“महिलाएं भुगतती हैं चिकित्सा सेवाओं के निजीकरण का सर्वाधिक ख़ामियाज़ा”

स्वास्थ्य के क्षेत्र में पब्लिक-प्राइवेट के गठजोड़ का असर आम लोगों के स्वास्थ्य पर किस तरह पड़ता है?

चित्रांकन: आयना विनाया और अपेक्षा वोरा

उदारीकरण के दौर में आर्थिक सुधारों के साथ जो चीज़ सबसे ज़्यादा उभरकर सामने आई वह थी सरकारी क्षेत्रों में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी. सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के ज़रिए सरकार ने निजी कंपनियों के साथ करार कर उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रेल एवं अन्य क्षेत्रों में शामिल किया. इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि इससे लोगों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी.

अगर, स्वास्थ्य की बात करें तो प्राइवेट सेक्टर की मुनाफ़ाखोरी, महंगी दवाइयां, हॉस्पिटल के ख़र्चे आदि ने लोगों को आर्थिक रूप से लगातार कमज़ोर किया है. स्वास्थ्य में इस मॉडल के असर को गहराई से समझने के लिए हमने पेशे से शोधकर्ता बिजोया रॉय से बात की. वे नई दिल्ली के महिला विकास अध्ययन केन्द्र (CWDS) से जुड़ी हुई हैं. बिजोया का शोध भारत में स्वास्थ्य सेवा में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर केंद्रित है. उनकी रूचियों ने उन्हें स्वास्थ्य सेवा, असमानताओं, जेंडर और हिंसा में नवउदारवादी नीतियों के प्रभाव को करीब से समझने के लिए प्रेरित किया. टीटीई के साथ इस बातचीत में, बिजोया विश्लेषण करती हैं कि कैसे पीपीपी ने स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को आकार दिया है, राज्य की भूमिका को फिर से परिभाषित किया है, और उदारीकरण के बाद के भारत में दशकों से स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित किया है.

आपका काम स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) के मॉडलों और इनके द्वारा राज्य की भूमिकाओं एवं ज़िम्मेदारियों को प्रभावित करने के तरीकों को समझने पर रहा है. स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में पीपीपी का अबतक का सफर कैसा रहा है?

वर्ष 2000 की शुरूआत में पश्चिम बंगाल में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों को देखने के साथ मेरा काम शुरू हुआ. यह वो समय था जब पश्चिम बंगाल में निजी स्वास्थ्य सेवा का विस्तार हो रहा था. विदेशों में, खासकर अमेरिका में, काम करने वाले बहुत सारे डॉक्टर घर लौट रहे थे और अस्पताल स्थापित कर रहे थे. अन्य क्षेत्रों और व्यवसायों ने भी निजी स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश करना शुरू कर दिया था. वर्ष 2000 से पहले, बंगाल में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र एक कुटीर उद्योग की तरह था – छोटे- छोटे नर्सिंग होम, क्लीनिक और अस्पताल. इन प्रतिष्ठानों में और उनके आसपास कुछ बड़ी सुविधाएं थीं. दरअसल 2000 के दशक की शुरुआत में, पश्चिम बंगाल को सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों में से एक राज्य के रुप में जाना जाता था.

इस सहस्राब्दी की शुरुआत में, राज्य द्वारा चलाए जा रहे बड़े और माध्यमिक स्तर के अस्पतालों ने कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित सहायक सेवाओं और सार्वजनिक निजी भागीदारी पर आधारित डायग्नोस्टिक सेवाओं का उभार देखा. वहीं, स्वास्थ्य सेवा पर ख़र्च के मामले में राज्य सरकार का बजट कम बना रहा. ख़ासतौर पर संस्थागत देखभाल के लिहाज़ से, पीपीपी को स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के एक उपाय के रूप में देखा गया.

धीरे-धीरे, पीपीपी का विस्तार बड़े राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों जैसे मातृत्व एवं बाल स्वास्थ्य सेवाओं (विशेषकर मलेरिया कार्यक्रमों में), आंखों की देखभाल से जुड़े कार्यक्रमों (जैसे अंधापन नियंत्रण) और टीबी से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों में भी हुआ.

हमने यह भी देखा कि सांस्थानिक जगहों, जिसका मतलब अस्पताल की व्यवस्था से है, में पीपीपी का प्रवेश ओपीडी क्लीनिक से लेकर डायग्नोस्टिक्स जैसी रोगियों को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में एक साथ होता है. या फिर, भोजन या अस्पताल परिसर के भीतर साफ़-सफ़ाई जैसी अन्य सुविधाओं के रूप में होता है. कहने का मतलब, सहायक और प्रत्यक्ष देखभाल की सेवाओं के मिश्रण के ज़रिए पीपीपी की शुरूआत हुई. इसके पीछे की सोच यह थी कि प्राइवेट सेक्टर की एंट्री से बेहतर सेवाएं और प्रतिस्पर्धा आएगी, जो अंततः स्वास्थ्य सेवाओं की दक्षता में सुधार लाएगी. शुरूआत में इन प्रयोगों को पश्चिम बंगाल, पंजाब और कर्नाटक में अपनाया गया और बाद में धीरे-धीरे यह सभी राज्यों में फैल गया.

आगे चलकर, हमने देखा कि पीपीपी ने अस्पताल के बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रवेश कर लिया है. कई अस्पताल अंग्रेज़ों के समय में, या 1960 और 70 के दशक में बनाए गए थे. उनमें मौजूदा मांगों के अनुरूप बदलाव और मरम्म्त की ज़रूरत थी. लिहाज़ा, हमने बहुत सारे पीपीपी कंस्ट्रक्शन- संचालन- और ट्रांसफर (बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर) और अन्य किस्म के मॉडल के ज़रिए सामने आते हुए देखा. इनमें बहुत बड़े पैमाने पर प्राइवेट सेक्टर का पैसा शामिल होता है और सरकार द्वारा आर्थिक रूप से मदद पाने वाली स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर को एंट्री मिल जाती है.
आजकल, हम पीपीपी को संपर्क बनाने वाली गतिविधियों में या प्राथमिक स्वास्थ्य की देखभाल से जुड़ी व्यवस्था के ज़रिए भी आते हुए देखते हैं. उदाहरण के लिए, गांवों में आपको सामुदायिक या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मिलते हैं और उनके नीचे उपकेंद्र होते हैं, जिन्हें अब ‘वेलनेस क्लिनिक’ के रूप में तैयार किया जा रहा है.

बढ़ते हुए निजीकरण से स्वास्थ्य सेवा तक जेंडर आधार पर पहुंच कैसे प्रभावित होती है?

देखिए, महिलाएं शायद ही कभी निर्णय लेने वाली भूमिका में होती हैं. किसको क्या मिलेगा, कैसे मिलेगा, कितना मिलेगा और घर में संसाधनों को किस तरह संभाला जाएगा – इसका निर्णय किसी भी परिवार में कोई महिला नहीं लेती है. भले ही वे कमा रही हों, लेकिन ज़रूरी नहीं कि महिलाओं का अपनी ख़ुद की कमाई पर कंट्रोल हो.

विभिन्न देशों में यह देखा गया है कि जब स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण किया जाता है, तो महिलाओं को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और वे सबसे अधिक प्रभावित होती हैं.

अफ्रीका में, स्वास्थ्य सुविधाओं में मरीज़ों से फीस लेने की व्यवस्था को हटाने से प्रेग्नेंसी के समय की दिक्कतों और उससे होने वाली मौत समेत नवजात शिशुओं की मौत में भी गिरावट आई है.

इसी तरह से नेपाल में, इसी किस्म के उपायों से वर्ण व्यवस्था में निचले तबके की जातियों की महिलाओं में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में गिरावट आई है. जब कोई ‘कस्टमर फीस’ नहीं होती है, तो स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने की महिलाओं की क्षमता में सुधार होता है.

फिर एक सवाल यह भी है कि इस देखभाल का लाभ लेता कौन है? कुछ साल पहले, एम्स में बच्चों के हृदयरोग (कार्डियक) से जुड़े वार्ड में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि लड़कों को लड़कियों के मुकाबले तरजीह दी जाती है. मतलब, एक परिवार के भीतर देखभाल का प्रावधान भी पुरूष सदस्यों के प्रति पक्षपाती है. प्राइवेट स्वास्थ्य सेवा का लाभ लेने के मामले में, परिवार के पुरुष सदस्यों के लिए संसाधन अधिक तेज़ी से जुटाए जाते हैं.

कर्मचारी पर आधारित स्वास्थ्य बीमा के मामले में महिलाएं इस सुविधा से वंचित होती हैं,

क्योंकि भारत जैसे देशों में बड़ी संख्या में महिलाएं असंगठित क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं. इस तरह अब हम निजीकरण करके और हर चीज़ को बीमा से जोड़कर उन्हें स्वास्थ्य सेवा के दायरे से बाहर धकेल रहे हैं.

ऐसे माहौल में, आपके हिसाब से सबसे अधिक ज़रूरी बहसें क्या हैं?

सबसे अहम नीतिगत बहसों में से एक यह है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर नज़र रखते हुए हम प्राइवेट सेक्टर को कैसे नियंत्रण में रख सकते हैं? दूसरा, इस महामारी के दौरान, हमने यह समझा है कि सिर्फ़ अस्पताल ही हमारी मदद के लिए नहीं आएंगे, हमें एक मज़बूत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की ज़रूरत है.
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हम इन प्रणालियों की फिर से कैसी परिकल्पना करते हैं? इस बारे में काफी बहस है कि कैसे

निजी क्षेत्र अस्पताल सेवाओं को अधिग्रहित कर सकता है, और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली समुदाय आधारित जरूरतों की देखभाल करेगी. लेकिन सवाल यह है कि हम इन दोनों को इतना अलग और एक–दूसरे से दूर कैसे रख सकते हैं, क्योंकि स्वास्थ्य सेवा के ये सभी स्तर एक प्रकार से आपस में जुड़े हुए हैं.

यह हमारे स्वास्थ्य सेवा से जुड़े ढांचे को और अधिक विभाजित करता है.

एक और महत्त्वपूर्ण बहस: अब हमें यह अहसास हो रहा है, विशेष रूप से अधिक डेटा के साथ और जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के बारे में हमारी समझ बढ़ी है, कि पशुओं के स्वास्थ्य और हमारे पर्यावरण की स्थिति से मानव स्वास्थ्य कैसे प्रभावित होता है. तो, सवाल यह है कि क्या इस चिकित्सकीय नज़रिए को अपनाया जा सकता है? और क्या यह टिकाऊ है?

हमारी स्थानीय और समुदाय आधारित स्वास्थ्य परंपराएं उन मुख्य क्षेत्रों में से एक हैं जिनपर ध्यान दिया जाना है. जब हम पिछले साल के मातृत्व संबंधी देखभाल पर नज़र डालते हैं, तो हम इस क्षेत्र को उभरता हुआ पाते हैं, और शायद हम इस महामारी की स्थिति के मद्देनजर इस वर्ष भी ऐसा होते हुए देखेंगे.

कोविड-19 से जुड़े परिदृश्य में प्रसव और अस्पतालों में बच्चे का जन्म एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन गया है क्योंकि महिलाएं अस्पतालों में सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं और साथ ही सेवा प्रदाताओं के उत्पीड़न का सामना भी कर रही हैं. लिहाज़ा दाई का काम फिर से शुरू हो रहा है, और इन सामुदायिक दाइयों, को और अधिक मान्यता देने की ज़रूरत है.

तो, हम इन सब बातों से कैसे जुड़ते हैं? हम मातृ स्वास्थ्य सेवा से जुड़े मुद्दों को कैसे संभालेंगे – महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े कई मुद्दों को दाईयों ने सदियों से संभाला है- कम संसाधन वाले क्षेत्रों में स्थाई तरीके से इसे अंजाम दिया जा सकता है.

क्या आप दाईयों की भूमिका के बारे में और अधिक विस्तार से बता सकती हैं?

हमने चार राज्यों में स्वदेशी दाईयों के बारे में एक अध्ययन किया और यह महसूस किया कि जिन इलाकों में सामुदायिक दाई की प्रथा पीढ़ियों से चली आ रही है, वहां प्रसव कराने वाली महिलाओं को दाईयों के साथ सहज महसूस होता है और कभी-कभी जब इन महिलाओं का परिवार उन्हें प्रसव के लिए हॉस्पिटल ले जाता है, तो दाईयों को उनके साथ जाने के लिए कहा जाता है. घर पर दाईयों के निरंतर समर्थन ने महिलाओं को घर में प्रसव करने में मदद की और पहली बार मां बनने वाली महिला एवं नवजात शिशु को भी सहायता प्रदान की.

दाईयों द्वारा एक साझा और अनुभवात्मक ज्ञान प्रणाली के ज़रिए महिलाओं ने पीढ़ियों से एक-दूसरे से सीखा है. लेकिन जब नीतियां इस प्रथा का समर्थन नहीं करती हैं, तो सामुदायिक स्तर पर ज्ञान की भारी हानि होती है.

हमने देखा है कि कैसे कोविड के कारण मातृ स्वास्थ्य की देखभाल से जुड़ी प्रणाली और प्रसव से जुड़ी ज़रूरतें प्रभावित हुईं और दाईयों की कमी ने प्रसव के दौरान विभिन्न संस्थानों से बाहर निकाले जाने की वजह से कई जन्म देने वाली महिलाओं को खतरे में डाल दिया गया.

हाशिए पर रहने वाले लोगों, मसलन बीपीएल परिवारों या गर्भवती महिलाओं, के लिए कई सरकारी योजनाएं हैं. पीपीपी वाले नज़रिए से ये योजनाएं ज़मीन पर कैसे उतरती हैं?

अगर हम प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना या राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी राष्ट्रीय बीमा योजनाओं के बारे में बात करें, तो इनमें कुछ ऐसी सेवाएं हैं जो सार्वजनिक अस्पताल प्रदान करते हैं और कुछ ऐसी हैं जिनका निजी क्षेत्र ध्यान रखता है. और अक्सर, निजी क्षेत्र वैसी सेवाओं से जुड़ना चाहता है, जिनसे लाभ की संभावना या किसी प्रकार के आर्थिक कमाई की संभावना होती है.

जब राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना आई, तो हमने तेलंगाना और बिहार में अवांछित रूप से गर्भाशय-उच्छेदन (हिस्टेक्टमी) की कई घटनाएं देखीं. प्राइवेट सेक्टर इन सेवाओं और उनके मूल्य निर्धारण पर केंद्रित था. योनि गर्भाशय-उच्छेदन (वेजाइनल हिस्टरेक्टमी) बीमा पैकेज में निर्धारित स्त्री रोग संबंधी प्रक्रियाओं के सेट के भीतर सबसे बड़ा पैकेज था. इस प्रकार, आप एक किस्म का अवसरवादी व्यवहार देखते हैं.

नतीजतन, निजी क्षेत्र निवारक देखभाल से जुड़ी सेवाओं को हाशिए पर रखता है और उंचे स्तर की उपचारात्मक सेवाओं पर अधिक ध्यान केन्द्रित करता है. पैनल में शामिल छोटे और मंझोले आकार के नर्सिंग होम के लिए ये प्रक्रियाएं महिलाओं के स्वास्थ्य के नुकसान की कीमत पर एक सुनिश्चित राशि अर्जित करने का एक ज़रिया बन गई हैं. इनमें से एक मामला महाराष्ट्र का भी था, जहां खेतों में काम करने वाली महिलाओं को गर्भाशय-उच्छेदन (हिस्टेरेक्टॉमी) कराने के लिए मजबूर किया गया था. मतलब अधिक राजस्व के लिए अधिक गर्भाशय-उच्छेदन (हिस्टेरेक्टॉमी).

वर्ष 2000 के दशक के मध्य में, राज्य स्तर पर बड़ी संख्या में नीतियां थीं जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वाले परिवारों को संस्थागत प्रसव करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सामने आईं. गुजरात की चिरंजीवी योजना ऐसी ही एक नीति थी. अस्पताल में प्रसव के बाद, महिलाओं को उसमें आने वाले खर्च की प्रतिपूर्ति करने का प्रावधान था. उसके बाद हमें सिजेरियन डिलीवरी की संख्या में अचानक बढ़ोतरी होती दिखी. मध्य प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में भी इसी तरह की योजनाएं शुरू की गईं. उचित नियमों और निगरानी के बिना, ये निजी स्वास्थ्य सेवाएं दरअसल महिलाओं की जरूरतों के खिलाफ चली गईं क्योंकि उनका सारा ज़ोर लाभ कमाने पर था.

साझेदारी के संदर्भ में अगर देखें, तो अधिकांश निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता शहरी क्षेत्रों में या बेहतर सुविधा वाले जिलों में स्थित होते हैं. लिहाज़ा वे कितने न्यायसंगत और सुलभ होंगे, यह भी एक सवाल है. निजी प्रदाताओं की अवस्थिति उन्हें सबसे गरीब और हाशिए पर रहने वाले (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों) तक पहुंचने से रोकती है.

वर्तमान प्रणाली को देखते हुए, आपके हिसाब से सभी के लिए सुलभ और न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवा हासिल करने के तरीके क्या हों?

सरकार से हमारी प्रमुख मांगों में से एक सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के लिए बजट आवंटन में बढ़ोतरी होनी चाहिए. इसके बिना इन सेवाओं को आम लोगों के लिए उपयोगी नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जबकि हमारी आबादी की एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है.

दूसरा, स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी श्रमशक्ति का मसला गंभीर है. हमारी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में नर्सों, डॉक्टरों, पैरामेडिकल और गैर-चिकित्सा कार्यों (वार्ड सहायक, सफाई कर्मी) से जुड़े कर्मचारियों की भारी कमी है. वर्षों से खाली पड़ी सीटों ने भारी असंतुलन पैदा कर दिया है. बड़ी संख्या में क्लिनिकल और नॉन-क्लिनिकल पदों को टेम्पररी या अस्थायी बना दिया गया है. इनकी संख्या अब पर्मानेंनट पदों से अधिक है. इस व्यवस्था ने पिछले कई वर्षों में कम तनख्वाह के साथ अनिश्चित नौकरियों को जन्म दिया है. सरकारी अस्पतालों में पूरी तरह से अनुबंध यानी कॉन्ट्रैक्ट वाले पदों में ग्रुप-डी के कर्मचारियों का स्थान पहला है. इसने सार्वजनिक क्षेत्र के स्वास्थ्य संस्थानों में अभाव को और गहरा कर दिया है.

तीसरा, हमें विभिन्न किस्म के मज़बूत विनियमन या रेगुलेशन की ज़रूरत है. सामुदायिक स्वास्थ्य से लेकर राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा संचालित अस्पतालों के स्तर पर बड़ी संख्या में पीपीपी लागू हैं, जिससे निगरानी करना मुश्किल हो गया है. जैसा कि मैंने पहले कहा, अगर आप पीपीपी को आमंत्रित कर रहे हैं तो वे सबसे जटिल करार वाले समझौतों में से एक होते हैं. और, पीपीपी के नियमों और शर्तों की जानकारी व्यापारिक गोपनीयता के नाम पर सार्वजनिक जांच के लिए खुले तौर पर उपलब्ध नहीं है. यह पहलू नियंत्रण और निगरानी को एक ही साथ बेहद महत्त्वपूर्ण और कठिन बना देता है.

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.

इस लेख का अनुवाद जितेन्द्र कुमार ने किया है.

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