फ़ारिग के लेख

फ़ारिग, पेशे से एक पत्रकार, विज़ुअल आर्टिस्ट हैं व खुद की पहचान को 'एक गिरे हुए पत्ते की तरह मानती हैं जिसका रंग भूरा है.' वह अमूमन जाति, जेंडर, हिंसा, राजनीति व आम लोगों कि रोज़मर्रा की कहानियों को लिखने की कोशिश करती हैं. पेड़ इनके मित्र - सखी, दोस्त बंधु हैं, जिनका आलिंगन वह हर जगह तलाशती हैं. वह मानती हैं कि लड़ाई की शुरुआत होना ज़रूरी है बेशक आप अकेले ही क्यों न हों.

एक चम्मच चीनी की चाहत रखने वाला समुद्र

हम जो चाहते हैं वो क्यों चाहते हैं? और जो चाहते हैं वो कभी पूरा न हो इसकी ख्वाहिश क्यों करते हैं? और फिर वापस से उन्हीं चाहतों के पीछे भागने लगते हैं. ये ऐसे फरेबी सवाल हैं जिनका जवाब कई मनोविश्लेषकों ने देने की कोशिश तो की है लेकिन इन सवालों के बीच खुद को खोना और पाना कैसा होता है?