अंक 005: अपराध

नारीवादी निगाह से

दिल्ली की दीवार

अपराध संस्करण में हम हिंदी की मूल कहानियों के ज़रिए भी अवधारणाओं पर बात करने की कोशिश कर रहे हैं. इस कड़ी में पेश है दूसरी कहानी – दिल्ली की दीवार. इस कहानी के लेखक हैं प्रतिष्ठित एवं चर्चित साहित्यकार उदय प्रकाश.

निधि सुरेश: ब्रेकिंग न्यूज़ के दौर में निःशब्द और मौन सवालों का क्या मतलब है?

F – रेटेड इंटरव्यूह के तीसरे एपिसोड में मिलते हैं निधि सुरेश से जो हमें लखीमपुर और हाथरस ले जाती हैं और घटनास्थल पर अपराध के बाद होने वाली हिंसा को अपनी पत्रकारिता के ज़रिए दिखाती हैं. वह स्थानीय पत्रकारों के साथ काम करने के लिए रणनीतियां आज़माती हैं और धीमे और शांत प्रश्नों के महत्त्व पर प्रकाश डालती हैं, तब भी (और विशेष रूप से) जब पत्रकारों की भीड़ एक कहानी को कवर कर रही हो.

कैसे सामाजिक कार्यकर्ता कैदियों को कानूनी भूलभुलैया में रास्ता दिखाते हैं

यह लेख सामाजिक कार्य (सोशल वर्क) के क्षेत्र में काम करने वाले उन पेशेवरों एवं छात्रों की बात करता है जिन्हें कैदियों के साथ काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. यह उन महत्त्वपूर्ण बिंदुओं का पता लगाने का काम करता है जिन्हें इस काम के दौरान पार करने की ज़रूरत होती है ताकि एक ऐसी आबादी के साथ काम किया जा सके जिसके बारे में मौजूदा आख्यान सकारात्मक नहीं होते.

नीतू सिंह: एक मुकम्मल कहानी के पीछे क्या-क्या होता है?

F रेटेड इंटरव्यूह के दूसरे एपिसोड में मिलिए नीतू सिंह से जो एक स्वतंत्र पत्रकार, मीडिया प्रशिक्षक और शेड्स ऑफ रूलर इंडिया यू-ट्यूब चैनल की संस्थापक हैं. पत्रकारिता के अपने करियर की शुरुआत ग्रामीण मीडिया संस्थान ‘गांव कनेक्शन’ से करने वाली नीतू अपने काम के ज़रिए इस सोच को चुनौती देती हैं कि एक रिपोर्टर का काम सिर्फ़ घटना के बारे में जानकारी देना भर है.

कहते हैं कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, पर क्या होगा जब कानून का दिल भी बहुत बड़ा हो?

पुनर्स्थापनात्मक न्याय/ रिस्टोरेटिव जस्टिस के दूसरे हिस्से में पढ़िए ज़मीनी स्तर पर यह कैसे काम करता है और जेल में बंद महिला कैदियों के जीवन में इसकी क्या भूमिका है.

कुन्तला

पेश है इस संस्करण की पहली कहानी ‘कुन्तला’. सच्ची घटना पर आधारित यह कहानी लेखक सीमा आज़ाद ने दो साल तक इलाहाबाद की नैनी जेल में रहने के अपने अनुभवों के आधार पर तैयार की है. ये उनकी किताब ‘औरत का सफर’ में प्रकाशित है.

प्रियंका दूबे: एक क्राइम रिपोर्टर की दुनिया

F – रेटेड इंटरव्यू के पहले एपिसोड में मिलिए द्विभाषी लेखक एवं पत्रकार प्रियंका दूबे से. इस एपिसोड में प्रियंका, 14 साल के अपने खोजी रिपोर्टिंग करियर के दौरान हिंसा, सामाजिक न्याय और मानवधिकारों से जुड़े मामलों पर व्यापक स्तर पर लिखने, खुद की तैयारी, जीवन पर उसके प्रभाव और कविताओं के साथ, पर विस्तार से बातचीत कर रही हैं.

ये F – रेटेड क्या है?

निरंतर रेडियो पर पेश है एक नया शो, जहां होंगी बातें F – रेटेड यानी फेमिनिस्ट रेटेड! इस शो में आप मिलेंगे अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले अभ्यासकर्ताओं से और नारीवादी नज़र को केंद्र में रखते हुए द थर्ड आई टीम के साथ होंगी रोचक, शानदार, जानदार बातें.

अगर प्रकृति के साथ कुछ बुरा होता है तो क्या वो अपराध कहलाएगा?

लर्निंग लैब में जब हमने क्राइम पर चर्चा शुरू की तो एक ख्याल बार-बार आता रहा. किसी इंसान के साथ कुछ गलत करो तो वह अपराध कहलाता है, पर अगर प्रकृति के साथ कुछ गलत करो, तो क्या वो भी अपराध माना जाएगा? इस सवाल की पेचीदगी को समझने के लिए हमने कुछ लिखित और विज़ुअल नोट्स बनाए हैं, जिन्हें आपके साथ साझा कर रहे हैं.

“हिंसा की तलाश थी और प्यार मिल गया.”

महिला कैदियों की ज़िंदगी के बारे में हम बहुत कम जानते हैं. लोक कल्पनाओं और कहानियों में या तो वे सिरे से गायब होती हैं या सामाजिक नियमों का उल्लंघन करने वाली, असाधारण, बिगड़ी हुई महिला के रूप में उनका चित्रण किया जाता है. पर, एक आम महिला कैदी का जीवन कैसा है? उसकी आपराधिकता क्या है? इसके जड़ में क्या छिपा होता है? उस महिला कैदी के डर, सपने और चाहतें क्या हैं? उसके लिए जेल के बाद की दुनिया कैसी होती है?

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