नो रिग्रेट्स

उस किताब में क्या था, जिसने न सिर्फ़ क्लासरूम में, बल्कि पूरे मोहल्ले में तहलका मचा दिया?

किताब_सामाजिक नियंत्रण
चित्रांकन: पारुल सिन्हा

सफ़दर हाशमी से माफ़ी के साथ कि किताबें डराती हैं, किताबें क्रान्ति के लिए उकसाती हैं, अक्सर कोर्स की किताबों में छुपाकर पढ़ी जाने वाली किताबें ज़िंदगी का असल मायने बताती हैं. सीमा दहिया की यह कहानी बंद खिड़की से झांकती रौशनी का वह टुकड़ा है जो अपनी जानदार भाषा के साथ यही दोहराता है कि ख्वाहिशें अपना रास्ता ढूंढ लेती हैं.

द थर्ड आई के वर्तमान संस्करण में हम यौनिकता में ‘मज़ा और खतरा’ की छानबीन कर रहे हैं. उन जगहों की तलाश कर रहे हैं, जहां विमर्श और व्यवहार एक जगह आकर मिलते हैं. ये कहानियां, ज़िंदगी में हमारी इच्छाओं की जो बेतरतीबी है, उसके बहुत करीब हैं. यह बेतरतीबी ही उस मिथक को तोड़ने का काम करता है, जिसकी वजह से हम यह मानते हैं कि हम सिर्फ़ तर्क से संचालित होते हैं और यही कारण है कि इस बेतरतीबी को समझना एक राजनैतिक काम भी है. 

तब मैं सातवीं में थी, और पूजा ग्यारहवीं में. पूजा राणा हमारे लिए हीरोइन थी. हम किरायेदारों के मोहल्ले की पटाखा और मेरी उम्र की सभी लड़कियों के लिए रोल मॉडल. उसका हमारे लिए रोल मॉडल होना, हमारी मांओं के लिए एक भयावह सपना था.

पूजा मॉडल जैसी दिखती भी थी. हंसती भी अंग्रेज़ी में थी. बाल हों या कपड़े, स्टाइल में कभी कमी नहीं होती थी. हमारी स्कूल स्कर्ट जहां घुटनों से भी दो बिलांद नीचे होती, उसकी हमेशा ऐन घुटने पर आकर रुक जाती. उसकी स्कर्ट को देखकर लगता था, अभी न तभी, ऊपर तो जाएगी ही. पड़ोस की सारी महिलाएं ताक लगाए बैठी थीं, कब घुटनों के ऊपर जाएं और वह उसकी मां का जीना हराम कर दें. पर वो लम्बाई एकदम सटीक और बरकरार रही, उस दिन तक…

दो बूढ़ी बहनें, उम्र यही कोई सत्तर के आसपास, गायत्री और सावित्री, वसीयत में मिले दो आमने-सामने स्थित बंगलों की मालकिन थीं. गायत्री ने कभी शादी नहीं की, और सावित्री के बच्चे अलग-अलग शहरों में रह रहे थे. ऐसे में दोनों ने अपने-अपने बंगले के सभी हिस्सों को दो मंज़िला बनाकर किराये पर चढ़ा दिया था. इन बंगलों के बंटवारे में कुछ तो लहू ज़रूर बहा था, क्योंकि वो सत्तर की उम्र में भी एक-दूसरे से बात नहीं करती थीं. कभी गलती से शाम की सैर के लिए साथ निकल जाएं तो अलग-अलग दिशा में घूम जाती थीं. इस परंपरा को किरायेदारों पर भी थोपा गया था.

तो इस तरह बसा यह यह किरायेदारों का मोहल्ला, आधा बॉर्डर के इस पार और आधा उस पार.

मैं और मेरा परिवार, सावित्री के बंगले में निचली मंज़िल पर रहते थे. पूजा अपने परिवार के साथ, गायत्री के बंगले की ऊपरी मंज़िल पर रहती थी. हमारे बगीचे से उसकी छत की मुंडेर दिखाई देती थी. मैं कभी-कभी शाम को उसे छत पर टहलते हुए देखती. कई बार उसे ऐसे ही टहलते हुए, खुद से बातें करते और ज़ोर-ज़ोर से हंसते भी देखा था. कभी मुझे पलट कर देख लेती तो चिल्ला कर हाल-चाल ज़रूर पूछती थी. यह आकस्मिक बातचीत मुझे बड़ा खास महसूस कराती थी.

एक दिन स्कूल से लौटते समय, मैं अपने गेट की तरफ बढ़ ही रही थी कि उसी छत से पूजा के ठहाकों की जगह, ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आने लगी. साफ़-साफ़ सुनाई दे रहा था कि पूजा की मां उस पर बहुत गुस्सा कर रही हैं, लेकिन शब्द समझ में नहीं आ रहे थे. फिर थप्पड़ों की आवाज़ भी आई. मैं ये सोच कर डर गई कि कहीं आज स्कर्ट घुटनों के ऊपर न चली गई हो! मन ही मन मैं उसके लिए प्रार्थना करने लगी. एक रामबाण मंत्र, जो हम फ़ौरन याद करने लग जाते हैं- गायत्री मंत्र. यह हमें बचपन में ही सिखा दिया जाता है. ‘धियो यो नः’. मैं अपने दरवाज़े पर खड़ी, उसकी छत की तरफ़ देख रही थी. मैंने देखा कि पूजा किरायेदार मोहल्ले की छतों की मुंडेर टापते हुए भागी जा रही थी. मैं यह सोचकर खुश हो गई कि आज मेरे ही मंत्र ने उसे पिटने से बचा लिया.

इतना कोलाहल सुनकर मेरी मां भी बाहर आ गईं और मुझे अंदर भेज दिया. छोटे शहरों की एक अच्छी बात ये है कि सब एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं, भावना चाहे मदद की हो या अफ़वाह फैलाने की. मां बॉर्डर पार कर, फटाफट उनके घर गईं और पूजा की रोती हुई मां को संभाला. मैं घर पर ही बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी कि कब मां वापस आए और मैं उनसे पूछूं कि क्या हुआ था.

मां वापस आईं, मैंने उनसे पूछा भी, लेकिन जवाब में मुझे पढ़ाई करने को कह दिया गया. उनके चेहरे को गुस्से से लाल होता देख, मैंने भी सामाजिक अध्ययन की किताब उठा ली. शाम की चाय बनाते समय भी मां बड़बड़ा रही थीं. मैंने झांक कर देखा तो पाया कि वह अपने प्याले में एक एक्स्ट्रा चम्मच चीनी डाल रही हैं. मेरे दोबारा पूछने पर भी मां ने कुछ नहीं बताया, बल्कि उल्टे थप्पड़, शुक्र है, चाय की प्याली से उठा और दुपट्टे में ही उलझ कर रह गया. मैं भी वहां से निकल भागी, यह सोचकर कि कहीं दूसरे के चक्कर में खुद ही न पिट जाऊं. हालांकि उन्होंने मुझे कभी नहीं पीटा था, पर उस पहले थप्पड़ का डर मेरी अंतरात्मा में बस सा गया.

एक कारण यह भी था मेरे अहंकार का- ‘मेरी मां ने मुझे आज तक नहीं पीटा.’

कुछ देर बाद, अपने आप ही वह मेरे कमरे में आईं और बहुत ही प्यार से स्कूल के बारे में पूछने लगीं. टीचर्स कैसे हैं? परीक्षा कब है? दोस्त कैसे हैं? दोस्त लड़का है या लड़की? मुझे लगा, कहीं पूजा का कोई प्रेम संबंध तो नहीं पकड़ा गया! मैंने बड़े घमंड से बताया कि मैं लड़कों से ज़्यादा बात ही नहीं करती. मां थोड़ी और विनम्र हो उठीं. फिर पूछने लगीं कि स्कूल की लाइब्रेरी कैसी है, और मैंने कोई किताब पढ़ी है या नहीं? अब तक मुझे अपने संस्कारों पर अभिमान होने लगा था, और मन-ही-मन मैं एक आदर्श बेटी बन चुकी थी. मैंने बड़े ही अहंकार से बताया कि ‘एनिड ब्लाइटन’ की चार किताबें एक महीने में पढ़ चुकी हूँ. मां बहुत पढ़ी-लिखी थीं, लेकिन उन्होंने एनिड ब्लाइटन को नहीं पढ़ा था. एकाएक मां के चेहरे का रंग बदलने लगा और मेरे अहंकार ने वहीं मेरा साथ छोड़ दिया.

उन्होंने बड़ी गंभीरता से समझाते हुए कहा, ‘बेटा, नॉवेल पढ़ना बुरी बात है. काल्पनिक कहानियां चरित्र को बिगाड़ देती हैं.’

चूंकि आज बाहर का वातावरण काफी गर्म था, अतः मेरे लिए अपनी आदर्श छवि को बरकरार रखना ज़रूरी था. मैंने हामी भरी और उन्हें राहत मिली.

नॉवेल पढ़ना बुरी बात क्यों है, इसका जवाब मां के पास नहीं था और बताने में भी उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. बात वहीं खत्म हो गई. उस दिन खाने में मुझे शाही पनीर मिला था.

अगले दिन स्कूल में लंच टाइम के समय, सातवीं के अलग-अलग सेक्शनों में पढ़ने वाली पड़ोस की सभी हमउम्र लड़कियां एक जगह पर वैसे ही इकट्ठा हुईं, जैसे अंग्रेज़ीराज में क्रन्तिकारी मिला करते थे. उन सबको भी ‘नॉवेल’, विशेष रूप से ‘अंग्रेजी नॉवेल’ के विरुद्ध चेतावनी मिल चुकी थी. जांच-पड़ताल करने पर पता चला कि पूजा, असल में एक अंग्रेजी नॉवेल के साथ पकड़ी गई थी. इसके बारे में किसी ने हमें बताया तो नहीं था, लेकिन हमारे गुट की एक लड़की ने अपनी मां को किसी और की मां से बात करते सुन लिया था.

हुआ ये था कि जब ‘मिल्स एंड बून’ के एक नॉवेल के एक बड़े ही पेचीदा क्षण में गुम बेटी को मां ने मुस्कुराते हुए देखा, तो यह जानने के लिए कि उनकी बेटी क्या पढ़ रही है, उन्होंने उसकी किताब में झांक लिया था. एक क्षण में कितनी ताकत होती है, यह उसी दिन पता चला। उस क्षण ने उसके और हमारे संसार में कोलाहल मचा दिया. कोलाहल के लिए बॉर्डर कोई मायने नहीं रखता.

उस क्षण का बस एक ही निष्पक्ष साक्षी है और वह भी मूक. सावित्री दादी के घर के पिछवाड़े के आंगन का बेर का वह पेड़, जिसके सहारे पूजा छत से कूदी थी. उसके कूदते ही कच्चे बेर झड़ गए थे और सूअरों का एक पूरा कुनबा उनके जंगली आंगन में घुस आया था.

हम सातवीं कक्षा की पांच लड़कियों में से किसी को नहीं पता था कि ‘मिल्स एंड बून’ आखिर है क्या? और यही अथक जिज्ञासा हमें निकम्मा बना रही थी. लाइब्रेरी में खूब ढूंढा, पर वहां सिर्फ़ वही एक किताब नहीं थी. लाइब्रेरियन से पूछा तो उसने जिस तरह शर्माते हुए हमें वहां से भगाया, उससे हमारी दिलचस्पी और बढ़ गई. कहीं से भी कुछ पता न लगने पर हमने अपने-आप ही उसका संधि-विच्छेद करना शुरू कर दिया.

डिक्शनरी के हिसाब से ‘मिल’ मतलब ‘चक्की’, और ‘बून ’ मतलब ‘वरदान’. हम सबने यह निष्कर्ष निकाला कि हरियाणा कृषि प्रधान राज्य है. गेंहू खेत से निकल कर चक्की में जाता है, और उससे हमें रोटी मिलती है, जो कि हमारे लिए एक वरदान ही है.

लेकिन इस निष्कर्ष में एक चीज़ फिट नहीं बैठी. पूजा क्यों पिटी? यह एक ऐसी पहेली थी जो हमें खाये जा रही थी. एक ही सुख था कि इस दुविधा की घड़ी में हम सब साथ थे.

पूजा को देहरादून के एक लड़कियों के बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया गया और हमें रोज़ चरित्र पर ज्ञान मिलने लगा. हर रात रोटी खाते हुए मां के ज्ञान और उस रोटी में बसे हमारे निष्कर्ष ने हमें बेचारा बनाकर रख दिया था. यह सिलसिला सातवीं की अंतिम परीक्षा तक चला.

सातवीं से जब हम आठवीं में गए, तो इस ज्ञान के अहंकार का बोझ हमारे शरीर पर दिखाई देने लगा था. लेकिन डर और अहंकार ने साथ मिलकर हमारे मन को अस्थिर कर दिया था। हम कभी किसी से यह पूछ ही नहीं पाए कि आखिर ऐसा क्या था उस किताब में, जिसने हमारे हंसते-खेलते बचपन में संस्कारों की गंगा बहा दी.

छुट्टियों में पूजा जब घर आई तो वह बिल्कुल बदल चुकी थी. कपड़े सादे हो चुके थे, आवाज़ धीमी हो चुकी थी, और बाल तेल में लिथड़े एक चोटी में गुंथे थे. लगती तब भी मॉडल ही थी. आदतन मैं उस दिन बगीचे में गई तो देखा कि वह भी ऊपर टहल रही थी. ऐसा लगा समय वापस पीछे चला गया हो! पर मेरे मन में पहली बार उसके प्रति दया का भाव पैदा हुआ. उस वक्त मैं बस यही चाहती थी कि वह मेरी तरफ न देखे.

पर तभी चलते-चलते उसने मेरी तरफ देखा और रुक कर वही सवाल किए–स्कूल कैसा है? मां कैसी है? नंबर कितने आए? मैंने भी औपचारिकता में पूछे जाने वाले वही सामान्य सवाल उससे भी पूछ लिए, जिनके आधे जवाब मुझे पहले से ही पता थे. उसने बताया कि उसका नया स्कूल देहरादून में है. पहाड़ों में ठंड ज़्यादा होती है और दोस्त कम. और यह भी कि वहां से वह स्पेशल बेकरी बिस्कुट लाई है. लाई होगी, यह भी कोई बताने की बात है!

चूंकि बात करने को कुछ ज़्यादा नहीं था, कुछ क्षण वह मुझे देखती रही और मैं उसे. जब दोनों की मुस्कराहट ढलने लगी तो उसने कहा, ‘आओगी क्या?’

मैंने कहा, ‘देहरादून तो नहीं आ पाऊंगी।’

‘अरे अभी, बिस्कुट खाने?’

‘ओह!’

मां बाजार गई थी. मौका अच्छा था. मैं पलक झपकते ही उसकी छत पर पहुंच गई. इतने सालों में कभी ऊपर आकर मैंने यह छत कभी नहीं देखा था. छत को बहुत अच्छे से सजाया गया था, एक छोटा सा बगीचा था, एक बड़ी सी जाली पर एक बेल चढ़ी थी, जिस पर रंग-बिरंगी तितलियां भी थीं. चिड़ियों के लिए पानी की व्यवस्था थी. इसके लिए मिट्टी का एक गोल बर्तन छज्जे से लटकाया गया था. गमलों में फूलों के पौधे और ज़मीन पर आर्टिफिशियल घास बिछी हुई थी.

वह अंदर से स्पेशल बिस्कुट लेकर आई और मेरे साथ वहीं आर्टिफिशियल घास पर बैठ गई. मैं उसे घूरे जा रही थी,और वह मुझे.

वह एकाएक अंग्रेज़ी में हंसने लगी और मुझसे कहा, “‘कुछ पूछना है?” पूजा बिल्कुल नहीं बदली थी.

***

वैसे तो उन दिनों छुट्टियां चल रही थीं, पर हम सब हमउम्र ताज़ा-ताज़ा सातवीं से आठवीं में गई लड़कियां, घर पर एक्स्ट्रा क्लास का बहाना करके, उस दिन लंच टाइम में स्कूल गईं. एक बार हर तरफ़ चक्कर लगाकर यह भी सुनिश्चित कर लिया कि कहीं कोई हमारी इस क्रांति की टोह तो नहीं ले रहा. मांओं का कुछ भरोसा नहीं!

फिर मैंने अपनी शर्ट के अंदर से एक किताब निकाली, और सारी लड़कियां उस पर ऐसे टूट पड़ीं, जैसे गोलगप्पे वाला आज सात तरह के पानी बना के लाया हो. किताब का शीर्षक थाः ‘नो रिग्रेट्स’!

उस दिन स्कूल के उस पुराने पीपल के नीचे, छुट्टी के दिन, आठवीं कक्षा की पांच क्रांतिकारियों को समझ आया कि चरित्रहीनता कितनी रोमांचक होती है.

  • सीमा दहिया, पेशे से लेखक और फिल्मकार हैं जिन्हें कहानी कहना पसंद है, माध्यम चाहे शब्द हों, चित्र हों, या स्वर. वह मानती हैं कि कहानी अपना नैरेटर और माध्यम खुद चुनती है. सीमा फिलहाल मुंबई में रहती हैं.

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