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एकल इन द सिटी, एपिसोड 03: अकेले और चलना चाहिए

एकल इन द सिटी के इस तीसरे एपिसोड में मिलिए अनु से जो छत पर बने अपने कमरे से हमारा परिचय करवाती हैं. आज से करीब 76 साल पहले वर्जिनिया वुल्फ ने अपने लेख ‘अ रूम ऑफ़ वन्स ओन’ में लिखा था कि रचनात्मक रचने के लिए लड़कियों और महिलाओं के पास अपना एक कमरा होना चाहिए.

वापसी

साल 2020 में कोविड के दौरान देशभर में लगे लॉकडाउन की वजह से ज्योति अपने गांव सवाऊ मूलराज वापस लौटती हैं. उन्होंने गांव में रहते हुए वहां के परिदृश्य, लोगों औऱ घटनाओं को अपने कैमरे में कैद करना शुरू किया.

दाम्पत्य और असंतोषः एक कहानी तस्वीरों की ज़ुबानी

1870 और 1920 के बीच की अवधि को पूरे भारत में दाम्पत्य/नव दाम्पत्य परियोजना (विवाहित जोड़े की एक नई कल्पना) को आगे बढ़ाने का उत्तम समय माना जा सकता है और यह महाराष्ट्र में भी बहुत अच्छी तरह से दिखाई देता है.

एकल इन द सिटी, एपिसोड 02: एकल परिवार

एकल इन द सिटी के दूसरे एपिसोड में माधुरी की मुलाक़ात उत्तर-प्रदेश में रहने वाली दो एकल महिलाओं से होती है. 27 वर्षीय सीमा, पेशे से पत्रकार हैं और 28 साल की शब्बो, बुंदेलखंड स्थित महिला अधिकार समूह ‘वनांगना’ की कार्यकर्ता हैं. इस एपिसोड में शब्बो और सीमा, दोनों ही खुलकर अपनी बातें साझा कर रही हैं. वे बताती हैं कि कैसे उन्हें शहर के भीतर एकल परिवार मिला.

एकल इन द सिटी, एपिसोड 01: ख़ुदा हाफ़िज़

महानगरों या बड़े शहरों से दूर किसी सुदूर इलाके में एकल महिला होने के क्या अर्थ हैं? शहरों की रुमानियत से दूर ऐसी जगहों पर एक महिला के अकेले रहने के अनुभव कैसे होते हैं? कोई एकल क्यों होता है? कौन से शब्द हैं जो इसे परिभाषित करते हैं? क्या यह संपूर्ण जीवन है या जीवन का एक हिस्सा?

मन के मुखौटे, एपिसोड 03: मैंने साफ किया तुम्हारा…

मानसिक स्वास्थ्य के तयशुदा खांचे से बाहर निकल, उसे आपबीती और जगबीती के अनुभवों एवं कहानियों के चश्मे से समझने की एक महत्वाकांक्षी पहल – मन के मुखौटे- के ज़रिए हम एक बार फ़िर वापस मानसिक स्वास्थ्य की तरफ़ मुड़कर देख रहे हैं. इस पॉडकास्ट सीरीज़ के नए एपिसोड में हम – देखभाल से जुड़े मुद्दों पर सवालों और अनुभवों के ज़रिए इसे समझने का प्रयास कर रहे हैं.

गुलाबी टॉकीज़

एक सिनेमाघर, मल्टीप्लेक्स, सिंगल स्क्रीन पर्दे की किसी शहर के बनने में क्या भूमिका होती है? क्या ये सिर्फ़ बड़े पर्दे पर किसी कहानी को हमारे लिए जीवित भर करते हैं या ये शहर के भीतर रह रहे किरदारों की ज़िन्दगियां भी बदलते हैं.

कोरोना वायरस और वैक्सीन: जानें और समझें.

लॉकडाउन में घर के अंदर पूरी तरह बंद होने के बाद आज, लगभग 18 महीने के बाद हम धीरे-धीरे घर से बाहर निकलकर अपने दफ़्तर जा रहे हैं, दोस्तों-रिश्तेदारों से मिल रहे हैं. कैसे? इसकी एक बड़ी वजह है कोरोना की वैक्सीन.

जन स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए विकलांगता प्राथमिक क्यों नहीं है?

2011 की भारतीय जनगणना के अनुसार सिर्फ़ दो या ढाई फीसदी लोग ही शारीरिक एवं मानसिक विकलांगता से ग्रसित हैं। क्या ये पूरा सच है? जन स्वास्थ्य व्यवस्था में शारीरिक एवं मानसिक विकलांगता वाले लोग सबसे निचले पायदान पर क्यों खड़े दिखायी देते हैं?

“आईएएस सेवाओं की तरह ही हमारे यहां भारतीय जन स्वास्थ्य कैडर होना चाहिए.”

ट्रांसजेंडर या सिसजेंडर – जो किसी तयशुदा खांचे में अपने को फिट नहीं पाते, वे सार्वजनिक स्वास्थ्य के ‘सिस्टम’ में अपने को कहां खड़ा पाते हैं? क्या वैक्सीन या स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी प्रचार का केंद्र ऊंची जाति के लोग और ख़ासकर उत्तर भारत के लोग ही हैं?

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