एक केसवर्कर कौन होती हैं? वे कौन लोग हैं जो जेंडर आधारित हिंसा पर काम करते हैं? उनका खुद का अतीत क्या है? वह क्या है जो उन्हें इस मुद्दे से जोड़े रखता है? जेंडर आधारित हिंसा पर उनकी अपनी सोच या विमर्श क्या है? ‘केसवर्कर्स के साथ एक मुलाकात’ सीरीज़ में आप उत्तर-प्रदेश के अलग-अलग ज़िलों में ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली केसवर्कर्स से मुलाकात करते हैं. सीरीज़ के इस एपिसोड में मिलिए चार केसवर्कर्स से – सद्भावना ट्रस्ट से तबस्सुम और हुमा, सहजनी शिक्षा केंद्र से राजकुमारी और वनांगना संस्था से शोभा.
हुमा कहती है, “कभी-कभी यह होता है कि लोग मारते-पीटते नहीं हैं, गाली-गलौज नहीं करते, लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें करते हैं जो उस महिला के खिलाफ होती है. ऐसे में घुटन होती है.” हुमा मानती हैं कि जब से उन्होंने केसवर्क का काम शुरू किया है उनके भीतर भी बहुत कुछ बदल गया है और उनके परिवार वालों का भी यही मानना है. वहीं, तबस्सुम का परिवार उनके काम से खुश नहीं है, वो कहती हैं, “मेरी ज़िद है और मैं अपनी मर्ज़ी से ये काम कर रही हूं.” तबस्सुम को लगता है कि जब भी वो कैमरा अपने हाथ में उठाती हैं तो भीतर एक तरह की ताकत महसूस करती हैं.
शोभा को अपने काम से मिली पहचान से खुशी महसूस होती है. तो, फ़ील्ड पर महिलाओं की बुरी स्थिति देखकर राजकुमारी को “गुस्सा बहुत आता है.” वो कहती हैं, “लेकिन मालूम है कि अगर हम यहां लड़ाई करेंगे तो यहीं तक सीमित रह जाएंगे. हमें इसे आगे ले जाना है, महिला को न्याय दिलाना है. तो हम खुद में बहुत कंट्रोल करते हैं.”
इन चारों केसवर्कर्स ने कुछ साल पहले से ही जेंडर आधारित हिंसा के मामलों पर काम करना शुरू किया है. और अपने-अपने तरीकों से, अपनी खुद की परिस्थितियों के बीच से वे न्याय तक महिलाओं की पहुंच को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
साल 2022 में हमने उत्तर-प्रदेश के ललितपुर, बांदा और लखनऊ ज़िले में काम करने वाली 12 केसवर्करों के साथ काम किया, एक-दूसरे को सुना और समझा भी. हमारी इसी गहन प्रक्रिया से कुछ शब्द निकले और उनपर चर्चा करते-करते ‘हिंसा की शब्दावली’ ने जन्म लिया. यह शब्दावली केसवर्करों के काम, अनुभव और ज़िंदगी के प्रति उनकी समझ को समेटे हुए है. इसमें जेंडर आधारित हिंसा से जुड़े उन महत्त्वपूर्ण शब्दों को शामिल किया गया है, जिनकी मदद से ज्ञान और समझ का निर्माण होता है.
शब्दावली पर काम करने वाली सभी केसवर्कर हत्या, बलात्कार, अपहरण, बच्चों के यौन शोषण, दहेज हत्या और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर काम करती हैं. ये सभी अपने समुदायों के बीच से ही निकलकर आई हैं. इनमें से कुछ तो खुद भी हिंसा का शिकार रही हैं.
इस प्रोजेक्ट का एक मकसद केसवर्करों के काम को नए नज़रिए से देखना भी है. अबतक हम उन्हें संकट के समय मदद के लिए सबसे पहले खड़ी होने वाली मददगार के रूप में देखते आए हैं. यह शब्दावली उनके व्यक्तित्व के उन पक्षों को सामने लागने का काम करती है जो सक्रिय रूप से न्याय की खोज में जुटी हैं और जिन्हें इस बात का ज्ञान है कि ज़मीनी स्तर पर ‘न्याय’ की क्या स्थिति है और इसे पाने के लिए किस तरह की भुलभुलैया से गुज़रना होता है.
‘केसवर्कर्स से एक मुलाकात’ सीरीज़ के ज़रिए मिलिए उन 12 केसवर्करों से जिन्होंने हिंसा की शब्दावली को तैयार करने का काम किया है. और जानिए कि एक महिला को हिंसा से बचाने या उसे न्याय दिलवाने के लिए एक केसवर्कर को परिवार, समुदाय और प्रशासनिक ढांचे के त्रिकोणीय समीकरण से कैसे जूझना पड़ता है?
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द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.


