एक पत्रकार के रूप में मैंने जितने सालों भी काम किया है, मुझे हर जगह की आशा कार्यकर्ता (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) की कहानियां याद हैं.
मणिपुर में हो रही हिंसा की घटनाओं के बीच रिपोर्टिंग करते हुए मैं एक आशा कार्यकर्ता से मिली. उसने एक साल से ज़्यादा समय से अपने खुद के पैसे खर्च करके एक आदिवासी ज़िले में टीकाकरण का काम जारी रखा, जब वह जिला मेडिकल सप्लाई से पूरी तरह कटा हुआ था.
मैं छत्तीसगढ़ के मलकानगिरी ज़िले में जापानी इंसेफेलाइटिस से लगातार होने वाली मौतों पर रिपोर्टिंग करते हुए एक आशा वर्कर से मिली जिसने उस सच्चाई को मेरे सामने खोला कि ज़िले में अचनाक से हाल ही में पैदा हुए बच्चे क्यों मर रहे हैं. वह खुद एक आदिवासी महिला थीं. उन्होंने उड़ीसा में आदिवासियों के प्रति एक गहरी उदासीनता और बेपरवाही के बारे में विस्तार से बताया और एकीकृत बाल विकास सेवा योजना (आईसीडीएस) में फैले भ्रष्टाचार के बारे में भी लंबी बातचीत की. इसकी वजह से ही सबसे गरीब समुदायों को प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं और एकदम न्यूयतम स्तर की खुराक तक नहीं मिल पा रही थी. इस कारण नए जन्मे बच्चों में इम्यूनिटी या प्रतिरोधक क्षमता न के बराबर थी.
कोविड-19 महामारी के दौरान, तमिलनाडु के जिस भी ज़िले में मैं गई, वहां आशा वर्कर हर गांव की गलियों में थीं, लोगों के लक्षणों की जांच और समय पर मेडिकल मदद उपलब्ध कराने में जुटी थीं.
देश के अलग-अलग इलाकों में मेरे साथियों ने भी अपनी रिपोर्टों में बताया कि कैसे ये हेल्थकेयर वर्कर वायरस के खिलाफ अपनी कम्युनिटी के लिए एक ढाल की तरह थीं.
ये वो कहानियां हैं जो किसी ‘सुपरहीरो’ किस्म की फिल्मी कहानियों में एकदम से फिट बैठती हैं, जहां पर्दे पर अचानक एक आदमी की एंट्री होती है जो कयामत की ओर बढ़ रही दुनिया को कैसे भी करके बचाता है जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. पर यहां, ‘हीरो’ देश भर की ये औरतें हैं. उनकी एंट्री में कोई रोमांच नहीं है; ये औरतें पहले से ही मौजूद हैं और शायद आपके पड़ोस में ही रहती हों. हम उन्हें जानते हैं — या पितृसत्तामक नज़रीया — ये वो कई वजहों में से एक हैं जिसके चलते इन महिलाओं की पहचान कभी ‘हीरो’ की नहीं बनेगी और उन्हें सिर्फ महिला कार्यकर्ता होने का दोहरा बोझ ही मिलेगा.
यह समूह, जो प्राथमिक स्वास्थ्य के ज़रिए लगातार देश के उन लोगों की सेवा कर रही हैं जिनकी सुनवाई सबसे कम है या शायद ही ये कहीं दिखाई देते हैं. साथ ही ये देश को एक के बाद एक स्वास्थ्य समस्याओं से उबार रही हैं. वह अब खुद ही अपने वाजिब हक़ की मांक कर रही हैं: एक स्वास्थ्य कर्मचारी के रूप में पहचान और उचित तनख्वाह.
1978 में, डब्लूएचओ—यूनिसेफ (WHO-UNICEF) के नेतृत्व वाले अल्मा-अता डिक्लेरेशन ने यह नतीजा निकाला कि दुनिया भर में स्वास्थ्य का एक सही स्तर पाने के लिए कम्युनिटी हेल्थ वर्कर के ज़रिए प्राथमिक स्वास्थ्य सहायता पर फोकस करना बहुत ज़रूरी है.
अगले कुछ दशकों में, दक्षिण एशिया की सरकारों ने राज्य के लिए आसानी से उपलब्ध बेरोज़गारों की एक बहुत बड़ी संख्या — अविवाहित महिलाएं — के लिए एक भूमिका तैयार कि ताकि वह कम आमदनी वाले समुदायों, गांवों और अपने आस-पड़ोस के इलाकों में काम कर सकें.
इन महिलाओं को ‘वॉलंटियर’ के तौर पर पहचाना गया. इससे एक ऐसी व्यवस्था का रास्ता बना जो लगभग पूरी तरह से सेवा प्रदान करने वाली व्यवस्था पर निर्भर थी और जिसकी नींव पितृसत्तात्मक है. इस व्यवस्था में ‘महिलाओं की देखभाल की भूमिका’ को न सिर्फ कम आंका जाता है, बल्कि इसे मुश्किल से ही काम का दर्ज़ा दिया जाता है.
ज़्यादातर आशा वर्कर को बहुत कम वेतन मिलता है, और इसमें मुख्य रूप से महिलाएं ही कार्यरत हैं. इनमें से कई आशा पिछड़ी मानी जाने वाली जातियों की हैं. एक ऐसी आबादी जिनके काम को ऐतिहासिक रूप से ही कमतर माना जाता रहा है. इस तरह वे उन औपचारिक और अनौपचारिक हज़ारों महिला श्रमिको की उस कतार में शामिल हो जाती हैं जो सफाई कर्मचारी, घरेलू कामगार या खेती का काम करती हैं. इन सभी को वाजिब मज़दूरी का हकदार नहीं माना गया है.
यह भारत के इतिहास में महिलाओं की सबसे लंबी, अनिश्चितकालीन दिन-रात की हड़ताल की कहानी है. इसके केंद्र में केरल आशा हेल्थ वर्कर्स एसोसिएशन (केऐएचवीए) के तहत सैकड़ों आशा कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने न सिर्फ केरल, जहां हड़ताल हुई थी, बल्कि पूरे देश को इस पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया है.
इस कहानी में हमारी नायिका एक लीडर है जिनकी पहचान इस हड़ताल के दौरान ही उभरी, जैसे कई और आशा लीडर भी उभरीं. उनका नाम रोसम्मा है. उनके साथ उनके शहर का चक्कर लगाने का मतलब है कि आप भी उन्हें ‘रोसम्मा चेची’ के नाम से पुकारने लगेगें. ठीक वैसे जैसे हर एक व्यक्ति जो उनके पास से गुज़रता या उनसे बात करने के लिए रूकता है, उन्हें इसी नाम से पुकारता है.
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जब हम यशोदा के दरवाज़े पर खड़े होकर इंतज़ार कर रहे थे, तब हमारे चारों ओर एक डरावनी सी खामोशी छा गई थी, रोसम्मा चेची के चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही थी. घर टूटा-फूटा था, जिसमें काई और अकेलेपन की गंध फैली हुई थी.
रोसम्मा चेची घर के भीतर घुसी और तुरंत ही उनकी नज़र यशोदा पर गई, जो घर के सबसे कोने में रसोई के बगल में बैठी थी. यशोदा को रोसम्मा चेची को पहचानने में एक-दो मिनट लगे, लेकिन जैसे ही उसने उनको पहचाना, उसकी आंखें भर आईं. इस बीच, चेची रसोई के भीतर जा चुकी थी और पूछने लगीं कि चावल का बर्तन कितनी देर से उबल रहा है.
यशोदा ने उन्हें नज़रअंदाज किया, उसका ध्यान भटका हुआ था, मानो वो चेची के सवालों से बचना चाहती थी. रसोई से निकल, चेची यशोदा के बेडरूम में गईं, एक के बाद एक सवाल पूछती रहीं, और आखिर में एक पॉलीथीन बैग लेकर बाहर आईं. चेची ने पॉलीथिन से एक डायरी और गोलियों का एक पेपर बैग निकाला और ज़ोर की आह भरी.
“तुमने इनमें से कोई भी गोली नहीं ली है!” उन्होंने यशोदा से कहा. अब तक, यशोदा ने हम दोनों से नज़रें मिलाना बंद कर दिया था और दरवाज़े से बाहर देखने लगी थीं.
“मेरी तरफ देखो! क्या हुआ है?” रोसम्मा चेची चिल्लाईं.
“मुझे दर्द हो रहा है,” यशोदा ने जवाब दिया.
उसने धीरे से अपनी नाइटी ऊपर उठाकर हमें अपना घुटना दिखाया जो उसके दूसरे घुटने से दोगुना बड़ा दिखाई दे रहा था. अपने आंसूओं को रोकते हुए, उसने चेची को बताया कि वह पिछले हफ़्ते फिसलकर गिर गई थी. रोसम्मा चेची थोड़ी देर रुकीं और फिर अपने बैग में से दर्द कम करने वाले मरहम की एक ट्यूब निकाली, और यशोदा को सूजन वाली जगह पर लगाने के लिए कहा.
”लेकिन अगर तुम अपनी गोलियां नहीं लोगी, तो तुम ठीक नहीं हो पाओगी,” उन्होंने डांटा. “तुम्हें अपनी गोलियां लेनी ही होंगी, यशोदा!”
“मैं कोशिश करूंगी, लेकिन…,’ ये कहते-कहते यशोदा बीच में ही रूक गई.
2017 में यशोदा को लकवा आया था, जिसकी वजह से उसके दिमाग, बोलने और चलने-फिरने पर गहरा असर पड़ा. समय-समय पर रोसम्मा चेची का उसे देखने आना और हाल-चाल लेना ही एकमात्र देखभाल है जो उसे मिलती है.
यशोदा दो बेटियों की मां है. दोनों ही बेटियों की शादी हो चुकी है और उनके बच्चे भी हैं. लेकिन रोसम्मा चेची के अनुसार उनके पति नहीं चाहते कि वे अपनी मां से मिलने जाएं. यशोदा आज भी उसी घर में रहती है जहां उसने अपने दोनों बच्चों को पाला-पोसा, पर अब बच्चे उससे मिलना नहीं चाहते या मिल नहीं सकते.
केरला, एक ऐसा राज्य है जहां उम्रदराज़ लोगों की आबादी बड़ी मात्रा में है. भविष्य में यहां पैलिएटिव सोशल केयर की ज़रूरत लगातार बढ़ने वाली है. खासकर गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बुज़ुर्ग लोगों के लिए, क्योंकि यह एक ऐसा राज्य भी है जहां बहुत ज़्यादा विस्थापन होता है. यहां के ज़्यादातर युवा काम की तलाश में राज्य से बाहर जाते हैं और उनके पीछे उम्रदराज लोग यहीं रह जाते हैं.
वो सारे लोग जिनसे रोसम्मा चेची मिल रहीं थी, उन्हें देखकर ये साफ़ पता चल रहा था कि किसके पास ‘देखभाल’ का विशेषाधिकार है और किसके पास नहीं. बुज़ुर्ग मरीज़ों की देखभाल करने वाले बहुत कम लोग थे, वहीं कई जवान, खासकर पुरुषों, की देखभाल करने के लिए उनकी मां, बहनें या पत्नियां थीं. यशोदा जैसी बुज़ुर्ग महिलाओं के बच्चे या तो शादीशुदा होने की वजह से कहीं और रह रहे हैं, या अपने परिवारों के साथ देश के बाहर काम कर रहे हैं.
इसका मतलब ये भी है कि रोसम्मा चेची जिन मरीज़ों का ध्यान रखती हैं या जिनकी बीमारी के बारे में जांच-पड़ताल करती हैं, उनमें से कई सीनियर सिटिज़न हैं जिन्हें खुद की देखभाल करने के लिए छोड़ दिया गया है, भले ही वे ऐसा करने में समर्थ न हों. उनमें से आधे से भी ज़्यादा लोग ऐसे हैं जो न तो देखभाल करने वालों का खर्च उठा सकते हैं और न ही हॉस्पिटल जाने का. रोसम्मा चेची ही स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी एकमात्र पहुंच हैं.
वैसे भी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनएचआरएम) के तहत आशा कार्यकर्ताओं के काम की भूमिका भी कुछ इसी तरह तैयार की गई थी: प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को केंद्र में रखना जैसा कि अल्मा-अता कॉन्फ्रेंस में तय हुआ था और पंचायत स्तर पर आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए एक कार्यबल बनाना. इसे इसी तरह डिज़ाइन किया गया था कि स्वास्थ्य सभी नागरिकों का एक ज़रूरी अधिकार है, और सरकार की भूमिका यह तय करना है कि यह अधिकार हर नागरिक के दरवाज़े तक पहुंचे.
जब देश में आशा वर्करों के पहले जत्थे को काम पर लगाया गया था, तब जो लक्ष्य तय किए गए थे, वे बहुत महत्त्वकांक्षी थे.
एनआरएचएम के मिशन घोषणापत्र में इस बारे में विस्तार से तरह बताया गया है: शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और मातृ मृत्यु दर (MMR) में कमी, महिलाओं के स्वास्थ्य, बच्चों के स्वास्थ्य, पानी, सफ़ाई और स्वच्छता जैसी जन स्वास्थ्य सेवाओं तक सबकी पहुंच, टीकाकरण एवं पोषण.
इसके साथ ही स्थानीय बीमारियों सहित संक्रामक और गैर-संक्रामक बीमारियों की रोकथाम और नियंत्रण, एकीकृत व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सुरक्षा तक पहुंच, आबादी को स्थिर करना, जेंडर और जन-आबादी का संतुलन, स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं को फिर से ज़िंदा करना और एक स्वस्थ्य जीवनचर्या को बढ़ावा देना भी एनआरएचएम के लक्ष्यों में शामिल था.
इनमें से हर लक्ष्य इस बात को दोहराता है कि 2005-06 के दौरान भारत में स्वास्थ्य के मानक बहुत खराब थे, उतन ही जितनी प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक लोगों की पहुंच खराब थी. और यह तब था जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई सारे फैसलों में कहा था कि स्वास्थ्य का अधिकार जिसमें व्यापक रूप में हर व्यक्ति को मेडिकल मदद और आम जनता की भलाई, ये सभी राज्य की ज़िम्मेदारियों के तहत आते हैं. कोर्ट की नज़र में यह अनुच्छेद 21 का एक हिस्सा भी है, जो जीवन की अधिकार की बात करता है.
रोसम्मा चेची देश भर की उस पहले जत्थे का हिस्सा थी जो इस मुश्किल सपने को हकीकत में बदलने का काम हर राज्य में कर रही थी.
केरल राज्य में, करीब दो दशक पहले जब आशा वर्कर स्वास्थ्य व्यवस्था के कार्यकारी केंद्र में आयीं तब से आज में वहां मातृ मृत्यु दर और शिशू मृत्यु दर देश भर में सबसे कम है. और आज यहीं, रोसाम्मा चेची और उनके साथी हड़ताल पर थे.
प्राथमिक स्वास्थ्य को लेकर इस कमाल की कामयाबी के लिए सभी तरह के मेडिकल विशेषज्ञों को वजह माना गया है, सिवाय खुद आशा वर्करों के.
70 साल की सुलेखा उन कई लोगों में से एक हैं जिन्होंने रोसम्मा चेची और दूसरी आशा कार्यकर्ताओं को तब से देखा है जब उन्होंने एक हेल्थकेयर वर्करों के रूप में काम करना शुरू किया.
सुलेखा ने कहा, “हमारी सेहत के लिए ये ही जिम्मेदार हैं. अगर मैं पूरी तरह ठीक होती, तो मैं भी इन सबके साथ हड़ताल पर होती.” रोसम्मा चेची उनकी पोती को आयरन और फोलिक टैबलेट दे रही थीं. सुलेखा याद करती है कि कैसे जब आशा वर्कर्स ने गांव में काम करना शुरु किया था, तब गांव की लड़कियों और महिलाओं की सेहत उनके मुख्य कामों में शामिल था.
शुरू से ही आशा वर्कर का काम ज़्यादा मातृ मृत्यु दर और शिशू मृत्यु दर से लड़ना था, और पिछड़े और गरीब लोगों को कुपोषण से लड़ने के लिए एकीकृत बाल विकास सेवाओं के अंतर्गत लाना था. उन्हें लड़कियों की हत्या की दर से भी लड़ना था, और नवजात लड़कियों को अपनाने के लिए जगह बनानी थी.
गर्भवती मांओं की मैपिंग या उनकी जांच आशा वर्कर द्वारा उन्हें एंटीनेटल कार्ड देकर मेडिकल सिस्टम में रजिस्टर करने से शुरू होती है. गांव में अपने दौरे के दरमियान, जब रोसम्मा चेची अपने रिकॉर्ड के हिसाब से बच्चे के जन्म से पहले और जन्म के बाद मांओं को चेक करती हैं, तो वह उनके परिवार वालों से भी बात करती हैं. उनसे मां के पोषण—खुराक और जीवनचर्या के बारे में अलग-अलग तरह के सवाल पूछती हैं. उन्होंने मुझे बताया कि ऐसा सिर्फ़ महिला के परिवार वालों में ज़िम्मेदारी का एहसास जगाने के लिए ही नहीं किया जाता, बल्कि यह पक्का करने के लिए भी किया जाता है कि उन्हें पता हो कि राज्य का एक प्रतिनिधि मौजूद है और किसी भी तरह के बुरे बर्ताव की हालत में वह आ धमकेगी.
बच्चा पैदा होने के बाद, आशा वर्कर ‘रोड टू हेल्थ (स्वास्थ्य की तरफ कदम)’ कार्ड के साथ बच्चे के जन्म को रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया शुरू करती है. यह कार्ड बच्चे के स्वास्थ्य से जुड़ी हर चीज़ को दर्ज करने और मां का दूध पीने के अच्छे तरीकों को शुरू करने के लिए है. आशा वर्कर मां को समझाती है कि टीकाकरण कब—कब होगा, और यह पक्का करती हैं कि बच्चे को एक तय समयसीमा (6 हफ़्ते, 9 हफ़्ते, 2.5 महीने, 3.5 महीने, वगैरह) के हिसाब से क्लिनिक में लाकर सभी टीके लगाने के लिए लाया जाए.
आशा वर्कर बच्चे के विकास में कमी के शुरुआती लक्षणों पर नज़र रखतीं, और अगर उन्हें पता चलता है कि बच्चे का सही से विकास नहीं हो रहा है या वह कुपोषित लग रहा है, तो मां को आगे ट्रेनिंग दी जाती कि क्या करना है. इसके साथ ही मां को सबसे पास के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएससी) या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में सलाह भी दी जाती.
यहीं पर आईसीडीएस और अन्य पोषण योजनाओं जैसे अंत्योदय अन्न योजना भी काम आती हैं, क्योंकि पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत को रोकने के कार्यक्रम तभी लागू होंगे.
प्राथमिक स्वास्थ्य के स्तर पर ऐसी सैकड़ों योजनाएं हैं लेकिन जरूरतमंद को इस योजना का लाभ मिले, इसे आसान बनाने में आशा वर्कर की भूमिका बहुत ज़रूरी है.
वह बताती है कि इन योजना और फ़ायदों के लिए कौन योग्य है और यह पक्का करती है कि जिन लोगों को इसकी ज़रूरत है उन्हें ये फ़ायदे मिलें. अगर भारत के गांवों में भारत सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदगी महसूस होती है, तो यह रोसम्मा चेची जैसे लोगों की वजह से है. मतलब यह आशा वर्करों की वजह से है.
सफलता की एक और बड़ी कहानी ये भी है कि किस तरह आशा वर्करों ने गैर-संक्रामक बीमारियों से परेशान लोगों की प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाकर मदद की, और पूरे भारत में संक्रामक बीमारियों को फैलने से किस तरह रोका है. केरल में कोरोना वायरस से लेकर निपाह वायरस तक के सुरक्षा जोखिम को आशा वर्करों की घर-घर जाकर की जाने वाली चौकस निगरानी ने नाकाम कर दिया है.
आज आज इन्हीं आशा वर्करों को 260 से भी ज्यादा दिनों तक हड़ताल करना पड़ा.
भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था को घर – घर पहुंचाने के क्रांतिकारी कदम को आसान बना देने के बाद, रोसम्मा चेची जैसे कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स को मुश्किल में डाल दिया गया है.
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तिरुवनंतपुरम में काहवा की हड़ताल का 181वां दिन था. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही था. सवाल पूछे जा रहे थे और सफाई दी जा रही थी. अचानक, एक अधेड़ उम्र का आदमी, जो कथित तौर पर एक मीडिया संस्थान का सीनियर जर्नलिस्ट है, माइक पकड़ता है और गुस्से में पूछता है, “आप सब दिल्ली में क्यों विरोध प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं? क्या यहां समस्या केंद्र सरकार नहीं है?”
वहां जुटे वर्करों में गुस्सा फैल गया. जर्नलिस्ट को उस सिस्टम का प्रतीक मान लिया जाने लगा जो ग्रुप के साथ सही तरीके से बात करने से मना कर रहा है, यहां तक कि काहवा के कुछ लीडरों का चरित्र हनन भी कर रहा है. इन लीडरों में से एक मिनी चेची हैं, जो हड़ताल वाली जगह पर एक जाना-माना चेहरा हैं. उन्होंने शांति से माइक उठाया.
“आप हड़ताल के लगभग छह महीने बाद यह सवाल पूछ रहे हैं. क्या आपको शर्म नहीं आ रही?” उन्होंने उससे पूछा, और एक बच्चे की तरह समझाने लगीं. “नहीं, एक आशा वर्कर को न्यूनतम मजदूरी देने की ज़िम्मेदारी जितनी केंद्र सरकार की है, उतनी ही राज्य की भी. एक से दूसरे को ज़िम्मेदारी देना और वादा की गई बढ़ोतरी की जानकारी छिपाना बताता है कि ये हज़ारों आशा वर्कर और उनकी भलाई सभी सरकारों को कितनी फिजूल लगती है.”
दक्षिण एशियाई देशों में, भारत अपनी आशा वर्करों को सबसे कम और पाकिस्तान सबसे ज़्यादा मानदेह देता है. पाकिस्तान में महिला हेल्थ वर्कर प्रोग्राम की महिला स्वास्थ्य कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारी माना जाता है, जिन्हें बीमारी में बिना पैसा काटे छुट्टी और पेंशन जैसे फ़ायदे मिलते हैं. बांग्लादेश में, षष्ठ्य शेबिका (महिला हेल्थकेयर वर्कर) को और भी बेहतर लाभ मिलते हैं, जैसे लोन और हेल्थकेयर सर्विस तक खास पहुंच. नेपाल में भी यही हाल है.
पाकिस्तान, बांग्लादेश या नेपाल अपनी महिला हेल्थकेयर वर्कर को जितना पैसा देते हैं, भारत उसका एक चौथाई भी नहीं देता.
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“आह, रोसम्मा चेची, सब ठीक है? मैंने तुम्हें कल टीवी पर देखा था!” एक ऑटो ड्राइवर ने हमारे पास से गुज़रते हुए कहा. और रोसम्मा चेची की तरफ हाथ हिलाकर मुस्कुराया. रोसाम्मा चेची के इलाके में मरीज़ों के पास जाते हुए हम जिस किसी के भी पास से गुज़रे, वे रुककर बात करना चाहते थे. वे काहवा हड़ताल पर अपनी राय दे रहे थे और पूछ रहे थे कि क्या कोई बदलाव हुआ है. चेची उन सभी से बात भी करती और तेज़ी से आगे भी बढ़ जाती.
उस दिन हमें 19 मरीज़ों से मिलना था, वे मुश्किल इलाकों में फैले हुए थे. रुक-रुक कर बारिश भी हो रही थी. जब भी हमें बूंदें महसूस होतीं, चेची झट से अपना छाता खोल देतीं, जिससे हम दोनों को पनाह मिल जाती. हम चलना बंद नहीं कर सकते थे, वरना सभी मरीज़ों को देखना मुश्किल होता.
आशा का काम पूरे हफ़्ते फैला होता है, और हर दिन एक अलग काम होता है. एक दिन पैलिएटिव केयर के लिए, एक दिन गैर-संक्रामक बीमारियों (एनसीडी) की जांच के लिए, एक दिन संक्रामक बीमारी वाले मरीजों को सीएचसी या पीएचसी ले जाने के लिए, एक दिन टीकाकरण के लिए, एक-एक दिन सीएचसी/पीएचसी में महिला कल्याण क्लीनिक और हेल्प डेस्क पर बिताना होता है. इन निर्धारित कामों के अलावा, योजना बनाना, डेटा दर्ज करना और डेटा संग्रह से संबंधित कर्तव्यों की सूचियां बनाना ऐसे काम हैं जो प्रत्येक आशा को करने होते हैं.
रोसम्मा चेची इस ऐतिहासिक कार्रवाई के दौरान काहवा का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रमुख नेताओं में से एक के रूप में उभरने के साथ-साथ यह सब करने में कामयाब रहीं.
हड़ताल सिर्फ इसकी अवधि के कारण ही अभूतपूर्व नहीं है, बल्कि कार्यकर्ताओं के न झुकने के संकल्प के चलते भी है.
266 दिनों के बाद, काहवा ने सचिवालय के सामने अपनी हड़ताल समाप्त करने और इसके बजाय स्थानीय स्तर पर जुटने का फैसला किया, जैसे कि स्थानीय स्वशासन चुनावों के लिए, जहां उनका मानना है कि नागरिकों के साथ नियमित जुड़ाव जारी रह सकता है. उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार द्वारा वेतन में मामूली वृद्धि का जश्न नहीं मनाया.
1 नवंबर को चुनाव अभियान के हिस्से के रूप में कई अन्य वादों के साथ एक हजार रुपए बढोतरी की घोषणा की गई थी.
उस दिन जुटे मीडिया चैनलों के सामने अपना दुख-दर्द दिखाने से आशा कार्यकर्ताओं ने इनकार कर दिया. उन्होंने घोषणा की अपनी मांगें पूरी करवाने यानी महीने में 21,000 रुपए तनख्वाह, 5,00,000 रुपए पेंशन और काम की बेहतर शर्तें, के लिए वह घर-घर जाकर या पंचायत-पंचायत जाकर लोगों को गोलबंद करना जारी रखेंगी.
जो संघर्ष वे कर रही हैं, उसे पहचान मिलने में सालों की कड़ी मेहनत लग सकती हैं, पर रोसम्मा चेची को यकीन है कि उनकी कोशिशें बेकार नहीं जाएंगी. “हमारा संघर्ष जीतेगा. हम दुनिया की सबसे बड़े सामुदायिक स्वास्थ्य वर्कफोर्स हैं और हम एक दिन इतिहास बनाएंगी. इंतज़ार करो और देखो.”
वर्तमान में: इस लेख के प्रकाशित होने के दौरान, कर्नाटक में आशा वर्कर्स यूनियन करीब एक साल से वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल कर रही है. उन्होंने 12 फरवरी, 2026 को पूरे राज्य में हड़ताल करने का ऐलान किया, जो एक साल में उनकी तीसरी हड़ताल है. पश्चिम बंगाल में भी आशा ने 23 दिसंबर, 2025 से अनिश्चित समय के लिए काम बंद हड़ताल के साथ आंदोलन शुरू किया है. उनकी मांगें हैं कि कम से कम 15,000 रुपए तनख्वाह मिले, काम करने के बेहतर हालात हों और सबसे पहले, सरकार उन्हें नियमित करके हेल्थकेयर वर्कर के तौर पर पहचान दे.
इस लेख का अनुवाद पारिजात ने किया है.
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चेन्नई की रहने वाली ग्रीष्मा कुठार, एक स्वतंत्र पत्रकार एवं वकील हैं.
मुंबई में रहने वाली प्रियंका पॉल, कलाकार, लेखक एवं एक्टिविस्ट हैं.
ग्रीष्मा और प्रियंका इन दोनों का काम सामाजिक न्याय, हाशिए की समझ को खोलने और स्वयं की पहचान के इर्द-गिर्द स्थित है. प्रियंका, अपने काम में अक्सर कविताओं या हास्य का इस्तेमाल कर स्थापित मानदंडों को चुनौती देने का काम करती हैं. अपने खाली समय में वे आईस-टी पीते हुए, छोटी- छोटी रचनात्मक किताबों को संजोते हुए या इंटरनेट पर कोई नया फितूर करते हुए दिखाई दे सकती हैं.


