए कोई नहीं टकरा जाता. माधुरी द थर्ड आई में पॉडकास्ट प्रोड्यूसर हैं.
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