“इस बात में कोई शक नहीं कि हमारे भोजन और हमारे स्वास्थ्य में सीधा संबंध है.”

दो डॉक्टर जिन्होंने तमिलनाडु के आदिवासी इलाके में सामुदायिक स्वास्थ्य व्यवस्था की शुरुआत कर, इसके इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया.

चित्रांकन: सृष्टि गुप्ता

90 के दशक के शुरुआती सालों में इन्होंने केरल के अलप्पुझा सरकारी मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की डिग्री ली, लेकिन केवल एक बड़े अस्पताल में काम करना काफ़ी नहीं था. ये देश के अलग-अलग गांवों, आदिवासी इलाकों में घूमने निकल पड़े. ये तलाश कर रहे थे एक ऐसी जगह की जहां इनकी डॉक्टरी की डिग्री की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी. इनकी तलाश इन्हें सित्तिलिंगी ले आई. सित्तिलिंगी मालवासी या पहाड़ी लोगों का घर था. उन दिनों वहां नवजात शिशु मृत्यु दर 150 थी जो पूरे भारत में सबसे ज़्यादा थी. ये वहीं रूक गए.

डॉ. ललिता रेगी और रेगी जॉर्ज ने 1992 में ट्राइबल हेल्थ इनिशिएटिव की स्थापना की. एक कमरे में लगे सौ वॉट के बल्ब के साथ उन्होंने अपने सफ़र की शुरुआत की थी. आज ये एक कमरा, 35 बिस्तरों वाले बड़े से अस्पताल में बदल चुका है. तन मन जन – जन स्वास्थ्य व्यवस्था विशेष में हमने बात की डॉ. ललिता रेगी से और जाना उनका सफ़रनामा और सामुदायिक स्वास्थ्य में उनके योगदान के बारे में.

डॉ. रेगी जॉर्ज और आपने सित्तिलंगी, तमिलनाडु में आदिवासियों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए एक संगठन की स्थापना की. क्या इसके बारे में आप हमें विस्तार से बता सकती हैं?

1993 में हमने धर्मपुर ज़िले की सित्तिलिंगी घाटी में काम करना शुरू किया. उससे पहले हम दोनों मदुरई के पास गांधीग्राम के एक अस्पताल में काम करते थे. जॉर्ज एनेस्थेटिस्ट विशेषज्ञ हैं और मैं प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ. हम दोनों अपने काम से बहुत ख़ुश थे. लेकिन, मन में ये बात थी कि हमें अस्पताल की देखभाल के दायरे से बाहर काम करना है. एक दिन हमने अपनी नौकरियों से इस्तीफ़ा दिया, कंधे पर एक-एक बैग लटकाया और निकल पड़े.

चित्र साभार: https://www.tribalhealth.org/

हम ऐसे बहुत सारे संगठनों से मिले जो ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य एवं अन्य मुद्दों पर काम कर रहे थे. उनके काम करने के तरीकों को जाना. कई आदिवासी इलाकों में गए. हमें समझ आ रहा था कि देश का कोई भी कोना हो, आदिवासी क्षेत्र, भौगोलिक रूप से अलग-थलग ही हैं. वहां सरकारी नीतियां, विकास से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम या योजना, कुछ भी नहीं पहुंचता. ये एक बड़ी खाई थी जिसे भरना था.

हमने तमिलनाडु के स्वास्थ्य के आंकड़ों की जांच कर, तीन ऐसी जगहों का चुनाव किया जो किसी भी तरह की स्वास्थ्य सुविधाओं से कोसो दूर थे. संयोग से सित्तिलिंगी उनमें से एक था. शुरुआत में यहां पहुंचने वालों में सिर्फ़ हम दो ही थे, बाद में हमारे दो दोस्त – एक इंजीनियर और एक स्वास्थ्यकर्मी – भी यहां आ गए.

हमें मालूम था कि लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए, स्वास्थय के अलावा अन्य क्षेत्रों पर भी काम करना होगा. लेकिन जब पता चला कि यहां सबसे नज़दीकी डॉक्टर 48 किलोमीटर दूर है और सर्जरी या इमरजेंसी की हालत में सबसे नज़दीकी अस्पताल 100 किलोमीटर की दूरी पर है तो हमने माना कि प्राथमिकता यहां अस्पताल की है. जहां 24 घंटे में से 14 घंटे कोई बस सुविधा तक उपलब्ध न हो, जब लोग मर रहे हों तो आप किसी और चीज़ पर ध्यान नहीं दे सकते!

फ़िर, ओपीडी की सुविधा के साथ एक कमरे के मकान में अस्पताल की शुरुआत की, धीरे-धीरे ये 10 बिस्तर वाले अस्पताल में बदला और आज यहां 30 बिस्तरों की सुविधा है. ये सेकेन्ड्री स्तर का अस्पताल है. इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यहां काम करन वाले 95 फ़ीसदी स्वास्थ्यकर्मी आदिवासी महिलाएं एवं पुरुष हैं जिन्हें बाकायदा प्रशिक्षित किया जाता है.

नर्स, दवाई की दुकान चलाने वाले, लैब टेक्नीशियन, प्रशासनिक कर्मचारी, ड्राइवर – सभी आसपास की घाटियों और पहाड़ियों के स्थानीय निवासी हैं. इसके अलावा हम अन्य दो घाटियों में बसी 26 बस्तियों में भी सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाते हैं. वहां भी आदिवासियों की आबादी है.

आपका काम समुदायों के साथ बहुत गहरे रूप में जुड़ा है. इसे देखते हुए आप जन स्वास्थ्य को कैसे परिभाषित करेंगी?

पब्लिक हेल्थ या जन स्वास्थ्य किसी एक व्यक्ति के स्वास्थ्य से नहीं जुड़ा, बल्कि इसे समग्र रूप में समुदायों के स्वास्थ के रूप में देखना चाहिए. जन-स्वास्थ्य में ‘जन’ की भागीदारी सबसे पहले है. यहां उनकी बात सुनी जानी चाहिए, वे क्या कह रहे हैं, किन परेशानियों का इज़हार कर रहे हैं. इन्हें दूर करके ही जन स्वास्थ्य के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है.

लेकिन, जन स्वास्थ्य को लेकर ऐसी समझ शायद ही कहीं मौजूद है. जब तक ग़रीब, वंचित समुदाय, असहाय, हाशिए पर धकेले दिए गए समुदायों, अल्पसंख्यकों, आर्थिक और सामाजिक रूप से कमज़ोर तबके के लोगों की बातों को नहीं सुना और संबोधित किया जाता है, तब तक हम यह नहीं कह सकते कि हमारे पास एक अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था है. ऐसा भी नहीं कि इस तरह के काम कभी हुए नहीं हैं. इक्का-दुक्का उदाहरण हो सकते हैं. लेकिन अभी भी बहुत कुछ होना बाक़ी है.

आप हमें अपने सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और स्थानीय लोगों की उसमें साझेदारी के बारे में कुछ बताएंगी?

शुरू-शुरू में हमने यहां के गांव की लड़कियों को मेडिकल की कुछ बुनियादी ट्रेनिंग दी. ये सभी लड़कियां आठवीं तक शिक्षित थीं क्योंकि गांव के स्कूल में यहीं तक की ही पढ़ाई होती थी. धीरे-धीरे कॉरेस्पोंडेंस कोर्स की मदद से उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी.

ट्रेनिंग देते वक़्त हमने सोचा कि ये युवा स्वास्थ्यकर्मी समुदायों के भीतर काम करेंगी. इधर, अस्पताल भी बड़ा हो रहा था. बाहर से कोई भी प्रशिक्षित नर्स या पैरामेडिक यहां आकर काम करने को तैयार नहीं थे तो, ये सभी प्रशिक्षित लड़कियां अस्पताल में बतौर स्टाफ काम करने लगीं.

इसके बावजूद अस्पताल में स्टाफ की कमी थी. इसलिए,

शुरुआत के तीन-चार साल हमने गांव की उम्रदराज महिलाओं एवं पुरुषों को प्रशिक्षित करना शुरू किया जिन्हें हम स्वास्थ सहायक कहते हैं. इनकी उम्र 50 से 60 वर्ष की है, और ये कभी स्कूल नहीं गए. क्योंकि जब वे बड़े हो रहे थे तब गांव में स्कूल की सुविधा थी ही नहीं. ये ज़्यादातर खेतीहर किसान हैं.

प्रशिक्षिण से जुड़ा पाठ्यक्रम – चाहे स्वास्थ्य सहायकों के लिए हो या स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए – वे आपसी संवाद पर आधारित होता है. हम ज़्यादा से ज़्यादा उनकी बात सुनते हैं. उनकी ख़ुद की समस्या क्या है? समुदाय की क्या ज़रूरतें हैं? प्रशिक्षण भी बहुत आसान और साधारण तरीकों से यहीं, ट्राइबल हेल्थ इनिशिएटिव सेंटर पर दिया जाता है ताकि उनके अपने काम में बाधा न पहुंचे और वे अपनी खेती के काम के लिए भी समय निकाल सकें. 

उस समय स्वास्थ्य कर्मचारियों और सहायकों के ज़रिए हमें कई तरह की वास्तविकताओं का भी पता चला. जैसे, शिशु मृत्यु दर (पांच या उससे कम उम्र के बच्चे) और मातृ मृत्यु दर- यहां बहुत ज़्यादा थी. इसलिए सबसे पहले हमने सिर्फ़ पोषण के बारे में चर्चा की और इसे समझने की कोशिश की.

चित्र साभार: https://www.tribalhealth.org/
कुपोषण को कैसे दूर करें या इसका सही उपचार क्या है? डायरिया से कैसे बचें और सांस की तकलीफ़ों को कैसे दूर करें- उस समय यही तीन बीमारियां बच्चों की जान की आफत थीं. आगे चलकर उन्होंने साफ़ एवं सही तरीके से डिलीवरी करवाने के बारे में जाना क्योंकि गांवों में डिलीवरी तो होती ही थी. इस दिशा में

लगभग तीन-चार साल की लगातार मेहनत के बाद गांव में शिशु मृत्यु दर 147 से कम होना शुरू हुई और आज गांववालों की मदद से ये 20 पर आ चुकी है. मातृ मुत्यु दर तो बिलकुल ही ख़त्म हो चुकी है.

ये बहुत ही आश्चर्यजनक है कि कम्युनिटी ने अपने दम पर शिशु मृत्यु दर को कम करने में कामयाबी हासिल की. आप स्वास्थ्य के साथ अन्य कारकों के बारे में भी बता रही थीं. क्या हैं ये कारक? क्योंकि अक्सर हम चीज़ों को अलग-अलग करके देखने के आदि हो गए हैं.

ये तो हम जानते ही थे कि खेती, पोषण, आजीविका, अपने अधिकारों की जानकारी और स्थानीय व्यवस्था – ये सभी आपस में पूरक हैं और स्वास्थ्य से इनका गहरा रिश्ता है. 10 साल काम करने के बाद, तकरीबन 2004-05 के आसपास जब यहां सुनामी आया था, उस वक़्त हमने फैसला किया कि अब हमें अस्पताल और समुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर सिर्फ़ ध्यान केन्द्रित करने से आगे बढ़ना होगा. हमें दूसरे, और ज़रूरी मुद्दों पर भी बात करनी होगी.

हमने घाटियों की पैदल यात्रा की. अस्पताल को हफ़्ते में तीन दिन बंद रखने लगे. इमरजेंसी सर्विस के लिए कोर टीम से कुछ लोग हमेशा मौजूद रहते थे. एक टीम की तरह हम एक घर से दूसरे घर जाते, शाम में सभी लोगों को सामुहिक मीटिंग में बुलाते. दिन किसी एक गांव में बीतता तो रात कहीं और सो रहे होते थे. अगले दिन फ़िर किसी और गांव के लिए निकल पड़ते.

हमने लोगों से कहा कि हम अस्पताल या किसी बीमारी के बारे में बात करने नहीं आए हैं बल्कि ये जानने आए हैं कि क्या वे अपने को पूरी तरह स्वस्थ महसूस करते हैं? अगर, नहीं तो वे क्या कारण हैं जो उन्हें अस्वस्थ बना रहे हैं? क्या हम मिलकर इसका हल ढूंढ सकते हैं?

कई महीनों तक हम यात्रा करते रहे. चूंकि हम घर-घर जाकर लोगों से मिलते थे इसलिए वे सभी हमारी मीटिंग्स में शामिल होते और खुलकर अपनी परेशानियां हमसे साझा करते. स्कूल, बस सर्विस जैसी चीज़ों की कमियों से तो वे परेशान थे ही, लेकिन

हर गांव में एक बात जो खुलकर सभी ने कही वो – कृषि से जुड़े मसले थे. उन्हें पता था कि कृषि और स्वास्थ्य के बीच क्या रिश्ता है.

उन्होंने कहा – जाने-अनजाने हम खेती की जटिल व्यवस्था के शिकंजे में फंस गए हैं जहां किसानी पूरी तरह रसायनिक खाद पर निर्भर हो गई है. इसे ख़रीदने के लिए हमें क़र्ज़ लेना पड़ता है और इस तरह हम क़र्ज़ के दलदल में फंसते चले जाते हैं जिससे छुटकारा पाना नामुमकिन हो जाता है. उन्होंने ये भी कहा कि, हमें पता है हमारा खाना वैसा नहीं है जैसा हमारे पुर्खे खाया करते थे. उनका स्वास्थ्य भी हमसे ज़्यादा अच्छा होता था. हम सच्चाई जानते हैं लेकिन इससे बाहर कैसे निकलें?

हमने उन्हें आश्वस्त किया कि अगर सभी को ऐसा लगता है तो हम किसानों के कुछ संगठनों से उनकी समस्याओं के बारे में बात कर सकते हैं. संगठन से कुछ लोग यहां आए भी. लगभग दो साल बाद, चार किसान जैविक खेती करने के लिए आगे आए. आज उनकी संख्या 500 है. वे सभी सित्तिलिंगी ऑर्गैनिक फॉर्मर्स एसोसिएशन के सदस्य हैं. ये सभी छोटे किसान हैं जिनके पास एक से तीन एकड़ ज़मीन है, पर आज एक समाज के रूप में वे उत्पादक कंपनी बन गए हैं.

अब वो यह मानते हैं कि उनके द्वारा उगाए अनाज से सबसे पहले उनका और उनके परिवार का पेट भरना चाहिए ताकि उन्हें ज़रूरी पोषण मिल सके. इसके बाद बचे हुए अनाज को वे अच्छे दामों पर बेच देते हैं. औरतें भी खेती और जैविक अनाज की बची हुई चीज़ों से सामान तैयार करती हैं जिसे ऑर्गेनिक बाज़ार में बेचा जाता है. सभी तो नहीं लेकिन जितने भी किसान इस मुहिम से जुड़े हैं, वे अनाज और पोषण के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो चुके हैं.

यह ज़रूरी है कि

स्वास्थ्य को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए. आज घाटी की किसी भी गर्भवती महिला के भीतर ख़ून या विटामिन बी की कमी दिखाई नहीं देती. कुछ ऐसी महिलाएं हैं जो शहर चली जाती हैं और गर्भ के आख़िरी महीने में डिलीवरी के लिए यहां आती हैं, उनमें कमी देखने को मिल सकती है. लेकिन यहां की महिलाओं में ये कमी अब नहीं है.

इसके पीछे कारण सिर्फ़ विटामिन और आयरन का सही से मिलना नहीं है, बल्कि ये संपूर्ण पौष्टिक आहार मिलने की वजह से है जो बहुत महंगा भी नहीं होता. छोटे किसान बाजरा उगाते हैं. जिसमें सबसे ज्यादा पोषक तत्व हैं. बरिश के मौसम में फसलों के साथ उगने वाले साग और दूसरी हरी सब्जियां उनके खान-पान का हिस्सा हैं. इन्हीं सब कारणों ने बच्चों को कुपोषण से दूर रखा है और महिलाओं में ख़ून की कमी की पूर्ती की है.

इससे तो साफ़ पता चल रहा है कि खेती करने के तरीकों और अच्छे स्वास्थ्य के आंकड़ों में सीधा संबंध हैं. क्या इस प्रक्रिया पर आपने अधिक विस्तार से शोध किया है?

नहीं, हमने इसपर कोई शोध तो नहीं किया है. लेकिन, 23 साल यहां काम करते हुए हमने स्वास्थ्य से जुड़े ख़राब तरह के प्रचलन भी देखे हैं. जैसे, पिछले कुछ सालों में जो लोग काम की तलाश में बाहर जा रहे हैं उन्हें सही से खाना नहीं मिल रहा. इससे उनका स्वास्थ्य भी ख़राब होता है. जब वे वापस आते हैं तो कई तरह की फैलने वाली बाहरी बीमारियां साथ आ जाती हैं. कुछ बड़ी और गंभीर बीमारियां अब यहां भी बढ़ने लगी हैं जो पहले नहीं थीं. दरअसल, इस बात में कोई शक नहीं कि हमारे भोजन और हमारे स्वास्थ्य में सीधा संबंध है.

एक तरफ़ इलाज के पारंपरिक तरीके हैं जिसपर लोगों का भरोसा टिका होता है, दूसरी तरफ़ आधुनिक चिकित्सा की ओर बढ़ता रूझान, ऐसे में एक डॉक्टर होने के नाते आप इन दोनों के बीच तालमेल कैसे बिठा पाते हैं?

हम जब यहां आए थे तब लोगों के बीच पारंपरिक जड़ी-बूटियों का ज्ञान लगभग ख़त्म हो रहा था. मेरा तो मानना है कि कोई भी चिकित्सा प्रणाली पूर्ण नहीं होती. अब, सर्जरी के लिए निश्चित रूप से एलोपैथिक तरीके की ज़रूरत है. हो सकता है, किसी और बीमारी में दूसरी तरह की दवाइयां काम कर जाएं.

चित्र साभार: https://www.tribalhealth.org/

ये हमारी व्यक्तिगत समझ है. हम पारंपरिक तरीकों की दवाइयों का भी सम्मान करते हैं. जैसे, अगर गांववालों को लगता है कि वो मरीज़ के पास किसी धार्मिक गुरू से पूजा-पाठ करवाएं तो हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं होती, हम भी उनके साथ इसमें शामिल होते हैं. इस तरह हम उनकी परंपरा का सम्मान करते हैं, बदले में वे हमारी बात मान, हमारे काम को इज़्ज़्त देते हैं. यानी बस इतना है कि मरीज़ ठीक हो जाए.

कोविड महामारी को लेकर यहां के अनुभव कैसे थे? समुदायों ने कोविड महामारी से अपने को कैसे बचाया?

पहली लहर में तो यहां कोविड का कोई मरीज़ नहीं था. गांववालों ने मास्क बनाने का काम ख़ुद संभाला. हमारे स्वास्थ्यकर्मी भी लोगों की मदद कर रहे थे. ऐसे समय में स्थानीय व्यवस्था की प्रमुख भूमिका होती है. यहां बहुत अच्छी पंचायत है और सरपंच, हमारे अस्पताल की ही एक पूर्व स्वास्थ्यकर्मी हैं. सरपंच ने शुरुआत से ही बहुत समझदारी और मुस्तैदी से काम किया.

पहली लहर में हर गांव कुछ न कुछ कर रहा था. गांव में बाहरी लोगों का प्रवेश बंद कर दिया गया और गांववालों ने भी बाहर जाना बंद कर दिया. हां, दूसरी लहर के आने से पहले तक लोग थोड़े आश्वस्त हो गए और ध्यान भी कम दे रहे थे. हमने अस्पताल में कोविड के मरीज़ों के लिए 15 बिस्तर अलग कर रखे थे. कुछ वॉलिन्टियर्स और स्वास्थ्यकर्मियों ने लोगों को जागरूक करने में अहम भूमिका निभाई. एक हेल्पलाइन नंबर की व्यवस्था कि गई जहां लोग फ़ोन पर सलाह ले सकते थे. दूसरी लहर में जो भी मरीज़ आए वो या तो घर पर ही क्वारंटाइन रहकर ठीक हो गए, या कुछ को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा लेकिन उनकी हालत गंभीर नहीं हुई.

क्या जेंडर से जुड़ी ऐसी कोई दखल है जिसे आप हमसे साझा करना चाहेंगी.

अक्सर हमसे पूछा जाता है कि हम इनसे नसबंदी या छोटे परिवार के फायदों के बारे में क्यों नहीं बात करते.

सोचिए, नवजात बच्चों की मृत्यु दर इतनी ज़्यादा हो वहां आप परिवार से नसबंदी की बात नहीं कर सकते. धीरे-धीरे जिस तरह से हमने शिशु मृत्यु दर को कम किया, वैसे ही लोग ख़ुद नसबंदी करवाने के लिए आगे आने लगे.

लोग मूर्ख नहीं हैं. वे अपने बारे में समझ सकते हैं. अब जहां बचपन में ही बच्चों के मरने की इतनी अधिक संभावना हो वहां वे चाहेंगे कि चार-पांच बच्चे कर ले ताकि अगर कोई मर भी गया तो बाकि तो बचे रहेंगे.

आमतौर पर कहा जाता है कि आदिवासी समुदाय के लोग या गांववाले ख़ासकर हाशिए पर खड़े लोग जागरुक नहीं होते- मेरे ख़्याल से ये सोच ग़लत है. यदि उनके मुद्दों पर बात की जाए तो वे समझते हैं कि उनके लिए क्या बेहतर है.

अगर आपसे कहा जाए कि आप नारीवादी समझ के आधार पर जन स्वास्थ्य व्यवस्था की नीतियों के संबंध में अपने कुछ सुझाव दें तो वे क्या होंगे?

जन स्वास्थ्य से जुड़ी बातें लोगों के बीच से निकल कर आनी चाहिए, ख़ासकर महिलाओं के बीच से आनी चाहिए. महिलाओं को पता होता है कि परिवार की ज़रूरतें क्या हैं, किसे क्या चाहिए, किसे प्राथमिकता देनी है. फ़िर, ये सारी प्लानिंग पंचायत के स्तर पर तय होनी चाहिए. क्योंकि हर जगह की अपनी अलग ज़रूरतें होती हैं.

चित्र साभार: https://www.tribalhealth.org/

आपको लोगों की बात सुनकर, उनकी ज़रूरतों के अनुसार ही समुदायों की समस्याओं का हल निकालना होगा. लोग स्वास्थ्य को हमेशा से ग़लत समझते आए हैं. इसका मतलब सिर्फ़ बीमारी से बचाव नहीं है, ये अच्छे स्वास्थ्य के साथ, जीवन जीने के स्तर में बढ़ोतरी और बीमारियों की रोकथाम से जुड़ा है, इससे जुड़ी नीतियां भी कई कारकों के साथ मिलकर बनानी चाहिए.

साथ ही विकलांग और बुजुर्गों को भी इसमें बराबर के साथ शामिल करना चाहिए, तभी एक समान स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित की जा सकती है. मुझे सच में लगता है कि लोगों के पास उपाय है, हमें उनपर भरोसा करना होगा और वहीं से शुरुआत करनी होगी. शहरी, ग्रामीण, दलित, आदिवासी कोई भी समुदाय हो, वे बदलाव ला सकते हैं. मैं ऐसा ही मानती हूं.

आख़िर में, सरकारी तंत्र को असलियत में ज़मीन पर काम करना चाहिए. अगर, ये तंत्र सही से काम करेंगे तो किसी और चीज़ की ज़रूरत ही नहीं रहेगी.

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.

इस लेख का अनुवाद सुमन परमार ने किया है.

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