अंधेरे के बिना प्रेमी जोड़े कहां जाएं?

शहरीकरण में निगरानी के बीच अंधेरा और सुरक्षा क्या मायने रखते हैं? एक निबंध

अंधेरा
चित्रांकन: सांची डिसूजा
अंधेरे ने हमेशा से ही कवियों की कल्पना के लिए खाद-पानी का काम किया है. खालीपन या रिक्तता से भरी जगह जो सितारों को चमकने का मौका देती है और अक्सर जहां डरावनी फिल्में फिल्माई जाती हैं. लेकिन हम जिस तरह से रहते हैं उसके बारे में यह अंधेरा क्या कहता है? सांची अपने इस लेख के माध्यम से पाठकों को अहमदाबाद में साबरमती के किनारे बने रिवरफ्रंट के पास लेकर जाती हैं. वह पाठकों को अपने साथ चिली देश के अटाकामा रेगिस्तान लेकर जाती हैं. दीगर जगहों पर अंधेरे के अलग-अलग रूप और अर्थ को समझने की कोशिश करती हैं. वे, जिनकी चाहते अंधेरे की ओट में बेहतर सांस ले पाती हैं, उनके लिए यह अंधेरा किस तरह के वादे और खतरे लेकर आता है? सांची इसकी पड़ताल करती हैं.

एम ने मुझे बताया कि बहुत सारी रातें ऐसी भी होती हैं जब अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट की मुंडेर पर प्रेमी जोड़ों का तांता सा लगा रहता है. वह पानी के किनारों पर हल्की रौशनी में परछाईयों सी दिखते हैं. चांद की रौशनी में नदी मद्धम-मद्धम चमकती है: अपने सिरों को एकदम नीचे झुकाए यह जोड़े एक-दूसरे में मशगूल रहते. पुलिस की टुकडियां नदी के किनारे-किनारे चुपचाप गश्त लगाती चलती हैं, पर वे कभी इन्हें टोकते नहीं. एम का कहना है, “यह एक तरह का अनकहा समझौता है.” वह कहती है, “वे आपको साथ बैठने की इज़ाज़त देते हैं, लेकिन उसकी अपनी कुछ हदें हैं. वे आपको देख सकते हैं, पर आपको टोकते नहीं…”

ये इज़ाज़तें बहुत नाजुक होती हैं: आज बर्दाश्त हैं, पर कल शायद न हो. रिवरफ्रंट जितना सार्वजनिक है उतना ही निजी. यहां अंधेरा अद्भूत तरीके से काम करता है — यह प्यार को पनाह देता है लेकिन इस खतरे के साथ कि किसी भी पल उसका पर्दाफाश कर सकता है.

जून 2018 में एक समलैंगिक प्रेमी जोड़े आशा और भावना ठाकुर ने साबरमती में कूद कर अपनी जान दे दी. दोनों की नौकरी चली गई थी और वे परिवार और दोस्तों की उपेक्षा की वजह से अकेलापन महसूस कर रही थीं. कूदने से पहले उन्होंने खुद को एक रस्सी से आपस में बांध लिया और फिर उसी नदी में छलांग लगा दी जो लंबे समय से प्रेमी जोड़ों को अंधेरे की सुरक्षित ओट देती आई है. मरने से पहले उन्होंने एक पत्र छोड़ा था जिसमें लिखा था, “हम इस दुनिया को छोड़कर जा रहे हैं ताकि हम एक-दूसरे के साथ रह सकें. दुनिया ने हमें साथ रहने की मंजूरी नहीं दी.”

यह घटना असहज करते हुए एक बार फिर इसी बात की तरफ इशारा करती है कि अंधेरे के साथ आने वाली निजता और इज़ाज़त बा सुरक्षा और मंजूरी के होती है. एक ऐसा शहर, जहां सार्वजनिक जगहों में क्वीयर लोगों के बीच प्यार सिर्फ अंधेरे में गुम होने पर ही सांस ले पाता है, वहां आशा और भावना की मृत्यु इस इजाज़त की हदों को उजागर. अंधेरा साथ दे सकता है, लेकिन ये अपनेपन की गारंटी नहीं देता.

यह सिर्फ रौशनी की गैर-हाज़िरी की बात नहीं है, बल्कि यह शहरी होने की सामाजिक स्थिति है जो तय करता है कि किसकी निजता के लिए यहां जगह है और किसकी निजता के लिए नहीं. अंधेरे की ओट में चाहतें पनाह तो पाती हैं लेकिन ऐसा करने पर सज़ा का खतरा भी बना रहता है—कभी-कभी ये भयानक भी हो सकता है.

अंधेरा इजाज़त की तरह

फिल्म निर्माता शॉनक सेन की डॉक्यूमेंट्री फिल्म सिटीज़ ऑफ स्लीप (2015) में, अपने भीतर पनाह और घुटन दोनों को समेटे हुए, अंधेरा दिल्ली के ऊपर पर्दे की तरह धीरे-धीरे चढ़ता जाता है. सेन, शकील और रंजीत, के साथ उन इलाकों की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं जिसे वह शहर के भीतर ‘नींद की अर्थव्यवस्था’ कहते हैं. जैसे-जैसे रात गहराती जाती है शहर के खाली फुटपाथ, अंडरपास और निर्माणाधीन इमारतें यहां के कामकाजी मजदूरों के लिए सोने की अस्थाई जगहों में तब्दील हो जाते हैं. शहर में रात के इन पनाहगारों में सोने की एक जगह हासिल करने के लिए 20 से 40 रुपये देने पड़ते हैं. और अगर आपने पैसे नहीं दिए या किसी वजह से पुलिस से मुठभेड हो गई तो इसका मतलब है आंखों में ही रात काटनी पड़ेगी.

रंजीत ने लोहा पुल पर अपने लिए एक कामचलाऊ — सोने और सिनेमा — की जगह बनाई है. लोहा पुल यमुना नदी के पास बना लोहे का एक पुराना पुल है जो अब इस्तेमाल में नहीं लिया जाता. रंजीत का कहना है, “सोने का मतलब स्थिरता नहीं है. ये दुनिया के बनाए खांचों — जैसे अंदर और बाहर, रोशनी और अंधेरा, होने और न होने — ये इन सबसे बहुत परे है.” पुल के ऊपर शहर जहां की टिमटिमाती पीली सफेद रौशनी चमक रही होती है, वहीं, पुल के नीचे वैधता और निकाल दिए जाने के बीच अंधेरे में, कई सौ लौग आराम कर रहे होते हैं.

शकील की ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही पैनी रेखाओं पर चलती है. दिन में वो खाने के लिए भटकता है और रात में सोने के लिए. वो फुटपाथों, पनाहगाहों, पुलिस के निर्देशों और कुछ अनजाने राहगीरों की उदारता के बीच अपना रास्ता बनाता चलता है. ठीक ऐसे ही एक पल से दूसरे पल में शहर कभी इजाज़त देता तो कभी उसे छीन लेता है. एक पल में अगर इजाज़त देता है तो अगले पल में वही इजाज़त छीन भी लेता है.

फिल्म सिटीज़ ऑफ स्लीप अंधेरे को ऐसे मौजूद रूप में देखने का रास्ता खोलती है जो यह तय करता है कि जब शहर सो रहा होता है तो कौन आराम कर सकता है, कौन नहीं. किसे प्यार करने, सपने देखने का अधिकार है किसे नहीं. एक ऐसा देश जहां दिखाई देने का मतलब अक्सर कमज़ोरी होता है, वहां रातें पनाहगाह और सरहद दोनों बन जाती हैं — अस्थायी इजाज़तों, चुप्पियों में होते मोलभाव और अनदेखी नज़दीकियों का एक नज़ारा.

बेलिबास जिंदगी, दृस्य और अदृश्य

इतालवी दार्शनिक जॉर्जियो अगाम्बेन ने अपनी पुस्तक होमो सैसर: सॉवरेन पावर एंड बेयर लाइफ (1995) में ‘बेयर लाइफ (साधारण जीवन/ बेलिबास जिंदगी)’ की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए उन लोगों के बारे में विस्तार से बताया है जो एक राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा तो होते हैं लेकिन उसकी सुरक्षा से वंचित होते हैं.

इस अवधारण का इस्तेमाल समकालीन विद्वानों ने विस्थापन, पुलिस व्यवस्था और प्रवासन या माइग्रेशन को समझाने के लिए किया है: मानवविज्ञानी मिशेल एजिएर इसका इस्तेमाल शरणार्थी शिविरों के संदर्भ में करते हैं, जहां लोगों को जिंदा तो रखा जाता है, लेकिन उन्हें राजनीतिक पहचान नहीं दी जाती. शहरी सिद्धांतकार निकोलस डी जेनोवा उन मज़दूरों के बारे में बात करते हैं जिनके पास कागज़ नहीं होता और जिनकी ज़िंदगियां निर्वासन वाले इलाकों में अलग-अलग तरीके से खुलती है. वे शहर में काम तो करते हैं लेकिन वहां सुरक्षा का दावा नहीं कर सकते.

दिल्ली और लॉस एंजेलिस जैसे शहरों में बेघर लोगों पर किए गए शोध में शहरीकरण की एक जैसी छवि ही दिखाई देती है. जिनके सिर पर कोई छत नहीं है उन्हें फ्लाईओवर या फुटपाथों पर तब तक सोने की इजाज़त है जब तक राज्य की सत्ता चाहती है. नहीं तो वो अनुमति उनसे छीन ली जाती है. इन सारे संदर्भों में ‘साधारण ज़िंदगी’ उन चौहद्दियों के अनुभव को नाम देती है जो मौजूद तो होती है पर पर कभी सुरक्षा नहीं देती.

कुछ इसी तरह की अनिश्चितता उन लोगों की ज़िंदगियों को भी गढ़ने का काम करती है जो भारत के अलग-अलग शहरों में अंधेरे पर निर्भर हैं. सिटीज़ ऑफ स्लीप में जो लोग लोहा पुल के नीचे सो रहे होते हैं; रात के अंधेरे में शोच के लिए बाहर जाने के इंतज़ार में बिहार के गांवों की महिलाएं और प्यार करने वाले क्वीयर जोड़े जिन्हें साबरमती रिवरफ्रंट के पास ही अपनी निजता प्राप्त होती है: सभी इसी सीमारेखा पर जीते हैं.

यहां अंधेरा एक अनोखा या असाधारण औज़ार बन जाता है जो न सिर्फ़ निजता देता है बल्कि सुरक्षा की औपचारिक व्यवस्थाओं की गैरमौजूदगी में ज़िंदा रहने की शर्तों को आसान बनाता है.

प्रेमी और रौशनी

2016 में एक फिल्म आई थी अलीगढ़. फिल्म प्रोफेसर रामचंद्र सिरस की ज़िंदगी पर आधारित एक सच्ची कहानी पर बनी है. और जहां रौशनी एक हिंसक घुसपैठिये की तरह दाखिल होती है. सिरस, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मराठी के प्रोफेसर थे. एक रात चोरी-छुपे कुछ पत्रकारों द्वारा एक स्टिंग ऑपरेशन में उनके घर में एक वीडियो वीडियो फिल्माया जाता है और इस तरह एक रिक्शाचालक के साथ उनके रिश्ते को सार्वजनिक कर दिया जाता है. इस फिल्म में प्रोफेसर के कमरे में अचानक से घुसने वाली तेज़ रौशनी की अधिकता दरअसल उल्लंघन का प्रतीक है.

कमरे का अंधेरा उनके लिए निजता की अकेली जगह थी — एक नाज़ुक सी जगह जहां उनकी इच्छाएं बिना किसी जांच-पड़ताल के मौजूद रह सकती थीं. रौशनी आती है लेकिन वो उजाला नहीं लाती, बल्कि अदृश्य रहने के अधिकारों का हनन करती है; वो निजता को एक सबूत में बदल देती है.

इस लेख के लिए दिए अपने इंटरव्यूह में मुम्बई के धारावी में रहने वाले दलित कवि श्रीपाद सिन्नाकर पूछते हैं, “अगर आप प्रेमी जोड़ों से अंधेरा छीन लेंगे तो वे कहां जाएंगे? शहर के कोने-कोने में प्रेमी जोड़े शौचालयों, अंडरपास और उन जगहों पर भटकते हैं जहां रौशनी नहीं पहुंचती: ये कोई आम जगहें नहीं हैं.

धीरेन बोरीसा, शहरी अध्ययन के शोधकर्ता हैं. वे बताते हैं कि कैसे दिल्ली में कामकाजी क्वीयर और ट्रांस लोग अस्थायी और ऐसी जगहों पर निर्भर होते हैं जो सार्वजनिक होते हुए भी उतनी सार्वजनिक नहीं होती हैं — जैसे लंबी खाली सड़कें, सब-वे, कम इस्तेमाल में आने वाले प्रतिक्षालय और पार्क का वो हिस्सा जहां रौशनी थोड़ी कम होती है — क्योंकि निजी कमरे या तो उनके लिए उपलब्ध नहीं होते या वे महंगे होते हैं. धीरेन के शब्दों में कहें तो ये जगहें “जीवित रहने की भौगोलिकताएं…क्षणिक, काल्पनिक और नुमाइशी होती है” — जो अदृश्यता और खतरे की स्थितियों में मौजूद रहती हैं.

शहरी मिटान

शहर की योजना बनाने वाले और शहरीकरण से जुड़े लोग अंधेरे को ज़्यादा से ज़्यादा खतरे के रूप में पेश करते हैं. भारत की सुरक्षित शहर परियोजना के तहत नगर प्रशासन के अधिकारियों ने ऐसे “अंधेरे कोनों” की तलाश की है जहां सड़कों पर एलईडी खंभे, बड़े-बड़े फ्लडलाइट्स और सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे.

उत्तर-प्रदेश में 4,150 ऐसे अंधेरे कोनें चिन्हित किए गए और इस योजना के तहत वहां हज़ारों की संख्या में कैमरे लगाए गए. नई दिल्ली में भी नगर निगम एजेंसियां ने ऐसे करीब 1000 जगहों को रौशनी से पाट देने की घोषणा की है और इससे होने वाले बदलाव की जांच के लिए तकनीक और फंड दोनों जारी किए हैं.

शहर में जब चलने के ऐसे अनौपचारिक कोनों को फ्लडलाइट्स लगाकर बदल दिया जाता है, या अंडरपास और पतली गलियों को वापस से डिज़ाइन किया जाता है, ताकि वहां ज़्यादा से ज़्यादा रौशनी हो सके, तो इसका एक नतीजा दुबारा से ये तय करना भी होता है कि कौन यहां रूक सकता है, इसे छू सकता है या अदृश्य रह सकता है. हम रौशनी से भरपूर सड़क को सुरक्षित और अच्छी सड़क मानते हैं. और कम रौशनी वाला वह कोना जो अबतक युवा प्रेमियों का अड्डा हुआ करता था, अब वहां से बाहर कर दिए जाने का कारण बन जाता है: तेज रौशनी निगरानी को दावत है, और जो थोड़ी बहुत छाया बचती है, उसे पुलिस, रेज़िडेंट ग्रुप या सिक्योरिटी गार्ड शक की नज़र से देखते हैं.

जो जगहें पहले शांत और निजता देने वाली जगहों के रूप में देखी जाती थीं, वही अब परेशानी के रूप में देखी जाती हैं, जिसे काबू में रखना ज़रूरी हो जाता है. सुरक्षा और सौंदर्यीकरण की भाषा के पीछे एक गहरा नैतिक एजेंडा छुपा होता है: यह तय करना कि सार्वजनिक जगहें किन लोगों की जगह है, और किन शर्तों पर.

धारावी के दलित कवि श्रीपाद सिन्नाकर मुम्बई के स्लम के बारे में बताते हैं कि यहां रौशनी हैसियत का पैमाना है. वह कहते हैं, “अंधेरे को गंदा और अनैतिक माना जाता है.” वह गोवंडी जैसे पुनर्वास इलाकों की इमारतों की ओर इशारा करते हैं, जहां गलियों में रौशनी न होने को रहने लायक नहीं माना जाता. यह बदलाव धीरे-धीरे होता है, लेकिन यह होता बहुत ताकतवर है: अब रौशनी सिर्फ खतरा नहीं दिखाती, बल्कि वैधता का संकेत भी बन जाती है. उनके शब्दों में, “महज रौशनी की कमी यह तय कर देती है कि लोग वहां रह सकते हैं या नहीं.”

2024 में किए गए एक सर्वे के अनुसार भारत में 1,50,000 लोग सड़कों पर अपनी रात गुज़ारते हैं. इनके लिए बनाए गए आश्रयगृह ज़रूरत का महज 10 फीसदी ही पूरा कर पाते हैं. जिंदा रहने के लिए बहुत सारे लोग शहर की धुंधली रौशनी पर आश्रित हैं : न पूरी तरह दिखाई देते हुए, न पूरी तरह छुपे हुए. रात उन लोगों को इक्ट्ठा करती है, जिन पर शहर अपना कोई दावा नहीं दिखाता — यह उन ज़िंदगियों का एक छाया-अभिलेख है, जो शहर से जुड़ने के वादे से बाहर जीते हैं.

पुनर्विकास, नई तरह से साज-सज्जा, नए रूप में सार्वजनिक जगहों को तैयार करना और सभी तरफ लाइटों के ज़रिए स्थानों को रौशन करना, इन सबने बिना रौशनी वाले किनारों को और छोटा कर दिया है. इस तरह अंधेरे का वो असाधारण सहारा टूट गया है. जैसे-जैसे ये खत्म होते जाते हैं, इसके साथ ही बिना अनुमति साथ होने और अचानक जुड़ पाने की संभावनाएं भी समाप्त होती जाती हैं.

रौशनी और निगरानी से चाहत के भूगोल को फिर से गढ़ा जाता है : जो कोने कभी ज़रूरत भर नज़दीकियों की पनाहगार थे, अब नियंत्रित, साफ़-सुथरी और पुलिस की निगरानी में हैं.

मरीन ड्राइव को अक्सर रोमांटिक और सार्वजनिक प्रेम के लिए सुरक्षित जगह कहा जाता है. लेकिन श्रीपाद इसकी सीमाओं की ओर ध्यान दिलाते हैं, “हर कोई वहां नहीं जाता,” वे कहते हैं. “बाकी लोगों का क्या? वे लोग कहां जाएं?”

जो प्रेमी जोड़े मरीन ड्राइव की स्ट्रीटलाइट्स के नीचे बैठते हैं वे कई मायनों में बहुत अलग होते हैं क्योंकि वे रौशनी में दिखाई देने का जोखिम उठा सकते हैं. वहीं कामकाजी वर्ग, क्वीयर और जिनके पास अपना कमरा नहीं होता, उनके लिए अंधेरा अकेला ऐसा शहरी ढांचा है, जो उन्हें कुछ पल साथ रहने देता है.

प्यार करने वाले खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेते हैं. “लोग अपने कोने ढूंढ लेते हैं.” श्रीपाद कहते हैं, “सब-वे, सार्वजनिक शौचालय, बसों के पीछे—बात करने के लिए, बहस करने के लिए, साथ होने के लिए.”

अंधेरा, जब रोशनी से मिटाया जा रहा है, और भी अस्थिर और भी ज़रूरी हो जाता है. भीड़ की गुमनामी या हल्की-सी अंधेरी गली वह संभव बनाती है, जो तंग घर नहीं कर पाते. जैसा कि श्रीपाद कहते हैं : कामकाजी वर्ग के कई परिवारों में युवा एक ही कमरे में माता-पिता और भाई-बहनों के साथ बड़े होते हैं, जहां “निजता एक विलासिता” होती है. इसलिए रिश्ते परछाइयों में गढ़े जाते हैं—धीमी फुसफुसाहटों में, क्षणिक स्पर्शों में, या उन खामोशियों में, जिनकी अपनी भाषा होती है.

खतरा और अंधेरे का जेंडर

औरतों के पास अंधेरे का अपना गणित होता है जो डर और आज़ादी के बीच घूमता है. 2014 में गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण बिहार में औरतें अक्सर हल्का होने के लिए शाम का इंतजार करती हैं और उससे पहले तक बाथरूम जाने की ज़रूरत को रोक कर रखती हैं, क्योंकि सामाजिक नियम उन्हें दिन की रौशनी में ऐसा करने से रोकते हैं. इस तरह उनकी निजता बची रहती है लेकिन अंधेरे में सांप के काटने और यौन हिंसा का खतरा भी बना रहता है.

ये खतरनाक रात लगातार लोगों की नज़रों में रहने वाली ज़िंदगी में निजता के कुछ पल देती है. इन महिलाओं के लिए, अंधेरा एक ज़रूरत है जो पसंद का रूप ले लेता है.

एक दूसरी तरह की रात

धरातल पर ही सारे अंधेरे नहीं होते. हजार किलोमीटर दूर चिली देश के अटाकामा रेगिस्तान में पृथ्वी की सबसे अंधेरी रात होती है, जब आसमान पूरी तरह काला होता है. यहां, यूरोपियन सदर्न ऑब्ज़र्वेटरी का वेरी लार्ज टेलिस्कोप (VLT) दूर की गैलेक्सी, एक्सोप्लैनेट और हल्की खगोलीय घटनाओं का अध्ययन करता है. लेकिन INNA नाम का एक प्रस्तावित ग्रीन-हाइड्रोजन प्रोजेक्ट रेगिस्तान को इंडस्ट्रियल रौशनी से भरने की धमकी दे रहा है. खगोलविदों ने चेतावनी दी है कि रात के आसमान की चमक 35 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जिससे लंबे समय तक अवलोकन करना मुश्किल हो जाएगा.

“अंधेरा बहुत ही नाजुक होता है.” ये कहना है न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक खलोगशात्री एडुआर्डो उन्दा-संज़ाना का. उनके लिए अंधेरा ब्रह्मांड के दूसरे कोने को साफ-साफ देख पाने की एक ज़रूरी शर्त है.

अटाकामेनो आदिवासी समुदायों के लिए, अंधेरा खुद खगोल विज्ञान का एक हिस्सा है. रात के आसमान को न सिर्फ उसके तारों से, बल्कि मिल्की-वे में परछाइयों से बनने वाले अंधेरे तारामंडलों की मार्फत भी पढ़ा जाता है, जो खेती के चक्रों को दिशानिर्देश देते हैं, रस्मों के समय को बताते हैं और पूर्वजों की कहानियों को सहेजते हैं.

जब कृत्रिम रौशनी रात को खत्म कर देती है तो ज्ञान की ये प्रणालियां अपना दायरा खो देती हैं. चिली में इएसओ की ऑब्ज़र्वेटरी की डायरेक्टर इट्ज़ियार डी ग्रेगोरियो कहती हैं, “ब्रह्मांड को देखते रहने के लिए, हमें वायुमंडलीय स्थिरता और अंधेरे की ज़रूरत है – इसके बिना, हम अपनी समझ को आगे नहीं बढ़ा पाएंगे.”

जब आर्टिफिशियल रौशनी रात को खत्म कर देती है तो ज्ञान की ये प्रणालियां अपना दायरा खो देती हैं. चिली में इएसओ की ऑब्ज़र्वेटरी की डायरेक्टर इट्ज़ियार डी ग्रेगोरियो कहती हैं, “ब्रह्मांड को देखते रहने के लिए, हमें वायुमंडलीय स्थिरता और अंधेरे की ज़रूरत है — इसके बिना हम अपनी समझ को आगे नहीं बढ़ा पाएंगे.”

चिली में रात के आसमान को बचाने की लड़ाई भारत के शहरों में एकांत के लिए संघर्ष जैसी ही है. दोनों में — चिली में रात के आसमान को बचाने का अधिकार और दिल्ली में बिना चकाचौंध के रहने, महसूस करने या प्यार करने का अधिकार — अंधेरे का अधिकार, वास्तव में अस्तित्व की लड़ाई बन जाता है.

अंधेरे के साथ एक निजी रिश्ता

कराजी में एक योगा निर्देशक के रूप में काम करने वाले असद के लिए अंधेरा न कोई रूपक है और न ही खतरा, बल्कि एक साथी है. उनका कमरा, जो पीढ़ियों से चलते हुए उनके पास तक आया है, पारिवारिक शोर-शराबे और सामाज कि निगाहों से बचने की एक शरणस्थली बन चुका है. ईमेल के ज़रिए हुई बातचीत में वे लिखते हैं, “मैं अंधेरे से पहली बार तब मिला जब कुछ खास तरह के शरीरों पर इसे ज़बरदस्ती थोप दिया गया था. अब मैं उसके पास फिर लौटता हूं क्योंकि मुझे उसकी ज़रूरत है. उसे देखने-दिखाने के कारोबार से कोई लेना-देना नहीं है.”

असद का लेखन रूमी की द गेस्ट हाउस और ओशन वुओंग की समडे आई’ल लव की याद दिलाता है, जहां अंधेरे को मानवीय रूप दिया गया है. अकेले होने से अच्छा है वफादार होना, जो किसी दिखावे की मांग नहीं करता. उनके लिए अंधेरा उस बचपन का साक्षी रहा है जो अकेलेपन और भिन्नता से चिह्नित था. वह बताते हैं कि क्वीयर और न्यूरो-डाइवर्जेंट के रूप में बड़े होते हुए, अक्सर गलत समझे जाने के बीच, उन्हें रात में वह स्थिरता मिली जो न घर दे सका, न दिन का उजाला. उन्हीं अदृश्य, खामोश घंटों में उन्होंने ऐसे आत्म-रूप की कल्पना शुरू की जो बिना सफ़ाई या बचाव के भी अस्तित्व में रह सके. “अंधेरा ही है जो ठहरता है.” असद कहते हैं — एक ऐसी जगह जो छुपाती नहीं, बल्कि थाम लेती है.

अंधेरे के प्रति यह कोमलता खतरे को मिटाती नहीं, बल्कि उसे निकटता का हिस्सा मानकर स्वीकार करती है—अपने साथ होने का जोखिम, और दूसरों के साथ होने का भी.

चाहते और उसके मिटते हुए ठिकाने

2021 में दिल्ली के एक मसाज पार्लर पर पुलिस का छापा पड़ा और इसने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि अंधेरा कैसे एक संरक्षित जगह से तमाशे में बदल जाता है. इस बार एक यूट्यूबर, पुलिस के साथ, एक धुंधली रौशनी वाले स्पा में घुस गया, जहां समलैंगिक पुरुष गुप्त रूप से मिलते थे. नंगे बदन कपड़े ढूंढते, भागते लोग कैमरे में कैद हो गए; और यह फुटेज “सेक्स!” के शोर के साथ ऑनलाइन डाल दी गई. एक निजी जगह का सार्वजनिक तमाशा बन गया. 


यह क्षण निबंध के सभी तनावों को ध्वस्त कर देता है: अनुमति के रूप में अंधकार, खतरे के रूप में अंधकार, दृश्यता और हिंसा के रूप में प्रकाश.

चाहतों का भुरभुरापन

अंधेरे के भीतर मौजूद होना जियोर्जियो अगम्बेन के शब्दों में रेखा के एकदम किनारे खड़े रहने जैसा है, जहां किसी की मनुष्यता, पहचान और मिटा दिए जाने के बीच झुलती रहती है. अंधेरे में चाहतें पनाह लेती हैं, इसलिए नहीं कि ये सुरक्षित है, बल्कि इसलिए कि अकेला यही है जिस पर किसी की सत्ता काबिज नहीं हो सकी है.

अगर आप इस अंधेरे को छीन लेंगे तो प्यार करने वाले कहां जाएंगे?

साबरमती रिवरफ्रंट पर एम के लिए इसका जवाब अनिश्चित है. वे कहते हैं, “लोग नई जगहें तलाश ही लेंगे. जैसा वो हमेशा ढूंढ लेते हैं. पर वैसा महसूस नहीं करेंगे जैसा वे अंधेरे में करते थे. अंधेरा आपको उतना ही छुपाता है जितने की ज़रूरत होती है — वो आपको अकेला नहीं करता.”

अंधेरा, आज़ादी नहीं है; यह वो बहुफलक है जिससे आज़ादी निकलती है. यह एक थमी हुई जगह है, निगरानी और सुरक्षा के बीच. क्या देखा जाएगा और क्या बाहर कर दिया जाएगा के बीच. जियोर्जियो अगम्बेन के शब्दों में यह ज़िंदगी की नंगी सच्चाईयों का इलाका है — जहां लोग दिखाई तो देते हैं लेकिन सुरक्षित नहीं होते, निगाह के दायरे में होते हुए भी पहचान से बाहर होते हैं.

भारतयीय शहरों में जो लोग अंधेरे में इकट्ठा होते हैं — जो दस्तावेज़ों से बाहर हैं, गरीब, क्वीयर, थके हुए और सपने देखते हुए — वही इस रेखा के किनारे पर खड़े रहते हैं. उनकी मौजूदगी शहरी व्यवस्था को बेचैन करती रहती है, जो दृश्यता को वैधता के बराबर मानती है. अंधेरे में ये न सिर्फ प्रेम, बल्कि इंसान बने रहने के अधिकार के साथ भी मोलभाव करते हैं.

और शायद यही इसका मतलब भी है. अपनी तमाम अस्थिरताओं और खतरों के बावजूद अंधेरा उन लोगों को लगातार आश्रय देता है जिन्होंने अब तक एक-दूसरे के साथ खड़ा होना नहीं छोड़ा है. ये वह लोग हैं जो अब भी विश्वास रखते हैं कि प्यार, आराम और आश्चर्य: शायद इन्हें धड़कते रहने के लिए अंधेरे की ज़रूरत है.

  • लेखक और संपादक सांची डिसूजा, पहचान, संस्कृति, राजनीति जैसे विषयों पर लेखन कार्य करती हैं. उनके लिखे निबंध, रिपोर्ताज, कथा-साहित्य एवं स्क्रिप्ट प्रकाशित हो चुके हैं.

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