डिजिटल दुनिया ने हमें यह आज़ादी दी है कि हम जैसे हैं वैसे ही रह सकें और जैसा बनना चाहें वैसा बन सकें. बावजूद इसके हम पाते हैं कि ऑनलाइन नज़दीकी बढ़ाने के तरीकों में भी पितृसत्तात्मक संरचना नए रूप में प्रकट हो रही है. डेटिंग ऐप्स हमें यह साहस तो देते हैं कि हम अपनी मुकम्मल पहचान के साथ सामने आ सकें, और यह आकर्षक भी है. पर क्या ये सच में आज़ादी के अवसर देने वाले बने रह सकते हैं? या यह एक और तरीका है तय पहचान में कैद हो जाने का? बोनिता राजपुरोहित की फिल्म आईवाईकेवाईके (Iykyk / 2024) एक युवा ट्रांस महिला कुसुम की कहानी है, जो एक ‘साथी’ की तलाश में है. (फिल्म brewtv पर उपलब्ध है.)
कुसुम को डेट करने वाले सभी युवा पुरुष उसकी ट्रांस पहचान से आकर्षित तो होते हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह उसको जानना चाहते हैं. साथ ही वह यह जानने के लिए भी उत्सुक होते दिखाई देते हैं कि ट्रांस लोगों के बारे में उनकी जो सोच है, वह कितनी सही है. एक विषमलैंगिक डेटिंग की तरह कुसुम से भी उम्मीद की जाती है कि वह जैसी है वैसा पर्फॉर्म करे, जिससे अंतत: वो पूरी तरह थक जाती है.
हमने बोनिता से उनकी फिल्म निर्माण की प्रक्रिया, उनकी असल और ‘डिजिटल’ ज़िंदगी के बीच तालमेल और जेन ज़ी (वर्तमान में युवा पीढ़ी) के डेटिंग अनुभवों के बारे में विस्तार से बात की.
टीटीई: आपकी फिल्म आईवाईकेवाईके (Iykyk / 2024) 2024 के कशिश प्राइड फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई थी. वहां आपको बेहतरीन उभरती हुई फिल्ममेकर का अवॉर्ड भी मिला था. यह फिल्म असल में उसी मुद्दे पर बात करती है, जिसमें अपने फील्डवर्क के दौरान हमारी भी दिलचस्पी रही है — आभासी दुनिया में अपने असली रूप में जीने की आज़ादी का विचार, साथ ही विषमलैंगिक आदर्शों का ज़बरदस्त दबाव, जिनसे पूरी तरह से बच पाना संभव नहीं है. खास तौर से डेटिंग ऐप्स पर. हम जानना चाहते हैं कि इस फिल्म को बनाने की शुरुआत कैसे हुई?
बोनिता: जब बात खुद को तलाशने की होती है, वहां मेरी ज़िंदगी में फिल्मों का रोल बहुत ही अहम रहा है. किसी को ऐसा किरदार निभाते देखना, जिसने [मेरे] जैसी ही ज़िंदगी जी हो, मुझ पर बहुत गहरा असर डालता है. मैं राजस्थान के एक ग्रामीण इलाके की रहने वाली हूं. इस नाते किल बिल (2003) जैसी फिल्मों को देखना सिनेमा से और खुद से भी, मेरा पहला परिचय था.
मैं सिनेमा का हिस्सा बनना चाहती थी और धीरे-धीरे मैंने इसमें काम करना शुरू किया. जब मैंने ऑडिशन देना शुरू किया तब मुझे एहसास हुआ कि मुझे जो भी किरदार मिल रहे थे, सब लगभग एक जैसे ही थे. ऐसा नहीं है कि वे कहानियां मायने नहीं रखतीं…लेकिन मुझे महसूस होता था कि और भी बहुत कुछ है जो इनमें होना चाहिए था.
एक बात और, जब मैं बड़ी हो रही थी, उस वक्त इंटरनेट सब कुछ था.
‘इंटरनेट’ ने मुझे वो कैनवास दिया, जिस पर मैं जैसी चाहती थी, अपनी वैसी तस्वीर बना सकती थी. मैं जैसी हूं, वैसी बन सकती थी.
पर सार्वजनिक ज़िंदगी में सबके सामने वैसे रह पाना मुश्किल था जैसी मैं हूं. हां, सोशल मीडिया पर ऐसा कर सकती थी. यहां मैं ऐसे लोगों से जुड़ी जिनकी सोच मेरे जैसी थी, जिनके अनुभव मेरे जैसे थे. इस तरह मैं ऑनलाइन मॉडर्न डेटिंग कल्चर से जुड़ती चली गई.
उस समय मैं गुजरात के वडोदरा में रह रही थी. हम सब इस रोमांटिक परीकथा वाले ख्याल के साथ बड़े हुए हैं कि हमें हमारा सच्चा प्यार मिलेगा. वो एक साथी मिलेगा जो बहुत खास होगा. लेकिन [मेरे जैसे लोगों के लिए] हकीकत की दुनिया बहुत अलग होती है. आप कई लोगों से मिलते हैं, [जो खुद भी] कई लोगों को डेट कर रहे होते हैं. कई लोगों के लिए आपकी पहचान महज़ सीखने का ज़रिया बन जाती है. ऐसा नहीं है कि लोग कोशिश नहीं करते लेकिन जिस तरह से उनकी परवरिश हुई है, उनकी जो सोच है वह डेट पर सामने आ ही जाती है.
जब भी मैं कोई किशोर ड्रामा या क्वियर शो देखती हूं तो ऐसा लगता है जैसे सभी लगभग एक जैसे हैं और बहुत ही उबाऊ हैं. इन ड्रामों में ज़्यादातर क्वियर किरदारों को बहुत ही सतही तरीके से दिखाया जाता है, उनमें गहराई की कमी होती है. मैं अपनी फिल्म बिल्कुल वैसी ही बनाना चाहती थी, जैसी कि मैं खुद देखना चाहती हूं.
टीटीई: वे कौन-सी फिल्में हैं जिन्होंने आपको एक इंसान और एक फिल्म निर्माता के रूप में तराशा और प्रभावित किया है?
बोनिता: मुझे नहीं लगता कि मैंने बहुत ज़्यादा अच्छी ट्रांस फिल्में देखी हैं. लेकिन हां, मम्बलकोर फिल्म मेकिंग का जो दौर था उसने ज़रूर मुझे बहुत प्रभावित किया है. यह एक आंदोलन था जो 2010 में शुरू हुआ था. इस आंदोलन को मार्क डुप्लास, जे डुप्लास, ग्रेटा गर्विग और जो स्वानबर्ग और इनके जैसे मिलेनियल (90 के दशक के) फिल्म निर्माताओं ने शुरू किया था. ये सभी सिर्फ उन्हीं साधनों की मदद से फिल्में बनाने के हिमायती थे, जो उनके पास मौजूद थे. डायलॉग बोलने का उनका अंदाज़ भी मुझे बहुत स्वभाविक लगता था. यह सब देखकर
मुझे लगा कि अरे यह तो वही चीज़ है जिसे मैं ढूंढ रही हूं और अपनाना चाहती हूं. जिसमें ज़बरदस्ती का लेंस थोपने, बेमतलब की एडिटिंग करने या टोनैलिटी के चक्कर में पड़ने की ज़रूरत ही नहीं है.
वैसे 2015 में कौन-सी क्वियर फिल्में थीं? डलास बायर्स क्लब (2013) और द डैनिश गर्ल (2015). हालांकि उस समय एक लड़के ने उस लड़की का किरदार निभाया था. मज़ेदार बात यह है कि ऑस्कर में इसको सेलिब्रेट किया जा रहा था. हमारे गांव में तो इसको बहुत ही शर्मनाक माना जाता है. और वहां, मैं देख रही थी कि स्टेज पर उसको सम्मानित किया जा रहा है. ऑस्कर के उस पल को देखते हुए मुझे एहसास हुआ कि ट्रांस होना इतना भी बुरा नहीं है.
लीना डनहम की शो गर्ल्स से मुझे मेरी आवाज़ मिली. यह 2012 में आई थी. आजकल बहुत से लोग यह शो दोबारा देख रहे हैं, मैं भी देख रही हूं. ऐसा नहीं है कि उस समय यह मशहूर नहीं था. था, लेकिन अब तो यह किसी अनमोल नगीने जैसा लगता है. सच कहूं तो यह शो आज भी बड़े काम की चीज़ है, खास तौर से जेन ज़ी के लिए. आप भटक जाते हैं, उलझनों में होते हैं, नज़दीकियां (इंटिमेसी)…
इस शो में सबकुछ सच्चाई के बहुत नज़दीक है. इसमें फैंटेसी जैसी कोई बात ही नहीं: सबकुछ बिल्कुल असली, मज़ेदार, हाज़िरजवाबी, कॉमेडी से भरपूर, और उलझा-बिखरा सा.
बिल्कुल हमारी ज़िंदगी की तरह. जब मैंने इसे [पहली बार] देखा था, तब मैं किशोर थी. अब जब मैं 27 साल की हूं ऐसा लगता है कि इनमें से बहुत-सी चीज़ें मेरी ज़िंदगी में फिर से लौट रही हैं. लीना डनहम तो अपने-आप में एक पूरी आर्मी हैं. वह इसे लिख भी रही थीं, डायरेक्ट भी कर रही थीं और इसमें एक्टिंग भी कर रही थीं. इतना कुछ करने के लिए कितने अनुशासन और श्रम की ज़रूरत पड़ती होगी, मेरा तो सोचकर ही सिर घूमने लगता है. सच कहूं तो यह देखना मेरे लिए सचमुच हौसला बढ़ाने वाला था.
टीटीई: जब आप बड़ी हो रही थीं तब हिंदी सिनेमा के साथ आपका जुड़ाव किस तरह का था?
बोनिता: मेरी हिंदी सिनेमा से जुड़ाव की रफ्तार काफी धीमी रही. मैंने ज़्यादा फिल्में नहीं देखी हैं; और सच कहूं तो ऐसा मैंने जानबूझ कर किया. कभी-कभी टीवी पर, सोनी या सेट मैक्स पर फिल्में आती थीं तो देख लिया करती थी. लेकिन उन फिल्मों में मेरा मन कभी रमा नहीं. लेकिन हां, कुछ
भारतीय फिल्में ऐसी हैं जो मेरे दिल के काफी करीब हैं, जैसे कि इंग्लिश विंग्लिश, क्वीन और रानी मुखर्जी की अइया, जिसे मैं गे समुदाय के लिए सबसे बड़ी आइकन फिल्म मानती हूं.
फिर मैंने अपर्णा सेन की फिल्में ढूंढनी शुरू कीं, 15 पार्क एवेन्यू जैसी पुरानी फिल्में, जो उन्होंने कोंकणा सेन के साथ की थीं. फिर मीरा नायर की बारी आई. मैं इन फिल्मों को तलाशती, उन्हें डाउनलोड करती और अपनी बहनों से ज़िद करती कि वह भी मेरे साथ देखें. वैसे हम सबको ये फिल्में बहुत मज़ेदार और अच्छी लगती थीं.
टीटीई: अपनी फिल्म में जो आपने दिखाया है, क्या उसमें आपके अपने डेटिंग अनुभव का भी कोई हिस्सा शामिल है?
बोनिता: जब मैंने [औरत बनने के लिए] ट्रांज़िशन शुरू किया था, तब मैं डेटिंग की दुनिया में बिल्कुल नई थी. हार्मोन की वजह से धीरे-धीरे मेरे शरीर में बदलाव दिखाई देने लगे. मैं धीरे-धीरे औरत में तब्दील हो रही थी. और तब डेटिंग ऐप पर मेरे अनुभव भी कम बुरे होते जा रहे थे.
मुझे मैच मिलने लगे. लड़के मैसेज करते, तारीफ़ों के पुल बांधते, बहुत ज़्यादा प्यार जताते. लव बम बोलते. लेकिन जैसे ही उन्हें लगता कि मैं दिलचस्पी नहीं ले रही हूं तो उनका रवैया बदल जाता. कहने लगते, “अरे तुम हो क्या चीज़? तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि मैं तुमसे बात कर रहा हूं, तुम तो ट्रांस औरत हो… खुद को क्या असली लड़की समझती हो?” मना किए जाने पर लड़के गुस्से से पागल हो जाते, गालियां देने लगते कुछ तो उल्टी-सीधी बातें करने लगते. जबकि
सच तो यह है कि किसी को पता ही नहीं कि ट्रांस होता क्या है [हंसते हुए]. किसी को कुछ पता ही नहीं है.
उन्हें लगता था कि मुझे शुरू से लेकर अब तक की हर बात उनको बता देनी चाहिए थी, जैसेकि मैं कब पैदा हुई, मेरे मां-बाप ने क्या कहा, मैंने अपना जेंडर कैसे बदलवाया, मैं कौन से हार्मोन्स ले रही हूं, मैंने कौन सी सर्जरी करवाई है, मतलब सब कुछ. लड़के पहले तो कहते कि “अरे यार, मैं तुमसे सच में प्यार करता हूं, तुम बहुत ही कमाल की हो, बहुत ही खूबसूरत हो.” यहां से वो इसमें बदल जाते कि “मुझे ट्रांस के बारे में कुछ भी नहीं पता. मुझे जानना है. गूगल करने से तो अच्छा है कि तुम ही बता दो. तुमको तो इन चीज़ों का अनुभव भी है. तुम तो सबकुछ जानती हो, तुमसे अच्छी टीचर कौन हो सकती है!”
डेटिंग ऐप्स पर पुरुष बिल्कुल बेझिझक होकर मुझसे मेरे प्राइवेट पार्ट्स के बारे में पूछने लगते थे. ठीक है, अगर आप मेरे साथ शारीरिक रूप से जुड़ रहे हैं तो मैं समझ सकती हूं यह आपके लिए मायने रखता है, लेकिन पूछने का क्या यही तरीका है! बहुत से लोगों में तमीज़ ही नहीं होती, भले ही वो आपको पसंद करते हों या उनकी नीयत बुरी न हो.
तमीज़ से कैसे पूछ सकते हैं? डिक या वजाइना? यह बहुत ही सहज सवाल है. इसको लेकर उनमें शालीनता ही नहीं है.
सच कहूं तो उन तमाम अनुभवों को एक शॉर्ट फिल्म में समेटना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल काम था. मैंने कोशिश की कि थोड़ा ये थोड़ा वो मिलाकर एक रेसिपी तैयार करूं — और फिर एक किरदार गढ़ूं.
मेरी कुछ ट्रांस गर्लफ्रेंड्स हैं. हम अपने अनुभव एक-दूसरे से साझा करते रहते हैं. मैं कह सकती हूं कि यह मेरे लिए बहुत मददगार साबित हुआ. मैंने कोशिश की थी कि एक मुकम्मल और बढ़िया फिल्म बनाऊं. मैं यह तो नहीं कहती कि इसमें वह सबकुछ है जो होना चाहिए था, लेकिन हां, उसका कुछ-कुछ अंश तो है ही. मैं बस यही कह सकती हूं.
टीटीई: आपकी एक ऑनलाइन ज़िंदगी है, दूसरी ऑफलाइन, और तीसरी वह जो आप फिल्मों में जीती हैं, चाहे वह आपका लिखा हुआ हो या किसी और का. इन तीनों तरह की ज़िंदगियों के बीच क्या रिश्ता है?
बोनिता: ऑनलाइन दुनिया अनुभवों की खान है. शुरू-शुरू में तो मैं कुछ भी पोस्ट कर देती थी. दिल में जो भी आता था, कह देती थी. कमेंट सेक्शन में अक्सर झगड़ पड़ती थी, लम्बी-लम्बी बहसें हो जाया करतीं. अगर आपने अपना अकाउंट पब्लिक कर रखा है, तो मीडिया और दूसरे लोगों की नज़र में तो आएंगे ही. आपको अच्छे और बुरे, दोनों तरह के कमेंट्स के लिए खुद को तैयार रखना पड़ता है. कभी-कभी बुरे कमेंट्स बहुत ज़्यादा खराब होते हैं. लेकिन एक समय के बाद, इंटरनेट पर वक्त बिताना बहुत भारी पड़ने लगा. यह एक कभी न खत्म होने वाला, लगातार बना रहने वाला तनाव था.यह तनाव मेरे मानसिक स्वास्थ पर हावी होता जा रहा था.
ऑनलाइन से बाहर वास्तविक दुनिया में मुझे अकेले बाहर जाने, रात में घूमने-फिरने और अपनी पसंद के कपड़े पहनने में बहुत मज़ा आता था. लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई, मेरे अंदर यह एहसास भी बढ़ता गया कि मुझे अपनी हिफाज़त की ज़िम्मेदारी खुद ही उठानी चाहिए. विशेष रूप से तब, जब आपके साथ कुछ बुरा हो जाता है और आप सोचने लगते हैं कि अच्छा, यहां क्या हुआ था? आगे से ऐसा न हो, इसके लिए क्या करना होगा?
मेरी मां कहा करती थीं, जैसा देश वैसा भेष. आपकी इंटरनेट वाली ज़िंदगी और असल ज़िंदगी में बहुत फर्क है. जैसे, अगर मैं किसी इन्फ्लुएंसर को फॉलो करती हूं जिसकी बातें मुझे पसंद हैं, लेकिन तब भी मैं राजस्थान या वडोदरा में उसकी लाइफस्टाइल या सोच को नहीं अपना सकती. अगर मेरे गांव में नियम है कि वे आपको छोटे कपड़े पहने नहीं देखना चाहते, तो आप छोटे कपड़े पहनकर नहीं निकलेंगी.. मैं कोशिश करूंगी कि लोगों का ध्यान मेरी तरफ आकर्षित न हो क्योंकि मैं अलग से दिखाई देना नहीं चाहती.
जहां तक कैमरे की बात है तो मेरा शूटिंग स्टाइल उन लोगों से बिल्कुल अलग है, जिन्हें मैंने ट्रांस लोगों की कहानियां शूट करते देखा है. ट्रांस किरदार वाली ज़्यादातर कहानियों में, कहानी का पूरा ढांचा और किरदार की दुनिया पहचान के इर्द-गिर्द ही सिमटी रहती है.
फिल्ममेकर दर्शकों में सहानुभूति पैदा करने या किसी भाव को (जैसे - नफरत, डर, खौफ या दुख) जगाने के लिए, अक्सर किरदार के ट्रांस होने को पूरी तरह निचोड़ लेता है.
नतीजा यह होता है कि पहचान के पीछे जो इंसान है, वह छिपा ही रह जाता है.
जब भी हम मीडिया में ऐसी कहानियां देखते हैं जिन्हें देखकर लगता है कि यह सही नहीं हैं, तो हमें बदलाव के लिए प्रेरित होना चाहिए. हमें यह सोचने की कोशिश करनी चाहिए कि हम कैसे बदलाव ला सकते हैं और चीज़ों को बेहतर बनाने के लिए क्या कर सकते हैं. अगर कोई चीज़ आपको बहुत परेशान करती है तो आप क्या करेंगे? यही न कि इस नज़रिए को कैसे बदलें?
मेरी बहन इस फिल्म को शूट कर रही थी और वो मुझे बहुत अच्छे से जानती है. उसके साथ काम करना मेरे लिए बहुत आसान था. एक समय ऐसा भी आया जब मैं फिल्म को अपनी बहन की नज़र से देख रही थी; यह उस नज़रिए से बहुत अलग था जिससे मैं अब तक दूसरों की नज़र में खुद को देखती रही हूं.
टीटीई: हम आपकी फिल्म के किरदार ‘जीवन’ के बारे में जानना चाहते हैं. कुसुम के साथ रहने के बावजूद, वह शायद ही कभी यह सोचता है कि दोनों कमिटेड पार्टनर भी बन सकते हैं. वहीं दूसरी तरफ कुसुम है, जो उसके साथ भविष्य को लेकर काफ़ी गंभीर नज़र आती है.
बोनिता: जीवन… (हंसते हुए) कुसुम जवान है, और जीवन भी जवान है. कुसुम उलझनों से भरी है, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा. उसे बार-बार ठुकराया गया है. इस कारण वह उस चीज़ की तलाश में है जो उसकी दूसरी सहेलियों के पास है, यानी एक अदद लड़का, जो उसे अपनी गर्लफ्रेंड कह सके.
शुरुआत में वह एक ऐसा लड़का ढूंढने की कोशिश कर रही है जो उसके लिए सही हो. उसे लगता है कि जीवन बहुत हैंडसम है. वह जीवन के सामने खुद को कम आंकती है और सोचती है, “शायद जीवन के साथ मेरा कभी कुछ नहीं बन पाएगा.” लेकिन धीरे-धीरे कहानी आगे बढ़ती है. दोनों रिलेशनशिप में आ जाते हैं और एक-दूसरे के साथ सहज हो जाते हैं. साथ रहने लगते हैं, लेकिन कुसुम के लिए यह काफी नहीं है. वह इससे ज़्यादा की चाहत रखती है.
हो सकता है कि वह चीज़ों को लेकर जल्दबाज़ी बरत रही हो. वह जीवन को नहीं जानती. वह इस बात को लेकर भी श्योर नहीं है कि वह उसके साथ रहना चाहती है या नहीं. वह तो बस किसी पुरुष के साथ रहना चाहती है या किसी पुरुष की हो जाना चाहती है. कोई पुरुष उसको अपना ले और उसके स्त्रीत्व की पुष्टि कर दे, उसे बस यही चाहिए.
वह यही सोचती है कि “हां, अब मैं एक नॉर्मल लड़की हूं क्योंकि एक लड़का मुझे चाहता है.” उलझन और चाहत के इस पूरे प्रकरण में, आपको पता ही नहीं है कि आप चाहते क्या हैं.
[कभी-कभी लोग] यह नहीं बताते कि वह पॉली हैं, लेकिन वे कई लोगों के साथ रिश्ते में होते हैं… मुझे लगता है कि हम सभी खुद तो पॉली होना चाहते हैं, लेकिन कभी यह नहीं चाहते कि हमारा पार्टनर भी पॉली हो. अगर पार्टनर ऐसा करे तो कहेंगे कि वह बेवफा है.
मैं यह नहीं कह रही कि इस तरह के रिश्ते अच्छे होते हैं या बुरे, लेकिन मुझे लगता है कि हम सभी और ज़्यादा उलझन का शिकार होते जा रहे हैं. आजकल लोगों से मिलना बहुत आसान हो गया है. शारीरिक नज़दीकियां महज़ एक कॉल या एक टेक्स्ट मैसेज जितनी दूर रह गई हैं. डेटिंग ऐप पर जो सबसे आसान काम है, वह है किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाना.
इसी कारण, हमें हमेशा ऐसा लगता रहता है कि “मुझे इससे भी बेहतर विकल्प मिल सकता है. मैं इससे और ज़्यादा बेहतर ढूंढ सकता/सकती हूं. भले ही यह लड़का या लड़की मेरे लिए बिल्कुल सही हो, और उसके साथ का अनुभव भी अच्छा हो, फिर भी दिमाग में यह चीज़ चलती ही रहती है कि मुझे इससे भी बेहतर मिल सकता/सकती है.” सच तो यह है कि सेटल होने का एहसास मन में कभी पैदा ही नहीं होता. हमारे अंदर अकेलेपन का एहसास बढ़ता जाता है. लेकिन इसके पीछे की वजह समझ नहीं आती.
टीटीई: आपकी फिल्म का बड़ा हिस्सा जेंडर को एक अदायगी के रूप में पेश करता है. कुसुम का किरदार बाहरी ज़रूरतों और अंदरूनी सच्चाइयों के बीच अपना रास्ता बनाता है. फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद, अब आप इस अदायगी को लेकर क्या अलग करना चाहेंगी, जो मौजूदा मीडिया रिप्रेजेंटेशन से अलग हो?
बोनिता: सच कहूं तो कभी-कभी मेरे लिए भी अपनी ट्रांस पहचान को अलग तरह से पेश करना मुश्किल हो जाता है. मैं बहुत सारा कंटेंट देखती रहती हूं. मैं जो कुछ भी देखती हूँ, ट्रांस होने के नाते मेरे दिल-दिमाग़ में बैठ जाता है, और फिर मेरे लेखन में उतर आता है. इससे खुद को डिटॉक्स करना मेरे लिए बहुत ज़रूरी है, लेकिन कई बार ऐसा करना बहुत मुश्किल हो जाता है.
इन दिनों मैं एक नई सीरीज़ लिख रही हूं, जिसमें मैंने किरदार के अंदाज़ और आवाज़ पर बहुत काम किया है. बहुत से नए तरीके मिले हैं. यह कुसुम की कहानी कहने का एक बिल्कुल नया तरीका होगा. जब आप किरदारों को महज़ ‘एक ट्रांस किरदार’ के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में देखने लगते हैं, तब जाकर कहीं एक नयी शुरुआत होती है. हम सब एक बहुत बुनियादी बात भूल जाते हैं: हम सभी इंसान हैं और हम सभी में जलन, नफ़रत और दया जैसी भावनाएं भी एक जैसी ही होती हैं…
हम अक्सर ऐसे किरदार गढ़ते हैं जो सिर्फ़ ट्रांस होते हैं, न कि ऐसे किरदार जो ट्रांस भी होते हैं. ट्रांस होना तो उनकी पहचान का महज़ एक हिस्सा है. लेकिन इसके अलावा वे कौन हैं? मैं कौन हूं? आप कौन हैं? कौन-सी चीज़ें हैं जो आपकी पहचान को परिभाषित करती हैं? आप खुद को कैसे परिभाषित करेंगे? आप किस रूप में परिभाषित होना चाहेंगे? ये वे परतें हैं जो हम सबके भीतर होती हैं. मैं इन्हीं परतों को टटोलने-समझने और अपनी कहानियों में ढालने की कोशिश कर रही हूं.
टीटीई: एक लेखक के रूप में हम न सिर्फ अपनी ज़िंदगी, बल्कि अपने आसपास के लोगों की ज़िंदगी से भी बहुत कुछ लेते हैं. आपको कभी इस बात की चिंता नहीं होती कि आप जिन लोगों को जानती हैं, उनके बारे में बहुत कुछ ज़ाहिर कर रही हैं? आपके लिए क्या लिखना मुश्किल होता है? और जब आप उसे अपनी परफ़ॉर्मेंस का हिस्सा बनाती हैं, तो उसे उन अभिनेताओं को कैसे समझाती हैं, जिनके साथ आप काम कर रही होती हैं?
बोनिता: [हंसते हुए] मैंने इस बारे में तो सोचा ही नहीं था. दरअसल आपको अपनी बात खुलकर रखनी पड़ती है, समझ रहे हैं ना? शुरू-शुरू में थोड़ी झिझक महसूस होती थी कि लिख तो दिया लेकिन सुनने में कैसा लगेगा? क्या यह शर्मिंदा करने जैसा है? लेकिन अब लगता है कि शर्मिंदा वास्तव में एक बहुत ही बढ़िया चीज़ है. अक्सर यह बाहर नहीं आ पाता, हमें इसे बाहर आने देना चाहिए.
एक ऐसे सहयोगी का होना ज़रूरी है, जो आपके विज़न को, जो आप कहने की कोशिश कर रहे हैं उसको, समझने वाला हो, क्योंकि शर्मिंदगी वाले एक सीन को कई तरह से देखा जा सकता है. मेरे साथ सबसे अच्छी बात यह है कि मेरे पास बेहतरीन प्रोड्यूसरों में से एक, ध्रुव सोलंकी हैं, जो मुझे ऐसी चीज़ें करने के लिए हमेशा प्रोत्साहित और प्रेरित करते रहते हैं.
जिस समय आप लिख रहे होते हैं, आपका पूरा ध्यान कहानी पर होना चाहिए. उस समय आप अदायगी के बारे में नहीं सोचते. [जब] हमारी स्क्रिप्ट शॉर्टलिस्ट हो गई और सब कुछ तय हो गया, तो मैं घबरा उठी! मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं? मैं सोच रही थी कि इतने सारे सीन मैं कैसे करूंगी? हम सभी इस बात को लेकर परेशान थे कि अभिनेताओं को चीज़ें कैसे समझाएंगे.
और मेरा क्या? मुझे कौन बताएगा? मुझे कौन तैयारी से हौसला देगा? मुझे तो एक ऐसे मज़बूत हीरो का किरदार निभाना है जो सब जानता है.
एक डायरेक्टर-एक्टर के रूप में आप खुद को हौसला देते हैं और ऐसा करने के लिए आपके पास कोई तरीका भी नहीं होता.
आपके पास कोई दूसरा निर्देशक भी नहीं है जो कहे कि हमें इसे ऐसे करना है.
इंटिमेसी कोऑर्डिनेटर के बावजूद यह सब करना बहुत मुश्किल था. अभिनेता यह सोचकर डरे रहते थे कि “कहीं कुछ उल्टा-पुल्टा न हो जाए, या कहीं ऐसी जगह न छू दूं जहां छूना उसे पसंद न हो, या कहीं हद न पार हो जाए! और मैं भी यही सोच रही होती थी कि कहीं मैं कुछ ऐसा न कर दूं जो सही न हो! मुझे लगता है कि अपनी भूमिका करने के दौरान आपको अभिनेता के साथ एक किस्म की दोस्ती करनी पड़ती है. वैसे हमारे पास एक एक्टिंग कोच भी थे, जो बाद में हमारे इंटिमेसी कोऑर्डिनेटर बन गए.
मुझे इस बात की खुशी थी कि बहुत से लोग और कलाकार मेरे दोस्त थे, लेकिन दोस्तों के साथ एक दिक्कत यह भी होती है कि वह आपको गंभीरता से नहीं लेते. वह आपको निर्देशक के रूप में नहीं देखते. ऐसे में सख्ती बरतना मुश्किल हो जाता है. आप सख्ती के साथ नहीं कह सकते कि तुम्हें मेरी बात सुननी होगी, तुम इसे ऐसे नहीं कर सकते, तुम्हें इसे ऐसे करना होगा. लेकिन जब आपस में दोस्ती हो जाती है, सहजता आ जाती है, तो आप हर चीज़ पर खुलकर बात करने लगते हैं.
इंटिमेसी वाले सीन के लिए मेरा बस एक ही मूलमंत्र है, जितनी जल्दी मुमकिन हो निपटा लो, फिल्म चाहे कोई भी हो. उसे ज़्यादा लम्बा खींचने की ज़रूरत नहीं है. जो करना ज़रूरी है, करो. परफ़ॉर्म करते समय आपको पूरी तरह अपने किरदार में रहना है, सिर्फ वही करना है जो फिल्म और कहानी के लिए ज़रूरी है. यह चीज़ मैंने ‘लव, सेक्स और धोखा’ वाली वर्कशॉप में सीखी थी. सच कहूं तो वर्कशॉप के कुछ अनुभवों से मुझे इस सोच तक पहुंचने में काफी मदद मिली है.
टीटीई: फिल्म को लेकर दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रही? कोई दिलचस्प प्रतिक्रिया? अलग-अलग पीढ़ी के लोगों की राय?
बोनिता: हाल ही में हमने मुंबई पीवीआर में स्क्रीनिंग की थी, फ्लेयर सिनेमैटोग्राफी फिल्म फेस्टिवल में, जिसमें महिला सिनेमैटोग्राफरों की फिल्में दिखाई जा रही थीं. वहां मैं एक वरिष्ठ [महिला] से मिली, उनकी उम्र यही कोई 60-70 साल रही होगी. जब मैं फ्री हुई तो उन्होंने मुझसे कहा, “आपकी फिल्म मुझे बहुत अच्छी लगी. यह लीग से बिल्कुल अलग हटकर थी, दुनिया कितनी ज़्यादा बदल गई है. क्या-क्या हो रहा है?” मुझे लगता है कि वह भी थोड़ी उलझन में थीं कि मैं कौन हूं… क्या हूं? लेकिन उस वक्त वहां उनके साथ मैंने बस यही महसूस किया कि वह मेरे साथ हैं. उनकी बातों में एक तरह की एकजुटता की भावना थी, जैसे कह रही हों कि मैं तुम्हारे साथ हूं और मैं तुम्हारी भावनाओं को समझती हूं. फिल्म में क्या हो रहा था, भले ही उन्हें यह पूरी तरह से समझ में न आया हो, लेकिन वह महसूस कर पा रही थीं कि [कुसुम] के साथ जो कुछ भी हो रहा है, नहीं होना चाहिए था. उनके चेहरे का भाव ऐसा था जैसे कह रही हों, “मैंने ऐसा कुछ पहले कभी नहीं देखा था.” यह बात मेरे दिल में उतर गई. सच कहूं तो, ऐसी प्रतिक्रिया पाकर मुझे बहुत खुशी और रोमांच महसूस हुआ. जब कभी मैं खुद को कमज़ोर पाती हूं, मुझे लगता है कि यही वे लोग हैं जिनकी मदद से मैं अपने लिए सही रास्ता तलाश कर पाई.
मैंने [फिल्म] यह सोचकर नहीं बनाई थी कि लोग खुद को इससे जोड़कर देख पाएंगे. ये तो उस बारे में है जिसे... मैं जानती हूं. जिसे कोई भी मुझसे नहीं छीन सकता, यह मेरा अनुभव है.
पर आखिरकार यह फिल्म बहुत सारे लोगों की आवाज़ बन गई. बहुत से लोगों की आवाज़, चाहे वे क्वियर हों या न हों. यह मेरे लिए किसी जादू से कम नहीं. यह फिल्म सिर्फ क्वियर लोगों की ज़िंदगी की झलक मात्र नहीं दिखाती बल्कि यह लोगों के एहसासों को पकड़ती है. मुझे खुशी है कि लोगों ने इसमें हमदर्दी, नफ़रत, घिन या डर जैसे एहसासों को महसूस किया. जब लोग फिल्म में कही गई किसी बात पर हंसते थे तो मेरा दिल खिल जाता था. जब लोग आपका स्टाइल और आपकी नीयत समझ जाते हैं, तो वह आपको भी समझने लगते हैं. यह कुछ वैसा ही है, जैसे कहते हैं न कि अगर आप जानते हैं कि जानते हैं तो आप जानते हैं. (अंग्रेज़ी में इस्तेमाल किया जाने वाली एक ऐसी पंक्ति जिसका मतलब है कि अगर आपको पता है, तो आपको पता है.)
और ऐसा हुआ कि कल मैं रॉटरडैम पर फिल्में देख रही थी. मेरी बहन का रॉटरडैम पर अकाउंट है. फिल्में देखने के बाद मैंने लेटरबॉक्सड (फिल्मी समीक्षा लिखने की एक ऑनलाइन वेबसाइट) पर उनको रेट किया. तभी मेरी नज़र आईवाईकेवाईके (Iykyk ) पर पड़ी तो क्या देखती हूं कि रिव्यूज़ की संख्या दोगुनी हो चुकी है. मैंने [मन ही मन] सोचा, तो लोग सचमुच मेरी आवाज़ पर भरोसा करते हैं. मुझे और ज़्यादा काम करना होगा. मुझे अपनी रफ्तार बढ़ानी होगी. आपको बताऊं कि फिल्म में लोगों ने जिन बारीक बातों को पकड़ा है, वे सचमुच बहुत कमाल की हैं. तो बात यह है कि लोग सचमुच ध्यान देते हैं.
बोनिता एक एक्टर और फिल्मकार हैं. वे दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘एलएसडी – 2’ में अपनी भूमिका के लिए जानी जाती हैं. राजस्थान की रहने वाली बोनिता ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत ‘इट्स ऑल इन योर हेड’ (2023) से की थी. यहीं से उन्होंने अपनी पहली लघु फिल्म ‘आईवाईकेवाईके’ (2024) लिखी और उसका निर्देशन किया. यह फिल्म काफी चर्चित हुई और कई फिल्म महोत्सव में इसने अवॉर्ड भी जीता. उनकी दूसरी लघु फिल्म वी कैन हियर द सेम म्यूज़िक, एनएफडीसी द्वारा किए गए ’48 घंटे फिल्म मेकिंग चैलेंज’ के तहत बनाई गई थी जो अमेज़न प्राइम वीडियो पर उपलब्ध है. बोनिता के द्वारा बनाई गई फिल्मों का प्रदर्शन कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में हो चुका है.
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द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.


