द थर्ड आई टीम के लेख

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.

चरवाहों की निगाह में शहर

क्या आपने अपने शहर में चरवाहों को आते-जाते देखा है? अब तक की ज़िंदगी में उन्हें कहां-कहां देखा है? हम में से बहुत सारे लोगों के लिए इन सवालों का जवाब ‘न’ भी हो सकता है क्योंकि असल में चरवाहों की आजीविका को विकास के एजेंडे में अलग-थलग या अजीब माना जाता है. शहरीकरण की हमारी कल्पना में वे सिरे से गायब दिखाई देते हैं.

“सच तो यह है कि किसी को पता ही नहीं कि ट्रांस होता क्या है!”

बोनिता राजपुरोहित की फिल्म आईवाईकेवाईके (Iykyk / 2024) एक युवा ट्रांस महिला कुसुम की कहानी है, जो एक ‘साथी’ की तलाश में है. कुसुम को डेट करने वाले सभी युवा पुरुष उसकी ट्रांस पहचान से आकर्षित तो होते हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह उसको जानना चाहते हैं.

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 09: दो ज़िले, चार केसवर्कर्स

सीरीज़ के इस एपिसोड में मिलिए चार केसवर्कर्स से- सद्भावना ट्रस्ट से तबस्सुम और हुमा, सहजनी शिक्षा केंद्र से राजकुमारी और वनांगना संस्था से शोभा.

स्कूल लौटती दो बुज़ुर्ग महिलाओं की बेजोड़ कहानी

शुवांगी खड़का की फ़िल्म ‘पढ्ने उमेर’ नेपाल में प्रौढ़ शिक्षा पर केंद्रित है. द थर्ड आई के साथ शुरुआती बातचीत में शुवांगी अपनी मां की कहानी कहना चाहती थीं. मां को भी पढ़ने का शौक है लेकिन घर-गृहस्थी में उलझकर उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई. शुवांगी, खुद अपनी मां से यह सवाल करती हैं कि उन्होंने पढ़ना क्यों छोड़ दिया? पर, फ़िल्म शूट करने के दौरान उन्हें अपने इस सवाल का जवाब मिल जाता है.

“प्रतिरोध की राजनीति ‘मज़ा’ के बिना अधूरी है.”

सलीम किदवई एक इतिहासकार और स्वतंत्र विद्वान थे, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में बीस वर्षों तक अध्यापन किया है. उन्होंने मध्यकालीन और आधुनिक भारत पर कई अकादमिक निबंध प्रकाशित किए हैं और कई कृतियों का अनुवाद किया है, जिनमें मलका पुखराज द्वारा लिखित “सॉन्ग सुंग ट्रू: ए मेमॉयर” और सैयद रफीक हुसैन की लघु कथाओं का संग्रह “द मिरर ऑफ वंडर्स” शामिल हैं.

जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे

किंक! क्या यह शब्द आपके भीतर सिहरन पैदा करता है या फिर आपको इससे घृणा सी महसूस होती है? शायद दोनों ही. यह स्पष्ट है कि किंक एक ऐसा विषय है जो कई तरह की प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है और जो अक्सर गलतफहमी या अलग-अलग तरह की धारणाओं में उलझा दिया जाता है.

पुलिस सदैव (किसकी) सेवा में?

आपराधिक न्याय प्रणाली की खामियां न तो छुपी हुई हैं और न ही ये कोई नई खोज हैं. लेकिन जिस चीज़ पर अभी भी ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया है, वह यह है कि कैसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था, अपराधीकरण और हमारी पुलिसिंग प्रणाली के हर स्तर पर घुस चुकी है?

फ से फ़ील्ड, ज से जेल: सरिता और मैडम – एपिसोड 4

सरिता और मैडम के इस चौथे और आखिरी एपिसोड में क्रुपा उस याद को साझा कर रही है जब सरिता एक बार फिर प्रयास के पास आती है लेकिन इस बार वो कुछ और ही चाहती है – इस बार वो सीखना चाहती है.

फ से फ़ील्ड, ज से जेल: सरिता और मैडम – एपिसोड 3

सरिता जब भी प्रयास के दरवाज़े खट-खटाती है तो इसका मतलब परेशानी ही नहीं होता, जो वो अपने साथ लाती है. कभी वो कुछ मसलों के ऐसे अनोखे हल भी ढूंढ लाती है जो हमें परेशानी को अलग नज़रिए से देखने पर मजबूर कर देते हैं. इस तीसरे एपिसोड में क्रुपा हमें सरिता के उस एक खास दिन के बारे में बता रही हैं जब उसने मोल-भाव करने से साफ इंकार कर दिया.

फ से फ़ील्ड, ज से जेल: सरिता और मैडम – एपिसोड 2

लॉकडाउन तो आपको याद है न? ऐसा नहीं लगता कभी कि ये बरसों पहले की बात हो? और कभी लगता है कि ये कल की ही बात है! जो भी है ये सभी के लिए भयानक ही था. ऐसे समय में जब हर कोई परेशान था तो सेक्स वर्कर्स कैसे अपना जीवन गुज़ार पा रही थीं? और एक सामाजिक कार्यकर्ता किस तरह की चुनौतियों का सामना कर रही थी? सरिता और मैडम के इस दूसरे एपिसोड में क्रुपा हमें यही बताने वाली हैं कि लॉकडाउन के दौरान सरिता ने क्या किया.