अंक 003: शहर

शहर अकेला है, लाख हैं गलियां

चरवाहों की निगाह में शहर

चरवाहों की निगाह में शहर

क्या आपने अपने शहर में चरवाहों को आते-जाते देखा है? अब तक की ज़िंदगी में उन्हें कहां-कहां देखा है? हम में से बहुत सारे लोगों के लिए इन सवालों का जवाब ‘न’ भी हो सकता है क्योंकि असल में चरवाहों की आजीविका को विकास के एजेंडे में अलग-थलग या अजीब माना जाता है. शहरीकरण की हमारी कल्पना में वे सिरे से गायब दिखाई देते हैं.

महरौली में एक सुबह

आपको याद है आखिरी बार आप किसी ऐसी जगह पर कब गए थे जो आपके लिए बिल्कुल अनजान थी? आपने वहां क्या देखा? आपने वहां क्या सुना? क्या महसूस किया? दृश्य माध्यम में काम करने वाली एक शिक्षिका के रूप में, मैं अक्सर सोचती हूं कि जब हम किसी नई जगह पर जाते हैं तो वहां एक अजनबी होने के अनुभव से हम क्या सीखते हैं? किसी चीज़ को पहली बार देखने का वह क्षणिक कौतूहल, वह खोजने का भाव, क्या इसे शिक्षण की प्रक्रिया में किसी स्थाई सीख में बदल सकता है?

छोटे शहरों की लंबी रात

फ़िल्म ‘रात: छोटे शहरों की लंबी रात’ डिजिटल एजुकेटर्स द्वारा अपने-अपने गांव और कस्बों में रात के अपने अनुभवों का चित्रण है. कौन है जो रात में बाहर निकल सकता है? कौन है जो हम पर नज़र रखता है? किस पर नज़र रखी जाती है? घुप अंधेरे के बारे में होते हुए भी यह फ़िल्म हमें उजाला दिखाती है. उजाला, नए इतिहास के बनने का.

होने, न होने के बीच

सोशल मीडिया पर हम जैसे दिखाई देते हैं क्या असल में हम वही होते हैं? सोशल मीडिया पर क्या कितना दिखाना है कितना नहीं? क्या दिखाना है, क्या नहीं इससे हमारे खुद के बारे में क्या पता चलता है?

फिल्मी शहर – सिनेमा में समलैंगिकता

इस मास्टरक्लास के दो भागों में – सिनेमा में समलैंगिकता – विषय पर बातचीत करते हुए फिल्म निर्देशक अविजित मुकुल किशोर ने सिनेमा की भाषा, सही एवं सम्मानजनक शब्दावलियों का अभाव, LGBTQI+ से जुड़े लोगों के संघर्ष एवं अपमान से पहचान की उनकी यात्रा को फिल्मी पर्दे पर उनकी प्रस्तुति के क्रम में देखने की कोशिश की है.

फिल्मी शहर एपिसोड 3: सिनेमा में समलैंगिकता

इस मास्टरक्लास के दो भागों में – सिनेमा में समलैंगिकता – विषय पर बातचीत करते हुए फिल्म निर्देशक अविजित मुकुल किशोर ने सिनेमा की भाषा, सही एवं सम्मानजनक शब्दावलियों का अभाव, LGBTQI+ से जुड़े लोगों के संघर्ष एवं अपमान से पहचान की उनकी यात्रा को फिल्मी पर्दे पर उनकी प्रस्तुति के क्रम में देखने की कोशिश की है.

तुम किसकी हो बिन्नी?

बोलती कहानियां Ep 4: तुम किसकी हो बिन्नी?

बोलती कहानियां के इस नए एपिसोड में स्वाती कश्यप से सुनिए मैत्रयी पुष्पा की कहानी ‘तुम किसकी हो बिन्नी’ का भावात्मक रूपांतरण. दो लड़कियों के पैदा होने के बाद जब बिन्नी की मां तीसरी बार गर्भवती हुईं तो सबको पक्का यकीन था कि इस बार लड़का ही होगा, मगर हो गई बिन्नी! उसके बाद क्या हुआ सुनें इस कहानी में.

शहर और सिनेमा

शहर के बनने और लगातार बढ़ने के परिदृश्यों और कारकों को डॉक्यूमेंट्री फिल्मों ने समय-समय पर अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश की है. इस विषय से जुड़ी फिल्मों को किसी एक लिस्ट में समेट पाना बहुत ही मुश्किल काम है. इस सूची के ज़रिए हमारा मकसद सिनेमा और शहर पर एक सार्थक बातचीत की शुरुआत करना है.

क्या वाकई भारत गांवों में बसता है?

द थर्ड आई के शहर संस्करण में गौतम भान के साथ हमने सरकारी नीतियों के बरअक्स वास्तविकता के बीच शहरों के बनने की प्रक्रिया, शहरी गरीबों की पहचान के सवाल, शहरी अध्ययन एवं कोविड महामारी की सीखें और भारत में शहरी अध्ययन शिक्षा के स्वरूप पर विस्तार से बातचीत की है.

टिंडर

“अनौपचारिक क्षेत्र में यौनकर्म करने वाली महिलाओं के अनुभव गिग इकॉनमी वर्कर्स की तरह हैं”

मंजिमा भट्टाचार्य एक नारीवादी शोधकर्त्ता, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. ऑनलाइन डेटिंग एप्प ‘टिंडर’ जैसे अन्य एप्स के आगमन से कुछ ही पहले, डिजिटल आत्मीयता और निजी रिश्तों (इंटिमेसी) को इंटरनेट कैसे बदल रहा था. इनकी किताब इसपर एक दिलचस्प अंतर्दृष्टि प्रदान करती है.