एक चम्मच चीनी की चाहत रखने वाला समुद्र

चाहतें और उनकी बारीकियों पर एक निबंध

चाहत_डर
चित्रांकन: अशनी सिंह

हम जो चाहते हैं वो क्यों चाहते हैं? और जो चाहते हैं वो कभी पूरा न हो इसकी ख्वाहिश क्यों करते हैं? और फिर वापस से उन्हीं चाहतों के पीछे भागने लगते हैं. ये ऐसे फरेबी सवाल हैं जिनका जवाब कई मनोविश्लेषकों ने देने की कोशिश तो की है लेकिन इन सवालों के बीच खुद को खोना और पाना कैसा होता है? ‘मज़ा और खतरा’ संस्करण में हमारी ‘सेक्सी लोग’ फ़ारिग (बदला हुआ नाम) इन मायावी सवालों को अपनी ज़िंदगी के अनुभवों के ज़रिए सामने रख रही हैं. उनके साथ उन टेढ़ी -मेढ़ी गलियों में चलकर देखिए क्या ये सवाल आपको भी परेशान करते हैं?

यह लेख ‘द थर्ड आई’ सेक्सी लोग मेंटरशिप कार्यक्रम के तहत तैयार किया गया है. इस कार्यक्रम में भारत के अलग-अलग हिस्सों से चुने गए दस लोगों ने यौनिकता को लेकर ‘मज़ा और खतरा’ विषय पर अपने अनुभवों को लेख के रूप में तैयार किया है.

आज मैंने अपनी पसंद से बाल कटवा लिए, इसके बोझ से मेरे कंधे बहुत भारी लग रहे थे. मां को बताया तो उन्होंने एकदम से डांट कर कहा, “अब छोटे नहीं कराना.” और हमेशा की तरह मैंने मां की बात नहीं मानी. किसी समय मुझे लंबे बाल बहुत सुंदर लगते थे, पर अब लंबे बाल मुझे याद दिलाते रहते हैं कि ये मेरी शादी के लिए हैं. इसके मैं खिलाफ तो नहीं, पर इसमें मेरी खुशी और मर्ज़ी भी नहीं है. अब मुझे छोटे ही बाल पसंद है, ज़िग-ज़ैग वाले.

मैंने हेयर ड्रेसर से कहा, “मुझे एक हिसाब के बाल नहीं चाहिए.”

बाल काटने के दौरान वो मुझसे काफ़ी बातें करता रहा. जब बाल कट गए तो उसने कहा, “क्यूट लग रहे हो”. मैं हंस पड़ी. मुझे कभी खुद की तारीफ लेना आया ही नहीं, और जब कोई लड़का कहे तो मेरे कान खड़े हो जाते हैं कि इसने ऐसे क्यों बोला? और अगर बोला, तो मुझे कैसे रिएक्ट करना चाहिए! मैं एक बार फिर हंसी और सैलून से निकल, मेट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ गई.

मेट्रो के एस्कलेटर से नीचे जाते हुए पीछे से एक आवाज़ आई,

“हेलो!”

मैं पीछे मुड़ती इससे पहले ही वो मेरी बगल में आकर खड़ा हो गया. मैंने उसकी तरफ देखा और कहा, “मैं तो तुम्हें नहीं जानती.”

“सेम-सेम”, अपनी शर्ट और मेरे ड्रेस के कलर की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा. फिर वो अचानक मेरे बालों की तारीफ करने लगा. पूछने लगा किससे इंस्पायर्ड हैं?

“आप पर बहुत अच्छे लग रहे हैं.”

वह बार-बार मेरा नाम पूछता और मैं कहती, “मैं नहीं बात करती सबसे.”

फिर कहता, “आप बहुत सुंदर लग रहे हो, मुझे कॉम्प्लिमेंट देना नहीं आता. मैं पहली बार दे रहा हूं.”

मुझे उसकी बातें अच्छी लग रही थीं, पर दिमाग में एक ख्याल दौड़ा कि अगर मैं अपने चेहरे से मास्क हटाकर इससे बातें करूं, और बोलते हुए जब ये मेरे आड़े-टेढ़े दांत देखेगा तो क्या तब भी मैं इसे खूबसूरत लगूंगी?

मैं ज़्यादा से ज़्यादा देर तक मास्क पहने रहती हूं. मैं खुद को कभी सुंदर नहीं लगी. मास्क या दुपट्टे के पीछे खुद को छिपाने का काम मैं बचपन से करती आ रही हूं. इस तरह खुद को छिपाने की एक बड़ी वजह यह भी है कि मैं नहीं चाहती कि लोग मेरे चेहरे की तरफ देखकर घूरें और बातें करें. मैंने कई बार मास्क उतारकर अपने इन ख्यालों को तोड़ने की कोशिश की है, पर कुछ ही पल में फिर मास्क के पीछे चली जाती हूं, अपने चेहरे और दांतो को छिपाने.

हां, पर इस बीच वो डायलॉग पर डायलॉग मारता रहा, “आपने नाम क्या बताया अपना? ” मैं मन ही मन बहुत हंस रही थी. यह ट्रिक तो कभी पुरानी नहीं होती. फिर उसने कहा, “मैं आपको कहीं ड्रॉप कर दूं?” मैंने मन ही मन कहा, “कितना बुद्धू है. हम मेट्रो स्टेशन के अंदर है, ये मुझे कहां और कैसे ड्रॉप करेगा?”

मैं उसे बुद्धू कह रही थी और खुद बुद्धुओं की तरह हरकतें करती रही.

वो बार-बार मेरे बारे में जानने की कोशिश करता और मैं बस बार-बार थैंक्यू बोलती. एक हाथ अपने दिल पर रख थैंक्यू बोलते हुए मैं अपना सिर झुका देती. मेरे दिमाग में मुझे यह समझ आ रहा था कि ये नहीं करना है, पर पता नहीं क्यों मेरी बॉडी दिमाग की बातों को सुन ही नहीं रही थी.

कोई मेरे प्यार में गिर जाए या मैं किसी के प्यार में गिर जाऊं, हमेशा सबसे यही कहती आई. वो पहली नज़र वाला प्यार, वो कैसा होता है? ये हमेशा से महसूस करना था. पर वो मुझसे कभी हुआ ही नहीं. बस ख्यालों में ही उसे ज़िंदा करती रहती. ख्याल ज़्यादा करीब, भरोसेमंद और साथ देने वाले लगते हैं क्योंकि इन्हें कोई देख नहीं सकता. मतलब इसके लिए कोई मुझे जज भी नहीं करेगा.

मेरी चाहत उस सर्फिंग बोर्ड की तरह है जिसका ना तो मैं वज़न उठा पा रही हूं, न ही उसके साथ चल पा रही हूं, और ना ही उसे थाम पा रही हूं.

सर्फ बोर्ड का वज़न मुझे अपने शरीर के भार से भी ज़्यादा लगता है. समुद्र में उतर जाने के बाद, मेरा शरीर हल्का और मेरी चाहत का भार और भी भारी और बेकाबू हो जाता है. मैंने बोर्ड पर चढ़ना सीख लिया है, लेकिन उसके साथ तैरना नहीं.

कुछ दूरी तक वो लड़का मेरी बगल में ही चलता रहा. कुछ न कुछ बोलता ही जा रहा था. फिर वो अपने प्लेटफॉर्म की तरफ मुड़ गया और मैं अपने. मैं एक बार मुड़ी उसे देखने के लिए तब तक वो भीड़ में गुम हो चुका था.

यहां सब ‘गड्डमड्ड’ है.

***

आज तीन बड़ी लहरों ने थपेड़े मारते हुए मुझे डुबो दिया, लेकिन आज मैं डूबने पर भी बाहर निकल आई. मेरे इंस्ट्रक्टर ने मुझे बताया था, अगर बड़ी लहरें तुम तक आएं तो उससे बचने की कोशिश मत करो. उसे खुद तक आने दो. उसे ऊपर से पार करने की कोशिश मत करो, बल्कि उसके अंदर चली जाओ, खुद को उन लहरों में डुबो लो और ऐसा करने पर तुम बच जाओगी. आज ऐसा करने पर मैंने जाना कि डूबने पर भी बचा जा सकता है. अब मैं इन लहरों से बातें करना सीख रही हूं, जिस तरह से वो मुझसे बात करना चाहती हैं. उस तरह से नहीं जिस तरह से मैं, बस इन्हें, अपने मन के समुद्र में बसाती आ रही थी.

मैंने यह भी जाना कि जिस समुद्र को मैं अपना कहती रही, वो मुझसे बहुत अनजान था, या यूं कहूं कि मैं उसके असल रूप से अनजान थी. मुझे यह भी समझ आया कि अगर मुझे मेरे इंस्ट्रक्टर का साथ नहीं मिलता तो मैं कभी समुद्र में नहीं उतरती. मैं शायद इसके किसी किनारे पर अपने चुने हुए सर्फिंग बोर्ड के साथ घंटों बैठी रहती और सोचती कि अगर मैं उसमें अकेले गई तो डूब जाऊंगी.

मैंने खुद को यह साफ कह दिया था कि यह मुझसे तो नहीं होगा, फिर भी मैंने इसे चुना…

मैंने अपने इंस्ट्रक्टर से एक बार पूछा था कि आप मुझे ही सिखाने के लिए क्यों आए यहां तो बहुत सारे लोग थे? उनका जवाब था, “तुम्हें डरते हुए देखकर.” उन्होंने कहा, “समुद्र में जाने से तुम्हें डर लग रहा था, इसलिए मैं तुम्हारे पास आया.” ये सुनकर मुझे अच्छा लगा. उस दिन के बाद, जब तक मेरा सर्फिंग का कोर्स चला, मैंने कभी अपने इंस्ट्रक्टर का हाथ नहीं छोड़ा. उसे एकदम कसकर मज़बूती से पकड़ लिया. दूसरे लोगों के पास हर दिन सिखाने के लिए अलग-अलग इंस्ट्रक्टर थे और मेरे लिए बस वो, क्योंकि मैं हर दिन किसी नए इंसान पर भरोसा नहीं कर सकती थी.

उन्होंने मुझे समझा भी. हर सुबह जब मैं मुलकी के उस बीच पर पहुंचती तो हाथों में सर्फिंग बोर्ड उठाए, सबसे पहले अपने इंस्ट्रक्टर को ढूंढती, उनका इंतज़ार करती क्योंकि जब-जब मैं समुद्र में अकेले गई हूं, लहरों ने मुझे बोर्ड के साथ बाहर फेंक दिया है. कुछ इस तरह कि कभी वो बोर्ड मेरे मुंह पर आकर लगा तो कभी लहरों ने रेत से मुझे घसीटते हुए मेरे शरीर को ज़ख्मी कर दिया. मैं समुद्र के थोड़ा अंदर जाती और तब तक इंस्ट्रक्टर मेरे पास आ जाते. वह मेरे हाथों से सर्फ बोर्ड लेकर खुद पकड़ लेते. एक हाथ में मेरा सर्फ बोर्ड होता और उनकी दूसरी तरफ मैं, उनकी बाहों को ज़ोर से पकड़े हुए. जब लहरें आतीं तो वो मेरा सर्फ बोर्ड भी संभालते और मुझे भी.

शुरूआती दिनों में मैं जब लहरों की वजह से डूब जाती तो वो मुझे ढूंढते और कहते, “जल्दी उठ जाया करो नहीं तो दूसरी लहर आएगी और तुम्हें फिर डूबा देगी”. वे ऐसे ही हंसते-हंसते कहते, “अरे! उठ जाओ, कहां गईं? इतने से पानी में डूब जाती हो.” और मैं गुस्से से कहती, “आपके लिए कहना आसान है, मुझे तो तैरना भी नहीं आता, तो मैं तो डूबूंगी ही ना.”

शुरू के कुछ दिनों में मुझे लगा था कि शायद मैं यहां किसी से बात न कर पाऊं. पर जैसे-जैसे इंस्ट्रक्टर को पता चला कि मैं बिहार से हूं और भोजपुरी बोलती हूं, सब बदल गया.

वहां आधे से ज़्यादा इंस्ट्रक्टर्स या तो बिहार से थे या फिर नेपाल से . मेरे सबसे पहले दोस्त मेरे इंस्ट्रक्टर ही थे.

जब उन्हें पता चला कि मैं भोजपुरी बोल सकती हूं तो वो मुझे कहते, “तुम हमसे भोजपुरी में ही बात किया करो”. मैं उनसे कहती कि मैं उतना अच्छा नहीं बोलती, लेकिन वे कहते, “जितना बोलती हो, अच्छा बोलती हो. हमें अच्छा लगता है अपनी भाषा सुनकर. तुम मज़ेदार इंसान हो, फ़नी और आज़ाद, ऐसे ही होना चाहिए.” मुझे कभी नहीं लगा था कि इस जगह पर भाषा मुझे लोगों के इतने करीब ले आएगी. मैं सबको यही कहती, “इतनी भोजपुरी तो मैनें पूरे साल नहीं बोली जितनी एक हफ्ते में बोल दी है.”

समुद्र के बीच रहते हुए गाना गाना मेरे लिए सुकून भरा था. चार-पांच इंस्ट्रक्टर तो ऐसे थे जो मेरे आस-पास ही रहते थे, जिनसे मेरी अच्छी दोस्ती थी. हम साथ में गाना गाते, मज़े करते और जब मैं लहरों पर चढ़ते हुए किनारे तक जाती तो वे खुशी से मेरी तरफ देखते और शाबाशी देते. वो मेरे लिए अलग ही सुकून था.

सर्फिंग का शायद चौथा या पांचवा दिन था. मैं अपने इंस्ट्रक्टर के साथ सर्फिंग कर रही थी और गाना गा रही थी, “हवा के साथ-साथ, घटा के संग-संग, ओ साथी चल.” इतनी ही देर में कुछ दूर से एक इंस्ट्रक्टर मुझे आवाज़ देते हुए मेरे सर्फबोर्ड के पास आए और कोई फ्लर्ट करने वाला गाना गाने लगे. मैंने हंसकर इग्नोर कर दिया. हालांकि इस तरह का अटेंशन मुझे अच्छा लग रहा था.

समंदर जो खुद में प्रेम का एक गहरा आज़ाब है वहां इस तरह की फ्लर्टिंग गुदगुदाने वाली थी. जितनी देर मैं समंदर में रहती, “मेरा दिल-दिमाग सब पानी हो जाता, एक दम खारा पानी.”

जिसका स्वाद तो मुझे पसंद नहीं लेकिन उसकी गहराई पसंद है. तो बस, इसे भी खुद तक आने दिया. इतना कि शरीर खारे पानी का प्याला बन गया.

इतने में मेरे इंस्ट्रक्टर ने मुझसे कहा, “वह तुम्हें पसंद करता है इसलिए तुमसे बार-बार बात करता है, तुम्हारे पास आता है.” और मैं कहती, “ये बात तुम क्यों कह रहे हो, ये तो उसे कहना चाहिए.”

और अगले दिन सर्फिंग करते हुए वे इंस्ट्रक्टर मेरे सर्फबोर्ड के माथे के सामने आ गए, उसे थाम लिया. हम एक-दूसरे के सामने थे. हमारे बीच बस एक हाथ का फासला था. भोजपुरी में उन्होंने मुझसे कहा, “हम ताहरा के पंसद करेनी” और एक बार फिर मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या कहूं. इतनी देर में कुछ दूरी से एक और इंस्ट्रक्टर ने नेपाली में यही कहा, “म तिमीलाई माया गर्छु” ( शायद इसे ऐसे ही लिखते हैं) मुझे दोबारा यही लगा कि वे मज़ाक कर रहे हैं.

खुद में मुझे अपनी ये वाली बात भी बहुत बुरी लगती है कि मैं सामने वाले को जानकर भी उसके एहसास को मज़ाक का नाम दे देती हूं. कोई मुझे पसंद करता है, इस बात पर विश्वास करना मेरे लिए सबसे मुश्किल है. कोई बार-बार भी कहे तो भी मैं बार-बार इसे एक झूठ की तरह ही लेती हूं. ये लॉजिक मुझे समझ नहीं आता.

जब भी मैं उस दिन के बारे में सोचती हूं तो मुझे बहुत गुदगुदी होती है यह सोचते हुए कि किसी ने मुझे समुद्र के बीचों-बीच प्रपोज़ किया है. फिर मैं यही सोचती हूं कि आखिर उन्हें मुझमें क्या पसंद आया होगा? मैं फिर खुद को, खुद के शरीर, खुद के रंग को जज करने लगती हूं. लेकिन जब भी ऐसी कोई चीज़ होती है, जहां कोई मुझे पसंद कर रहा हो तो एक बार फिर मैं वहीं आ जाती हूं, उसी लड़ाई पर जहां से मैंने खुद को अपनाने का संघर्ष शुरू किया था. बहुत मुश्किल है, एक ऐसे समाज में खुद को अपना पाना जहां हर कोई आपको सिर्फ अपने हिसाब से बनाना, चलाना चाहता है.

कई बार तो मैं इस बात पर भी लड़ पड़ती हूं कि कोई मुझे उनके नज़रिए से क्यों देख रहा है? वैसे क्यों नहीं देख रहा है जिस तरह से मैं दिखा रही हूं? काफी घुटन है, खुद को दिखाने और समझाने में. ये सब बहुत थकाने वाला है इसलिए मैं सबको झूठ और मज़ाक बना देती हूं जबकि ऐसा चाहती नहीं.

उनके इज़हार का जवाब मेरी “ना” के साथ तैयार था.

मुझे मालूम है कि मुझे लोगों से दूरी बनाना बहुत अच्छे से आता है. खासकर उनसे जो मुझे पसंद करते हैं, मुझे जानना चाहते हैं और मेरे करीब आना चाहते हैं.

समुद्र को विदा बोल मैं अगली यात्रा की ओर बढ़ गई.

***

कुछ दिन पहले एक अजीब सी चीज़ हुई. मैं ट्रेन में थी और शायद आधी रात से ज़्यादा का समय हो रहा था. थोड़े अंधेरे, थोड़े उजाले के बीच मैंने एक लंबे से लड़के को अपनी सीट से गुज़रते देखा. शायद वो सीट ढूंढ रहा था. मैंने खुद से अपने दिमाग में कहा कि अगर वो आया तो मैं उसे बैठने के लिए सीट दे दूंगी. कुछ देर तक वो नहीं आया तो मुझे लगा कि उसे सीट मिल गई होगी. पर सुबह पांच-छह बजे मेरे सामने की सीट पर अचानक वो आकर बैठ जाता है. ट्रेन एक स्टेशन पर कुछ देर रुकी, और वो मलाई दूध की दो बोतल ले आया. एक अपने लिए और एक मेरे लिए. इस पूरे समय मैं उसकी तरफ देखकर भी अनदेखा कर रही थी. बहुत अजीब-सी हो गई हूं, कोई अटेंशन देता है तो हज़म नहीं होता और कोई नहीं देता तो बस उसे ढूंढती रहती हूं.

उससे बात न करनी पड़े इसलिए मैं चादर ताने उसकी तरफ पीठ करके सो गई. उस समय शायद सुबह के 6 या 7 बज रहे थे. और उसे 10:30 बजे मडगांव उतरना था. वो भी सोलो ट्रिप पर आया था, मेरी ही तरह. मैंने अपने दिमाग में ठान लिया था कि मुझे उसे बात करने का मौका ही नहीं देना. मैं तब तक सोती रहूंगी, जब तक उसका स्टेशन न आ जाए.

मेरी नींद 9:30 बजे के आस-पास खुली. मेरे दिमाग में यह साफ था कि अब कोई बात नहीं होगी, क्योंकि इतने कम समय में क्या ही बात होगी, क्यों ही कोई बात शुरू करेगा और शुरू से लेकर आखिर तक मैं बस गलत साबित होती रही. उसने फिर बहाना बनाते हुए मुझसे बात करने की कोशिश की और बस मेरे दिमाग में वही था कि आखिर कितनी ही बात होगी. आखिर में मैंने कहा, “ठीक है, जब तक तुम्हारा स्टेशन नहीं आता तुम बैठ जाओ.”

और बस यहां से मैंने वही फिल्मी किस्सा अपने साथ होते हुए देखा जो मैं चाहती थी कि वो मेरे साथ भी हो.

मेरे बगल में बैठकर उसने मुझसे कहा कि वो पूरे टाइम मुझसे बात करने का मौका देख रहा था. उसे यह भी डर था कि अगर मैं नहीं उठी तो वो बात नहीं कर पाएगा. उसने कहा, “तुम्हारी जैसी लड़की कभी नहीं देखी.” फिर कहता, “जब तुम सो रही थी तो बहुत प्यारी लग रही थी, मैं बार-बार बस तुम्हें ही देख रहा था कि कब तुम उठो और मैं तुमसे बात करूं. मुझे तुमसे वो पहली नज़र वाला… तुम मुझे पहली नज़र में पसंद आ गई.” उसकी यह लाइन मेरे दिमाग में छप गई. ये सुनने के बाद, मेरे चेहरे पर शक, मुस्कुराहट और हंसी सब थे. मैं अपने दिमाग में बस यही सोचे जा रही थी कि ये शायद मुझे पागल बना रहा है. ऐसा थोड़ी न होता है. फिर कुछ देर में उसने कहा, “तुम हंसते हुए बहुत अच्छी लगती हो, मैं बार-बार तुम्हारी हंसी को देख रहा हूं.” और एक बार फिर मैं अपने आड़े-टेड़े दांतो के बारे में सोचने लगी.

उसने मुझसे पूछा कि मैं कहां जा रही हूं. मैंने कहा, “मंगलूरु”. उसका स्टेशन आने में 10 मिनट थे. उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसके साथ गोवा आना चाहती हूं? वो चाहता है कि वो मेरे साथ टाइम बिताए. मैंने कहा, “तुम्हें बहुत लोग मिल जाएंगे.” पर वो इस बात पर अड़ा रहा कि नहीं, उसे मेरे साथ ही घूमना है. जो उसे मेरे साथ लग रहा है, वो किसी के साथ नहीं लगेगा. कहता, “तुम हंसती हो तो सांसे तेज़ हो जाती हैं, दिल कभी-कभी सांस लेना बंद कर देता है.” और मैं बस हंस रही हूं, हंसे ही जा रही हूं. उसका स्टेशन आने ही वाला था. जब मैंने उसके साथ गोवा जाने से मना किया, यह कहते हुए कि मैं ऑफिस के काम से आई हूं, और मैं ऐसे बीच में नहीं जा सकती. मेरे कॉलीग मेरा इंतज़ार कर रहे हैं.

जब ट्रेन मडगांव स्टेशन पर आ चुकी और मेरे दिल में यह खयाल आया कि जो भी उसने अभी तक कहा, मुझे अच्छा लगा पर अब उसे चले जाना चाहिए. यही मेरे लिए अच्छी मेमोरी होगी. और इस बीच वो कहता कि, “क्या मैं तुम्हारे साथ मंगलूरु चलूं? इसी बहाने तुम्हारे साथ और बात करने और टाइम बिताने का समय मिल जाएगा. मुझे कुछ नहीं चाहिए, ज़्यादा समय नहीं, बस तुम्हारे साथ वहां तक जाना है, एक अच्छी जगह पर तुम्हारे साथ चाय पीनी है और फिर मैं वापस लौट जाऊंगा.” ट्रेन स्टेशन पर खड़ी थी और वो बार-बार मुझे उसे रोकने को कह रहा था. “बस रुकने के लिए कह दो, दिलासे के लिए या झूठ ही कह दो, लेकिन रुकने के लिए कह दो.” ट्रेन अब निकलने वाली थी पर वो नहीं.

ट्रेन स्टेशन को छोड़ चुकी थी, और अभी भी उसका यही सवाल था कि मैं उसे रुकने को कह दूं.

इस बीच उसने अचानक से एक बात कही, जिसे अगर मैंने सही सुना है तो वो चीज़ मुझे पसंद नहीं आई. कुछ चीज़ें जहां मैं सोच रही थी कि मैं उसपर विश्वास कर सकती हूं, वो भी मेरे दिल से चली गईं. मुझे बस ये लगा कि ये मुझे घुमा रहा है, ये मुझे इज़ी समझता है.

वो कहता, “मेरे पास टिकट नहीं है, अगर टीटी आता है तो कह देना कि मैं तुम्हारे साथ हूं.” यहीं तक बात रहती तो भी ठीक था. पर उसने आगे कहा कि अगर वो पेनल्टी मांगे तो तुम दे देना. बस मुझे यहीं समझ आ गया कि शायद मेरा फायदा उठाने के लिए मुझसे ये सब कह रहा था. वो मुझे कोई पसंद-वसंद नहीं करता.

मैं फिर से अपने कलर, अपनी इन्सेक्युरिटीज़ के बारे में सोचने लगी. अभी तक जो भी उसने कहा, वो सब मेरे लिए बस सवाल हो गए थे.

वो अब भी यही कह रहा था कि मैं उसे रुकने को कहूं. मैंने कहा, “तुम अगले स्टेशन पर उतर जाना. अगला स्टेशन आने में अभी एक घंटा है. इस बीच तुम्हें जो बात करनी है, जो पूछना है, पूछ लो.” मैं उसे सुनना चाहती थी कि वो क्या कहना चाहता है, क्यों रुकना चाहता है.

वो मुझसे बस एक हाथ की दूरी पर बैठा था. उसका एक हाथ मेरे कंधे से दो हथेली की दूरी पर था. वो मुझे जानना चाहता था कि मुझे किस तरह के लड़के पसंद हैं. “मुझे वो लड़के पसंद हैं जो देश-दुनिया के बारे में सोचते हों क्योंकि मैं एक पोलिटिकल पर्सन हूं.” और वो पॉलिटिकल पर्सन को बस करंट अफेयर्स समझता रहा. मैंने कहा, “मैं फेमिनिस्ट हूं.” तो कहता, “वही न जो फीमेल के बारे में बात करती हैं.”

इतनी देर में अगला स्टेशन आ गया. जाने से पहले तक वो मेरे रोकने का शायद इंतज़ार कर रहा था. जब वो ट्रेन से उतरा तो मैंने उसकी तरफ़ देखा, पर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा. वो मुझसे बार-बार कह रहा था कि वो मुझे याद रखेगा, नहीं भूलेगा, जो उसे मेरे साथ लगा. पर अभी तक उसने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा. मुझे समझ आया कि शायद सब झूठ था, या अगर मैं उसे रोक लेती तो क्या होता. मुझे डर था. मैं एक तरफ उसके साथ जाना चाहती थी. सच कहूं तो जब वो मेरे साथ आखिर तक जाने के लिए कह रहा था तो यह सब चीज़ें मैं इमेजिन कर रही थी कि अगर ऐसा हो तो मुझे अच्छा लगेगा. मुझे यह अच्छा लग रहा था. मैं उसके मंगलूरु तक जाने, उसके साथ चाय पीने, उसके साथ गोवा घूमने का खयाल अपने मन में बुन रही थी. फिर से एक फिल्मी कहानी मेरे दिमाग में थी कि ऐसे ही दो अलग लोग मिलते हैं और एक साथ हो जाते हैं…

मैं प्यार चाहती हूं लेकिन कर नहीं पाती. मैं प्यार का खयाल करती हूं पर वो मुझे समझ नहीं आता. मुझे चाहतें आराम देती हैं पर उन्हें जीने के समय मैं डर कर भाग जाती हूं.

ऐसा नहीं है कि मुझ तक चाहतें प्रेम के लिबास में, समुद्र की लालसा में ना आई हों. सब कुछ हुआ लेकिन मेरे डर ने मुझे हरा दिया. वो डर जो कभी हकीकत नहीं बना लेकिन उसने मेरा हर आज जीने से पहले मुझसे ले लिया. काश! मैं इस डर की घुटन को सर्फिंग की तरह किनारे तक छोड़ पाती. बेशक हर बार गिरती लेकिन यह एहसास रहता कि मैं उससे उभर सकती हूं, ये मेरे साथ रहता…

इस दौरान अगर मैंने कुछ सीखा या जिया तो वो बस यही है…

“समुद्र के अंदर से किनारा बहुत दूर और बाहर से बहुत पास नज़र आता है.”

  • फ़ारिग, पेशे से एक पत्रकार, विज़ुअल आर्टिस्ट हैं व खुद की पहचान को 'एक गिरे हुए पत्ते की तरह मानती हैं जिसका रंग भूरा है.' वह अमूमन जाति, जेंडर, हिंसा, राजनीति व आम लोगों कि रोज़मर्रा की कहानियों को लिखने की कोशिश करती हैं. पेड़ इनके मित्र - सखी, दोस्त बंधु हैं, जिनका आलिंगन वह हर जगह तलाशती हैं. वह मानती हैं कि लड़ाई की शुरुआत होना ज़रूरी है बेशक आप अकेले ही क्यों न हों.

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