कमरा और उसके भीतर की कहानियां

एक लेखक और एक कलाकार द्वारा एक कमरे के अंदर शहर को समेटने की कोशिश

फ़ोटो साभार: वैदेही सादिवाला

साक्षात्कारकर्ता: सुमन परमार, शिवम रस्तोगी और आस्था बाम्बा

अचल डोडिया, द थर्ड आई सिटी संस्करण के ‘ट्रैवल लॉग’ फैलोशिप का एक हिस्सा हैं. इस फैलोशिप ने भारत के 13 अलग-अलग शहरों से जुड़े लेखकों एवं कलाकारों को निर्देशन देने का काम किया. जिन्होंने इसके अंतर्गत नारीवादी नज़रिए से शहर के विचार की कल्पना की है.

आर्किटेक्ट के स्टुडेंट अचल, शहर और उसके भीतर की जगहों को ईंट और गिट्टी से बनी इमारतों में नहीं देखते बल्कि उनके लिए शहर प्यार और करूणा की वो जगहें है जहां कोई खुलकर अपनी ज़िंदगी जी सकता है.

अचल का नक्शा-ए-मन दृष्टि माध्यम की कलाकार वैदेही सादिवाला (@crumbledredने बनाया है, जो सूरत में रहती हैं. 

अचल, नक्शा ए मन आपकी यात्राओं का चित्रण है. इस प्रक्रिया में एक ट्रैवल लेखक के साथ एक कलाकार, लेखक के मन के नक्शे को सामने लाने का प्रयास करता है. इस सफ़रनामा में आप जब वैदेही से पहली बार मिले तो कैसा लगा?

अचल: मुझे वैदेही से मिलकर समझ आ गया कि मेरा ‘माइंड मैप’ वैदेही ही बना सकती हैं. पहली मुलाक़ात में वे अपने बनाए कॉमिक्स के सैम्पल लेकर आई थीं. कॉमिक्स देखकर मैं एकदम से चहक उठा, जैसे यही वह चीज़ थी जो मेरे दिमाग में थी. वैदेही के साथ काम करते हुए सबसे ख़ास ये भी हुआ कि मुझे मेरे दस साल पुराने दोस्त मिले. हम दोनों एक ही शहर में रहते हैं, और मुझे पता चला कि हमारे बहुत सारे दोस्त एक-दूसरे को जानते हैं.

वैदेही: हम एक ही शहर में तो रहते हैं, काफ़ी लोगों को जानते भी हैं लेकिन एक दूसरे से पहले कभी नहीं मिले थे इसलिए पहली बार तो बहुत औपचारिक मुलाक़ात ही थी. लेकिन दूसरी बार में हम एक-दूसरे से अपनी बात कहने लगे और अचल से बात करते हुए समझ आया कि मैं ख़ुद के शहर को और जानने लगी हूं.

एक कमरा और उसके भीतर की दुनिया आपके ‘नक्शा ए मन’ का केंद्र होगा ये किसका आइडिया था? और कहां से आया था?

अचल: ये आइडिया वैदेही की तरफ़ से ही आया था. हमारी दूसरी मुलाक़ात मेरे घर पर हुई थी और वैदेही ने मेरा कमरा देखकर कहा कि, “तुम्हारे कमरे को देखकर ये नहीं कहा जा सकता कि ये किसका कमरा है. ये कमरा बहुत कुछ कहता भी है और नहीं भी.” तभी हमने सोचा कि क्यों न कमरे को अपने आप में एक जगह के रूप में खोजा जाए.

वैदेही: किसी का कमरा बहुत ही व्यक्तिगत जगह होती है. हम चाहते थे कि कुछ ऐसी चीज़ें हों जो किसी को भी दुविधा में डाल दें, किसी को पता न चल पाए कि इस कमरे में रहने वाले का जेंडर, उसकी उम्र, सेक्सुएलिटी क्या है, ऐसे कमरों में किस तरह की बातें होती हैं! इन सारी बातों पर आपस में विचार करते हुए हम वीडियो के आइडिया तक पहुंचे. शुरुआत हम अचल के कमरे से ही करना चाहते थे लेकिन उसमें यह साफ़ था कि जब हम दूसरों को बुलाकर इस कमरे में सवाल करेंगे तो उन्हें पहले मालूम होगा कि ये किसका कमरा है. इसलिए फ़िर हमने एक कमरा किराए पर लिया और उसे अपने ढंग से तैयार किया. ये वीडियो इसी प्रक्रिया को डॉक्यूमेंट करने के अभ्यास से शुरू होता है.

अब तक नक्शा ए मन कलात्मक चित्रण रहा है, जहां चित्रों और रेखाओं के ज़रिए शहर को देखने की कोशिश होती है. आपने इसके लिए वीडियो फॉर्मैट को क्यों चुना?

अचल: शुरुआत हमने चित्रों से ही की थी लेकिन बीच रास्ते समझ आया कि जैसे हम सबकुछ बना-बनाया पाठकों-दर्शकों के सामने रख रहे हैं, उन्हें ख़ुद से कुछ सोचने-समझने की जगह नहीं दे रहे. हम चाहते थे कि हमारे काम के बारे में पढ़ने या देखने के बाद लोगों के मन में बैचेनी हो, सवाल हों. जो शायद सिर्फ़ चित्रों के ज़रिए कर पाना संभव नहीं हो पा रहा था. वीडियो हमें वो छूट दे रहा था कि हम स्पष्टता में भी अस्पष्टता को बनाए रख सकते थे.

कमरा तैयार करने के बाद हमने लोगों को बुलाया औऱ उनसे पूछा कि आपको इसे देखकर क्या लगता है. उनमें से एक व्यक्ति ने कहा कि, “इसे देखकर ऐसा लगता है कि यहां दो लोग रहते हैं – एक लड़का और एक लड़की – क्योंकि कमरे में रखे जूते को देखकर लगता है कि ये किसी लड़के का है और वहीं टेबल पर रखी चूड़ियां किसी लड़की की हैं.”

उनके मन में उठे सवाल ख़ुद में एक सवाल है कि किसी को खांचाबद्ध करना क्यों ज़रूरी है? मतलब हमें क्यों लगता है कि लड़का चूड़ियां नहीं पहन सकता या लड़की जूते नहीं पहन सकती?

वैदेही: इस प्रोजेक्ट पर काम करते हुए मुझे लगने लगा था कि हम कई तरह के फॉर्म के साथ प्रयोग कर सकते हैं. ज़रूरी नहीं कि हमें 2डी या किसी एकतरफ़ा फॉर्म में इसे बांधना है. हम शहर को जिस स्पेस के भीतर समझने और देखने की कोशिश कर रहे हैं वो कुछ चित्रों में बंध कर रह जाता. शूटिंग शुरू करने से पहले तक कमरा मेरे लिए एक इंस्टॉलेशन की तरह ही था. हमने उसे उसी तरह तैयार भी किया था.

वीडियो में दिख रहे कमरे और उसमें रखी चीज़ों के बारे में थोड़ा बताएं.

अचल: मुझे कुछ चीज़ों को पहनने का बहुत शौक है जैसे – नाक में नथनी, कान में इयररिंग्स (वो वाले नहीं जो आजकल लड़के पहनते हैं!) मेरे मन में श्रृंगार से जुड़ी चीज़ों या गहनों को लेकर कभी यह भावना नहीं रही कि ये सिर्फ़ लड़कियों के पहनने की चीज़ें हैं. मैं हमेशा सोचता था कि मैं चूड़ियां क्यों नहीं पहन सकता? बचपन में मेरे पिता मुझसे कहते कि, “बंद करो इस तरह की चीज़ें पहनना.” या “तुम ऐसी हरकतें क्यों करते हो?” यहां तक कि मेरे हावभाव पर भी पहरेदारी थी-

तुम हाथ ऐसे क्यों उठाते हो, तुम्हें कुर्सी पर पैर पर पैर चढ़ाकर नहीं बैठना चाहिए, तुम्हें तो मर्दों की तरह दोनों पैर फैला कर बैठना चाहिए. इस तरह के व्यवहार ने मुझे मानसिक रूप से बहुत डरा दिया और ये डर हमेशा के लिए मेरे भीतर बैठ गया है. मर्द-अनुरूप व्यवहार या इससे जुड़ी चीज़ों से मैं ख़ुद को बहुत जोड़ नहीं पाता. मुझे लगता है कि मैं थोड़ा इधर बिखरा हूं तो थोड़ा उधर या शायद बहुत सारे बिखराव में अटका-भटका सा हूं.

यही सारी बातें मैंने वैदेही को बताईं. जिसे हम वीडियो के ज़रिए दिखाना चाहते थे.

आपके ख़ुद के कमरे में और इस कमरे में कितनी समानताएं थीं?

अचल: ये कमरा मेरी सोच और समझ के बहुत क़रीब था. मैं बहुत जगहों पर किराए के कमरे में एक पेइंगगेस्ट की तरह रहा हूं, और ये कमरा बिलकुल वैसा ही है जैसा दो साल पहले मेरा पेइंगगेस्ट कमरा हुआ करता था. एक पुरानी इमारत, जहां बहुत कम रौशनी आती थी, कमरे के भीतर मकान मालिक का छोड़ा हुआ बहुत सारा सामान रखा होता था. पहले मुझे इस तरह के कमरे पसंद आते थे. क्योंकि मुझे वहां ख़ुद में रहते हुए सुरक्षित महसूस होता था. हां, अब ऐसा नहीं है.

वैदेही: इस कमरे ने मुझे सूरत के वाडिफालिया में अपने बचपन के घर की याद दिला दी, जहां मेरा बचपन बीता था. वो घर 200 साल पुराना था और मुझे आज भी उसकी दीवरों पर पड़ी दरारें और मेरे बनाए गए चित्र याद हैं. पुरानी इमारत होने के नाते उसमें भी रौशनी नहीं थी. इसलिए इस कमरे को देखकर मैं बहुत नोस्टेलजिक हो गई थी.

बाहरी दुनिया के साथ अपने कमरे के संबंध को दिखाने के लिए आपने कुछ आवाज़ों का उपयोग किया है. इन आवाज़ों का चुनाव कैसे किया था, ख़ासतौर पर फोन से जुड़ा संवाद.

अचल: मैं जब कमरा लेकर रहा करता था उस वक़्त, मैं लगभग हर दिन खाना ऑर्डर करता था. लेकिन, खाना डिलिवर करने आने वाले किसी भी व्यक्ति को मेरा लोकेशन कभी सही से नहीं मिलता. अक्सर मैं उन्हें फ़ोन पर रास्ता बताया करता था. ऐसे करते हुए मुझे बहुत गुस्सा भी आता. फ़िर उसके बाद मैं कुछ भी कर रहा हूं, मुझे सबकुछ छोड़कर खाना लेने नीचे जाना पड़ता था. ये पूरी प्रक्रिया बहुत कुछ कहती है. मैं इसे फ़िल्म के ज़रिए सामने लाना चाहता था. जैसे फ़िल्म में

आप देखेंगे की नायक खाना डिलिवर करने आए लड़के से बात करने के बाद अपनी चूड़ियों को उतारकर नीचे जाता है खाना लेने. वो हमारी बनी-बनाई धारणाओं के विपरीत चूड़ियां पहनता है लेकिन सभी के सामने वो उनके जैसा बन जाता है. मैं फ़िल्म में इस दृश्य को इस तरह दिखाना चाहता था कि कैसे हम कमरे के भीतर कुछ और होते हैं और बाहर दुनिया के सामने कुछ और हो जाते हैं.

इसी तरह, दूसरा डॉयलॉग रात में घर से बाहर निकलने के ऊपर है. मेरा कॉलेज वडोदरा में था और जब भी वहां नाइटआउट की बात होती तो मैं सबसे ज़्यादा डर जाता था. रात को बाहर जाना और घर वापस आना मेरे लिए एक डरा देनेवाला एहसास था. मैं उस वक़्त कॉलेज में पढ़ता था और मुझे पुलिस द्वारा रास्ते में रोके जाने की संभावनाएं हमेशा अधिक थीं; पुलिस को लेकर एक खौफ़ हमेशा से मेरे मन में बैठा है क्योंकि मैंने उन्हें अपनी शक्तियों का दुरूपयोग करते बहुत बार देखा है. ख़ासकर हाशिए पर रहने वाले लोगों के साथ. मैं हमेशा अपने दोस्तों को ऐसे रास्तों के बारे में बताता जहां पुलिस के होने का ख़तरा कम रहता था. मेरे लिए सामना करने से बेहतर उपाय था बचना.

आप और वैदेही दोनों एक ही शहर के रहने वाले हैं. शहर में बड़े होने औऱ उसे देखने के आप दोनों के नज़रिए में कितनी समानताएं हैं?

अचल: देखा जाए तो शहर में ऐसी बहुत सारी जगहें होती हैं जो जेंडर के खांचे में घोर तरीके से बंटी होती हैं, ऐसी जगहों पर पुरुषों का ही प्रभाव ज़्यादा दिखाई देता है. उदाहरण के लिए

चाय की लॉरी, जहां ज़ाहिर तौर पर लड़के या पुरुष अधिक दिखाई देते हैं. लेकिन, मैं अपने ख़ुद के और अपनी महिला दोस्तों के अनुभवों से बता सकता हूं कि ये जगहें ज़्यादा सुरक्षित होती हैं.

बाकी शहरों का पता नहीं, लेकिन गुजरात में ये लॉरियां ज़्यादातर बुज़ुर्ग महिलाएं या वे महिलाएं चलाती हैं जिनके पति कहीं मज़दूरी करने गए होते हैं. ऐसी जगहों पर आप गर्माहट महसूस करते हैं. इन जगहों पर प्रेमी जोड़े या कोई भी ‘देखे और अनदेखे’ के बीच अपनी पहचान के साथ सुरक्षित महसूस कर सकता है. क्योंकि जैसे ये जोड़े पार्क या गार्डन में जाते हैं लोगों की नज़रें घूरने लगती हैं.

वैदेही: मैं बहुत सालों से सूरत में हूं लेकिन मुझे यहां की काफ़ी जगहों के बारे में पता भी नहीं है. कई बार आश्चर्य होता है कि ऐसी भी जगहें होती हैं. मैं बहुत ज़्यादा घर पर रहनेवालों में से हूं. मुझे बाहर जाना या लोगों के साथ घुलने-मिलने में बहुत डर लगता है. इसके पीछे कोई कारण समझ नहीं आता लेकिन शहर की भीड़ में जाना पसंद नहीं है. अब ऐसा है कि मैं किसी और शहर भी जाती हूं तो अचल से पूछती हूं कि ‘अच्छा, यहां क्या मज़ेदार है?!’

आख़िरी सवाल, इस प्रोजेक्ट का क्या हासिल रहा आपके लिए?

अचल: फाइनल वीडियो जो निकलकर आया है, उसे देखकर मैं बहुत ज़्यादा रोमांचित हूं. यह मेरा अब तक का पहला शूट था – और मेरी नज़र में परफेक्ट शूट भी कह सकते हैं.

इसके अलावा, जब मैं वीडियो के बारे में लिख रहा था तो मेरे ज़ेहन में एक पंक्ति घूम रही थी ‘ शहर के भीतर एक ज़िंदगी, अनेक ज़िंदगियां’ मैं इस विचार को आगे ले जाना चाहता था और हाल ही में,

मेरी मुलाक़ात इटली के एक समुह से हुई जिसमें एंथ्रोपॉलिजिस्ट और आर्किटेक्ट से जुड़े लोग शामिल हैं. उन्होंने शहर को लेकर मेरे विषय से मिलते-जुलते एक प्रोजेक्ट के लिए आवेदन निकाला था. मैंने भी उन्हें अपना प्रस्ताव भेजा, और अब मुझे पता चला कि मेरा यह आइडिया उन्हें पसंद आया.

बहुत सारी बधाइयां. यह सुनकर बहुत खुशी हुई.

अचल: शुक्रिया. इस प्रोजेक्ट पर काम करते हुए, वास्तव में यह एक बड़ा पड़ाव हैं मेरे लिए. अब तक मैं अपने विचारों को वीडियो के ज़रिए आकार दे रहा था. अब मेरे पास मौका है कि मैं इस प्रोजेक्ट से जुड़े शोध का उपयोग करते हुए इसे आर्किटेक्ट की फॉर्म में डिज़ाइन कर सकूं.

वैदेही: अचल के साथ बातचीत करने और काम करने से मुझे बहुत सारे विषयों के प्रति अपनी समझ को विस्तार देने में मदद मिली – क्वीयर जगहें क्या होती हैं, क्वीर लोग, जेंडर और सेक्सुएलिटी जैसे विषयों को जब मैं अपने आसपास की दुनिया के बीच रखकर देखती हूं तो मुझे बहुत सारी सतहें साफ़ दिखाई देने लगती हैं. इस काम को व्यवस्थित कर अगले विषय पर जाने में मुझे अभी थोड़ा और समय लगेगा.

सुमन परमार द थर्ड आई में सीनियर कंटेंट एडिटर, हिन्दी हैं.

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