“आपकी नज़र गंदी है, हमारा खेल नहीं”

कैसे बिहार के एक गांव में फ्रिस्बी का खेल जाति और यौनिकता के 'खेल' को उजागर करता है

खेल
चित्रांकन: चंचल

पहली बार इस घटना की जानकारी मुझे फोन पर मिली. सपना की आवाज़ में एक तेज़ उफनती नदी सा आवेग था, गुस्से और डर की स्पष्ट तीक्ष्णता उसके शब्दों को चीर रही थी. जब तक मैं यह जोड़ पाता कि हुआ क्या है, गांव में सूरज डूब चुका था. उन्होंने मुझे बताया कि फ्रिस्बी, जो ज़मीन पर गिरी पड़ी थी, इस टकराव की चश्मदीद गवाह भी है. उसे वहीं धूल भरे मैदान में छोड़ दिया गया है.

बिहार के कटिहार ज़िले के डंडखोरा ब्लॉक में स्थित पनसेरवा गांव कोई अपरिचित जगह नहीं है. 15 साल से जन जागरण शक्ति संगठन (जेजेएसएस) इस गांव और आसपास के इलाकों में भूमिहीन मज़दूरों और हाशिए पर खड़े किसानों की जीविका, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा के सवाल पर लोगों को संगठित करने का काम करता आया है. मैं खुद पिछले एक दशक से अधिक समय से गांव और इसके आसपास के इलाके में संगठन के काम के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा हूं.

गांव में ओबीसी (कुर्मी) परिवारों के साथ-साथ कुछ मुस्लिम और आदिवासी परिवार भी रहते हैं. पिछले कुछ सालों में जाति और साम्प्रदायिक रेखाएं — जो कि हमेशा से ही मौजूद रही हैं और रोज़मर्रा में अपने ही तरीके से बातचीत और समझौते के साथ संभाली जाती हैं — अब सख्त होती जा रही हैं. कटिहार के ज़्यादातर इलाकों की तरह, ज़िले की ठीक-ठाक बड़ी मुस्लिम आबादी का इस्तेमाल चुपचाप लेकिन लगातार साम्प्रदायिक शक पैदा करने के लिए किया गया है, जिसके कारण पनसेरवा जैसे छोटे गांव जहां हर जाति-सम्प्रदाय के लोग रहते हैं, वे भी अत्याधिक निगरानी वाले माहौल की तरफ खिंचते चले जा रहे हैं.

उस रात मैदान में खेल रही कई लड़कियां यूनियन में ही बड़ी हुई हैं — अपनी मां या बड़े भाई-बहनों के साथ स्थानीय बैठकों, राज्य-स्तरीय कार्रवाइयों, और राष्ट्रीय विरोध प्रदर्शनों में शामिल होते हुए. वे रणनीतियों से जुड़ी चर्चाओं में बैठतीं और गीत-संगीत में भी शामिल होतीं. उन्होंने दिल्ली या पटना की लंबी ट्रेन यात्राओं में भीड़-भाड़ वाले जनरल डिब्बों में घंटों धक्का-मुक्की में बिताए हैं.

हमारे रिश्ते ने भी इन्हीं साझा जगहों के बीच आकार लिया है — सिर्फ संघर्ष के पलों में नहीं बल्कि रोज़मर्रा की अपनी लय में भी. जैसे पेड़ के नीचे बातें करते हुए, मीटिंग के बाद भीड़ से भरे बरामदे में, सांझ के समय एक दूसरे को चाय के कप बढ़ाते हुए, उन गानों को गाते हुए जो खत्म होते-होते ज़ोरदार हंसी में तबदील हो जाया करते, और उन चुप्पियों में जो सहज थीं. समय के साथ खुद-ब-खुद, धीरे-धीरे भरोसा बनता गया.

इसलिए जब फोन आने शुरू हुए, तो सबसे पहले सपना ने फोन किया, फिर दो-दो और तीन-तीन करके दूसरों के फोन आने लगे. मैं समझ गया कि इसका क्या मतलब था. उनकी आवाज़ में चुनौती भी थी और भय भी. मुझे इतना पता था कि मैं ज़ोर देकर उनसे साफ-साफ कहने के लिए नहीं कह सकता था. जेजेएसएस के हमारे काम में, कहानियां धीरे-धीरे खुलती हैं जो डर, शर्म और आत्म-मंथन के बीच से होकर अपना आकार लेती हैं. वे तब बोलेंगी जब वे तैयार होंगी. इसलिए मैं इंतज़ार करने लगा.

सपना पहली थी जो बोली. उसके शब्द बाहर गिर रहे थे, जिससे उन्हें जल्दी-जल्दी कह देने पर वे गहराई में जाकर चोट न करें,

“हम बस खेल रहे थे, तन्मय भैया. बस फ्रिस्बी के पीछे दौड़ रहे थे, पकड़, फेंक… और फिर वे आ गए.”

वे, गांव के बड़े पुरुष. नैतिकता के स्वयं-नियुक्त संरक्षक, जिनकी सत्ता पर कभी कोई सवाल नहीं किया जा सकता, “शर्म नहीं आती?” वे चिल्लाए. “इतनी बड़ी होकर कूद-फांद कर रही हो!” प्रियंका ने अपनी सहमी और उखड़ती हुई आवाज़ के साथ कहा,

“उन्होंने कहा कि हम बेहया-बेशर्म हैं… कि हर कोई हमें देख सकता है… हमारा शरीर… कि हमें याद रखना चाहिए कि हम लड़कियां हैं.”

उनके शब्दों ने कुछ जानी-पहचानी यादों को ताज़ा कर दिया: महिला कार्यकर्ताओं को बोला जाता है कि वे बहुत ज़्यादा बोलती हैं, क्वीयर दोस्तों को बोला जाता है कि उनकी लिपस्टिक बहुत भड़कीली है, लड़कियों को कहते हैं कि बहुत ज़ोर से हंसती हैं. लोगों को अपनी हदें याद दिलाने का सामान्य तरीका. लेकिन लड़कियों ने अपनी रोज़मर्रा की दिनचर्या से भरी ज़िंदगियों से खुशी निकालने का एक तरीका खोज लिया था, और वही खतरा बन गया था.

उसमें मज़ा था. जिस तरह वो इसके बारे में बात करती थीं उसमें मुझे साफ दिखाई देता था. फ्रिस्बी के ऊंचा उड़ने का रोमांच, तेज़ी से उसका पीछा करते हुए हवा का उनकी त्वचा से टकराना, हर गोते के बाद, लगभग हर चूक के बाद हांफती खिलखिलाहटें. उनका शरीर जिसे अक्सर नियंत्रित किया जाता है और रोका जाता है, वो बिना सोचे, आज़ादी से भागती-दौड़ती हैं. वे कूदतीं, वे दौड़तीं, वे गोता लगातीं, घुटने छिल जाते, कपड़े फट जाते, पर फिर से मुस्कुराते हुए उठ खड़ी होतीं. उन पलों में वे सिर्फ एक बेटी, एक लड़की – जो अपनी शादी के इंतज़ार में हैं – से बहुत कुछ अधिक थीं. वो खिलाड़ी थीं, एक दूसरे की साथी थीं और उनकी खुशी में चुनौती थी.

उनके जाने बिना उनकी हंसी की गूंज इतनी दूर तक फैली कि वो नैतिकता के संरक्षकों के कानों तक पहुंच गई.

तिरस्कार से टपकती हुई आवाज़ में एक आदमी ने कहा, “अपने शरीर का होश नहीं है तुम्हें? तुम्हारी ये हरकतें, हमारे पूरे गांव का नाम मिट्टी में मिला देंगी!”

संदेश स्पष्ट था: उनका शरीर उनका अपना नहीं है. वो गांव का है, गांव की नज़र का है, उसके कायदों का है.

सपना, जो खेलते हुए छलांग लगाने के बाद अपने सांसों को काबू में ला ही रही थी, उनकी बातें सुनते ही उसके भीतर का खून खौलने लगा. ये कहने की जुर्रत कैसे हुई? इन मर्दों की हिम्मत तो देखो, जो हमें दूर से खेलता हुआ देख ये तय करेंगे कि हम अपने शरीर के साथ क्या कर सकती हैं, क्या नहीं. उसकी मुट्ठियां कस गईं और एक पल के लिए उसने सोचा कि वह उनके इन तेज़ और ज़हरीले शब्दों को उनके ऊपर ही दे मारे.

लेकिन इससे पहले की वो कुछ कहती, दो लड़कियां, नेहा और पुष्पा, बोल पड़ीं. उनके दिल तेज़-तेज़ धड़क रहे थे, फिर भी उनकी आवाज़ें स्थिर थीं. उन्होंने कहा, “हम खेल रहे हैं. आपको क्या दिक्कत हो रही है?”

वे आदमी हंसे और करीब आकर कहा, “लड़कियों को ये सब शोभा देता है क्या? अच्छे घर की बेटियां ऐसे दौड़ती हैं मैदान में?”

आरती ने पलट कर जवाब दिया, “आपको अच्छा नहीं लग रहा, तो मत देखिए.” आदमियों के चेहरे काले पड़ गए. एक ने बगल में थूका और गुर्राया, “बहुत ज़ुबान चल रही है. चुप न रही तो हाथ चलाना आता है हमें.” वह थोड़ा और आगे बढ़ा, तना हुआ शरीर, कंधा चौड़ा करके, उसका शरीर एक डराने वाली चेतावनी जैसा था.

पर लड़कियां पीछे नहीं हटीं. वो कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहीं, उनकी आवाज़ें एक साथ उठीं:

“हाथ लगाने की हिम्मत मत करना.”

“आपकी नज़र गंदी है, हमारा खेल नहीं.”

यह पहली बार था जब वे एक साथ मिलकर जवाब दे रही थीं और उनके बीच बिजली सा कुछ कड़क कर गुज़र गया, डर जो एकजुटता में बदल गया था.

उनमें से दो बुजुर्ग मर्द वहीं खड़े रहे, धोतियों को सही जगह खींचे हुए, जाति की सत्ता को उन्होंने करीने से पहने गए कपड़े की तरह ओढ़ रखा था. उन लड़कियों को ऐसे अपने सामने बिना झुके, डटे खड़े देखकर उनके चेहरे कठोर हो गए थे. उनके चारों ओर हवा तन सी गई थी, इस बात के लिए तैयार कि उनकी घायल सत्ता आगे क्या मांग करती है.

कुछ पल माहौल गर्म था, दोनों पक्षों के बीच की ज़मीन दुश्मनी से धड़क रही थी. फ्रिस्बी, वहीं उनके पैरों के पास लावारिस सी पड़ी हुई थी. माहौल भारी था, इस संभावना से लदा कि मर्दों की आक्रामकता कैसे लड़कियों के पीछे हटने के इंकार का सामना करेगी. दोनों ही पक्षों में से न कोई झुका और न ही अपनी जगह से टस से मस हुआ.

बाद में जब सपना मुझे इस घटना के बारे में बता रही थी, उसकी आवाज़ सहज होने के साथ-साथ एकदम दृढ़ थी, “तन्मय भईया, वो ऐसे दिखा रहे थे जैसे दिक्कत हममें ही है, जबकि परेशानी उनकी खुद की नज़र में है.”

वो जैसे बोल रही थी उसे सुनते हुए मुझे एक परिचित चुभन महसूस हुई. अपने ही शरीर में मौजूद होते हुए गलत समझे जाने की चुभन. लेकिन मुझे पता है कि मेरी जाति मुझे एक तरह की सुरक्षा देती है जो मेरे दूसरे साथियों को नहीं मिलती.

उस पल सपना बहुत कुछ कहना चाह रही थी लेकिन तब उसके शब्द गले में अटक रहे थे. अब जब वह दुबारा उसके बारे में बता रही है, उसने उन्हें बाहर आने दिया है: “आप लोग दूसरे आदमियों की नज़र से इतने परेशान हैं? पर असल में क्या होता है? आप अपनी ही नज़र से डर रहे हैं.”

“फिर क्या हुआ?” मैंने पूछा.

प्रियंका ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, “गेम रुक गया. हम लोग चुप हो गए. तभी गाय-बैल वापस आने लगे, धूल उड़ाते हुए. अंधेरा भी हो रहा था. तो बस… घर की तरफ चल दिए. पर जाते-जाते भी वो आदमी धमकियां देते रहे.”

पर वो तो सुनील था जिसकी बयानी ने इस टकराहट की असलियत को हमारे सामने रखा. सुनील, जेजेएसएस का एक युवा दलित कार्यकर्ता है. वो अररिया का रहने वाला है और कटिहार में रहकर युवाओं और बच्चों को संगठित करने का काम करता है. उस शाम सुनील उन लड़कियों के साथ ही खेल रहा था. लड़कियों से पहले उन लोगों ने सुनील को घेरा था. 

“चल भाग यहां से! ये क्या लड़का-लड़की साथ में तमाशा कर रहे हो,” आदमियों में से एक ने उस पर भौंकते हुए कहा.

उस पल सुनील ने अपनी जगह पर ही खड़े होकर, शांत लेकिन मज़बूत आवाज़ में कहा, “ठीक है, मैं हट जाता हूं… पर हम कुछ गलत नहीं कर रहे हैं. हम बस खेल रहे हैं.”

उसने उन्हें समझाने की भी पूरी कोशिश की, विनम्रता के साथ, लगभग गिड़गिड़ाते हुए, “ये फ्रिस्बी खेल है… दुनिया भर में खेला जाता है. और इसमें नियम ही ये है कि कोई खिलाड़ी किसी को छू भी नहीं सकता, गलती से भी नहीं. तो आपको टेंशन लेने की ज़रूरत ही नहीं है.”

वो अब तक इतनी सारी टकराहटों को देख चुका है कि उसे पता है कि कैसे ये पलक झपकते ही बड़ा रूप ले सकती हैं और कितनी आसानी से इसमें हिंसा शामिल हो जाती है. वो गुस्से से भरा था, पर हैरान नहीं था. अगर वो पीछे हट जाए, उसने सोचा, तो हो सकता है कि लड़कियां अपना खेल जारी रख सकें.

उसी शाम, ताकतवर जाति के बड़े लोग प्रियंका के घर के बगल वाले घर में इकट्ठा हुए थे. सड़क से ही उनकी आवाज़ें सुनाई दे रही थीं — ऊंची, कड़वी और ज़हर से भरी. वे लड़कियों पर, सुनील पर जातिवादी और लैंगिक गालियों की बौछार कर रहे थे. उन्होंने फ्रिस्बी के खेल को ‘बुरा प्रभाव’, ‘अपवित्रता’ की निशानी कहा. उन्होंने वादा किया कि अगर लड़कियों ने दोबारा इस तरह बाहर निकलने की हिम्मत की तो वे उनकी ज़िंदगी नर्क बना देंगे.

बाद में एक महिला ने दबी हुई आवाज़ में मुझे बताया कि वे “'नियंत्रण' के बारे में चिल्ला रहे थे.” और ये कि, “कैसे चीज़ें हाथ से निकलती जा रही हैं.” उस बैठक में कई औरतें थीं, चुपचाप, ज़मीन को देखती हुई.

किसी ने भी एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं की. न तब, न अब.

बाद में, अपने शब्दों को तोलते-परखते हुए प्रियंका ने कहा, “उनको परेशानी यह है कि हम बाहर के लड़कों के साथ खेल रहे हैं. पर हम बेवकूफ नहीं हैं… हमें पता है वे सुनील के बारे में बोल रहे थे. उनको असली दिक्कत यह है कि वो दलित है. लेकिन वो हमारा दोस्त है, हमारा साथी. उसके साथ मिलकर हमने ये नया खेल सीखा… और सच बताऊं, हमें इस दोस्ती में ज़्यादा सुरक्षित लगता है, इतना कभी अपनी ही जाति के बड़े पुरुषों के साथ नहीं लगा.”

कुछ दिन बाद, जेजेएसएस ने गांव में एक पंचायत बुलाई. यह पहली बार था जब मैं उस घटना के बाद वहां गया था. हमें पता था कि इस तरह की धमकियों को बिना चुनौती दिए छोड़ दिया गया तो अत्याचारियों का हौसला और बढ़ेगा. बैठक पनसेरवा में हुई, उसी मैदान के पास जहां खेल रोका गया था, उन आदमियों के घरों के नज़दीक जिन्होंने गालियां दी थीं. मीटिंग शाम पांच बजे के लिए बुलाई गई थी, लेकिन गांव की रीति के अनुसार मीटिंग अंधेरा होने के बाद, लगभग रात आठ बजे शुरू हुई.

लड़कियां आईं, हर एक लड़की जो उस शाम मैदान में खेल रही थी. ज़्यादातर अपनी मांओं को अपने साथ लाई थीं; जिनके माता-पिता पास नहीं थे वे बड़े भाई-बहनों के साथ आईं. कुछ माता-पिता, दोनों के साथ आईं, हालांकि पुरुषों की अनुपस्थिति साफ दिखाई दे रही थी. कईयों के पिता दूर-दराज़ शहरों में मज़दूरी का काम कर रहे थे. सभी मांओं के अलावा, उस रात केवल एक पिता आए. उनकी शांत मौजूदगी बहुत कुछ कह रही थी कि रोज़मर्रा की इन लड़ाइयों का बोझ कौन ढोता है.

जब यह साफ हो गया कि दो मुख्य दोषी इस बैठक में अपनी मौजूदगी दिखाने की ज़हमत भी नहीं करेंगे, तो लड़कियों ने फिर भी बोलने का फैसला किया. वे अपने समुदाय के सामने खड़ी हुईं, स्थिर और साफ, और उन्होंने अपनी बात कही: कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया, कि उन्हें खेलना पसंद है, कि वे खिलाड़ी होने की पहचान को संजोती हैं.

गांव के कुछ मर्द इस बात से निराश थे कि उस शाम यूनियन के साथ कोई झगड़ा नहीं होगा, इसलिए वे खुद ही बहस में कूद पड़े. मखौल उड़ाते हुए उन्होंने कहा, “तुम लोग अपने आप को खिलाड़ी बोलती हो? तुम्हारे पास कोच नहीं, सामान नहीं, ड्रेस नहीं. खिलाड़ी बनने के लिए प्रोपर ट्रेनिंग चाहिए होती है. ऐसे नहीं बनते खिलाड़ी. नेशनल-इंटरनेशनल स्टेज पर खेलो, तब बनोगे खिलाड़ी. गांव का कुछ मान-सम्मान रखोगे कि नहीं?”

बस उसी समय सपना और आरती टूट पड़ीं. इस मखौल के खिलाफ उनकी आवाज़ तेज़ हो उठी: “नेशनल-इंटरनेशनल लेवल तक पहुंचने के लिए पहले फील्ड पर खेलने का मौका मिलना चाहिए. तुम लोग चड्डी में मैच खेलोगे और हम लोगों को खेलने नहीं दोगे?”

पूरी भीड़ में सब लोग धक से रह गए. चकित होकर, वे आदमी लड़कियों के माता-पिता की ओर मुड़े, यह मांग करते हुए कि वे अपनी लड़कियों को काबू में रखें.

लेकिन तभी एक और आदमी बोला, नशे में चूर, उसके शब्द लड़खड़ा रहे थे पर ज़हर से भरे, लड़कियों के शरीर के बारे में गंदी बातें बड़बड़ाया, उसने उन्हें बदचलन कहा.

उसके बाद अफरा-तफरी मच गई. औरतें, जो अब तक चुप थीं, ग़ुस्से से कांपती आवाज़ों के साथ खड़ी हो गईं. उन्होंने खुद को नहीं रोका, वे उस आदमी पर टूट पड़ीं, धक्का दिया, मारा, उस आदमी का जो भी हिस्सा हाथ आया, वही निशाना बना. कुछ मिनटों तक पंचायत में सिर्फ शोर था, गुस्सा गुस्से से टकराता हुआ. फिर, जितनी अचानक ये शुरू हुआ था, उतनी ही अचानक टूट गया. लोग छंटने लगे, रात के नौ बज चुके थे, और ज़िंदगी अपनी दिनचर्या मांगती थी: खाना पकाना था, पशुओं को खिलाना था, घर पर परिवार इंतज़ार कर रहा था.

जिस आदमी ने लड़कियों पर गालियों की बौछार की थी उसके साथ कुछ नहीं हुआ; वह जवान था, नशे में था, और औरतों की प्रतिक्रिया को उचित माना गया. मामला बिना किसी दोषारोपण के बंद हो गया, उस पर भी नहीं, और औरतों पर भी नहीं.

अगले दिन, सपना को विज्ञान की कोचिंग क्लास से उसके बीस-बाईस साल के अध्यापक ने बाहर निकाल दिया, “ऐसी खराब लड़कियों के लिए इस कोचिंग में जगह नहीं है.” उसने तंज़ कसते हुए कहा. उसे इस बात के लिए दंड दिया गया कि उसने सार्वजनिक रूप से एक बुजुर्ग आदमी के सामने आवाज़ उठाने की हिम्मत की थी.

सपना की मां और चाची, प्रियंका और कुछ अन्य खिलाड़ियों के साथ, कोचिंग पर पहुंचीं, अध्यापक को कड़ी फटकार लगाई, और सपना को वापस क्लास में बिठा दिया. उस टीचर ने कभी माफी नहीं मांगी, लेकिन अगले दिन सपना अपनी सीट पर लौट आई, बेखौफ, और उसकी मौजूदगी ही एक शांत जीत थी.

वे दो आदमी जो लड़कियों के साथ टकराए थे, बिना किसी परिणाम के यूं ही अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ते रहे. वे वकील हैं, गांव में सम्मानित, उनकी सत्ता पर कोई सवाल नहीं उठाता है. पनसेरवा की औरतें उनसे दूरी बनाए रखती हैं, उनकी नज़र से सतर्क. लड़कियों ने पनसेरवा में खेलना बंद कर दिया.

लेकिन पनसेरवा से एक किलोमीटर दूर, फुलवरिया में, एक नया पंचायत भवन बना था. एकदम चमकदार, इसमें एक विशाल खुला मैदान भी है. छत आंशिक रूप से ढकी थी, बारिश में पिकनिक के लिए या हल्की धूप में बैठने के लिए बिल्कुल ठीक. और क्योंकि वह नया था, वहां शायद ही कोई आता-जाता था.

सबसे अच्छी बात: ऊंची बाउंड्री, मैदान में खेलने या बैठने वालों को आड़ देती थी. यहां, लड़कियां हर रविवार मिलती रहीं. शुरुआती कुछ हफ्तों तक, जब लड़कियां दूसरी जगह मिलने लगीं, दो-चार बड़ी औरतें पास ही रहतीं, निगरानी करतीं, इस बात की देखरेख करतीं कि कहीं कोई दख़ल न दे.

सुनील के भीतर पहले के टकरावों के घाव भरे थे. एक दलित युवा कार्यकर्ता, जो एक ओबीसी गांव में संगठन बनाने का काम कर रहा था. वहां उसके दोस्त तो थे, लेकिन वो अपने दर्जे से वाकिफ था. ओबीसी लड़कियों ने कसम खाई थी कि वे उसे किसी भी जातिवादी हमले से बचाएंगी, उनकी एकजुटता जोशिली और सच्ची थी. वह उन पर भरोसा करता था, मुसीबत आने पर वे साथ खड़ी होंगी. फिर भी अपने दिल की गहराई में वो जानता था कि कितनी भी बहादुरी से वादा करें, जाति का बोझ उसे ऐसे कुचल सकता है, जिसे उनका साहस भी नहीं रोक सकता.

घटना के बाद से, गांव के आदमियों ने अपना ध्यान उसकी ओर मोड़ लिया था. छोटे-छोटे इशारों से, चुभती हुई चुप्पियों से, और कभी-कभार यूं ही कही गई टिप्पणियों से जो सीधे अपमान से भी ज़्यादा चुभती थीं. उसकी मौजूदगी, एक दलित आदमी का ओबीसी बहुल क्षेत्र में युवा लड़कियों के साथ खुलकर खेलना, जाति की पवित्रता को लेकर चिंताएं बढ़ा देती थीं. धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ, जिसे वो कहीं न कहीं लंबे समय से जानता था कि: उसकी ऊर्जा, उसका काम, उसकी एकजुटता शायद कहीं और बेहतर जगह पा सकती है.

महीनों के सोच-विचार के बाद, सुनील को वो बात समझ आई जो आंबेडकर लंबे समय से सिखाते आए थे: जाति भावना नहीं है, ढांचा है. उसने अपने काम को अररिया में वापस ले जाने का फैसला किया, अपने घर के ज़िले में जहां वह अब मुख्य रूप से दलित कामगार समुदायों के साथ काम करता है. पनसेरवा छोड़ना पीछे हटना नहीं था; यह उस ज़मीन पर लौटना था जहां उसकी आवाज़ और शरीर लगातार संदेह के घेरे में नहीं रहेंगे.

फोटो साभार: विक्रम कुमार

पनसेरवा नहीं बदला. लड़कियों ने फुलवरिया में क्षणिक आज़ादी का एक छोटा-सा कोना तराश लिया, और सुनिल ने अररिया में गरिमा का एक स्थान. फिर भी, जाति की परछाइयां बनी रहीं: लड़कियां निगरानी भरी नज़रों के दायरे में रहीं, औरतें घर के रोज़मर्रा के भारी कामों से दबती हुई रहीं, और संघ का काम दबावपूर्ण, तात्कालिक और असमान रूप से चलता रहा. फिर भी इन पलों में, फ्रिस्बी आसमान में उछलती रही, हंसी मैदानों में फैल जाया करती और हाथ एकजुटता में थामे जाते. खुशी और अवज्ञा की झलकियां लगातार दिखाई देती रहती थीं. शायद यही जातिए भारत का असली नक्शा है — एक अकेला आज़ाद गांव नहीं, छोटी-छोटी जगहों पर बिखरी हुई आज़ादी, दावा करती, संभलती, और नैतिक भूगोल के खिलाफ खड़ी हुई.

***

नेहा ने फ्रिस्बी डिस्क को ऊंचा उछाल दिया. मीना दौड़ी, उसका दुपट्टा फिसला और उसकी उंगलियां उसे छू ही रही थीं कि उसका शरीर ज़मीन से टकराया. एक धड़कन भर के लिए, वह इतनी हल्की थी कि जब उसकी छाती ज़मीन से टकराई, उसकी कोहनी मिट्टी से घिस कर जलने लगी — फ्रिस्बी उसके हाथ में थी. उस पल में वह केवल एक शरीर नहीं थी जिसपर नज़र रखी जाती है. वे निगरानी में रखे हुए शरीर नहीं थे, वे एक चेतावनी थे कि: खुशी गलत हाथों में राजनीतिक होती है. खबरदार!

इस लेख का अनुवाद सुमन परमार और प्रियंका मिंज ने किया है.

  • तन्मय निवेदिता, एक ट्रांस नारीवादी हैं जो पिछले एक दशक से भी अधिक समय से ग्रामीण बिहार में स्थित जन जागरण शक्ति संगठन (जेजेएसएस) के साथ काम करते आए हैं. जेजेएसएस भूमिहीन ग्रामीण मज़दूरों, हाशिए पर पड़े समुदायों और युवाओं को संगठित करने वाली एक ट्रेड यूनियन संस्था है.

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