यौनिकता

सवाल ही सवाल हैं, सूझता नहीं कोई रास्ता

किशोरावस्था में मन के भीतर जिज्ञासाओं का अंबार होता है. दोस्तों के बीच होने वाली फुसफुसाहटे, मैग्ज़ीन के पन्नों में छपी तस्वीरें या टीवी पर दिखाई देने वाले दृश्य मन में तरंगों पैदा करती हैं. एकतरफ मज़ा आता है तो दूसरी तरफ डर लगता है कि ये जो महसूस हो रहा है, ये क्या है?

चाहत_डर

एक चम्मच चीनी की चाहत रखने वाला समुद्र

हम जो चाहते हैं वो क्यों चाहते हैं? और जो चाहते हैं वो कभी पूरा न हो इसकी ख्वाहिश क्यों करते हैं? और फिर वापस से उन्हीं चाहतों के पीछे भागने लगते हैं. ये ऐसे फरेबी सवाल हैं जिनका जवाब कई मनोविश्लेषकों ने देने की कोशिश तो की है लेकिन इन सवालों के बीच खुद को खोना और पाना कैसा होता है?

समलैंगिक_ समलैंगिक संबंध

माननीय न्यायमूर्तिगण, आपने हमें प्यार करने का अधिकार तो दिया है, हमारे अकेलेपन का क्या?

कानूनी पाबंदियों की वजह से, क्वीयर लोगों के आपसी रिश्तों के लिए शायद ही कोई गुंजाइश बचती है. फिर भी, चाहत के ऐसे अनुभव, चाहे असल दुनिया में हों या डिजिटल दुनिया में, अलग-थलग रहकर भी ज़िंदा रहते हैं.

अंधेरा

अंधेरे के बिना प्रेमी जोड़े कहां जाएं?

अंधेरे ने हमेशा से ही कवियों की कल्पना के लिए खाद-पानी का काम किया है. खालीपन या रिक्तता से भरी जगह जो सितारों को चमकने का मौका देती है और अक्सर जहां डरावनी फिल्में फिल्माई जाती हैं. लेकिन हम जिस तरह से रहते हैं उसके बारे में यह अंधेरा क्या कहता है?

किताब_सामाजिक नियंत्रण

नो रिग्रेट्स

सफ़दर हाशमी से माफ़ी के साथ कि किताबें डराती हैं, किताबें क्रान्ति के लिए उकसाती हैं, अक्सर कोर्स की किताबों में छुपाकर पढ़ी जाने वाली किताबें ज़िंदगी का असल मायने बताती हैं. सीमा दहिया की यह कहानी बंद खिड़की से झांकती रौशनी का वह टुकड़ा है जो अपनी जानदार भाषा के साथ यही दोहराता है कि ख्वाहिशें अपना रास्ता ढूंढ लेती हैं.

खेल

“आपकी नज़र गंदी है, हमारा खेल नहीं”

बिहार के पनसेरवा गांव में फ्रिस्बी खेल रही लड़कियों को ऊंची जाति के दबंग रोकने की कोशिश करते हैं. लड़कियां इन दबंगों के सामने झुकने से इंकार कर देती हैं और एक युवा कार्यकर्ता उनके साथ खड़ा होता है. अब खेल और पितृसत्ता के बीच इस टकराहट का साक्ष्य पूरा गांव है. तन्मय अपने निबंध में इस टकराव की ज़मीन पर खड़े होकर ग्रामीण बिहार की एक तस्वीर हमारे सामने रखते हैं और साथ ही इस भ्रम को तोड़ते हैं कि खुशी में नुकसान की गुंजाइश नहीं होती.

जंगल

फ से फील्ड, इश्श से इश्क: मशीन ही तो है

इंसानी चाहतें और मशीनी आवाज़ के बीच एक अदद वाइब्रेटर! कौन किसके लिए? मज़ा और खतरा के इस आखिरी एपिसोड में मिलिए मैक्सी और उसके वाइब्रेटर से! साथ में टॉम की आवाज़ को न भूलें!

LGBTQIA+

“एलजीबीटी लोगों पर किस देश का कानून लागू होता है?”

क्वीयरबीट के संस्थापक बता रहे हैं कि मीडिया संस्थानों खासकर हिंदी मीडिया में LGBTQIA+ पहचानों को लेकर किस तरह के छिपे और ज़ाहिर पक्षपात देखने को मिलते हैं.

जंगल

फ से फील्ड, इश्श से इश्क: टीस

“कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात। भरे भौन मैं करत हैं, नैननु ही सब बात।।”

इस कहानी मे हल्की खुमारी है, वो जो हो सकता था पर हुआ नही. पर वो ऐसा है जो चुपके-चुपके होता भी रहा. ये कैसा इश्क है भला?

जंगल

फ से फील्ड, इश्श से इश्क: उपन्यास

किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने, मगर कोई चेहरा भी तुमने पढ़ा है? लक्की ने जब पढ़ने की कोशिश की तो हवाएं थम सी गईं, पृथ्वी ने घूमना बंद कर दिया… क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है?