ट्रांसजेंडर

एक ट्रांसजेंडर शिक्षक के शिक्षा के अनुभव

डॉ. राजर्षि चक्रवर्ती बर्द्धमान विश्वविद्यालय में इतिहास विषय पढ़ाते हैं और बतौर सहायक प्रोफेसर कार्यरत हैं. इतिहास के एक शिक्षक के रूप में उनकी यात्रा 1999 से शुरू होती है जब उन्होंने कलकत्ता के तिलजला ब्रजनाथ विद्यापीठ में पहली बार पढ़ाना शुरू किया था. राजर्षी 1997 से एलजीबीटीक्यूआई+(LGBTQIA+) आंदोलनों से भी जुड़े हैं.

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सन् 2013 में निरंतर संस्था ने एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म का निर्माण किया था. यह फ़िल्म उन लोगों के स्कूली अनुभवों पर आधारित थी जो स्त्री-पुरुष बाइनरी में खुद को अनफिट महसूस करते थे. नृप, सुनील और राजर्षि इस फ़िल्म के केंद्रीय पात्र हैं जो क्रमशः ठाणे, बेंगलुरु और कोलकाता में रहते हैं.

“हमारी ज़िंदगियां दो समांतर रेखाओं की तरह है. हम दोनों की भटकन और तलाश एक जैसी है.”

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर फतेहपुर के रहने वाले रुहान आतिश अपनी पहचान एक ट्रांसमैन के रूप में देखते हैं. उन्हें कविताएं लिखने का शौक है. वकील होने के साथ-साथ वे एक कार्यकर्ता भी हैं. इस सीरीज़ में रूहान के ‘नक्शा ए मन’ को आकार देने का काम तमिलनाडु की रहने वाली, ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता, कवि, उद्धमी, एक्टर एवं प्रेरक वक्ता कल्कि सुब्रमण्यम ने किया है.

बदलती निगाहों का शहर

प्रयागराज एक्सप्रेस ने जैसे ही अपनी रफ़्तार धीमी की, मैंने ट्रेन की खिड़की से बाहर का जायज़ा लिया. रेल की पटरियों के दोनों तरफ़ जुगनूओं जैसी टिमटिमाती रौशनी की कतारों को देखकर सर्दी में सुस्त पड़े दिल ने मानो फ़िर से धड़कना शुरू कर दिया.

“आईएएस सेवाओं की तरह ही हमारे यहां भारतीय जन स्वास्थ्य कैडर होना चाहिए.”

ट्रांसजेंडर या सिसजेंडर – जो किसी तयशुदा खांचे में अपने को फिट नहीं पाते, वे सार्वजनिक स्वास्थ्य के ‘सिस्टम’ में अपने को कहां खड़ा पाते हैं? क्या वैक्सीन या स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी प्रचार का केंद्र ऊंची जाति के लोग और ख़ासकर उत्तर भारत के लोग ही हैं?

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