द थर्ड आई टीम के लेख

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.

विशेष फीचर: तुम्हारे नाम…

मैं जेल के भीतर काम करती हूं. मैं जिनके साथ काम करती हूं वे कैदी है. तो मैं क्या हूं? सामाजिक कार्यकर्ता भी कई तरह के होते हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं. पर, अक्सर जेल के भीतर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं से पूछा जाता है कि, “कोई जेल में क्यों काम करना चाहेगा?”

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 08 – मंजू सोनी

मिलिए मंजू सोनी से जो बांदा, उत्तर-प्रदेश की रहनेवाली है. मंजू, 2000 से वनांगना संस्था के साथ काम कर रही हैं. पिछले पांच साल से वे संस्था में जेंडर आधारित हिंसा के मामलों में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं.

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 07 – अवधेश गुप्ता

केसवर्कर्स के साथ मुलाकात के इस एपिसोड में मिलिए बांदा, उत्तर-प्रदेश की रहने वाली अवधेश गुप्ता से, जो 1995 से वनांगना संस्था के साथ बतौर केसवर्कर काम कर रही हैं.

“हिंसा की तलाश थी और प्यार मिल गया.”

महिला कैदियों की ज़िंदगी के बारे में हम बहुत कम जानते हैं. लोक कल्पनाओं और कहानियों में या तो वे सिरे से गायब होती हैं या सामाजिक नियमों का उल्लंघन करने वाली, असाधारण, बिगड़ी हुई महिला के रूप में उनका चित्रण किया जाता है. पर, एक आम महिला कैदी का जीवन कैसा है? उसकी आपराधिकता क्या है? इसके जड़ में क्या छिपा होता है? उस महिला कैदी के डर, सपने और चाहतें क्या हैं? उसके लिए जेल के बाद की दुनिया कैसी होती है?

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 06 – कुसुम

केसवर्कर्स से मुलाकात के इस एपिसोड में मिलिए महरौनी, उत्तर-प्रदेश की रहने वाली कुसुम से, जो महरौनी स्थित सहजनी शिक्षा केंद्र के साथ 2008 से काम कर रही हैं.
अपने अनुभवों को साझा करते हुए कुसुम बताती हैं, “एलएलबी तो हमने नहीं की है, इनसे तो हम बहुत दूर हैं लेकिन हमें पता है कि किस केस में किस तरह की धारा लगना चाहिए.”

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 05 – राजकुमारी प्रजापति

केसवर्कर्स के साथ मुलाकात के इस एपिसोड में मिलिए राजकुमारी प्रजापति से जो उत्तर-प्रदेश के ललितपुर की रहने वाली हैं. 2008 में जब राजकुमारी सहजनी शिक्षा केंद्र से जुड़ीं तो उस वक्त उनकी उम्र 19 साल थी. वे आवासीय शिक्षण केंद्र में बतौर एक शिक्षिका महिलाओं और किशोरियों को पढ़ाने का काम करती थीं. आगे वे सहजनी के साथ ही महिला हिंसा के मुद्दों पर काम करने लगीं और तब से आजतक एक केसवर्कर की भूमिका में निरंतर सक्रिय हैं.

केसवर्कर्स से एक मुलाकात एपिसोड 4 – शबीना मुमताज़

मिलिए उत्तर-प्रदेश के बांदा ज़िले में स्थित वनांगना संस्था से जुड़ी शबीना मुमताज़ से, जो पिछले 17 सालों से महिला हिंसा से जुड़े मुद्दों पर काम कर रही हैं. खुद आर्थिक, यौनिक और मानसिक यातनाओं को झेल चुकी शबीना कहती हैं, “एक महिला को न्याय मिलना चाहिए. मुझे बहुत खुशी होती है जब मैं किसी महिला को उस दलदल से बाहर निकाल लाती हूं.”

केसवर्कर डायरी | एपिसोड 3: संडे का दिन

केसवर्कर्स डायरी के तीसरे एपिसोड में एक केसवर्कर हमें अपने संडे के दिन के बारे में बताती है, सप्ताह का वह दिन जब अपने बेटे के साथ वह अपने पति के गांव जाती है जहां गांव के लोगों के तीखे सवालों के साथ-साथ उसकी सबसे प्यारी सहेली— एक महुआ के पेड़— उसका इंतज़ार कर रहा है.

केसवर्कर डायरी | एपिसोड 3: संडे का दिन

लड़कियां या औरतें समझौता करना कहां से सीखती हैं? कैसे वे मायके और ससुराल में सभी को खुश रखने के लिए अपनी खुद की ज़िंदगी को होम करने के लिए तैयार हो जाती हैं? सच यह है कि पैदा होने से लेकर बड़े होने तक अपने आसपास मां, बहन, दादी, चाची, नानी…इन सभी को वे समझौता करते ही देखती हैं.

कतरनों से सपने बुनती बुंदेलखंड की औरतें

हंसा छोटी-छोटी गुड़ियाओं को अपने काम में शामिल करती हैं – कभी सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में, कभी भावों को व्यक्त करने के लिए तो कभी अपनी कलाकृति को सामने रखने के लिए. यही वजह है कि ‘क्या है यह समझौता’ सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं बल्कि एक लघु–दृश्य कथा है जिसमें कई तरह के भावों का मिश्रण है जो शब्दों से छन कर आपस में घुलते जाते हैं.