
माननीय न्यायमूर्तिगण, आपने हमें प्यार करने का अधिकार तो दिया है, हमारे अकेलेपन का क्या?
कानूनी पाबंदियों की वजह से, क्वीयर लोगों के आपसी रिश्तों के लिए शायद ही कोई गुंजाइश बचती है. फिर भी, चाहत के ऐसे अनुभव, चाहे असल दुनिया में हों या डिजिटल दुनिया में, अलग-थलग रहकर भी ज़िंदा रहते हैं.




