“हमारी ज़िंदगियां दो समांतर रेखाओं की तरह है. हम दोनों की भटकन और तलाश एक जैसी है.”

शहर और उसके साथ बदलते रिश्ते पर कल्कि सुब्रमण्यम के साथ रूहान आतिश की बातचीत.

चित्रांकन: कल्कि सुब्रमण्यम

जूही जोतवानी के साथ

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर फतेहपुर के रहने वाले रुहान आतिश अपनी पहचान एक ट्रांसमैन के रूप में देखते हैं. उन्हें कविताएं लिखने का शौक है. वकील होने के साथ-साथ वे एक कार्यकर्ता भी हैं. 

इस सीरीज़ में रूहान के ‘नक्शा ए मन’ को आकार देने का काम तमिलनाडु की रहने वाली, ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता, कवि, उद्धमी, एक्टर एवं प्रेरक वक्ता कल्कि सुब्रमण्यम (https://www.kalkisubramaniam.com/arts/) ने किया है. 

कल्कि और रुहान, जब द थर्ड आई की टीम आप दोनों के सामने ‘नक्शा-ए-मन’ पर साथ काम करने का प्रस्ताव लेकर आई तो आपके मन में क्या ख़्याल आए थे?

कल्कि: रुहान की परवरिश छोटे शहर की है. ठीक इसी तरह मेरा जन्म भी एक छोटे से शहर पोलची में हुआ था. जिस तरह रुहान, एक दिन शहर छोड़कर दिल्ली चला जाता है, वैसे ही मैं भी छोटे शहर से निकलकर चेन्नई गई थी. चेन्नई, में मुझे एक पहचान मिली. मैं जैसी हूं मुझे इसी रूप में देखने और समझने वाले लोग मिले और काम के नए-नए मौके मिले. जेंडर के तयशुदा खांचों से अलग, मैं जो हूं और जो होना चाहती हूं, उसमें मज़बूती से ढलने का मौका मिला. रूहान का लिखा पढ़कर मुझे महसूस हुआ कि हमारी ज़िंदगियां दो समांतर रेखाओं की तरह है. हम दोनों की भटकन और तलाश एक जैसी है.

रूहान: द थर्ड आई के ट्रैवल राइटिंग प्रोजेक्ट के बारे में जब मुझे पता चला था तो मेरे दिमाग़ में सिर्फ़ एक ही ख़्याल था कि अपने शहर के बारे में मुझे सभी को बताना है. फतेहपुर, एक छोटा सा शहर है जिसे उत्तर-प्रदेश से बाहर शायद ही कोई जानता हो. मैं चाहता था कि मेरा इस शहर से जो रिश्ता था या है, जैसा मैंने इस शहर को जिया है, उससे लोग परिचित हों.
पर, अपनी पहचान को लेकर मैं खुलकर सभी को बता सकूं ऐसी कोई सुरक्षित और आत्मीय जगह मुझे यहां नहीं मिली और इसलिए मैं दिल्ली चला गया.

मेरे मन में आज भी खलिश है कि मेरा शहर जहां मेरे बचपन की सारी यादें, सारे रिश्ते-नाते बसे हैं वहां मुझे कोई सुरक्षित जगह क्यों नहीं मिली?

आप दोनों की पहली मुलाकात कैसी थी?

रूहान: मैं कुछ बताना चाहता हूं. जिस दौरान मैं ख़ुद की पहचान को लेकर बहुत ऊहापोह में रहा करता था, उस वक़्त मैं काफ़ी गूगल सर्च किया करता और इंटरनेट पर इसके बारे में जानकारियां ढूंढा करता था. वहीं, मैंने पहली बार ट्रांसमैन शब्द के बारे में जाना जो आज मेरी असल पहचान है.

उस वक़्त मेरे आसपास कोई नहीं था जो मेरे भीतर की उधेडबुन को समझ सके, मेरा साथ, या हौसला बढ़ाए. मैं गूगल पर ऐसे संगठन या संस्थानों के बारे में पता लगाने की कोशिश करता जो ट्रांस लोगों के अधिकारों के लिए काम करती हैं. तभी मुझे कल्कि का नाम और नम्बर मिला था. उस वक़्त तो मेरी उनसे बात नहीं हो पाई और एक अन्य एनजीओ ने मेरी मदद की थी. अब सालों बाद, जब ट्रैवल राइटिंग प्रोजेक्ट पर काम करते हुए मुझे पता चला कि मैं कल्कि के साथ काम करने वाला हूं तो मैं बहुत ज़्यादा उत्साहित हो गया.

कल्कि: रुहान ने मुझे एक लंबा मैसेज लिखा था जिसमें उसने अपनी ज़िंदगी, अपने काम, घर-परिवार, पसंद, सबकुछ के बारे में बहुत खुलकर ज़िक्र किया था. वो एक प्यार भरा, सुंदर सा मैसेज था जिसके हर शब्द से ईमानदारी टपक रही थी.
फोन पर हमारी बातें बहुत लंबी नहीं होती थीं, लेकिन गहरी ज़रूर होती थीं. रुहान, हिंदी में ब्लॉग भी लिखता है. मुझे हिंदी तो नहीं आती लेकिन एक अनुवादक की मदद से मैंने उसका ब्लॉग भी पढ़ा और मुझे लगा कि रूहान के शब्द और लेख बहुत पारदर्शी हैं. उसकी ईमानदारी ही उसकी ताकत है.

मैंने सोचा कि कोई मेरी जगह से इतनी दूर भारत के दूसरे कोने में रहता है, जिसकी हर बात मुझे अपने जैसी लगती है. जिन संघर्षों से होकर मैं गुज़री हूं उसने भी वैसे ही संघर्ष झेले हैं.

कल्कि, रूहान की ऐसी कोई ख़ास बात जिसे नक्शा ए मन तैयार करते हुए आपने सबसे ज़्यादा ध्यान में रखा.

कल्कि: रुहान बहुत धीमे स्वर में बात करता है. किसी भी विषय पर बात करते हुए उसके भाव हमेशा एकदम सरल और सहज होते हैं. ये वे खूबियां हैं जिन्हें मैं चित्र में सहेज सकती थी, यही उसकी ताकत भी हैं. नक्शा ए मन में मैं, कुछ ऐसा रास्ता निकालना चाहती थी जहां रूहान का संघर्ष खुलकर दिखाई दे, पर ऐसा भी न हो कि वो एकतरफ़ा हो जाए. ये भी सच है कि बग़ैर हमारा भूत, हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों ही संभव नहीं है. मैंने, नक्शा ए मन में इसका संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है.

रूहान, नक्शा ए मन को देखकर आपको कैसा लगा?

रूहान: मुझे इसमें फतेहपुर से निकलकर दिल्ली का अपना सफ़र दिखाई दे रहा है. इन दोनों के बीच मेरे जीवन से जुड़े सभी अहम पहलुओं को कल्कि ने बहुत कलात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है. लेकिन, एक छोटी सी चीज़ है: मैं चाहता था कि इसमें मेरे वो अनुभव भी दिखाई देते जो मैंने फतेहपुर में रहने के दौरान जिए थे. जैसे वो पार्क जहां मैं घंटो एक पेड़ के नीचे अकेले बैठ अपनेआप से बातें किया करता था या वो कब्रिस्तान वाला मैदान जहां मैं मोहल्ले के बच्चों के साथ क्रिकेट खेला करता था. लेकिन जब मैं 13-14 साल का था और मेरे शरीर में बदलाव शुरू हो रहे थे, उस वक़्त मेरे घरवालों ने मेरे बाहर जाकर लड़कों के साथ क्रिकेट खेलने पर रोक लगा दी. फिर मैं छत पर चढ़कर मैदान में लड़कों को खेलते हुए देखा करता था. मैं चाहता था कि नक्शा ए मन में ये छोटी-छोटी चीज़ें भी दिखाई देतीं तो अच्छा रहता. वैसे, जो अभी निकलकर आया है वो बहुत अच्छा है.

इस प्रोजेक्ट पर काम करने के बाद से आपकी ज़िंदगी में क्या बदलाब आए हैं? क्या इस प्रोसेस ने शहर के साथ आपके रिश्ते को किसी भी तरह प्रभावित किया?

रुहान: इस प्रोजेक्ट ने मुझे थोड़ा बदल दिया. मतलब पहले जो एक तरह का गुस्सा और आक्रोश मेरे अंदर था और मैं निगेटिव चीज़ें ही देखता था. मुझे लगता था कि मेरी सभी परेशानियों की जड़ ये शहर ही है. इस शहर ने मुझे वो नहीं बनने दिया जो मैं बनना चाहता था, यही वजह है कि यहां मेरे जीवन के इतने साल बर्बाद हो गए.

लेकिन, इस प्रोजेक्ट पर काम करते हुए मैं अपने हर छोटे-बड़े अनुभव को दुबारा याद कर उसे पलटकर समझने की कोशिश कर रहा था.

कल्कि के साथ बात कर उनके अनुभवों को जब जाना तो मुझे हिम्मत मिली. मैंने महसूस किया कि जो मेरे साथ हो रहा था और जिसे मैं अपनी परेशानियों की जड़ समझ रहा था, दरअसल वो तो सिर्फ़ परिस्थितियां थीं जिसे मैं आसानी से बदल सकता था.

कल्कि: रूहान से मुलाक़ात मेरे जीवन की एक रोमांचक घटना है, मुझे महसूस हुआ कि ये प्रोजेक्ट मेरे सबसे ख़ूबसूरत कामों में से एक है. इससे पहले मैंने किसी व्यक्ति के मन को इस तरह साकार करने का काम नहीं किया था. मैं, वैसे भी जीवित व्यक्तियों के चित्रांकन पर बहुत कम ही काम करती हूं. मैंने फ्रीडा काहलो, चे ग्वेरा के अलावा प्राकृतिक दृश्यों और जानवरों के चित्रांकन पर ज़्यादा काम किया है. केरल की रहने वाली एक ट्रांसलड़की है शीतल, जो मेरी दोस्त भी है. मैंने उसे पेंट किया है और अब लगभग सात सालों के बाद मैं रूहान के साथ ही काम कर रही हूं.

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.
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