रात वाली वह बस

आशंका और आत्मविश्वास के बीच झूलती एक लड़की का सफर

चित्रांकन: शिराज़ हुसैन

आगरा से चलकर निज़ामुद्दीन स्टेशन आने वाली ताज एक्सप्रेस उस दिन फिर लेट हो गई थी. अब प्रगति मैदान से कनॉट प्लेस और वहां से विश्वविद्यालय की मेट्रो फिर नहीं मिलेगी. रात के 11.30 बज रहे हैं. इतनी रात में तो कोई ऑटोवाला भी विश्वविद्यालय की तरफ़ जाने को तैयार नहीं होता. पांच ऑटोवालों के मना करने के बाद आख़िर में यह छठा वाला जाने को तैयार हुआ है, वो भी दोगुने किराए पर!

“आपको रास्ता पता है?”

“हां, पता है. आप चलिए.

उफ़्फ! इस ऑटोवाले के लहजे से समझ आ रहा है कि इसने शराब पी रखी है. देर रात सरायकाले खां से आईटीओ वाली सड़क पर ट्रक ही ट्रक चलते हैं. फ़िलहाल मेरे पास कोई दूसरा ऑप्शन नहीं है. जीन्स की जेब से फ़ोन निकालकर मन ही मन मैंने सोचा कि देखते हैं आगे क्या होता है!

अरे यार! मेरा फोन फ़िर बंद हो गया. किसी भी इमजेंसी में मेरा फोन सबसे पहले मेरा साथ छोड़ जाता है. एक दोस्त ने कभी कहा था, “तुम्हारा फोन चार्ज क्यों नहीं रहता. तुम्हें पता है न कि लड़कियों को इजाज़त नहीं कि राह चलते उनका फोन बंद हो जाए, तुम्हें समझ क्यों नहीं आता, डर नहीं लगता क्या तुम्हें?” 

डर, पता नहीं.

मुझे सड़कों पर घूमना पसंद है. अकेले, अवारा, बेफ्रिक, बिंदास. मुझे अकेले घूमने में कभी डर नहीं लगा. डर लगता है घर ही चार दीवारी में. अच्छे घर की लड़कियां बिना काम, बेवजह घर से बाहर नहीं निकलती हैं. मैं भी यही मान कर बैठ जाती तो शायद मैं कभी नहीं जान पाती कि अकेले बेकाम, बेटैम अपनी मर्ज़ी से घूमना क्या होता है, नहीं जान पाती कि ख़ुद की इच्छा से कमरा किराए पर लेने से प्यार में डूबने तक का अहसास कैसा होता है.

बचपन में मेरे लिए आज़ादी का मतलब था कमरे की लाइट देर तक जलाए रखना, रात को 12 बजे कॉफी बनाकर पीना और अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आना-जाना. छोटे शहर की छोटी-छोटी आकाक्षाएं! वैसे, ये आज छोटी लगती हैं उस वक़्त ये ऐसा सपना था जिसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी. कुछ भी…

बारहवीं करने के बाद लड़-झगड़कर एक छोटे कस्बे से बाहर निकली और दिल्ली जैसे महानगर पहुंची तो नहीं मालूम था कि आगे क्या होगा. इतना पता था कि मुझे दिल्ली की चौड़ी सड़कें, कॉलेज में ज़ोर-ज़ोर से हंसती लड़कियां अच्छी लगती थीं. दिल्ली शहर ने मुझे भागना, दौडना, उड़ना सिखाया.

यही उड़ान मुझे दिल्ली से बाहर एक नई जगह लेकर गई जहां मुझे पहली नौकरी मिली थी. कितनी दूर है, कौन-कौन सी ट्रेन वहां जाती है, बसें कहां से मिलेंगी इस सबका पता लगाते हुए मैं 92.7 बिग एफएम रेडियो में काम करने के लिए आगरा पहुंच गई.

तो उस वक़्त अक्टूबर का महीना चल रहा था. काम शुरु किए अभी कुछ महीने ही हुए थे कि ट्रेनिंग के सिलसिले में हेड-ऑफिस कानपुर जाना पड़ा. कुछ पांच राज्यों से 25 लोग ट्रेनिंग के लिए आए थे. मेरे लिए आगरा के बाद उत्तर-प्रदेश का यह दूसरा शहर था जहां मैं जा रही थी. तय हुआ कि ट्रेनिंग ख़त्म होने के बाद कानपुर घूमा जाए और ठग्गू के लड्डू खाए जाएं.

अबतक कानपुर के बारे में बस अख़बारों में सुना था – कानपुर में 15 घंटे बिजली गायब, अवैध हथियारों के साथ कुख्यात गिरफ्तार, बैल ने दुल्हे को मारी लात…

ट्रेनिंग के दौरान पूरा दिन दफ़्तर में ही बीत जाता था. फिर होटल लौटकर रात का खाने खाते और अगले दिन की घिसाई के बारे में सोचते-सोचते सो जाते थे.

इसी बीच आगरा में मुझे एक बहुत ज़रूरी काम आ गया. मुझे किसी भी हालत में शुक्रवार की शाम आगरा के लिए निकलना ही था. मुझे इसमें कोई परेशानी नहीं दिखी. पांच घंटे का रास्ता है आसानी से आगरा पहुंच जाउंगी.

टीम लीडर ने कहा, “तुम्हें क्या लगता है सारी जगहें तुम्हारी दिल्ली की तरह हैं कि जब मन आया बाहर निकले, ऑटो लिया और चल दिए. यहां लड़कियां अकेली ट्रैवल नहीं करतीं.”

“पहली बात, दिल्ली में भी आप ऐसे ही कहीं नहीं निकल जाते. कहां जाना है, वापस कैसे लौटूंगी ये सब सोचकर ही कहीं जाना संभव होता है. दूसरी बात, मैं अकेले यात्रा कर सकती हूं.”, मैंने जवाब दिया.

टीम लीडर से बहस के चक्कर में उस दिन का लंच मिस हो गया. ख़ैर, शाम के 7.30 बजे हैं. मैं ऑटो से कानपुर बस अड्डे पहुंचती हूं. कंधे पर एक लैपटॉप बैग लटक रहा है.

अरे, इलाहाबाददददद…एलाहाबाजदददद..मुरैनााााााा…शाहजहानाबाददददद, दिल्लीलललललल, जयपुरररररर, लखनऊउउउउउउउ…आगरररररररर… ठीक से खड़ी भी नहीं हो पाई हूं कि कोई इधर से कहता… साइड हटना… कोई उधर से बोलता… टिकट टिकट टिकटटटटटट.

चारों तरफ़ से बहुत सारी आवाज़ें आ रही थीं. मेरी नज़रें इंक्वायरी बोर्ड को ढूंढ रही थीं जिसपर लाल या पीले अक्षर से बसों के बारे में जानकारी प्रसारित होती रहती है. इस बीच लोग इधर से उधर टक्कर मारकर आगे बढ़ते जा रहे थे. कुछ लोग घूरते हुए सामने आए, “कहां जाना है मैडम जी…”

“अहंह… कहीं नहीं, मैं देख लूंगी.”, मैंने जवाब दिया.

तभी, अचानक एक पर एक गिरते पड़ते शहरों के नाम में मुझे आगरा शब्द सुनाई दिया. मैं फ़िल्म बाज़ीगर की काजोल की तरह खुशी के मारे खिल उठी. एक तसल्ली भरी मुस्कान के साथ मैंने देखा – उत्तर प्रदेश परिवहन एयर कंडीशन बस – हल्के हरे रंग की उस बस को मैं पहचानती थी. आगरा-दिल्ली के बीच भी इसी तरह की बसें चला करती हैं.

ऐसा नहीं था कि बस में सफ़र करना मेरे लिए कोई नई बात थी. आगरा, दिल्ली, जयपुर के बीच पिछले कई महीनों से ताज एक्सप्रेस से लेकर शताब्दी ट्रेन और वॉल्वों से लेकर एसी एक्सप्रेस बसों के ज़्यादातर कंडक्टर और टिकट कलैक्टर मुझे पहचानने लगे थे. मेरे जैसे नींद के मारे लोगों के लिए सफ़र में सोना सबसे आनंददायक काम होता था.

ख़ैर, इतनी यात्राओं के अपने अनुभवों के आधार पर मुझे यह यात्रा कुछ ख़ास नहीं लगी.

एक लड़की होने के नाते सड़क पर बाहर निकलते ही मेरे मन में प्लान ए, प्लान बी घूमने लगता है. ख़ासकर सफ़र के दौरान मैं आसपास के लोगों और माहौल का बहुत बारीकी से जायज़ा लेती हूं. मेरे एंटीना चारों तरफ जागरूक रहते हैं. कौन मेरे बगल में आकर बैठ रहा है, कौन किधर से देख रहा है, ये सब कुछ जैसे मेरा टूलकिट होता है घर से बाहर निकलने को लेकर.

ये मुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ खुद पर भरोसा करने के लिए तैयार करते हैं ताकि मैं खतरे को भांप सकूं. जैसे मेरा शरीर एक प्लेन है और मैं पायलेट की भूमिका में सेफ लैंडिंग के लिए चौकन्नी रहती हूं. अकेले सफ़र करने के अपने अफसानों में बेफ्रिक सिर्फ़ मंज़िल पर पहुंचकर ही हो पाती हूं. लेकिन, उम्मीद है कि एक दिन ये मंज़र भी बदलेगा.

कोई गुडलक निकालें

दफ़्तर से बस स्टैंड पहुंचते हुए मैं इन्हीं ख़्यालों में गुम थी.

“क्या ये बस आगरा जाएगी??”

“नहीं.“

“क्या?? क्यों?? आप अभी तो आगरा-आगरा चिल्ला रहे थे…”

“हां, लेकिन 10 पैसेंजर भी नहीं हैं इसलिए बस नहीं चलेगी. “एसी बस ने आगरा जाने से इंकार कर दिया. अब क्या?

अब, बस स्टैंड तक आकर यहां से लौटना ठीक नहीं लग रहा था. आगरा जाना भी ज़रूरी था.

कुछ पल खड़े होकर अपने आसपास की भीड़ को देखने लगी. क्या अलग है? वैसा ही तो है जैसा हर एक बस स्टैंड होता है. हां, थोड़ी भीड़ वाली जगह है. लड़कियां कम दिख रही हैं. अभी एक के बाद एक बसों पर नज़र घुमा ही रही थी कि पीछे से एक सफेद-नीली बस ने ज़ोर से हॉर्न बजाया.

“पौ-पौ… इटावा, मुरैना, औरइया, आगरा…”

कंडक्टर ने जितने भी नाम लिए उनमें से बस एक नाम सुनकर मेरे भीतर की उम्मीद जग गई – आगरा!

“क्या ये बस आगरा जाएगी?”

“हां.”

मैं बस में बैठ गई. समय रात 8.15 बजे.

अगले 20 से 25 मिनट बस में कई-कई तरह के लोग अंदर बाहर कर रहे थे. मैं खिड़की वाली सीट पर बैठी थी. लगभग 30-32 साल का एक नौजवान मेरी बगल की सीट पर आकर बैठ गया. 25 मिनट के बाद बस चली. बस के चलने के कुछ मिनट बाद कंडक्टर सभी के पास जाकर टिकट काटने लगा.

“एक टिकट आगरा”

“ये बस आगरा नहीं जाएगी.”

“लेकिन आपने ही तो कहा था कि जाएगी, मैं आपसे पूछकर बैठी थी.”

“हां, लेकिन आगरा का कोई पैसेंजर नहीं है इसलिए नहीं जाएगी.”

“मैं तो हूं. आपने मुझे बिठाया क्यों?”

“इटावा छोड़ दूंगा वहां से आगरा के लिए बस ले लेना.”

उफ्फ! अब क्या. बस शहर छोड़ हाईवे की तरफ मुड चुकी थी. मैंने जताया नहीं लेकिन, मन ही मन सोचने लगी कि मैं कहीं फंस तो नहीं गई. यात्राओं के अनुभव से जानती हूं कि अपने संशय को किसी के सामने नहीं दिखाना चाहिए. ऐसी स्थितियों में विश्वास बनाए रखना बहुत ज़रूरी है. मैं चुपचाप बैठी रही. बस की लगभग सभी सीटें भरी थीं. मेरी निगाह किसी लड़की या औरत को ढूंढ रही थी. मुश्किल से दो आरतें दिखीं जो अपने परिवार के साथ आगे की सीटों पर बैठी थीं.

आधे घंटें के सफ़र के बाद बस एक ढ़ाबे के पास रुकी. देखते ही देखते बस से सारे पैसेंजर नीचे उतर गए, सिर्फ़ मेरे बगल की सीट पर बैठा आदमी यूं ही बैठा रहा. भूख तो मुझे भी बहुत लग रही थी. लेकिन, खुद को एक बार ज़ब्त कर लिया कि यहां नहीं उतरना चाहिए. थोड़ा इंतज़ार, आगरा पहुंच कर खा लूंगी. उस व्यक्ति ने मुझे मुंगफली ऑफर की. मैंने हंसते हुए मना कर दिया. मेरा दिमाग़ उस वक़्त चाचा चौधरी के दिमाग़ से भी तेज़ दौड़ रहा था. समय रात 9.30 बजे.

मेरे आसपास के पूरे माहौल ने मुझे और चौकन्ना कर दिया था. कुछ था जो मेरे भीतर सवाल कर रहा था कि क्या ज़रूरत थी इस तरह देर रात बिना रिज़र्व टिकट के चल देने की? क्या रात में सफ़र करना ज़रूरी है?

यही सवाल तो हर लड़की से पूछा जाता है कि क्या ज़रूरत है बाहर निकलने की? लड़कियां बेवजह, बेमतलब बाहर नहीं जातीं. बाहर खतरा है. खतरा दिन में हैं, खतरा रात में हैं. मैं अकेली सफ़र क्यों करती हूं? क्योंकि ऐसे करके मुझे ख़ुद पर अधिकार महसूस होता है. अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आने-जाने का अधिकार. मुझे किसी से पूछना नहीं पड़ता कि मैं यहां जाउं या न जाउं.

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई

सड़क पर बहुत अंधेरा था. आमतौर पर सफ़र के दौरान मैं आसपास की दुकानों या लोगों को पहचानने की कोशिश करती हूं. लेकिन, अभी कुछ भी दिख नहीं रहा था. मुझे तो मेरी बस के पैसेंजर्स की शक्लें भी याद नहीं. वो लड़का मुझसे कई तरह के सवाल करता रहा. कहां जाना है?, कहां की रहने वाली हूं? मैं उससे बात नहीं करना चाहती थी. मेरे रुखे स्वभाव को भांप लेने के बाद वो अपने आप में ही बड़बड़ाता रहा.

मैं मन ही मन सोच रही थी कि उसे टोकूं या न टोकूं. ख़ैर, जाने देते हैं. बिना मतलब के किसी से न उलझना – ये भी सफ़र का ही पाठ है.

आधे घंटे बाद बस में सवारियां बैठने लगीं. इंजन की गड़गड़ाहट से अंदाज़ा लग गया था कि अब बस चलने वाली है. लेकिन, ये क्या, बस में तो सिर्फ़ 7-8 लोग ही बैठे. बाकि सब कहां गए?

वो ढाबे पर ही उतर गए. और जो बचे हुए थे वो भी अगले बीस मिनट में एक-एक कर उतरते चले गए. बगल की सीट वाले लड़के ने भी उतरने से पहले मुझसे कहा कि आप अकेले इतनी रात में कैसे सफ़र करेंगी, मेरे घर चलिए. कल चली जाइएगा. मैंने शुक्रिया कहकर उसकी बात अनसुनी कर दी.

अब बस में मैं, कंडक्टर और ड्राइवर हैं. समय रात 10.30 बजे.

“बस आगे जाएगी न?”

अब तक मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था कि मैं किस रास्ते पर चल रही हूं. ये कौन सा इलाका है? क्या ये लोग सच में ड्राइवर-कंडक्टर ही हैं?

“हां, जाएगी. आप परेशान न हों. ये रुट ठीक नहीं है इसलिए बस की सारी लाइटें बंद कर रहा हूं. आप अपना सिर नीचे रखिएगा, या चाहें तो सीट पर लेट जाएं.” कंडक्टर ने अपनी बात दो वाक्यों में कह दी और पूरे बस में अंधेरा छा गया. “हां, फोन भी मत चलाइएगा. फोन की रौशनी से परेशानी हो सकती है.”

कैसी परेशानी? आख़िर ये बस जा कहां रही है? अब मुझे यकीन होने लगा था कि मुझे प्लान बी की ज़रूरत पड़ेगी. प्लान बी क्या है? परिस्थिति के अनुरूप व्यवहार!

कोई डेढ़ घंटें से बिना पलकें झुकाए मैं बस किसी अंधेरे में चली जा रही हूं. होना तो यही चाहिए था कि मुझे बहुत डर लगता. जाने क्यों मुझे डर नहीं लग रहा था. इतना ज़रूर सोच लिया था कि ज्यादा से ज़्यादा क्या होगा, मर जाउंगी. उससे आगे तो कुछ नहीं हो सकता था. मैं सामने पसरे अंधेरे को पढ़ने की कोशिश करती रही. अगले ही पल मुझे मेरी सीट के पीछे एक परछाईं दिखी...

मैं घबराकर तेज़ी से आगे वाली सीट पर बैठ गई. मुड़कर देखा तो एक व्यक्ति पीछे की सीट पर अचानक से उठ बैठा था. ये कहां से आया?

मुझे घबराता हुआ देखकर कंडक्टर ने ड्राइवर के केबिन से बाहर निकलकर पूछताछ की और मुझे बताया कि ये व्यक्ति होश में नहीं है, नशे की हालत में सीट पर ही सो गया था. अब अचानक उठ गया है.

रात के 01.15 मिनट पर हम इटावा पहुंचे. कंडक्टर मुझे बस से उतरने का निर्देश देते हुए ख़ुद टिकट काउंटर की तरफ़ बढ गया. कभी 1857 की क्रांति का प्रमुख केन्द्र रहा ये शहर रात के इस पहर में 80 के दशक की फ़िल्म के सीन की तरह लग रहा था. एक पोल की रोशनी में कुछ लोग ज़मीन पर सोए हुए थे. कुछ इधर-उधर चल रहे थे. एक चाय वाले की दुकान के पास दो लोग खड़े चाय पी रहे थे. बस से उतरने के बाद लाज़िमी था कि लोगों की निगाहें मेरे ऊपर पड़तीं.

इधर-उधर भटकने के बाद एक बोर्ड पर ‘लेडीज़ टॉयलेट’ पढ़ कर मैं उस ओर बढ़ गई, लेकिन दरवाज़ा बंद था. बंद तो होना ही था! आश्चर्य तब होता जब ये दरवाज़ा खुला होता, क्योंकि 99 प्रतिशत महिला शौचालाएं अक्सर बंद ही मिलते हैं. यह सच में शोध का विषय है कि ऐसा क्यों होता है? मैं वापस बस के पास आकर खड़ी हुई ही थी कि कंडक्टर ने बताया कि 10 मिनट में आगरा जाने वाली बस आ रही है.

अब तक, कंडक्टर पर मेरा भरोसा पुख्ता हो चला था. ऐसा पहली बार था कि कंडक्टर-ड्राइवर्स में से किसी ने न ही मुझे कोई ज्ञान देने की कोशिश की और न ही मुझसे कोई सवाल किया था. ख़ैर, आगरा की बस आई. कुछ पैसेंजर उतरे, एक दो चढ़े. मैं भी उसमें बैठ गई.

लेकिन, इश्क के इम्तेहां अभी और भी हैं...

बस में बैठते ही मैंने एक बार फ़िर निगाह दौड़ाई कि कितनी लड़कियां हैं? तीन. यात्रा में ख़ुद के अलावा किसी लड़की या औरत का होना विश्वास दिलाता है कि चलो कोई है. नहीं तो एकतरफा मर्दों से भरी बसों में आपकी लड़ाई बहुत बड़ी हो जाती है.

मुझे ड्राइवर के ठीक पीछे वाली सीट मिली, सबसे आगे. बस बहुत ही खंडहर हालत में थी.

कंडक्टर लगातार मेरी तरफ़ घूरे जा रहा था. बस के चलने के 10-15 मिनट बाद ही उसने मुझसे कहा कि मैं पीछे, उसके बगल की सीट पर बैठ जाउं. जी तो उसे थप्पड़ मारने का हो रहा था लेकिन इतना कहकर चुप हो गई कि – “मैं अपनी सीट पर ठीक हूं.”

मैं बहुत थक चुकी थी. थोड़ी देर बाद उसने अपना कंबल देने की कोशिश की, “अरे, मैडम ठंड लग जाएगी ये लो कंबल ले लो.” मैं जोर से चिल्लाई, “नहीं. थैंक्यू.” सन्नाटा! कुछ लोगों ने सीट से उचक कर देखने की कोशिश की क्या हो रहा है. बाकी सभी सोते ही रहे. कंडक्टर पर चिल्लाने के बाद कब मेरी आंख लग गई पता नहीं चला. तभी आवाज़ आई धड़ाम.

ये क्या हुआ! बस की टक्कर हो गई है. टक्कर बहुत तेज़ नहीं था लेकिन बस की ख़स्ता हालत की वजह से वो पूरी तरह हिल गई थी. मेरी नींद तब खुली जब टक्कर से लगे झटके में मेरा सिर ड्राइवर की सीट के पीछे लगे रॉड पर जा टकराया. मेरे होंठों से ख़ून बह रहा था और सिर और हाथ छिल गए थे.

खून रूक नहीं रहा था तो कंडक्टर ने कहीं से चीनी का इंतजाम कर मुझे लाकर दी और कहा, “इसे होंठ पर रख लीजिए ख़ून रुक जाएगा.”

बस अब वापस से हाइवे पर चलने लगी. ख़ून भी रुक गया है. लगभग सारे पैसेंजर जाग चुके हैं. आपस में बातें करने की आवाज़ें आ रही हैं. मुझे सब कुछ धुंधला-धुंधला सुनाई दे रहा है. मैं सुनने की कोशिश भी नहीं कर रही. शाम से होने वाली सारी घटनाओं को देखने के बाद मुझे हंसने की इच्छा हो रही है. लेकिन हंसते ही होंठ दुखने लगते हैं.

सुबह के 3.30 बज रहे हैं. मैं आगरा के बस स्टॉप पहुंच गई हूं. ये मेरा जाना पहचाना स्टॉप है. मैं ऑटो लेकर अपने कमरे पर पहुंचती हूं और बिस्तर पर गिरते ही मुंह से निकला – ऊफ्फ!!

अगले दिन जब आगरा के दोस्तों को सारा वाकया बताया तो उनके अनुसार मेरा ज़िन्दा बचकर निकल आना चमत्कार ही था क्योंकि बस जिस रूट से इटावा जा रही थी वो गुंड़ों औऱ डाकुओं का इलाका माना जाता है. वहां कुछ भी सकता है!

भरोसा नाम की चिड़िया जो मेरे कंधे पर बैठी थी उसने मुझे कहीं भी डरने नहीं दिया. अब, समझ आ रहा है कि बस में कंडक्टर-ड्राइवर की उस जोड़ी ने मेरे विश्वास को बचाए रखने के लिए मुझे जोख़िम के बीच से निकालकर, मेरी मंजिल तक पहुंचने में मदद की.

ख़तरा हर जगह है लेकिन किसी के कहने पर उससे डरकर घर में बैठे रहना न केवल ख़ुद के जीवन के साथ धोखा है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के साथ भी धोखा है. क्योंकि अगर आज हम बाहर निकलेंगे तो कल हमारी बेटियां निकलेंगी, परसों और लड़कियां निकलेंगी. एक दिन ऐसा आएगा कि जब मेरी जैसी कोई बावरी लड़की अपना सिर ऊंचा कर बस में देखेगी तो हर तरफ़ लड़कियां की लड़कियां दिखाई देंगी.

आगे भी इस तरह के किस्से मेरे साथ अक्सर होते रहे, लेकिन कहते हैं न कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा…
सुमन परमार द थर्ड आई में सीनियर कंटेंट एडिटर, हिन्दी हैं.
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