अंक 006: मज़ा और खतरा

इस संस्करण के ज़रिए हम मानवीय अनुभवों को समझने और देखने का प्रयास कर रहे हैं – खासकर हमारी इच्छाएं, यौनिकता, सेक्स, शरीर, उम्र, हिंसा, भूख और प्यास जो आपस में एक-दूसरे से टकराते हैं – इन्हें हम अवचेतन की नज़र से देखने की कोशिश करेंगे.

नो रिग्रेट्स

सफ़दर हाशमी से माफ़ी के साथ कि किताबें डराती हैं, किताबें क्रान्ति के लिए उकसाती हैं, अक्सर कोर्स की किताबों में छुपाकर पढ़ी जाने वाली किताबें ज़िंदगी का असल मायने बताती हैं. सीमा दहिया की यह कहानी बंद खिड़की से झांकती रौशनी का वह टुकड़ा है जो अपनी जानदार भाषा के साथ यही दोहराता है कि ख्वाहिशें अपना रास्ता ढूंढ लेती हैं.

खेल

“आपकी नज़र गंदी है, हमारा खेल नहीं”

बिहार के पनसेरवा गांव में फ्रिस्बी खेल रही लड़कियों को ऊंची जाति के दबंग रोकने की कोशिश करते हैं. लड़कियां इन दबंगों के सामने झुकने से इंकार कर देती हैं और एक युवा कार्यकर्ता उनके साथ खड़ा होता है. अब खेल और पितृसत्ता के बीच इस टकराहट का साक्ष्य पूरा गांव है. तन्मय अपने निबंध में इस टकराव की ज़मीन पर खड़े होकर ग्रामीण बिहार की एक तस्वीर हमारे सामने रखते हैं और साथ ही इस भ्रम को तोड़ते हैं कि खुशी में नुकसान की गुंजाइश नहीं होती.

मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत

अवचेतन और यौनिकता शृंखला l भाग 4: यमी-यकी

चौथे भाग में नारीवादी कार्यकर्ता और लेखक जया शर्मा अपने विश्लेषण के ज़रिए बता रही हैं कि कैसे हमारी सबसे अजीबोगरीब यौन कल्पनाएं हर तरह के तर्क के बिल्कुल खिलाफ होती हैं और फिर भी हमें ये समझ आती हैं. जया, यहां मनोविश्लेषण पर नारीवादी दृष्टिकोण का भी गहराई से चिंतन करती हैं.

सहमति_खरगोश

खरगोश

लेखक प्रियंवद की कहानी ‘खरगोश’ कामना के भंवर में उपजे तनावों की कहानी है तो वहीं एक किशोर मन में उपजी सैकड़ों भावनाओं की कहानी भी है. एक कस्बाई शहर की गलियां, गंध, धूप, छत, सीढ़ियों और उसके रिदम में बंटू, बंटू के अविनीश भाई और अविनीश भाई की मृत्यु- खरगोश इन्हीं किरदारों के इर्ग-गिर्द घूमती है.

जंगल

फ से फील्ड, इश्श से इश्क: मशीन ही तो है

इंसानी चाहतें और मशीनी आवाज़ के बीच एक अदद वाइब्रेटर! कौन किसके लिए? मज़ा और खतरा के इस आखिरी एपिसोड में मिलिए मैक्सी और उसके वाइब्रेटर से! साथ में टॉम की आवाज़ को न भूलें!

LGBTQIA+

“एलजीबीटी लोगों पर किस देश का कानून लागू होता है?”

क्वीयरबीट के संस्थापक बता रहे हैं कि मीडिया संस्थानों खासकर हिंदी मीडिया में LGBTQIA+ पहचानों को लेकर किस तरह के छिपे और ज़ाहिर पक्षपात देखने को मिलते हैं.

जंगल

फ से फील्ड, इश्श से इश्क: टीस

“कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात। भरे भौन मैं करत हैं, नैननु ही सब बात।।”

इस कहानी मे हल्की खुमारी है, वो जो हो सकता था पर हुआ नही. पर वो ऐसा है जो चुपके-चुपके होता भी रहा. ये कैसा इश्क है भला?

जंगल

फ से फील्ड, इश्श से इश्क: उपन्यास

किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने, मगर कोई चेहरा भी तुमने पढ़ा है? लक्की ने जब पढ़ने की कोशिश की तो हवाएं थम सी गईं, पृथ्वी ने घूमना बंद कर दिया… क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है?