माननीय न्यायमूर्तिगण, आपने हमें प्यार करने का अधिकार तो दिया है, हमारे अकेलेपन का क्या?

क्वीर लोगों के अकेलेपन पर भारत के सर्वोच्च न्यायलय से एक अपील

चित्रांकन: भाग्यश्री पाटकी
कानूनी पाबंदियों की वजह से, क्वीयर लोगों के आपसी रिश्तों के लिए शायद ही कोई गुंजाइश बचती है. फिर भी, चाहत के ऐसे अनुभव, चाहे असल दुनिया में हों या डिजिटल दुनिया में, अलग-थलग रहकर भी ज़िंदा रहते हैं. साइबर कैफ़े, गुमनाम चैट रूम्स और मध्यम रौशनी में डूबे कमरे— ये सभी अकेलेपन की इस महामारी के गवाह हैं; और हाल में मिली कुछ कानूनी सुरक्षाओं* के बावजूद, क्वीयर लोगों के लिए यह अकेलापन और भी ज़्यादा बढ़ गया है. एक दलित समलैंगिक पुरुष के रूप में अपने निजी, बंद दरवाज़ों के पीछे के अनुभवों के ज़रिए गौतमन इस बात पर विचार कर रहे हैं कि जब कानून सामूहिक स्तर पर अकेलेपन का सामना करने की कोशिश करता है, तो उसका क्या मतलब होता है—एक ऐसी अनिवार्य स्थिति, जिसका अंत हमेशा त्रासदी में होना ज़रूरी नहीं है और न ही होना चाहिए.

भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तिगण,

आपके पास अपनी याचिका को पहुंचाना कोई असाधारण काम नहीं है. 1970 और 1980 के दशकों में ‘पत्र-प्रथा संबंधी क्षेत्राधिकार’ के माध्यम से न्यायालय ने हाशिए पर रहने वाले नागरिकों के लिए अपने दरवाज़े खोल, उनके पत्रों को याचिकाओं के रूप में स्वीकार करना शुरू किया था. आज, मैं उसी परंपरा में आपको यह पत्र लिख रहा हूं, यह जानते हुए कि कानून की प्रणाली में भले ही इस पत्र का कोई भविष्य न हो, फिर भी यह न्यायालय के अभिलेखों में अपनी जगह बना ही लेगा.

इस पत्र में मैं अकेलेपन की गवाही दे रहा हूं: अपने अकेलेपन की, और मेरे जैसे तमाम दूसरे पुरुषों के अकेलेपन की.

भले ही अकेलेपन में एक मायूसी या निराशा भरी होती है, लेकिन हौले से ये हमें एक काल्पनिक दुनिया की तरफ भी धकेलता है — जहां हम दूसरों के साथ से खुश होते हैं. एक तरफ जहां कुछ लोग इस अकेलेपन के सामने घुटने टेक देते हैं, वहीं कुछ इसकी ओर बढ़ते हैं इसे नाज़ुक, अनिश्चित पलों में बदल देते हैं, या अंधेरी प्रतिकूल सड़कों पर चलते हुए उसे जोश से भर देते हैं.

इस कोर्ट ने प्यार करने का अधिकार तो दिया है लेकिन हमारे अकेलेपन का क्या?

नवतेज जौहर बनाम भारत संघ के केस में, भारत के समलैंगिकता विरोधी कानून को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से पूछा था कि, “जब हमें धारा 377 के तहत बिना बिना अपराध के अपराधी समझा जाता है, तो हम बेखौफ होकर कितनी शिद्दत से प्यार कर सकते हैं?” इसके जवाब में अदालत ने घोषित किया कि हम — यौनिकता की आधिकारिक परिभाषा से असहमति जताने वाले — बराबरी के नागरिक हैं, और हमें प्यार करने का पूरा हक है.

शायद कोर्ट को ये उम्मीद थी कि प्यार हमारे अकेलेपन को जीत लेगा.

पर, नवतेज जौहर मामले के सात साल बाद भी भारत में क्वीर लोग अभी भी इसकी जकड़ में हैं. सब कहते हैं कि प्यार बहुत मजबूत होता है, वो सबकुछ जीत सकता है, पर अकेलापन फिर भी साथ चला आता है. वो हमें चिढ़ाता है, हमें टीस पहुंचाता है. वास्तव में असल प्रेमी तो यही है. तो फिर यहां सवाल उठता है कि : किस गहराई से हम इस अकेलेपन को महसूस करें ताकि हम अपनी एक अलग दुनिया की कल्पना कर सकें?

माननीय न्यायाधीश, एक समलैंगिक दलित पुरुष होने के नाते मैं बहुत गहराई से ये जानता हूं कि जाति और यौनिकता किस तरह अकेलेपन को गढ़ने का काम करती है. मेरी परवरिश 90 के उस दौर में हुई जब मेरे पास अपनी यौनिकता को समझाने या व्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं था. मैं अपने आस-पास के साइबर कैफे में धुंधले से कम्प्यूटर की स्क्रिन पर बेनाम चैट रूम्स में अपने जैसे लोगों की तलाश करता. मेरी क्वीयर पहचान चैट रूम्स में अंतहीन स्क्रॉल करने से पैदा हुए खालीपन में गढ़ी गई थी—जिसके बीच-बीच में, अपने ही जैसे किसी दूसरे व्यक्ति से मिलने का एक पल भर का रोमांच भी शामिल होता था.

किशोरावस्था में कम्प्यूटर के ये झिलमिलाते स्क्रीन ही मेरे अकेले साथी नहीं थे. अखबारों के वो छोटे-छोटे कोने भी थे, जहां पुरुषों के अंडरवियर के विज्ञापन छपा करते थे. बाद में सेक्स विशेषज्ञों के कॉलम ने मुझे ‘गे’ शब्द दिया.

धीरे-धीरे मैं ऑनलाइन वेबसाइट्स के ज़रिए उन अजनबियों से मिला जिनके साथ कुछ पल के लिए ही सही पर यौन आनंद तो मिलता था. ये मुलाकातें मज़े और खतरे का एक नशीला मिश्रण हुआ करती. पर, जब मेरे शरीर ने इससे मिलने वाली उत्तेजना को महसूस करना बंद कर दिया, तब अकेलापन लौट आया. अकेलेपन ने ही मुझे बनाया हैं; मैं उसे कैसे अपने से दूर करूं? मेरा क्या शेष रह जाएगा?

जाति के मेरे अनुभवों ने अकेलेपन के साथ मेरी आत्मीयता, मेरी दोस्ती को मजबूत किया. स्कूल में जब मैं अपनी क्लास के एक लड़के के प्रति अपनी एकतरफा भावनाओं को समझने की कोशिश कर रहा था, तभी एक दूसरे लड़के के तिरस्कार से भरे, ‘छी’ ने मेरे डरे-सहमे, अकेले शरीर को शर्म से ढक दिया. उस लड़के को यह पता चल गया था कि मैं अनुसूचित जाती से हूं. हो सकता है वो ‘छी’ मेरे भीतर घर कर चुका हो ताकि मुझे ये विश्वास दिला सके कि मैं गंदा और बद्सूरत हूं. मैंने कमीज़ की बांह को नीचे कर अपने गहरे सांवले रंग और हाथों के बालों को छुपाना सीख लिया था.

मैं बहुत आसानी से अपने शरीर को नापसंद करने लगा था, और अब मैं फिर से अपने शरीर से प्यार करना सीख रहा हूं. लेकिन ये आसान नहीं.

उस ‘छी’ के कई सालों बाद मैंने समलैंगिक लोगों की पार्टियों में कदम रखा. वहां भी मैंने महसूस किसी कि कोई मुझे नहीं चाहता. ऐसा मानते हैं कि समगैंगिक क्लब के डांस फ्लोर आज़ादी का अहसास देते हैं. पर, जब इसके बीचों-बीच मैंने सेक्सी मर्दों को एक-दूसरे में डूबे देखा तो मुझे एकबार फिर अपने अनचाहेपन का अहसास हुआ, जिसे मैंने खुद से ही मान लिया है. क्या इससे कोई अकेला महसूस नहीं करेगा? मैंने इन पार्टियों से दूरी बना ली. इसके बाद भी मुझे कई साल लगे इसे समझने में कि दूसरों द्वारा चाहा जाना असल में जाति का ही दूसरा नाम है.

माननीय न्यायमूर्तिगण, ये अकेलापन सिर्फ़ मेरे अकेले का नहीं है.

हर दौर में, हर तरह के लोगों ने इस अकेलेपन को महसूस किया गया. ये राह चलते हर उस पुरुष द्वारा एक जगह से दूसरी जगह फैलता है, जो एक-दूसरे को सिर्फ उनके नाम के पहले अक्षर से जानते हैं.

2010 में अलीगढ़ के प्रोफेसर सिरस ने उस वक्त आत्महत्या कर ली जब एक टेलीविज़न क्रू ने उनके घर में घूसकर उनका और उनके साथी का वीडियो बना लिया था.

2004 में पुष्किन चंद्र और कुलदीप सिंह की हत्या के पीछे के कारण को मीडिया ने छुपा हुआ प्रेम संबंध बताया था.

1990 में एक समलैंगिक पुरुष अपने घर से दूर एक पोस्टबॉक्स में बॉम्बे दोस्त मैग्ज़िन का इंतज़ार करता है,

2013 में कर्नाटक के हासन में उन मर्दों को हिरासत में ले लिया गया जो दूसरे मर्दों से प्यार करते थे,

ऑनलाइन प्यार की तलाश करने वाले लोग ‘बॉयफ्रेंड स्कैम’ के जाल में फंस गए. 2021 में भारतीय एयरपोर्ट पर उनके प्रेमी होने का झूठा नाटक कर रहे फर्ज़ी लोगों के हाथों उन्होंने अपना पैसा और इज़्ज़त दोनों गंवा दिया.

अकेलापन रूप बदलता है
बंद कोठरियों का
और बंद कोठरियां के न होने का भी

सीमाओं का
और सीमाओं को लांघना का भी

जेल की कोठरियों के भीतर
और कोलाहल से भरी सड़कों के बीच

साथ होने का भी
और जुदाई का भी

और इंतज़ार का अकेलापन
अंतहीन इंतज़ार- कानून के आगे

हम इंतज़ार कर रहे हैं आज़ाद होने का, अपने अकेलेपन से आज़ाद होने का. ये जानते हुए कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने नाज़ फाउंडेशन बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली मामले में दिए अपने निर्णय में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था. 2013 में इस न्यायालय के सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन के फैसले के दौरान भी इंतजार किया, जिसने समलैंगिकता को फिर से अपराध घोषित कर दिया था. हम 2018 में नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ में इस न्यायालय द्वारा प्रेम के अधिकार को मान्यता दिए जाने के बावजूद भी इंतजार करते हैं.
प्यार में जो इंतज़ार है, अकेलापन उससे भी ज़्यादा बड़ा है, वो कानून के इंतज़ार से भी बड़ा इंतज़ार है. फिर भी पता नहीं क्यों मुझे लगता था कि कानून, अकेलेपन के मेरे दर्द को खत्म कर देगा. लोग एलजीबीटीक्यू समुदायों के साथ प्राइड परेड में साथ पैदल चले, कानून में सुधार की बातें की और क्वीर कला और साहित्या की रचना की. मैंने इन सबमें आगे बढ़कर हिस्सा लिया इस उम्मीद के साथ कि मेरे इस डरे हुए, अकेले और शर्मसार शरीर को कहीं तो राहत मिलेगी.

पर, क्या हो अगर हमें साथ लाने वाली कड़ी प्यार नहीं बल्कि अकेलापन हो?

और अकेलेपन को सुना जाना ज़रूरी है. वह संभावनाओं से भरा हुआ है इसके बावजूत की उसमें भीषण शक्ति है हमें बर्बाद करने की. इसलिए मैंने उसे सुना. एक बार इसका मतलब था बार-बार आने वाले एक सपने पर ध्यान देना: वह सपना जो 1990 के दशक के आख़िरी वर्षों में उस साधारण से मुंबई के फ्लैट में, जहां मेरी क्वीयर पहचान आकार लेने लगी थी. सपनों में वह जगह अपना रूप बदल लेती थी, लेकिन जागने पर मुझे ठीक-ठीक पता होता था कि वह कहां है. मैं उसे एक आख़िरी बार देखना चाहता था. मैं चाहता था कि वह सपना थम जाए.

मेरे लिए वो किसी तीर्थ यात्रा पर जाने जैसा था. अब खस्ताहाल हो चुके ‘मेहूल टॉकीज़’ के पास गन्ने का एक गिलास जूस और वड़ा पाव खाने के बाद, मैं अपने अपार्टमेंट की ओर चल पड़. आस-पड़ोस की ज़्यादातर साधारण इमारतें अब ऊंची-ऊंची इमारतों में बदल चुकी थीं, और मेरा छोटा-सा, तीन मंज़िला अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स शायद मुंबई के बिल्डरों की ताक़त के आगे ज़्यादा दिनों तक टिक नहीं पाता. मैं पानी की टंकी के पास बैठ गया; उसकी लयबद्ध घरघराहट ही मेरे बचपन की आवाज़ों का संसार थी. मैं इमारत के अंधेरे गलियारों से होते हुए तीसरी मंज़िल तक पहुंचा, बिजली के मीटरों और 20 साल पहले हाथ से लिखे गए एक नेमप्लेट के पास से गुज़रते हुए.

कुछ देर मोहल्ले की गलियों में टहलने के बाद मैं वहां से चला गया. मुझे नहीं पता था कि मैं क्या ढूंढ रहा था, लेकिन जब मैं वहां से निकला, तो मैंने अपने भीतर एक आज़ादी महसूस की. ऐसा लगा मानो जैसे मेरा टूटा हुआ क्वियर दिल खुद को फिर से जोड़कर एक बहुरंगी शीशे में बदल गया हो. मैंने अपने अंदर साहस को समेटते हुए उस जवान, स्त्री-स्वभाव वाले क्वियर लड़के को सांत्वना दी, जिसकी आंखों में चमक थी, जो कभी यहां रहा करता था. और सपने थम गए.

इस यात्रा ने मुझे दो छोटी कहानियां लिखने के लिए प्रेरित किया. एक कहानी मुंबई के उस उपनगरीय इलाके पर आधारित है जिसका जिक्र मैंने यहां किया है, और दूसरी कहानी मॉनसून से भीगे हुए एक अपार्टमेंट में, देर रात के समय, रेडियो बजते हुए माहौल में रची गई है.

मैं कहानियां बुनते हुए खुद के घाव को भरना शुरु कर दिया है. लेकिन उन लोगों का क्या, जो अब भी इन भावनाओं को जी रहे हैं? ऐसे लोग, जिनकी इच्छाओं को उनसे दूर रखने को कहा जाता है—हमारी इस सामूहिक तन्हाई का क्या होगा?)

इस न्यायालय ने प्रेम को समझा है और उसे संरक्षण दिया है, लेकिन क्या यह उन लोगों के अकेलेपन को समझ सकता है जो ‘खतरनाक’ इच्छाएं अपने भीतर संजोए हैं?

हाल ही में याचिकाकर्ताओं ने समलैंगिक जोड़ों के लिए विवाह के अधिकार की मांग करते हुए इस न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया. उम्मीद यह थी कि शादी अकेलेपन से अंतिम मुक्ति होगी. मैं ये नहीं कह रहा हूं कि आप किसी को भी शादी की अनुमति न दें. यह वह बात है जिस पर इस न्यायालय ने सुप्रियो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में नकारात्मक निर्णय दिया है और भविष्य में यह बदल भी सकता है. लेकिन क्या आप ऐसा फैसला लिख सकते हैं जो हमारे सामूहिक अकेलेपन को मिटा दे? क्या आपकी स्याही उन लोगों के टूटे दिलों को भर सकती है जिनके साथी ऑनर किलिंग में मार दिए गए?

यहां तक की अगर हम जाति की बाधाओं को पार करके और कानूनी अड़चनों को दूर करके एक प्यार भरा रिश्ता बना लें, फिर भी अकेलापन खत्म नहीं होता. मैं अपने बॉयफ्रेंड से छह साल पहले, एक अनजान देश में, सात सड़कों के चौराहे पर मिला था; इंटरनेट कनेक्शन खराब होने की वजह से हम दोनों एक-दूसरे से मिलते-मिलते रह जाते. हाल ही में, जब मैं यह लेख लिख रहा था, तो मैंने उससे पूछा कि क्या उसे अकेलापन महसूस होता है. “बेशक, होता है,” उसने कहा. हम दोनों को ही होता है.

लेकिन मैंने ये सीखा है कि मुझे अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए किसी दूसरे इंसान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.

हमने अपने रिश्ते में अकेलेपन के लिए भी जगह बनाई है. शायद इसका श्रेय गिब्रान की उस कविता को जाता है, जिसे मैंने एक बार बार-बार पढ़ा था—अपने अतीत के उन रिश्तों की सोच को मिटाने की कोशिश करते हुए, जो पूरी तरह से हावी हो जाते थे: तुम्हारे साथ होने के बीच भी, कुछ खाली जगह होनी चाहिए.

अकेलापन तब तक रहेगा जब तक मनुष्य रहेंगे. उम्मीद है, यही हमें ऐसा संसार बनाने के लिए प्रेरित करेगा जहां हम एक-दूसरे की देखभाल और सहारा बनें. यह हमें उन क्षितिजों की ओर भी धकेलेगा जहां हम अभी तक नहीं पहुंचे हैं, अधिक बेहतर, अधिक कल्पनाशील दुनिया की ओर.

और इस न्यायालय का अकेलेपन को गंभीरता से लेना कई बातों का संकेत होगा — इसका अर्थ हो सकता है पीड़ा को गंभीरता से लेना, जैसा कि इसने अतीत में किया है; या फिर कैदियों और बंधुआ मज़दूरों के पत्रों पर ध्यान देना, जो न्याय की ऐसी झलकियां पेश करते हैं जिनका महत्व कानून से भी कहीं अधिक है. लेकिन इसका अर्थ इस न्यायालय की सीमाओं को स्वीकार करना भी हो सकता है. कामना है कि यह साक्ष्य न्यायालय के अभिलेख में सुरक्षित रहे, जो इन दोनों बातों को रेखांकित करे — कि कानून अकेलेपन के किस हिस्से को अपने दायरे में समेट सकता है, और किसे नहीं.

भवदीय,
एक तन्हा याचिकाकर्ता
(19/01/2026)

*यह लेख अभी हालिया ट्रांस बिल के पास होने से पहले लिखा गया था. इस पंक्ति में लेखक का मतलब धारा 377 को निरस्त किए जाने के बाद, भारत में समलैंगिक प्रेम को कानूनी मान्यता देने से है.

आभार: मैं ‘द थर्ड आई’ की शबानी, जूही और इशानी को उनके बेहतरीन संपादकीय मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद देता हूं. मैं ‘ध्वनि लीगल ट्रस्ट’ (Dhwani Legal Trust) के अश्विनी और श्रीकरा को भी धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने मुझे 2025 की अपनी ‘वैलेंटाइन डे’ शृंखला पर ‘कानून और अकेलापन’ विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया था; वह बातचीत अब इस लेख का रूप ले चुकी है. इस लेख के शुरुआती मसौदों पर अपनी राय और सुझाव देने के लिए जूली सेस्नी, कैली जैमिसन और सारा हान का भी धन्यवाद.

इस लेख काअनुवाद सुमन परमार और प्रियंका मिंज ने किया है. 

  • गौतमन रंगनाथन एक मानवविज्ञानी, वकील और कलाकार हैं, जिनका कार्यक्षेत्र नृवंशविज्ञान, कानून और कला तक फैला हुआ है.

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