सवाल ही सवाल हैं, सूझता नहीं कोई रास्ता

एक सामाजिक कार्यकर्ता के कुछ खरे सवाल

चित्रांकन: मुघदा तिवारी

किशोरावस्था में मन के भीतर जिज्ञासाओं का अंबार होता है. दोस्तों के बीच होने वाली फुसफुसाहटें, मैग्ज़ीन के पन्नों में छपी तस्वीरें या टीवी पर दिखाई देने वाले दृश्य मन में तरंगों को पैदा करते हैं. एकतरफ मज़ा आता है तो दूसरी तरफ डर लगता है कि ये जो महसूस हो रहा है, ये क्या है? फिर अचानक ही उसे दबाने, छिपाने की कोशिश होने लगती है. घर से लेकर स्कूल तक के माहौल में एक अनकही सी कवायद घुली होती है कि शरीर या आकर्षण को लेकर जो भी हम महसूस कर रहे हैं ये गलत है, ऐसा सोचना, करना सब खराब है. असल में अक्सर मज़ा या प्लेज़र को लेकर हमारी शुरुआत ही खुद को गलत पायदान पर खड़े रखकर होती है. ऐसे में एक सामाजिक कार्यकर्ता कुछ क्लासरूम में मौजूद माहौल पर सवाल खड़ा करती हैं कि कैसे अक्सर ये सोच कुछ बड़े नुकसान की ओर धकेलने का काम करती है. काजल एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और अपनी ईमानदार कशमकश को सामने रखने की कोशिश कर रही हैं. वह सवाल करती हैं कि क्यों आज भी हम रूढ़ हो चुके मुद्दों पर बात नहीं कर सकते??

यह लेख ‘द थर्ड आई’ सेक्सी लोग मेंटरशिप कार्यक्रम के तहत तैयार किया गया है. इस कार्यक्रम में भारत के अलग-अलग हिस्सों से चुने गए दस लोगों ने यौनिकता को लेकर ‘मज़ा और खतरा’ विषय पर अपने अनुभवों को लेख के रूप में तैयार किया है.

मैं देखती हूं कि क्लासरूम या औपचारिक जगहों पर जब हम रोमांस, शरीर या यौनिकता की बात करने की कोशिश करते हैं, माहौल बदल-सा जाता है. लड़कियां एक-दूसरे को देखकर हंसने लगती हैं. कुछ सिर झुका लेती हैं और कुछ मेरी आंखों में झांकते हुए चुप हो जाती हैं. टीचर की निगाहें मुझे टोकती हैं, जैसे मैं कुछ अस्वीकार्य बातें बोल रही हूं. हम स्कूल के परिसर में चाहे जितनी भी बड़ी-बड़ी बातें कर लें लेकिन आज भी इन विषयों पर बात करने की मनाही है. जैसे ये कोई गलत काम है. समाज की उन रेखाओं को लांघना है, जो कहती हैं कि ये बातें ‘बड़े होने के बाद’ की हैं?

“प्यार क्या होता है?”

“बॉयफ्रेंड होना ठीक है क्या?”

“गर्भपात क्या होता है?”

अक्सर ये सवाल हंसी-मज़ाक में लिपटे होते हैं, या कुछ इस तरह पूछे जाते हैं जैसे पूछने की इजाज़त नहीं है. लेकिन इन सवालों के साथ क्या किया जाए, इसका रास्ता बहुत धुंधला है.

एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मैं स्कूल में किशोर लड़कियों के साथ कार्यशालाएं लेती हूं. इन कार्यशालाओं में मैं अक्सर हमारी चाहतें, इच्छाएं, प्यार, सेक्स जैसे विषयों पर बात करने की कोशिश करती हूं. मेरा काम है किशोरियों को खुद की आवाज़, खुद की पहचान और अपनी पसंद पर भरोसा करना सिखाना. अक्सर जब हम आत्मविश्वास और नेतृत्व की बात करते हैं, तो लड़कियां मुस्कराती हैं, सिर हिलाती हैं, कहती हैं, “हमें बोलने में डर लगता है, पर अब थोड़ा कम लगता है.”

लेकिन जैसे ही सेक्स, शरीर या गर्भपात जैसे शब्द हवा में आते हैं, एक अजीब-सी खामोशी पूरे कमरे में फैल जाती है. अचानक कमरा ठंडा पड़ जाता है. लड़कियां फुसफुसाने लगती हैं, कुछ सिर झुका लेती हैं. मुझे ऐसे देखने लगती हैं जैसे मैंने किसी बंद अंधेरे कमरे का दरवाज़ा खोल दिया है जिसे खोलने की मनाही है. और तब मेरे अंदर भी सवाल उठने लगते हैं कि शायद मैं सचमुच कुछ अनुचित कह रही हूं? कभी-कभी मुझे लगता है कि जो सबसे आसान सवाल हैं, वही सबसे मुश्किल जवाब मांगते हैं.

एक बार एक 14 साल की लड़की ने मुझसे पूछा, "दीदी, आपका कोई बॉयफ्रेंड है क्या?"

मैं कुछ पल के लिए चुप हो गई. मुझे समझ नहीं आया कि इसका क्या जवाब दूं. सवाल बहुत मासूम था. पर मेरे भीतर मानो पूरा समाज उतर आया. नैतिकता, आदर्श, अनुकरणीय वयस्क होने की छवि. क्या ‘हां’ कह देने से उसकी जिज्ञासा को बढ़ावा मिलेगा? क्या मैं एक आदर्श वयस्क की परिभाषा से बाहर निकल जाऊंगी? और अगर ‘ना’ कहूं तो, क्या मैं झूठ नहीं बोल रही होऊंगी? क्या एक वयस्क महिला का अपने रिश्तों के बारे में खुलकर बताना किशोरियों के लिए खतरनाक हो सकता है? क्या उन्हें इस उम्र में ये सब जानना चाहिए? लेकिन क्यों नहीं जानना चाहिए?

एक अजीब-सी उधेड़बुन है और एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मैं खुद को अक्सर इस उधेड़बुन में फंसा हुआ पाती हूं. आमतौर पर ये सवाल बहुत मासूम और सरल तरीके से पूछे जाते हैं. लेकिन इनके जवाब सबसे जटिल बन जाते हैं. इस बात को एक और उदाहरण के ज़रिए समझा जा सकता है. एक बार एक बच्ची ने मुझसे पूछा, “गर्भपात क्या होता है?” उसने कहा, “सीरियल में सुना है.” उस क्षण मेरे पास कोई आसान, सुरक्षित भाषा नहीं थी. मैं झिझकी, अटकी, पर फिर भी जवाब देने की कोशिश की. क्योंकि मुझे यह अहसास हुआ कि उसने सवाल किया, वही सबसे बड़ी बात थी. वो चुप नहीं रही.

अब सवाल यह उठता है कि क्या हर लड़की को यह अवसर और माहौल मिलता है?

इस सवाल का जवाब भी हमारे घरों की भीतरी संरचना में छुपा हुआ है. आज भी हम स्वयं को इतना सहज नहीं कर पाए हैं कि अपने बच्चों के मन में उठने वाले सवालों को सही ढंग से समझकर उनकी जिज्ञासा को शांत कर सकें.

फिल्मों में जब कोई अंतरंग दृश्य आता है, तो घरों में चैनल बदल दिए जाते हैं. स्कूलों में जब हम शरीर या प्रेम की बात करते हैं, तो माहौल सख्त हो जाता है. पर क्या वाकई किशोरियों को इन बातों से दूर रखा जा सकता है?

क्या वे पहले क्रश, पहले प्रेम, पहले आकर्षण से अछूती हैं? क्या यह उतना ही ज़ाहिर नहीं है जितना 18 साल के तुरंत बाद किसी लड़की का गर्भवती हो जाना.

***

एक दिन मुझे पता चला कि हमारी साथी सरिता (काल्पनिक नाम) अपने ससुराल में बहुत परेशान हैं. वह कई सालों से हमारे साथ जुड़ी हुई थीं और कुछ महीने पहले ही उन्होंने प्रेम विवाह किया था. पर अब वह अपने नए घर में बहुत परेशान हैं. वह इस उम्मीद में हमसे मिलने आईं कि हम उनकी कुछ मदद करें. समस्या घरेलू हिंसा की ही थी. उस वक्त सरिता की उम्र 20 साल थी और वह प्रेग्नेंट भी थीं. इन सभी बातों के बावजूद वह खुद के निर्णय को लेकर एकदम स्पष्ट थीं और मज़बूती के साथ अपने निर्णय पर अडिग खड़ी थीं: उन्हें वापस अपने ससुराल नहीं जाना था और और वह गर्भपात कराना चाहती थीं. वह यह भी जानती थीं कि न तो ससुराल वाले और न ही उनके घर वाले उन्हें ऐसा करने देंगे.

ऊपरी तौर पर देखने में यह एक आम और साधारण घटना दिखाई देती है, लेकिन ऐसा है नहीं. इस घटना में कई तरह की परतें जुड़ी हुई हैं, जिन्हें खौलने पर इस घटना की जटिलता का अंदाज़ा होता है. हकीकत में यह परिवार, पुलिस, कोर्ट, अस्पताल के बीच बहुत गहरा उलझा हुआ ऐसा मामला है जहां लड़की के पास सारे अधिकार होते हुए भी वह अपने लिए निर्णय ले पाने में सक्षम नहीं है. कारण सामाजिक दबाव. इस मुद्दे से रूबरू होते हुए मेरी विडम्बनाएं मेरे सामने आईं कि क्यों मैं सरिता की मदद करना चाहती हूं? पहले थोड़ा गुस्सा भी आया कि जल्दी शादी करने की मर्ज़ी उसकी खुद की थी, फिर मैं क्यूं उसकी मदद करूं! पर तभी ये भी समझ आया कि किशोरावस्था में प्यार, मोहब्बत को लेकर कितनी जिज्ञासाएं होती हैं. मज़ा है लेकिन उसके साथ जो खतरा आता है उसके बारे में आमतौर पर किशोरियां सोचती भी नहीं.

सरिता केवल एक उदाहरण है. सरिता जैसी कई लड़कियां हैं जो अपनी सुरक्षा और अधिकारों को जाने बिना विवाह जैसे बड़े निर्णय को ले लेती हैं और फिर ससुराल और पति के द्वारा घरेलू हिंसा की शिकार बनती हैं. इन सवालों के साथ ही मैं यह भी सोच रही थी कि स्कूल में किशोरियों के साथ यौनिकता या सेक्स विषय पर बात करना कितना ज़रूरी है. इससे लड़कियां अपने शरीर और अपने अधिकारों के बारे में बेहतर ढंग से समझ पाएंगी.

जितना मैं सरिता के बारे में सोच रही थी उतना ही मैंने इस विषय को गहराई से समझने के लिए पढ़ना शुरू किया. मैं यह जानने के लिए उत्सुक थी कि एक युवा महिला के क्या-क्या अधिकार होते हैं. कहने को तो कागज़ों में 18 की उम्र के बाद एक महिला अपने जीवन का निर्णय खुद ले सकती है. पर असल में ये बातें वास्तविकता से कोसो दूर हैं. ये बात मुझे तब समझ आई जब मैं, सरिता के बुलाने पर कुछ घंटों के लिए हॉस्पिटल गई. मैंने देखा कि कुछ नर्स मुझे अजीब नज़र से देख रही थीं. जिस वार्ड में सरिता थी उसके भीतर जाते ही वहां के बाकि पेशेंट और उनके परिजन आपस में फुसफुसाने लगे. उनकी आंखे मेरी ओर इस तरफ बढ़ रही थीं जैसे मैंने कुछ गलत किया हो.

वॉर्ड में जब मैं सरिता से मिली तो उससे बात करके भी पता चला कि वह काफी परेशान है. उससे भी अजीब तरह के सवाल किए जा रहे थे. कारण था सरिता के माता-पिता या पति का इस निर्णय में उनके साथ न होना. अस्पताल प्रशासन इस बात को लेकर दबाव बनाए हुए था कि संविधान में कुछ भी लिखा हो अस्पताल की पॉलिसी अलग है. वे सरिता को गर्भपात न कराने के लिए दबाव बना रहे थे. इसके लिए उनकी मनोचिकित्सक जांच हुई. उसके बाद उन्हें कॉउंसलिंग के लिए ले जाया गया. ये सब ऐसा था मानो उनके पास अपना कोई दिमाग ही नहीं है क्योंकि मायके या ससुराल की तरफ से कोई नहीं था. नर्स ने कहा कि घर वाले साथ न होने से पुलिस में रिपोर्ट होगी. रिपोर्ट भी हुई. इस दौरान मैं भी थोड़ा डर-सी गई थी क्योंकि यह पूरी प्रक्रिया एक तरह से तंग करने जैसी थी. ऐसा लग रहा था जैसे व्यवस्था हमारे मुंह पर कह रही हो – कैसा संविधान? कौन से अधिकार?

पुलिस के लोगों ने मुझसे बहुत कठोरता से बात करते हुए कहा, “कुछ हुआ तो ज़िम्मेदारी कौन लेगा?” एक भारी और गुस्सैल आवाज़ में ये सवाल हथौड़े की तरह मेरे ऊपर आया. एक बार को तो मैं सच में डर गई थी और मेरी धड़कने कुछ देर के लिए बहुत तेज़ हो गई थीं. पर ठीक उसी पल मैंने यह भी सोचा कि अगर अभी आवाज़ नहीं उठाई तो सरिता को सपोर्ट नहीं कर पाऊंगी और उनकी अब तक की लड़ाई बेकार चली जाएगी.

एक बार दिल में आया कि मैं भी अच्छा खासा लंबा जवाब दूं और उनसे ही सवाल करूं कि वे मदद करने के बजाए डरा क्यों रहे हैं. बहुत सारा गुस्सा था, आंसू थे लेकिन मैंने अपनी भावनाओं पर काबू किए रखा कि कहीं आंसू बाहर आ गए तो मैं कमज़ोर न दिखूं. गला भर्राने लगा था. अपने को संभालते हुए मैंने उन्हें सहजता से समझाया कि यह एक महिला का निर्णय है. वह अपने भविष्य और अपने शरीर के बारे में स्वयं निर्णय ले रही है. वह सजग है कि वह क्या कर रही है. इसमें आप और मैं या कोई भी कुछ नहीं कर सकता.

एक राष्ट्रीय अख़बार में प्रकाशित एक ख़बर के मुताबिक अकेले मुम्बई में पिछले एक साल में (अप्रैल 2024 से मार्च 2025) कुल 20,950 गर्भपात हुए हैं. इसमें 716 मामले वह हैं जिसमें लड़की की उम्र 19 वर्ष के नीचे है. वहीं 25-30 साल की उम्र की महिलाओं में गर्भपात की संख्या 7296 है. ये आंकड़ें सिर्फ एक शहर के हैं. और ये तो वे आंकड़ें हैं जो दर्ज़ हुए हैं. बहुत सारे मामले तो दर्ज़ भी नहीं होते. एक पल के लिए ठहर कर सोचें कि सैकड़ों सरिताएं हैं जिन्हें हर कदम पर न जाने कितनी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

जेंडर, शरीर, उन्मुक्तता, प्रेम, काम, शरीर, हिंसा इन सबसे जुड़े सवाल हमेशा मेरे इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं जिनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. कभी-कभी लगता है कि क्या हम कुछ ऐसे संसाधन बना सकते हैं जो इस चुप्पी को तोड़ सकें? ऐसे टूल्स जो लड़कियों को सोचने, पूछने, और समझने की आज़ादी दें, बिना डरे, बिना आंके जाने के डर से. शायद कहानियों से शुरुआत हो सकती है. शायद कुछ सवालों से हो, कुछ छोटे विडियो, कुछ ऐसे चित्र जो चर्चा की शुरुआत कर सकें. शायद कोई साझा जगह जहां सिर्फ जवाब नहीं, अनुभव साझा हों.

मैं आज भी उस डर और उम्मीद के बीच खड़ी हूं जहां हर सवाल एक दरवाज़ा खोलता है, और हर जवाब एक जोखिम. और हर बार जब कोई लड़की मुझसे सवाल करती है, मैं खुद को थोड़ा और खोलती हूं क्योंकि शायद यही एक तरीका है जिससे उनके सवालों और उनकी जिज्ञासाओं के जवाब दिए जा सकें और उनकी समझ को विकसित करने के ज़रिए उनके रास्ते को थोड़ा सुगम बनाया जा सके.

अबॉर्शन या गर्भपात शब्द सुनकर मेरे भीतर भी कई जिज्ञासाएं पैदा होती थीं. मैंने जब पहली बार यह शब्द सुना था, तब मैं 14 साल की थी. सोचती थी कि लोग इस शब्द के बारे में बात क्यों नहीं करते? लेकिन कहीं न कहीं इतना पता था कि इसके बारे में किसी से कुछ पूछना नहीं है.

आज मैं 27 साल की हूं और पिछले कुछ वर्षो में मैंने जब-जब यह शब्द सुना तब-तब मन में तनाव, डर और अजीब-सी विडंबना को महसूस किया. इन चर्चाओं में मैंने कई बार औरतों की सहमति और उनकी स्वायत्ता का हनन होते हुए देखा है. पितृसत्तात्मक समाज में गर्भपात के निर्णय को पारिवारिक गतिशीलता और सांस्कृतिक मान्यताओं के विरोध में जाने और औरत के चरित्र से भी जोड़ा जाता है. यहां एक औरत के अपने निर्णय, अपने शरीर पर अधिकार और स्वास्थ्य दोयम दर्जे का रहा है. ऐसे निर्णयों में मैंने औरतों को खुद को ही कोसते और अपने कर्त्तव्य पूरे न कर पाने जैसे प्रसंगो पर घिरते हुए देखा है. औरतों के दिमाग़ों में यह बात गहराई से बैठा दी गई है कि औरत का कर्त्तव्य है प्रजनन करना. क्योंकि हमारे शरीर की प्राकृतिक संरचना ही ऐसी है इसका मतलब यह नहीं कि हमारा अपने शरीर पर अधिकार नहीं या हम अपने शरीर से जुड़े निर्णय नहीं ले सकते.

अक्सर यह देखने में आता है कि शरीर और भावनाओं से जुड़े मुद्दों को जटिल बना देना कितना नुकसानदेह हो सकता है. जो लोग आकर्षण की भावना को महसूस करते हैं लेकिन समाज के डर और शर्म के कारण किसी को बता नहीं पाते, ऐसे में जब वे किसी के साथ शारीरिक नज़दीकी बढ़ाते हैं तब उनके पास उचित ज्ञान नहीं होता. कई बार यह अल्पज्ञान किसी अनजान मुसीबत को निमंत्रण दे देता है. बहुत बार लड़कियां, लड़कों के झांसे में आ जाती हैं. बहुत बार ब्लैकमेल तक की जाती हैं. यह सभी समस्याएं पैदा होती हैं यौन संबंधों के विषय में उचित जानकारी न होने के कारण. यौन संबंध, अपने शरीर और यौनिकता जैसी अभिव्यक्ति की तो हमारे समाज में जगह ही नहीं है. इन प्राकृतिक शब्दों को भी लेबल लगाकर पेश किया जाता है. ऐसे में मेरी चिंता यह है कि ऐसे घेराबंदी वाली जगह में बच्चे, जो बखूबी अपनी भावनाओं को परखते हैं वे कहाँ अपनी जिज्ञासा रखें? ऐसे में बहुत आसानी से इन बच्चों को जज किया जाता है और अपनी जिज्ञासा जानने के लिए भी उन्हीं को दोषी जैसा महसूस कराया जाता है.

हमारे संविधान में महिला अधिकारों के बारे में विस्तार से लिखा हुआ है. महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून भी बने हुए हैं. पर अभी भी महिलाओं का एक बहुत बड़ा तबका इन अधिकारों के बारे में जानकारी से वंचित है. जो जानती हैं वे उनका इस्तेमाल अपने निजी जीवन में कितना कर पाती हैं? इसका जवाब किसी के पास नहीं है. लोगों ने रूढ़िवादी सामाजिक मूल्यों को काफी आकर्षक तरीके से समाज के भीतर तक पैठा दिया है. अब इन रूढ़ियों का पालन-पोषण आधुनिक तरीके से किया जा रहा है. इस पर हमें ठहरकर सोचने की ज़रूरत है.

  • काजल सिंह, सामाजिक बदलाव से जुड़ी कार्यकर्ता हैं और वर्तमान में द जेंडर लैब संस्था के साथ काम कर रही हैं. मुम्बई में जन्मी और वहीं पली-बढ़ी काजल ने अपनी पढ़ाई एकाउंटिंग और फाइनेंस में पूरी की है. पर लंबे समय से वे नारीवादी और सामाजिक न्याय से जुड़े समूहों और पहलों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ी रही हैं.

    काजल की रुचि और काम जेंडर और पहचान के अंतर्संबंधों को समझने में है. वे उन कहानियों और अनुभवों को सामने लाने की कोशिश करती हैं जो अक्सर अनसुने या अदृश्य रह जाते हैं. चाहे मुंबई की लोकल ट्रेनों की भागदौड़ हो या मरीन ड्राइव की शांति, काजल जेंडर मानदंडों को चुनौती देने के विभिन्न आयामों को समझने और नारीवादी मूल्यों को आशा, जिज्ञासा और संवेदनशीलता के साथ अपने जीवन और काम में उतारने की कोशिश करती रहती हैं.

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