“आईएएस सेवाओं की तरह ही हमारे यहां भारतीय जन स्वास्थ्य कैडर होना चाहिए.”

संपादन : शिवम रस्तोगी

ट्रांसजेंडर या सिसजेंडर – जो किसी तयशुदा खांचे में अपने को फिट नहीं पाते, वे सार्वजनिक स्वास्थ्य के ‘सिस्टम’ में अपने को कहां खड़ा पाते हैं? क्या वैक्सीन या स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी प्रचार का केंद्र ऊंची जाति के लोग और ख़ासकर उत्तर भारत के लोग ही हैं?

डॉ. अक्सा शेख़, जामिया हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च के कम्यूनिटी मेडीसिन विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं, साथ ही वे वहां के कोविड वॉर्ड की नोडल अधिकारी भी हैं. अक्सा को कहानियां सुनाना अच्छा लगता है और वे इसे क्लासरूम की पढ़ाई का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं. उनका कहना है कि आसपास की सच्ची घटनाओं से निकलने वाली कहानियां स्टुडेंट्स एवं स्वास्थयकर्मियों को अपने समुदायों से जोड़ती हैं, और उनके भीतर समानता भी पैदा करती हैं. 

डॉ. अक्सा ने द थर्ड आई के साथ बात कर जन स्वास्थ्य के मुद्दे से जुड़े ज़रूरी नीतिगत बदलावों पर चर्चा की और साथ ही एक भारतीय जन स्वास्थ्य कैडर के निर्माण पर ज़ोर दिया.

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.
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