सुमन परमार के लेख

सुमन परमार द थर्ड आई में सीनियर कंटेंट एडिटर, हिन्दी हैं.

रात वाली वह बस

आगरा से चलकर निज़ामुद्दीन स्टेशन आने वाली ताज एक्सप्रेस उस दिन फिर लेट हो गई थी. अब प्रगति मैदान से कनॉट प्लेस और वहां से विश्वविद्यालय की मेट्रो फिर नहीं मिलेगी. रात के 11.30 बज रहे हैं. इतनी रात में तो कोई ऑटोवाला भी विश्वविद्यालय की तरफ़ जाने को तैयार नहीं होता.

कमरा और उसके भीतर की कहानियां

इस नक्शा ए मन में एक ट्रैवल लेखक के साथ एक कलाकार, लेखक के मन के नक्शे को सामने लाने का प्रयास कर रही हैं. “किसी का कमरा बहुत ही व्यक्तिगत जगह होती है. हम चाहते थे कि कुछ ऐसी चीज़ें हों जो किसी को भी दुविधा में डाल दें, किसी को पता न चल पाए कि इस कमरे में रहने वाले का जेंडर, उसकी उम्र, सेक्सुएलिटी क्या है, ऐसे कमरों में किस तरह की बातें होती हैं!”

“आदिवासी बचेंगे तो जंगल बचेंगें”

नक्शा ए मन शृंखला की इस दूसरी कड़ी में प्रकाश और बाओ एक विकृत दुनिया और उसकी उलटबासियों को समझने की कोशिश कर रहे हैं जो आदिवासियों को ‘बाहरी’ समझती हैं.

अगर इलाज का खर्च जेब से भरना पड़े तो बीमा लेने से क्या फायदा?

हमने रवि दुग्गल से बात कर जाना कि क्यों आजकल स्वास्थ्य बीमा को एक ज़रूरत की तरह पेश किया जा रहा है? क्या हम स्वास्थ्य बीमा लेने और न लेने की दुविधा के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं? रवि के साथ इस बातचीत के ज़रिए पढ़िए स्वास्थ्य बीमा के टेढ़े-मेढ़े और उलझे रास्ते से निकलने का सही रास्ता क्या हो सकता है.

“मैं पागलपन की सर्वाइवर नहीं, मनोचिकित्सा की सर्वाइवर हूं.”

द थर्ड आई टीम ने मुलाक़ात की लेखक एवं शोधकर्ता जयश्री कलिथल से. जयश्री, भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने वाले शुरुआती कार्यकर्ताओं में से एक हैं जिन्होंने मानसिक तनाव एवं इससे जुड़ी परेशानियों के इर्द-गिर्द अपना कब्ज़ा जमा चुके मेडिकल मॉडल को अनुभवों एवं ज्ञान के स्तर पर चुनौती दी है.

लोगों की रज़ामंदी के बिना सरकार बना रही है उनका UHID कार्ड

15 अगस्त 2020 को लाल किले की प्राचीर पर खड़े होकर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन को ‘भारत के हेल्थ सेक्टर में नई क्रान्ति’ का नाम दिया. क्या हेल्थ आईडी कार्ड से देश की स्वास्थ्य सेवाएं सच में बेहतर हो जाएंगी? इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के एक कार्यकर्ता ने बताया कि वहां तक पहुंचने के रास्ते में कई सवाल हैं जिनके जवाब जानना ज़रूरी है.

“महिला हिंसा सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा है.”

स्वास्थ्य, निजी होकर भी सार्वजनिक है. भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं सभी को प्राप्त नहीं हैं. हालांकि हमारा संविधान यह मानता है कि स्वास्थ्य का अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों का भाग है. जेंडर के आधार पर भी कई सवाल हैं. जन स्वास्थ्य व्यवस्था सीरीज़ की इस कड़ी में हमने महाराष्ट्र स्थित सेहत संस्था से बात की.

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