बदलती निगाहों का शहर

शहर के साथ बातचीत करती एक ट्रांसमैन की डायरी

फ़ोटो साभार: रूहान आतिश

रूहान, द थर्ड आई सिटी संस्करण के ‘ट्रैवल लोग’ फैलोशिप का एक हिस्सा हैं. इस फैलोशिप ने भारत के 13 अलग-अलग शहरों से जुड़े लेखकों एवं कलाकारों को निर्देशन देने का काम किया. जिन्होंने इसके अंतर्गत नारीवादी नज़रिए से शहर के विचार की कल्पना की है.

प्रयागराज एक्सप्रेस ने जैसे ही अपनी रफ़्तार धीमी की, मैंने ट्रेन की खिड़की से बाहर का जायज़ा लिया. रेल की पटरियों के दोनों तरफ़ जुगनूओं जैसी टिमटिमाती रौशनी की कतारों को देखकर सर्दी में सुस्त पड़े दिल ने मानो फ़िर से धड़कना शुरू कर दिया. ये रौशनी उस मंज़िल का निशां है, जिसके इस्तिक़बाल के लिए मैंने कानपुर स्टेशन के गुज़रते ही, ऊपर वाली बर्थ से अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया था. मंज़िल यानी मेरा अपना शहर, फ़तेहपुर.

मैं कहीं भी चला जाऊं, ये शहर मुझे चुम्बक की तरह हमेशा अपनी ओर खींचता रहता है. दिल्ली जाने से पहले कुछ साल मैं उत्तर-प्रदेश के अलग-अलग शहरों में रहा था. लेकिन जहां भी रहा फतेहपुर, हमेशा नज़दीक ही रहा. बाहर से लौटने पर शहर में घूमने के मौके तो कम ही मिलते, हां, जब-तब शहर से मुलाक़ात ज़रूर हो जाती है.

ख़ैर, इस बार दिल्ली से फ़तेहपुर लौटा हूं तो मेरे पास शहर को नए नज़रिए से जी भर कर देखने के दो कारण हैं – पहला, वर्क फ्रॉम होम के बहाने ढेर सारा वक़्त और दूसरा, द थर्ड आई के साथ बतौर फेलो राइटर ‘ट्रैवेल राईटिंग प्रोजेक्ट’ पर काम करने का मौक़ा. 

मैं फ़तेहपुर हूं. दिल्ली हावड़ा रेलवे रूट पर, कानपुर और इलाहाबाद जैसे बड़े शहरों के बीच, दोआब की धरती पर बसा, गंगा-जमुनी तहज़ीब में रंगा, उत्तर प्रदेश का एक गुमनाम सा उपेक्षित ज़िला – फ़तेहपुर!

मौर्य कालीन सिक्के, मूर्तियां, शिलालेख, गुप्तकालीन मंदिर, इमारतों के खंडहर – इन सारी विरासतों को आज तक सहेज कर रखा है. मैं ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रह चुका हूं. औरंगज़ेब और शाह शुजा के बीच उत्तराधिकार का युद्ध मेरी ही ज़मीं पर लड़ा गया. खजुहा कस्बे के 18 एकड़ में फैले बाग़ बादशाही और रंगमहल के अवशेष, इसी युद्ध की निशानी हैं.

नज़दीक ही, परदाना में वो ‘बावनी इमली’ का दरख़्त भी है जिसपर 28 अप्रैल 1858 को क्रांतिकारी जोधा सिंह अटैया और उनके 51 साथियों को हिन्दुस्तान के पहले स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के ज़ुर्म में  अंग्रेज़ों  ने एक साथ फांसी पर लटका दिया था. फ़तेहपुर से इसका नेतृत्व अज़ीमुल्ला खां ने किया था. 18 दिन तक ये 52 शरीर इस दरख़्त की टहनियों से लटकते रहे. आज वहां इमली के कई और दरख़्त पैदा हो चुके हैं. 

कभी मौका मिले तो ‘रानी तालाब’ देखने आना. हसवा के ज़मींदार रामगुलाम केसरवानी की बेटी और फूलपुर स्टेट के राजा अमरनाथ की पत्नी, रानी गोमती कुंवर ने बनवाया था यह तालाब. उस ज़माने में भी इस मर्द वर्चस्ववादी समाज में सिर्फ़ बेटी और पत्नी होने से इतर, रानी गोमती कुंवर अपनी स्वतंत्र पहचान रखती थीं.

आना कभी इधर अगर देखना चाहो आर्किटेक्चर और इंजीनियरिंग का ऐसा नायाब नमूना जिसे आज के बड़े-बड़े इंजीनियर देख कर चक्कर खाते हैं. ससुर खरेदी नदी पर बना 135 साल पुराना ब्रिटिश कालीन पुल जिसके नीचे नदी बहती है और नदी के ऊपर पुल पर उसे लगभग 90° के एंगल पर काटती हुई राम गंगा नहर गुज़रती है. और क्या-क्या बताऊं? छोटी भूलभुलैया तो ख़ैर अब उपेक्षित और वीरान है लेकिन शाह जलालुद्दीन औलिया की दरगाह में अक़ीदत वाले लोग रोज़ अब भी हाज़िरी लगाते हैं.

18 दिसंबर 2020

स्टेशन से घर की ओर जाते हुए मैं आईटीआई रोड से गुज़र रहा था. मेरी ज़िंदगी की ऐसी बहुत सी खट्टी-मीठी यादें हैं जो आज भी दिल से शहद की तरह चिपकी हैं, जिनका रास्ता शहर के इस मोड़ से होकर गुज़रता है.

फतेहपुर, में रहने के दौरान इस इलाके में पहले रोज़ ही आना-जाना होता था. गवर्नमेंट गर्ल्स इंटर कॉलेज (GGIC) के अलावा तमाम छोटे-बड़े कोचिंग सेंटर इसी रोड पर हैं. उससे थोड़ा सा आगे बाईं तरफ़ चलने पर इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट का बड़ा सा कैम्पस है. उसका विशाल घास का मैदान अलसुबह शुगर-बीपी के मरीज़ों और एक्सरसाइज़ करने वाले लोगों के लिए पार्क बन जाता, तो दिन में खिलदंड लड़कों के लिए स्टेडियम, और शाम को खाली होने के बाद कोचिंग सेंटरों से छूटे कमसिन प्रेमी जोड़ों का ठिकाना.

मैदान के एक तरफ़ की बाउंड्री वॉल टूटी हुई थी इसलिए ज़ंगदार ज़ंजीरों में जकड़ा इसका आधा टूटा फाटक कभी किसी के लिए रोड़ा नहीं बना. साईकिल की सवारी से लेकर स्कूटी सीखने तक के मेरे सारे शौक़ भी इसी मैदान में परवान चढ़ा करते थे. आज भी शहर में कोई बड़ा सांस्कृतिक मेला आयोजित किया जाना हो या प्रदर्शनी लगनी हो, तो कार्यक्रम स्थल यह मैदान ही होता है.

लेकिन इस बार लौटा हूं तो आईटीआई कैम्पस की दीवारें मरम्मत हो कर नए रंग में रंगी नज़र आ रही हैं. टूटे हुए फाटक की जगह नया और मज़बूत गेट लग गया है. ये पक्की दीवारें और मज़बूत गेट मुझे जाने क्यों चिढ़ाते हैं, ऐसा लगता है जैसे ये विकास न होकर इंसानों को घेरने, बांधने, और हदों में क़ैद कर देने की कोई साज़िश हो. विकास के नाम पर की जाने वाली ये हदबंदी और सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम कुछ लोगों के लिए अच्छे हो सकते हैं लेकिन ये कइयों से उनके ठिकाने छीन भी लेते हैं.

मैं फतेहपुर हूं. मेरी रूह में बसती है यहां बसने वाली तक़रीबन 26 लाख आबादी. मुझे छोड़कर जानेवाले मुझे मोहन के पेड़ों, बिरजू के समोसों, बनवारी के सोहनहलुवे और चाची की कचौड़ियों के ज़ायके के साथ याद करते हैं. ये शहर के चटोरों के वो अड्डे हैं जिनपर जुटने वाली भीड़ अपेक्षाकृत समावेशी होती है क्योंकि यहां बाकी शहर की तरह किसी को किसी के धर्म, जाति और जेंडर पर ध्यान देने की फ़ुर्सत नहीं होती. काश इन अड्डों की तरह ही हमारी बाहरी दुनिया भी समावेशी होती.

यहां के चौक, लाला बाज़ार, बाक़रगंज, चौधराना, पीरनपुर और खेलदार जैसे मोहल्लों के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने में हिंदू-मुस्लिम की बराबर भागीदारी देखी जा सकती है लेकिन जाति धर्म और आर्थिक स्तर पर बांटे गए लोगों के प्रति उदार भाव रखने वाले ये लोग अपने ही शहर में जेंडर एवं यौन अभिरुचियों के आधार पर हाशिए पर रखे गए लोगों के प्रति इतना उदार और समावेशी नहीं हैं, आख़िर क्यों? इस क्यों का जवाब तो सभी को मिलकर ढूंढना होगा.

ख़ैर… ये लोग इतने सालों से जो मुझे सजाते-संवारते रहे. मैं भी इनके ग़म में ग़मगीन और इनकी ख़ुशी में ख़ुश होता रहा. मेरी आग़ोश में रहने वाले ये बाशिंदे मेरे अपने हैं. इसी ज़मीं पर पैदा हुए, यहीं खेले-कूदे, पले-बढ़े, ज़िंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव से गुज़रे. जब भी वे अपने संघर्षों में जीते, तो मुझे ख़ुदपर फ़क्र हुआ. मजबूरियों या महत्त्वाकांक्षाओं में मुझे छोड़ गए, तो उनकी जुदाई ने मुझे रुलाया.

लेकिन मैं उन छोड़ जानेवालों से शिकायत भी नहीं कर सकता क्योंकि इलाहाबाद और कानपुर जैसे बड़े शहरों के बीच बसे फ़तेहपुर जैसे कस्बाई शहर में उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य की वैसी सुविधाएं, तरक्की की वैसी असीमित संभावनाएं और यहां की तंग ज़हनियत के बीच बदलती आधुनिक विचारधाराओं को वैसी स्वीकृति नहीं मिल पाती जैसी उन्हें चाहिए.

25 दिसंबर 2020

घर आने के तीन-चार दिनों के बाद मन हल्का सा लगा तो सिर को भी हल्का करने की गरज़ से मैंने एक मैन्स सैलून में जा कर बाल कटवाने का सोचा. यह सैलून मेरे मोहल्ले से कुछ ही दूरी पर है. दोनों मोहल्लों के बीच एक बहुत बड़ा कब्रिस्तान है जहां मेरा बचपन मोहल्ले और रिश्तेदारों के लड़कों के संग पतंग उड़ाते, क्रिकेट खेलते गुज़रा था. लेकिन बढ़ती उम्र के साथ ही घरवालों की बढ़ती रोकटोक ने मैदीन से मेरा रिश्ता लगभग ख़त्म कर दिया. हां, कभी-कभी अपनी छत से मैं लड़कों को खेलते देख लिया करता था.

फिलवक़्त बाकी जगहों की तरह यह भी ऊंची चारदीवारी से घेरा जा चुका है, और मिट्टी की कई कच्ची क़ब्रों की जगह पुख़्ता क़ब्रों ने ले ली है. कुछ पर तो संगमरमर के पत्थर भी लगे हैं जिनपर मरने वाले का नाम खुदा है. मगर कब्रिस्तान की पक्की दीवारों के होने के बावज़ूद मुझे एक शॉर्टकट गली मिल ही गई, जहां से एक घुसपैठिए की तरह हम दूसरे मोहल्ले में जा घुसे.

लेकिन सैलून के भीतर जाते ही मुझे मेरे ट्रांसमैन होने का एहसास हुआ और ये भी कि मेरे शहर के लोग आज भी जेंडर को तयशुदा खांचों में रखकर ही देखते हैं. अपने आसपास नज़र दौड़ाने पर मुझे हर तरफ़ हेट्रोनोर्मेटिव मिज़ाज के लोग ही दिखाई देते हैं (यानी औरतें, औरतों की लाईन में और मर्द, मर्दों की लाईन में और ये लाईनें स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बैंक - हर जगह दिखाई देती हैं. इनके बीच किसी अन्य जेंडर की पहचान के लिए कोई जगह न थी, न है!)

गांव हो, कस्बा हो या शहर जेंडर को लेकर यह नज़रिया हर तरफ़ दिखाई देता है. हां, महानगर कुछ हद तक अपवाद हो सकते हैं. दिल्ली जैसे महानगर का विस्तार एक पल में पहचान और गुमनामी दोनों देता है. (लेकिन दिल्ली जैसे शहरों की अपनी कुछ अलग मुसीबतें भी हैं.)

फिर भी दिल्ली में मुझे वो आज़ादी मिली जो मैं चाहता था, भले ही ये आज़ादी एक 1BHK में क़ैद है और आसमान देखने के लिए 5 माले की सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो हम जैसे कस्बाई बाशिंदों को गर्मियों में खुले आसमान तले सोनेवालों को थोड़ी अखरती है. लेकिन दिल्ली ने मेरी जेंडर पहचान की तस्दीक़ करके मेरा हौसला बढ़ाया. वहीं,

छोटे शहरों के सामाजिक संबंधों के मकड़जाल और पारम्परिक दायरों में जीते हुए न जाने कितने ख़्वाब ख़ामोशी से दम तोड़ देते हैं. मुझे आज भी याद आता है रस्तोगीगंज का वो लड़का जिसके शरीर के अंगों को पुलिस वाले टटोल रहे थे, जिसने ख़ुद को मारने से पहले दीवारों पर लिखा था ट्रांसजेंडर भी इंसान होते हैं. वहां खड़े पुलिसवाले कह रहे थे कि शरीर तो ठीक है, शायद दिमाग़ी हालत बिगड़ गई थी इसकी.

फतेहपुर में, बतौर एक ट्रांसमैन, मेरी असल पहचान को, पहली स्वीकृति मेरे कर्ज़न ब्रदर से मिली जब मैं सैलून से बिना बाल कटवाए ही लौट आया था. शायद उसे मेरी बैचेनी समझ आ रही थी. उसने अपने शेविंग ट्रिमर से मेरे बाल काटने का अनोखा प्रयोग किया. बाल ठीक से सेट हुए या नहीं ये कहना मुश्किल है लेकिन यक़ीनन उसने बाल बिगाड़े ज़्यादा!

वैसे, उसकी तरफ़ से मिली ये स्वीकृति इस बात की भी सूचक थी कि धीरे-धीरे ही सही, बदलाव की बयार इस शहर में भी बहने लगी है और नई पीढ़ी चीज़ों को नए नज़रिए से देख समझ रही है.

मैं फतेहपुर हूं. रूहान ! मुझे छोड़कर जाने से पहले वो अक्सर यहां के लोकल पार्क – जिसे गेट वे ऑफ अर्थ कहा जाता है – में अपनी बेचैनियों के साथ बैठा मुझसे घंटों झगड़ता था. वो मुझसे कहता, “तुम एक सदी तक टुकड़ा-टुकड़ा कभी कानपुर कभी इलाहाबाद की पनाह में अपना वज़ूद तलाशते रहे, लेकिन आख़िरकार 1826 में तुम मुक़म्मल हो ही गए. फ़तेहपुर- तुम्हें नाम मिला, तुम्हारी एक पहचान तुम्हें मिली. लेकिन मैं अब तक अधूरा हूं. मुझे मेरा नाम, मेरी पहचान आख़िर कब मिलेगी? आख़िर कब मैं खुल कर अपनी ज़िंदगी जी पाऊंगा?” लेकिन, मैं भला रूहान के इन सवालों का क्या ही जवाब दे पाता. मैं बस उसके हक़ में दुआ कर सकता था.

4 जनवरी 2021

फतेहपुर शहर के लगभग बीचो-बीच चौक बाज़ार है. आज शहर घूमते हुए मैं बाकरगंज की तरफ़ से इस बाज़ार में घुसा तो एक पुरानी इमारत दिखी, जिसके कमज़ोर दरके हुए हिस्से को गिराकर शायद मरम्मत या नए निर्माण की तैयारी चल रही है. ऐसी अनेक टूटी, पुरानी और नई बनती इमारतें आज इस शहर में विकास के नाम पर हो रहे बदलाव को बयां करती हैं. इमारतें हों या धारणाएं – वक़्त के साथ कमज़ोर और अनुपयोगी हो ही जाती हैं, और समय के साथ चलने की गरज़ से बदली जाती हैं. लेकिन, कई बार कुछ धारणाएं, परम्पराएं, पूर्वाग्रह और कभी-कभी कुछ यादें उन मज़बूत दरख़्तों सी होती हैं जिनकी जड़ें वक़्त के साथ और गहरी होती जाती हैं.

इस बाज़ार से ऐसी ही एक बुरी याद जुड़ी है. तब मैं 7वीं में पढ़ता था. साप्ताहिक बाज़ार वाले दिन इन्टर स्कूल कॉम्पटीशन के बाद अकेले घर लौटते वक़्त मैं बाज़ार की भीड़ में फंस गया और तभी भीड़ का फायदा कुछ वहशी हाथों ने उठाया. उस दिन के बाद से जाने कितने साल मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं दोबारा इस बाज़ार के अंदर घुसूं. भीड़ के प्रति भी एक अनजाना खौफ़ दिल मे बैठ गया था.

ईद के लिए नए कपड़े ख़रीदने हों या कभी कुछ भी लेना हो, जब भी मम्मी-पापा साथ चलने को कहते तो कोई न कोई बहाना बनाकर साथ जाने से इंकार कर देता. उनके लाख डांटने पर भी न जाता, और फ़िर वो जो कुछ भी लाकर देते पहन लेता. जब चप्पल या जूते छोटे होने लगते या फट जाते, तब एक कागज़ पर पैरों का माप बनाकर पापा को दे आता, और वो जो भी लाते उसे चुपचाप पहन लेता था.

इस बार सालों बाद एक बार फ़िर इस बाज़ार में घुसा तो वो वाक़या याद आने लगा. तभी अचानक पीछे से आवाज़ आई, “भैया जी थोड़ा साईड हो जाइए” मैनें मुड़ कर देखा तो उस रिक्शा वाले और मेरे बीच में कोई भैया जी नहीं थे, यानी यह सम्बोधन मेरे लिए था. मैंने किनारे होते हुए आश्चर्य मिश्रित खुशी से अपने ऊपर ध्यान दिया. सर्दियों की शाम में भीतर इतने सारे कपड़ों के ऊपर जैकेट पहनने से सीना सपाट लग रहा था और मुंह पर मास्क लगा होने के कारण शायद उसने भूलवश मेरी वास्तविक पहचान पर अपनी मुहर लगा दी थी. किसी ट्रांसमैन को एक मर्द के रूप में स्वीकार कर, उसे उसी रूप में संबोधित करना, कितनी खुशी और संतुष्टि देता है इस बात का अंदाज़ा जेंडर के तयशुदा खांचों में अपने को फिट देखने वाले लोग शायद ही लगा सकते हैं.

5 जनवरी 2021

आज, एक बार फ़िर मैं मम्मी के साथ ख़रीददारी करने बाज़ार गया था. वहां ज़्यादातर दुकानदारों का मुझे भैया जी कहना, और एक मर्द की तरह व्यवहार करना, मुझे ये सोचने पर भी मजबूर कर रहा था कि समाज में आज भी स्त्री और पुरुष की पहचान सिर्फ़ शरीर के कुछ ख़ास हिस्सों के आधार पर होती है, और पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष होना किसी और जेंडर के मुकाबले सुरक्षित होना भी है.

फतेहपुर, की जिन दुकानों से कभी मेरे लिए दुपट्टे की लंबाई देखकर सूट ख़रीदे जाते थे, अब और ज़्यादा बड़ी हो चुकी उन दुकानों के मैन्स कॉर्नर से अपने लिए पसंद के पैंट-शर्ट, टीशर्ट चुनना मेरे लिए किसी सुखद सपने के सच होने जैसा था. कभी इस शहर में सड़कों पर घूमते हुए लड़कों को देखकर मेरा मन बहुत ललचाता था. उस वक़्त बस यही ख़्याल मन में उठता कि एक दिन मैं भी अपने ऊपर लादी जा रही सारी बंदिशों को तोड़कर उन लड़कों की तरह आज़ाद हो घूमूंगा.

आज इस रूप में मैं ख़ुद को काफ़ी हद तक उसी तरह कंफर्टेबल महसूस कर पा रहा था जैसा मैं चाहता था. हालांकि, मम्मी का रवैया आज भी पहले की तरह नकारात्मक ही था.

21 फ़रवरी 2021

इन दो महीनों में मैं शहर की ऐसी कई जगहों पर भी गया, जहां पहले नहीं गया था. लेकिन वापस लौटने से पहले आज मैं रेलवे लाइन के उस पार शहर के लगभग दक्षिणी किनारे पर बने उस ‘गेट वे ऑफ अर्थ’ पार्क में जाना चाहता था, जहां शहर में रहने के दौरान मैं अक्सर अपना गुस्सा, अपनी बेबसी अपनी बेचैनियां इस शहर की रूह के साथ बांटने जाया करता था.

लॉकडाउन ख़त्म होने के इतने महीनों बाद सड़कें भले ही फ़िर से गुलज़ार होने लगी हों, लेकिन ये पार्क अभी भी लगभग वीरान सा लग रहा था. मैं इस वीरानी में डूबकर गुफ़्तगू के उन सिरों को पकड़ने की कोशिश करने लगा जिन्हें बिखरा छोड़ कर गया था. आस-पास के दरख़्तों से लेकर किनारे की वो बेंच तक गवाह थी कि इस शहर में रहते हुए मैं कितनी शिकायतें करता था इस शहर से. मुझे लगता था कि मेरी सारी परेशानियों की जड़ इस शहर का पिछड़ा और उपेक्षित होना है.

गेट वे ऑफ अर्थ के गेट तक जाने के रास्ते में एक ओवरब्रिज है जिसके नीचे से गुज़रने वाली रेलवेलाइन इस छोटे से शहर को दो हिस्सों में बांटती हैं. शाम को लौटते वक़्त मैंने ब्रिज के नीचे पचास नम्बर गेट से निकलकर सूनसान रेल पटरी वाला रास्ता पकड़ा. अक्सर इस रास्ते पर एक दूसरे का हाथ थामे, हथेलियां सहलाते ख़्वाबों वाली कुछ शामें मैनें किसी के साथ घूमते हुए बिताई थीं. रिश्ता कितना गहरा रहा कह नहीं सकता लेकिन एक दिन घिरते अंधेरे में एक-दूसरे को चूमते हुए अचानक दो घूरती आंखों पर नज़र पड़ी तो दिल सहम सा गया था.

पहली बार जाना कि अगर इज़हार के लिए सुरक्षित जगह न हो तो मोहब्बत और दहशत दोनों एक से ही महसूस होते हैं और उस सूनसान रास्ते पर फ़क़त दो घूरती आंखों ने हमारा सुरक्षित हिस्सा हमसे छीन लिया था. हम जब तक साथ रहे इस शहर में हमने फिर कभी एक-दूसरे को खुलेआम नहीं चूमा... कि ये इश्क़ मोहब्बत की दिलक़श बातें यूपी-बिहार के ठेठ पुरबिया परिवेश पर अक़्सर फिट नहीं बैठतीं.

यहां सामान्य स्त्री-पुरुष का आपस में खुश होकर बात कर लेना भी व्याभिचार माना जाता है, हमारी तो ख़ैर बात ही अलग थी. हमने सोचा था कि भागेंगे एक दिन पितृसत्ता की क़ैद से, हमें फेंक देना था हमारे सिर पर ज़बरन रखा गया खानदान की इज़्ज़त का टोकरा, तोड़ना था सामाजिकता की असंवेदनशील दीवारों को और इसके लिए ख़ुद को मज़बूत बनाने तक अतिरिक्त सावधानी बरतना बेबसी भरा तो था, लेकिन ज़रूरी था.

ऐसी कितनी ही तल्ख़ यादें जुड़ी हैं यहां से फ़िर भी इस शहर ने मुझे बिखरने नहीं दिया. किसी न किसी बहाने से उम्मीद की लौ जलाए रखी और आज भी मैं मेरे शहर फ़तेहपुर से इस वादे के साथ विदा ले रहा हूं कि मैं कभी भी हार नहीं मानूंगा. हालात कितने भी मुश्किल हों, हर मुश्किल को फ़तेह करूंगा और खुद को मज़बूत बनाकर फ़िर लौटूंगा, अपने इस शहर के लिए कुछ बेहतर करने के इरादे के साथ. क्योंकि कोई शहर पिछड़ा नहीं होता, उसे पिछड़ा या प्रोग्रेसिव बनाती है उसमें बसने वाले लोगों की सोच और इस सोच को बदलने के लिए हमें ही काम करना होगा. हाशिए हर शहर में हैं और पितृसत्ता के बनाए हुए औरत और मर्द के दो खाने भी हैं. इंसानी समाज को इन हाशियों, इन खानों में बांटने वाली खाईंयों को भरने की कोशिश हमें ही करनी होगी.

रूहान आतिश, क्वीर फेमिनिस्ट ट्रांसमैन हैं. पेशे से कार्यकर्ता एवं वकील रूहान, को कविताएं लिखना पसंद है. वे बतौर ट्रेनर भी काम करते हैं. ज़िंदगी को महसूस करना और फ़िर उन एहसासों को लफ़्ज़ों में उतारना इनका शौक है.

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