“हम लोगों से सिर्फ़ डेटा कलेक्ट करती हैं, उनके सवालों का जवाब हमारे पास नहीं होता.”

समुदाय और सरकार के बीच अपनी भूमिका निभाती आशा वर्कर की ज़िन्दगी में डर, असुरक्षा और आर्थिक तंगी स्थाई है. उनकी स्थिति में परिवर्तन स्वस्थ समाज के लक्ष्य को पाने की तरफ एक सकारात्मक कदम हो सकता है.

चित्रांकन: सृष्टि गुप्ता

‘तन मन जन’ – द थर्ड आई के इस ‘जन स्वास्थ्य व्यवस्था’ संस्करण में हम, भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के संभावित भविष्य पर स्वास्थ्य कर्मचारियों, अर्थशास्त्रियों, कम्यूनिटी लीडर और चिकित्सकों की व्यापक सोच एवं विचारों को प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं.

ग्रामीण आबादी के स्वास्थ्य एवं देखभाल के लिए साल 2005 से देश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन) की स्थापना की गई तथा इसके अंतर्गत गांवों में आशा वर्कर की नियुक्तियां की गईं. देश में करीब दस लाख से ज़्यादा आशा वर्कर हैं. कोविड महामारी के बाद लगे लॉकडाउन में आशा वर्कर फ्रंटलाइन वॉरियर के रूप में घर-घर जाकर मदद कर रही थीं लेकिन आशा वर्कर की ख़ुद की ज़िन्दगी कैसी है? उन्हें किन हालात में और कैसे काम करना पड़ता है? जन स्वास्थ्य व्यवस्था सीरीज़ में द थर्ड आई ने हरियाणा की सुनीता रानी से इन सवालों का जवाब जानने की कोशिश की. 11 सालों से आशा वर्कर का काम कर रही सुनीता आशा वर्कर यूनियन की सक्रिय सदस्य हैं.

आपने आशा वर्कर के बतौर काम की शुरुआत कब और कैसे की? अपने काम के बारे में हमें बताएं.

मैंने साल 2011 में आशा वर्कर का काम शुरू किया था. मेरी मां स्वास्थ्य विभाग के साथ बच्चों को टीका लगवाने का काम करती थीं. मैं, कभी-कभी उनकी मदद कर दिया करती थी. मुझे अच्छा लगता था. मैंने आशा वर्कर के लिए फॉर्म भर दिया, इंटरव्यूह हुआ और मैं सेलेक्ट हो गई. उस वक़्त हम टीबी के मरीज़ों को समय पर दवा लेने के लिए प्रेरित करतीं, लोगों को स्वच्छता के बारे में जानकारी देतीं और बच्चों के टीकाकरण में मदद करती थीं. हर एक काम का मेहनताना फिक्स था. हमें 20 रुपए से लेकर 50 रुपए प्रति काम मिला करते थे. किसी दिन हमने एक बच्चे का टीकाकरण करवाया तो उसके 20 रुपए बने, या महिला को अस्पताल से डिस्चार्ज करा कर घर लेकर आईं तो उसके तीस रूपए मिले. मुझे आज भी याद है 13 महीने काम करने बाद मुझे 1220/- रुपए मिले थे. हम बहुत खुश थे कि हमें एक साल काम करने के बाद पैसे मिले हैं.

कोविड से पहले फ़ील्ड में चार से पांच घंटे बिताती थीं, जो अब बहुत ज़्यादा बढ़ गए हैं. काम के लिए हमें रोज़ कई-कई किलोमीटर पैदल भी चलना पड़ता है. एक दिन भी अगर छुट्टी कर ली तो उस दिन का काम अगले दिन पूरा करना होता है. हमारे रोज़मर्रा के काम में एक साल से 12 साल तक के बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं का समय पर टीकाकरण, गर्भ के दौरान महिलाओं का रजिस्ट्रेशन करवाकर उनके ख़ून की जांच, डॉक्टरी चेकअप, उन्हें आइरन और कैल्शियम की गोली देना, प्रसूति के समय गर्भवती महिला को समय पर अस्पताल लेकर जाना शामिल है. अगर कम्यूनिटी में कोई नई बीमारी दिखे तो उसकी जानकारी स्वास्थ्य़ विभाग को देना, कौन सी महिला परिवार नियोजन के लिए कौन से साधन का इस्तेमाल कर रही है, इसकी जानकारी इक्ट्ठा कर, इस तरह के तमाम रिकॉर्ड्स स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के पास जमा करवाने होते हैं.

हमारे रोज़ के कामों में 8 तरह की एक्टिविटी का ब्यौरा हमें मेंनटेन करना होता है. फ़ील्ड से लौटकर हम रोज़ ऑनलाइन इस डेटा को अपलोड करती हैं. सरकार, अलग-अलग दिन तरह-तरह के सर्वे करवाती है और हमसे कभी भी कोई भी डेटा मांग सकती है, इसलिए ये सारे रिकॉर्ड हम हमेशा तैयार रखती हैं.

कोविड महामारी के फैलने के बाद से आपके काम में क्या बदलाव आए हैं?

पहली लहर के समय जब लोग शहरों से वापस लौट रहे थे तो हम घर-घर जाकर सर्वे करती थीं कि कौन आया, किसे बुख़ार है? ये सारा डेटा हम इकठ्ठा कर रही थीं. उसके बाद कोविड की टेस्टिंग का काम शुरू हुआ. फिर कोविड के मरीज़ों की पड़ताल कर उन्हें आइसोलेशन सेंटर में भेजना, होम क्वारंटाइन कर रहे मरीज़ों से जाकर मिलना, ये सब करना पड़ता था. अभी हम टीकाकरण के काम में लगी हुई हैं. लोगों के साथ काम करने के अलावा उनसे प्राप्त डेटा भी लिखित में तैयार करती हैं. हर एक काम का फॉलोअप भी करना ज़रूरी है. साथ ही मानसिक तौर पर भी हम अपने को सतर्क एवं जागरूक रखने की लगातार कोशिश करती रहती हैं. महामारी के आने के बाद से हमारे काम के घंटे भी बढ़ गए हैं, फ़ील्ड में रोज़ 5 से 6 घंटे लग जाते हैं और डेटा एंट्री भी बहुत ज़्यादा बढ़ गई है.

इसके अलावा कोरोना की वजह से हमारे रेगुलर काम, जो गर्भवती महिलाओं, बच्चों और समुदाय से जुड़े हैं वो पेंडिंग में चल रहे हैं या बहुत कम हो गए हैं. अभी हमारा बहुत सारा समय वैक्सीन के प्रति गांववालों को जागरूक करने और उन्हें प्रेरित करने में खर्च हो रहा है.

हमें इस बात का भी डर रहता है कि कहीं हम इनफेक्टेड तो नहीं हैं? कहीं हमारी वजह से ये बच्चा या हाई रिस्क जोन वाली गर्भवती महिला बीमार तो नहीं हो जाएगी? इस तरह हमारे काम की परवाह भी बहुत ज़्यादा बढ़ गई है और मानसिक तनाव भी.

सारी आशा वर्कर घर चलाने वाली महिलाएं हैं. वे अपने घर में खाना बनाना, साफ़-सफ़ाई, घरवालों की देखभाल भी करती हैं और फ़िर पैदल फ़ील्ड में घूम-घूम कर लोगों से मिलती हैं, जानकारी लेती हैं, उनकी मदद करती हैं.

आपको अपने काम को लेकर किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है? इसमें स्वास्थ्य व्यवस्था का क्या रोल है?

एक आशा वर्कर सरकार और ग्रामीण जनता के बीच की सबसे अहम कड़ी है. सरकार की योजनाएं, जो ग़रीब और गांववालों के लिए होती हैं, उन्हें ज़मीनी स्तर पर लोगों तक पहुंचाने का काम हम ही करती हैं. 1000 की आबादी पर एक आशा वर्कर होती है.

लेकिन, हमारा स्वास्थ्य सिस्टम (व्यवस्था) बहुत कमज़ोर है. ग़रीब परिवारों के प्रति हमारी विशेष ज़िम्मेदारी होती है कि हम उन्हें बुख़ार, उल्टी, दस्त या दर्द में ज़रूरी दवा दे सकें. पर, हमारे पास दवाइयों की भी भारी कमी होती है. यहां तक की हमें पैरासिटामोल तक नहीं दी जाती. गर्भवती महिलाओं को कैल्शियम और आयरन की गोलियां देनी होती हैं लेकिन ये भी आशा वर्कर को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रही हैं, तो हम ज़रूरतमंदों को कहां से दें? ऐसे में उन्हें प्राइवेट से दवाइयां खरीदनी होती हैं. इससे, हमें लेकर उनका भरोसा भी टूटता है. जबकि ये सारी चीज़ें सरकार बहुत कम ख़र्च में मुहैया करा सकती है.

हमें जानकारी लेने के लिए फ़ील्ड में भेज दिया जाता है लेकिन हमारे पास लोगों के सवालों और परेशानियों का कोई जवाब नहीं होता. लोगों को लगता है कि हम उन्हें परेशान करने के लिए आ जाती हैं. उनकी बुरी बातों का समाना भी हमें ही करना पड़ता है.

व्यवस्था की नज़र में हमारी हालत एक वॉलिन्टियर जैसी है. हमारे पास अनुभव है. सरकार भी हमें ट्रेनिंग देती है कि हम किसी बच्चे में दस्त और उल्टी के लक्षण देखकर उसका इलाज़ कर सकती हैं. लेकिन हमें कभी आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जाता. एक आशा वर्कर मरते दम तक आशा वर्कर ही रहती है.

क्या ख़राब स्वास्थ्य व्यवस्था की वजह से आपको लोगों का भरोसा जीतने में मुश्किल होती है?

हमें गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना होता है लेकिन अस्पताल में स्टाफ का व्यवहार बहुत ख़राब होता है. डिलिवरी के दौरान कोई समस्या पैदा हो गई और ऑपरेशन करवाना हो तो ग़रीब परिवार सरकारी अस्पताल ही आते हैं. लेकिन वहां उनसे पैसा वसूला जाता है. बच्चा पैदा होने पर भी रिश्वत लेते हैं. विरोध करने पर ऑफ़िसर भी हम पर गुस्सा उतारते हैं. अब आशा का काम इतना पक्का तो नहीं कि उन्हें प्रताड़ित कर या टारगेट कर हटाया न जा सके. बहुत ऐसे केस हैं जहां उन्हें हटाया भी गया है.

हम किसी तरह समझा कर लोगों को सरकारी अस्पताल लेकर जाती हैं तो वहां उन्हें लंबी-लंबी लाइनों में लगना पड़ता है क्योंकि वे गरीब हैं इसलिए डॉक्टर उन्हें कुछ भी कह देते हैं. हमें बहुत बुरा लगता है. इस सब का ख़ामियाज़ा हमें ही भुगतना पड़ता है. हमें पूरे समुदाय का गुस्सा झेलना पड़ता है. लोगों को लगता है कि सरकारी अस्पताल वाले तो हमारी कुछ सुनते ही नहीं, फिर वे हम पर भरोसा क्यों करें!

कोविड के दौरान हम सरकार के कहने पर लगातार सर्वे कर पता कर रही थीं कि कौन कहां बीमार है और उनके घरों के आगे क्वारंटाइऩ के पेपर चिपकाती थीं. इससे लोग बुरा मानने लगे क्योंकि बीमारी का पता होने पर गांव में उनके साथ छूआ-छूत जैसा बर्ताव होने लगता था. साथ ही गांव के लोगों को यह भी लगता कि कर्फ्यू के जो नए-नए नियम बन रहे हैं और उन्हें बाहर नहीं जाने दिया जा रहा वो भी हमारी वजह से ही है. वे हमें इसका कारण मानते हैं और इसकी वजह से हमसे बुरा बर्ताव करते हैं.

कोविड के समय तो बहुत सारी आशा वर्कर्स के साथ झगड़े हुए हैं, मारपीट भी हुई है. हमने ये शिकायतें स्वास्थ्य विभाग से भी कीं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई. संगठन के दम पर भी हम इसके लिए लड़ाई लड़ रही हैं.

आपको अपने काम को लेकर किस तरह की ट्रेनिंग दी जाती है?

इंटरव्यू के बाद जब हम आशा वर्कर के काम में लग जाती हैं तो हमें एक छोटी सी ट्रेनिंग दी जाती है कि, लोगों के घर जाकर कैसे व्यवहार करना है. बस, इसके अलावा और कोई ट्रेनिंग नहीं होती. उसके बाद विभाग के साथ हमें जो काम करना होता है उससे जुड़ी हुई बातों के लिए कभी दो दिन, कभी चार दिन की ट्रेनिंग होती है.

आशा वर्कर के संगठन के बारे में कुछ बताएं.

हरियाणा आशा वर्कर यूनिट की शुरुआत 2009 में हुई थी. संगठन आशा वर्कर के साथ होने वाली ज़्यादतियों पर एकजुट होकर आवाज़ उठाता है. जैसे, जबरन कोई काम थोपा जाता है या तनख़्वाह समय पर न मिलना या हमें बहुत प्रताड़ित किया जाता है. जब कोविड के दौरान आशा वर्करों के साथ मारपीट हुई तो हमने इसका विरोध किया.

हम तो फ्रंटलाइऩ वर्कर्स हैं न? लेकिन दूसरी लहर की भयावह स्थिति में भी हमें सुरक्षा उपकरण नहीं दिए गए. कहीं 6 मास्क तो कहीं आधा लीटर सैनिटाइज़र की बाल्टी दी गई, कहीं-कहीं आशा वर्कर्स को दस्ताने दिए गए. लेकिन ये सभी जगह अलग-अलग तरीके से बांटा गया. बहुत जगहों पर आशा वर्कर ख़ुद से ख़रीद कर मास्क लगाती हैं या दुपट्टे से अपनी सुरक्षा करती हैं. ये छोटी-छोटी चीज़ें भी हमें संगठन के दम पर लड़कर हासिल हुईं.

हरियाणा सरकार ने हमें फोन दिया है जिसमें एमडीएम (MDM) के नाम से एक एप्प हमें डाउनलोड करना होता है. एप्प के ज़रिए सरकार हमारे लोकेशन की जानकारी रखती है. इसका मतलब है कि हमारी कोई प्राइवेसी नहीं है. एक तो हमें समय पर हमारा मेहनताना नहीं मिलता, हमारी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं, लेकिन सरकार हमें बंधुआ मज़दूर बनाने के पीछे ज़रूर लगी हुई है, जिसका हम विरोध कर रही हैं.

एक आशा वर्कर की सैलरी भी फिक्स नहीं है. देश में औसतन, एक आशा वर्कर की महीने की सैलरी 2,000 रुपए से लेकर 5,000 रुपए तक होती है, यह भी इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस राज्य से हैं. हरियाणा में हमने 2018 में संगठन के दम पर लड़कर अपनी सैलरी 2000 रूपए से 4000 रूपए करवाई थी. इसके अलावा, हमें समुदायों में स्वच्छता कार्यक्रम करने, जन्म और मृत्यु की जानकारी रखने और उनके रिकॉर्ड्स मेंटेन करने के लिए केन्द्र सरकार से 2000 रुपए इन्सेंटिव के रूप में दिए जाते हैं. अब इतने से पैसे में हम बच्चों की फीस दें, परिवार के लिए खाने का इंतज़ाम करें और सारा काम कैसे करें?

दिक़्कत ये भी है कि पूरे देश की आशा वर्कर्स एकजुट होकर लड़ाई नहीं लड़ पातीं. वे अपनी यूनिटी न बना लें इसके लिए महिलाओं को डराने-धमकाने की कोशिश की जाती है. इसलिए अभी तक पूरे देश में ऐसी यूनिटी नहीं बन पाई है जैसी हरियाणा में है.

अपने काम की वज़ह से लोगों के कल्याण से जुड़ी सरकारी नीतियों के असल प्रभाव को आप बहुत क़रीब से देखती हैं. क्या आप इससे जुड़े अपने अनुभव हमसे साझा कर सकती हैं?

जितना हमने देखा है उससे यही समझ आता है कि सरकार सिर्फ़ प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा देती है. देश में लगभग 70 प्रतिशत आबादी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर आश्रित है. लेकिन ये स्वास्थ्य (सिस्टम) आज बिजनेस बन गया है और कुछ लोगों के मुनाफ़े का ज़रिया. जनता, सरकार और प्राइवेट सेक्टर के बीच कठपुतली बनकर रह गई है.

उदाहरण के तौर पर सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत सरकार प्राथमिक इलाज़ के लिए भुगतान नहीं करती, लेकिन गंभीर बीमारी हो और बिल पांच हज़ार से ऊपर का हो तो सरकार हॉस्पिटल को बीमा की रक़म का भुगतान करती है. इसके चलते हॉस्पिटल्स लोगों के शरीर को पैसा बनाने की मशीन की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं.

शिक्षा और स्वास्थ्य सभी के लिए बुनियादी ज़रूरत है. ये बिजनेस नहीं हो सकते. ये सभी को समान रूप से प्राप्त होने चाहिए.

आपके अनुसार सरकार की तरफ़ से आशा वर्कर्स की वर्तमान परिस्थिति में सुधार के लिए कौन-कौन से कदम सबसे महत्तवपूर्ण हैं जिनके ऊपर सरकार को ध्यान देना चाहिए?

सबसे अहम बात है आशा वर्कर्स के काम के घंटे निर्धारित करना. हम कम से कम 10-12 घंटे काम करती ही हैं. महिलाएं घर भी संभालती हैं, फ़ील्ड भी जाती हैं, ऑनलाइऩ भी काम करती है, लिखित में भी रिकॉर्ड तैयार करती हैं, शाम को वापस लौटकर फिर घर में काम करती हैं. इतना सब करते हुए अगर वो ख़ुद के स्वास्थ का ध्यान नहीं रख पाएंगी तो दूसरों की मदद कैसे करेंगी? अगर, स्वस्थ भारत का निर्माण करना है तो आशा वर्कर को थोड़ा आराम देना पड़ेगा.

दूसरा, हर

आशा वर्कर की आर्थिक स्थिति मज़बूत होनी चाहिए. उन्हें कम से कम इतना मेहनताना तो मिलनी ही चाहिए जितना किसी स्किल्ड वर्कर को दिया जाता है. हम 15 -15 साल से काम कर रही हैं और ज़्यादा से ज़्यादा हमें 8000 रुपए मिलते हैं. ये भी हरियाणा जैसे राज्य की बात है जहां दूसरे राज्यों के मुकाबले मेहनताना सबसे ज़्यादा है. आज की तारीख़ में दो बच्चों समेत चार लोगों के परिवार का भरण-पोषण आठ हज़ार रूपए में कोई (आशा वर्कर) कैसे कर सकती है?

सरकार को अगर स्वास्थ्य सिस्टम को मज़बूत बनाना है तो इसकी नींव में काम कर रहे आशा वर्कर्स और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) से जुड़े सभी कर्मचारियों की भर्ती ठेके पर न करके, उन्हें पक्की स्थाई नौकरी देकर मदद करनी चाहिए. एक अच्छी नीति को लागू करने के लिए उसकी नींव का मज़बूत होना बहुत ज़रूरी है.

जाति हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या मानी जाती है. आपके काम में जाति का दखल किस तरह से होता है?

हरियाणा में जाट और ब्राह्मण जाति के लोग सबसे ज़्यादा हैं और वे पसंद नहीं करते कि हम दलितों के घर जाएं. घरवाले भी इस बात से नाराज़ होते हैं कि हमें अपने काम की वजह से दलितों की बस्ती में जाना पड़ता है. समुदाय में इसे लेकर बातें होती हैं. हम यही कहती हैं कि ‘हमारा काम है, हमें जाना होता है’. लेकिन बहुत कम लोग इसे समझते हैं. उनके मन में हमारे प्रति एक अजीब सी भावना तो भर ही जाती है. कई आशा वर्कर्स गांववालों को दलील देती हैं कि हम दलित परिवारों से मिलकर आने के बाद नहा धो लेती हैं. एक आशा वर्कर को नवजात शिशु एवं माताओं की देखभाल करने के लिए और एचबीपीएनसी (HBPNC) कार्ड को भरने के लिए तीन बार विज़िट करना होता है. लेकिन सामान्य तौर पर ऊंची जाति की आशा वर्कर किसी दलित बस्ती में एक या दो बार जाएगी, और बाहर से भी पूछ लेगी कि “बहु ठीक है? बच्चा ठीक है?” और अपने मन से कार्ड को भर देगी. ऐसा वो समुदाय के प्रेशर में आकर करती है.

हमने सरकार सुझाव दिया था कि दलित बस्तियों में उन्हीं समुदाय की आशा वर्कर होनी चाहिए ताकि उस समुदाय की महलाओं, बच्चों और बूजुर्गों को ज़रूरी सुविधाएं मिल सकें. सरकार ने हमारी बात मान कर कई जगहों पर दलित आशाओं की नियुक्तियां भी कीं. लेकिन, इसमें एक व्यवहारिक परिशानी ये आ रही है कि हरियाणा में आशा वर्कर होने के लिए 12 वीं पास होना ज़रूरी है. दलित, वैसे ही ग़रीबों में ग़रीब होते हैं. उनकी शिक्षा का स्तर भी बहुत कम होता है. उसमें भी पांचवी पास या दसवीं पास महिलाएं मिल जाएं ऐसा बहुत मुश्किल से होता है.

हम संगठन के बतौर कोशिश कर रही हैं कि इस नियम को पांचवीं पास तक के लिए कर दिया जाए. क्योंकि किसी दलित महिला के लिए हरियाणा बोर्ड से दसवीं पास करना भी बहुत मुश्किल काम है.

आपके काम को लेकर परिवार में किस तरह की प्रतिक्रिया होती है?

महामारी के दौरान टीवी के ज़रिए फैलाया जा रहा था कि यहां कोरोना है वहां कोरोना है उस वक़्त फैमली भी बहुत ज़्यादा डरी हुई थी. हमारे फील्ड में जाने की वजह से घर में बहुत ज़्यादा लड़ाइयां-झगड़े हुए. लेकिन, हमें पता था कि हम काम करने नहीं जाएंगी तो हमें आशा के काम से हटा दिया जाएगा, और अगर हम जाएंगी तो हमें ख़ुद के मरने का डर था. इसके साथ ही अगर हमारी वजह से परिवार या बुज़ुर्ग इंफेक्टेड हो गए तो क्या होगा? इस तरह के मानसिक तनावों के बीच हम रोज़ फ़ील्ड में जाती हैं.

इससे पहले भी परिवार और आशा वर्कर के काम के बीच तालमेल में घर में झगड़े होते रहते थे, कभी बच्चों पर ध्यान नहीं दे सकीं या खाना ठीक से नहीं बनाया तो इन सब बातों पर झगड़े हो जाते थे. हां, कभी-कभी फैमिली सपोर्ट भी करती है.

आपका ख़ुद का संघर्ष बहुत बड़ा है. आप अकेले अपने दम पर अपने परिवार की देखभाल कर रही हैं. इन कठिन परिस्थितियों के बीच आप भविष्य के प्रति कितनी आशान्वित हैं?

जब मेरी पारिवारिक ज़िम्मेदारियां थोड़ी कम होंगी, बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे तो शायद मैं अपने विचारों और अपने सपने पर ज़्यादा समय दे सकूंगी. मैंने सावित्रीबाई फूले, भगतसिंह, कर्तार सिंह सराभा और दूसरे क्रान्तिकारियों को पढ़ा है. स्कूल में तो बस किसी तरह पास हो जाएं इसके लिए पढ़ते थे. लेकिन जब असल ज़िन्दगी में इन्हें दोबारा ठीक से पढ़ा तो अपने समाज को देखने और समझने की प्रेरणा इनसे ही मिली.

मैं चाहती हूं कि मैं इनकी तरह समानता और सम्मान के लिए खड़ी हो सकूं. महिलाओं को उनका हक़ और सम्मान दिला सकूं.

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.
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