यौनिकता एवं अवचेतन शृंखला में यह पांचवा लेख है जो संबंधित विषय पर लेखक के शोध, उनके विचार और विश्लेषण पर आधारित है. इस लेख में लेखक यौन फंतासियों को देखने की कोशिश कर रही हैं कि क्या हमारी नारीवादी राजनीति के साथ इसका कोई संघर्ष है? यह शृंखला कुछ प्रमुख मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा करती है और यौनिकता पर काम करते हुए इन सिद्धांतों की शैक्षणिक संभावनाओं को भी सामने लाती है. शृंखला के पहले भाग में हमने जाना कि आश्यर्च पर बात की, वहीं दूसरे भाग में हमें चाहत और कमी पर बात की थी, तीसरा भाग तर्कसंगति की सीमाओं पर बात करता है तो वहीं चौथा भाग यौनिक चाहतों की यमी-यकी पर बात करता है.
यौन फंतासियों पर किए गए एक सर्वे में, (जिसके बारे में इसी शृंखला के भाग 2 में बात हुई है) दो जवाबदाताओं ने जिक्र किया कि उनके मन में अंतरद्वंद्व चलता रहता है, क्योंकि उनकी यौन फंतासियों में हाशिए पर खड़े लोग होते हैं.
उन्होंने बताया कि उनकी फंतासियां में योनकर्मी (सेक्स वर्कर) और मजदूर वर्ग के श्रमिक होते हैं, और यही बात उन्हें असहज कर देती है, क्योंकि वे उस कठोर जिंदगी की असलियत से अच्छी तरह वाकिफ हैं जिनमें यौनकर्मी और श्रमिक वर्ग गुजर करते हैं.
कुछ ऐसी ही बातें पर एक और जवाबदाता ने लिखा, “एक नारीवादी होने के नाते मैं हमेशा उन लोगों के साथ खड़ी रही हूं जो हिंसा का शिकार हुए हैं, पर मेरी अपनी बलात्कार की फंतासी मुझे बहुत ज़्यादा परेशान करती हैं. मुझे आंतरिक संघर्ष से भर देती है.”
आंतरिक संघर्ष का एक और स्रोत रूढ़िगत जेंडर भूमिकाओं से जुड़ी फंतासियां थीं. यानि वह जेंडर आधारित भूमिकाएं जिन्हें असल जिंदगी में कुछ जवाबदाताओं ने चुनौती भी दी है. जैसे, एक जवाबदाता ने अपनी फंतासी में अपने पर लगाम रखने वाले को डैडी की भूमिका में और खुद को “कमसिन रखैल” (प्रिंसेस स्लट) के रूप में वर्णित किया. उसने लिखा, “मुझे लगता है कि मेरी नारीवादी राजनीति ने मेरी यौनिकता की समझ और इससे जुड़ी मेरी इच्छाओं को भी प्रभावित किया है. यही वजह है कि डैडी वाला मसला कश्मकश से भरा था और अब भी है. मेरे लिए यह मानना कि मुझे किसी पुरुष के देखभाल की ज़रूरत है, काफी मुश्किल रहा है.”
फंतासियों का एक अन्य पहलू जिसने आंतरिक संघर्ष पैदा किया, वह था अपमान.
एक जवाबदाता ने इसे “एक पहाड़ जैसे” विरोधाभास की उपाधि दी. “अपनी रोमांटिक और यौन दोनों भावनाओं के वश में होना, भले ही इसमें अपमान शामिल हो, बहुत परेशान करने वाला हो सकता है.” उसने कहा.
इसी तरह जवाबदाताओं के भीतर चाहतों को लेकर जो आंतरिक संघर्ष था वह कभी-कभी पोर्न के साथ उनके संबंध में भी जाहिर हुआ. एक जवाबदाता ने उस अपराधबोध के बारे में लिखा जो उसने गैर-सहमति के यौनकर्म वाले पोर्न को देखने के चलते महसूस किया.
अगर हम इन जवाबों को देखें, तो मुख्य रूप से दो तरह के “आंतरिक संघर्ष” सामने आते हैं. एक, उन लोगों की असल ज़िंदगियों की निर्मम सच्चाई के इर्द-गिर्द हैं, जो उनकी फंतासियों में होते हैं. जैसे, यौनकर्मियों के साथ जिस तरह की हिंसा होती है, श्रमिक वर्ग का शोषण और बलात्कार पीडित महिला को जिस तरह के मानसिक और शारीरिक आघात से गुज़रना होता है. दूसरा, यह अहसास कि अपनी फंतासियों में वे जिस तरह से बर्ताव करते हैं वह उनके मूल्यों और विचारधारा के खिलाफ है.
बलात्कार की फंतासी इन दोनों पहलुओं को समेटे हुए थी. जिस तरह का आंतरिक संघर्ष उन्होंने जाहिर किया वह बलात्कार पीड़िताओं की निर्मम हकीकत के साथ-साथ नारीवादी मूल्यों के साथ कथित असंगति के इर्द-गिर्द था.
हालांकि हर पहलू से देखें तो उनका आंतरिक संघर्ष इस मजबूत धारणा पर टिका खड़ा है कि उनकी फंतासियां उनकी बाकी ज़िंदगी का अक्स है. उनके जवाबों में बार-बार यह बात सामने आ रही थी कि: यह कैसे हो सकता है कि मेरी – जो एक नारीवादी, उदारवादी, प्रगतिशील, नैतिक/सदाचारी इंसान, एक कार्यकर्ता वगैरह- ऐसी फंतासियां हैं!
इस गुत्थी को सुलझाने के लिए कि क्या सच में यहां पर फंतासियों और मूल्यों के बीच कोई टकराहट है, आइए कुछ ज़रूरी बिन्दुओं को थोड़ा खोल कर देखते हैं:
- निषेध या मनाही का स्रोत कौन है? क्या ये एक से ज़्यादा हैं?
- अनुमति का स्रोत कौन है? क्या ये एक से ज़्यादा हैं?
- क्या मना किया जा रहा है और किस बात की अनुमति दी जा रही है? और किसके ज़रिए?
बिग अदर का एक संक्षिप्त परिचय
मनाही और अनुमति के बीच के खेल को समझने की कुंजी जैक लकां द्वारा विकसित मनोविश्लेषणात्मक अवधारणा “कोई एक दूसरा” है (जिसे मैं बिग अदर के रूप में संदर्भित करूंगी क्योंकि मुझे यह अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति लगती है).
बिग अदर, अपने मानदंडों के ज़रिए, यह निर्धारित करता है कि शिशु, बच्चे और बाद में वयस्क के लिए किस तरह का सुख प्राप्त करना स्वीकार्य है.
बिग अदर कई तरह के आकार ले सकता है, सबसे पहले ये भाषा में दिखाई देता है.
जिस तरह गर्भाशय के तरल जीवद्रव्य में एक शिशु 9 महीने तक रहते हुए बड़ा होता है, उसी तरह भाषा ही है जो शिशु को शब्दों या प्रतीकों से घेरे रहती है. ध्वनियों की अनजान और रोमांचक दुनिया, जो समय के साथ बच्चे के लिए सूचक और अर्थपूर्ण बन जाते हैं. यह अधिकार का पहला स्रोत है जिससे बच्चा रूबरू होता है क्योंकि इसके नियमों का पालन किए बिना, ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी संवाद (मौखिक या अशाब्दिक) असंभव है.
यहां ‘बिग अदर’ माता-पिता भी है — अधिकार का प्रतीक — और जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, अधिकार की भूमिका मानदंडों, संस्कृति, समुदाय, और कानून द्वारा निभाई जाती है.
हालांकि, बिग अदर वह आंख है जो बना रहता है जिसके लिए हम सारा जतन करते हैं, एक सर्वशक्तिमान देखने वाला. जैक लकां के शब्दों में, यह वह कोई एक दूसरा है जो हमारी हर हरकत और बातचीत पर नज़र रखता है.
चाहे हम बिग अदर का पालन करें या उसकी अवहेलना, हमारी इच्छाओं को हमेशा उसके संबंध में होना होता है. यह केवल बिग अदर की स्वीकृति और अस्वीकृति, इच्छाओं और आकांक्षाओं, सपनों और निराशाओं के संबंध में ही है कि हम अपनी खुद की इच्छा पाते हैं.
हमारे जीवन में कई तरह के बिग अदर मौजूद हैं. इनके अस्तित्व को पहचानना ही हमारी इच्छाओं और फंतासियों के संबंध में आंतरिक संघर्षों को कम करने की कुंजी है. अपने सर्वे पर वापस लौटें, तो जवाबों से पता चला कि आंतरिक संघर्ष एक तरह के समूह के यौन मानदंडों के इर्द-गिर्द अनुभव किया गया था. जिन यौन मानदंडों के इर्द-गिर्द आंतरिक संघर्ष का अनुभव किया गया, वे यौन फंतासियों के तत्वों से संबंधित थे, जिनमें अपमान, नियंत्रण, गैर-सहमति वगैरह शामिल थे. इसके अलावा लगभग किसी और तरह के समूह में यह आंतरिक संघर्ष नहीं देखा गया, जो एक व्यक्ति के साथ ही सेक्स (विपरीत सेक्स/जेंडर के साथ) या निजी तरीके से सेक्स होने वगैरह के बारे में बात कर रहे थे.
तो, इन अलग-अलग तरह के यौन मानदंडों को उनके ‘बिग अदर’ के संदर्भ में समझा जाना चाहिए जो इसे निर्धारित करते हैं. आइए दूसरे वाले यौन मानदंडों से शुरुआत करें. इन्हें निर्धारित करने वाले बिग अदर को हम मुख्यधारा, परंपरा, रूढ़िवाद नाम दे सकते हैं. लेकिन इसका सटीक विश्लेषण तब निकलकर आता है जब हम इन्हें पितृसत्ता को बनाए रखने के रूप में देखते हैं.
पहली तरह के यौन मानदंडों से संबंधित बिग अदर (जो अपमान, असहमति, नियंत्रण वगैरह की निंदा करते हैं), इसे भी कई नामों से पुकारा जा सकता है जैसे उदारवाद, आधुनिकता, प्रगतिशील विचारधाराएं,लेकिन मैं कोई और नाम चुनूंगी.
मेरा सुझाव है कि पितृसत्ता के साथ-साथ इनको नारीवाद के साथ जुड़ाव के आधार पर भी देखें.
नारीवाद ही क्यों? इसका पहला कारण यह है कि इस अनाम सर्वे के कई जवाबदाताओं ने खुद की पहचान एक नारीवादी के रूप में की. दूसरा कारण नारीवादी के रूप में खुद को जवाबदेही बनाने में हम बहुत माहिर होते हैं. यह आत्म-प्रताड़ना, जो अकेले हो या साथ मिलकर ये हमें आंतरिक संघर्ष की पड़ताल करने या बिग अदर के रूप में माकुल जगह देता है.
नारीवाद को चुनने को लेकर तीसरी वजह है कि यह एक ऐसी विचारधारा है जिसके मूल्य स्पष्ट एवं मुखर रूप से व्यक्त किए गए हैं. इस जांच में नारीवादी मूल्यों को लाना पितृसत्ता की स्पष्ट रूप से व्यक्त विचारधारा के संबंध में, खोजबीन करने में मदद करेगा.
नारीवाद का बिग अदर
एक स्वतंत्र महिला के बतौर एम ने अपनी यौन फंतासियों के प्रति मजबूत विरोधाभास व्यक्त किया. अपनी फंतासी में वे अपना कंट्रोल किसी और के हाथ में देने और खुद के साथ ज़बरदस्ती किए जाने वाले सेक्स में मज़ा लेने की बात करती हैं.
जे ने एक ट्रांसमैन और घोषित क्वीयर नारीवादी बतौर गैंगबैंग (सामुहिक बलात्कार) की फंतासी साझा की जिसने उसे नियंत्रण और उल्लंघन के कृत्यों पर अमल करने की अपनी इच्छा के बारे में गहरे अंतरद्वंद्व में पहुंचा दिया.
नारीवादी के रूप में पहचान रखने वाले एम और जे, दोनों के लिए परेशान करने वाली बात यह थी कि अपनी फंतासियों में, वे उन मानदंडों का उल्लंघन करते हैं जहां यौन संबंध में पारस्परिकता, सहमति, गरिमा और खुदमुख्तारी शामिल होनी चाहिए. ये नारीवादी मानदंड अधिकार और न्याय की बात करते हैं, जिसके साथ अस्तित्व एवं स्वायत्त के मुल्य भी जुड़े हैं. ये नारीवाद के मूल आधार हैं जिन्हें, जवाबदाता अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जीने की कोशिश करते हैं.
चाहे इस मामले में हो, या हाशिए पर खड़ी पहचानों और ज़िंदगियों से जुड़ी फंतासियों के मामले में, ऐसा लगता है कि नारीवाद का बिग अदर यौन फंतासियों के उन पहलुओं को महसूसने की इजाज़त नहीं देता जो न्याय, समानता, गरिमा, पारस्परिकता, स्वायत्तता, सहमति और अधिकारों से संबंधित नारीवादी मानदंडों का उल्लंघन करते हुए लगते हैं.
मैं जानबूझकर ‘ऐसा लगता है’ और ‘जान पड़ता है’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रही हूं, क्योंकि यह सवाल कि क्या नारीवाद का बिग अदर असल में ऐसी यौन फंतासियों को निषिद्ध करता है, इसकी जांच होना अभी बाकी है.
नारीवाद के बिग अदर के साथ संबंध
इस विशेष समूह के जवाबदाताओं के डेटा से पता चला कि वे (और हम भी) नारीवाद को बहुत ज़्यादा ही सम्मान की नजर में रखते हैं और इसके साथ पितृसत्ता को जितना मुनासिब हो नज़रअंदाज करना चाहते हैं.
एम, और सर्वे में शामिल ज़्यादातर जवाबदाताओं ने, पितृसत्ता के बिग अदर को खास गंभीरता से नहीं लिया था, कम से कम फंतासियों के स्तर पर. वहीं नारीवाद से इजाज़त मिलना ज़रूरी है क्योंकि ये उनकी ज़िंदगी में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, यहां तक की उनके यौन जीवन में भी. सर्वे में नारीवाद के साथ अपने रिश्ते के बारे में साझा किए गए उनके जवाबों से यह स्पष्ट था.
एस ने नारीवाद को यौन सशक्तिकरण के स्रोत के रूप में और साथ ही कथित निषेधों के स्रोत के रूप में स्पष्टता से व्यक्त किया है. एस ने लिखा कि नारीवाद के साथ विरोधाभास केवल “तभी होता है जब ज़बरदस्ती के साथ सेक्स करने की इच्छा होती है.” लेकिन वह इस बात की सराहना करती हैं कि कैसे नारीवाद “महिलाओं की अपनी यौनिकता के अधिकार” की बात करता है.
यौनिकता के अन्य पहलुओं, या सामान्य रूप से जीवन के अन्य पहलुओं के लिए नारीवाद एक सशक्तीकरण की भूमिका निभाता है. यह इस बात को समझने में भी मददगार हो सकती है कि क्यों हम बहुत बेताबी से यह महसूस करते हैं कि नारीवाद, बिग अदर के रूप में, हमें उन फंतासियों की इजाजत नहीं दे रहा है जो इसके द्वारा बनाए गए मूल्यों के साथ टकराते हुए लगते हैं.
अब हम जवाबदाता जे पर वापस लौटते हैं, जो एक ट्रांसमैन हैं. हमने पहले ही नारीवाद के संबंध में अनुभव किए गए उसके गहरे संघर्ष को सुन लिया है. उन्होंने खासकर उस संघर्ष के बारे में लिखा जिसे वह अपनी फंतासियों की वजह से अनुभव करते हैं क्योंकि उसकी इच्छा “नियंत्रण और अपमान और स्त्री देहों पर ज़बरदस्त नियंत्रण के इर्द-गिर्द बहुत अधिक केंद्रित है.” सर्वे में एक अन्य सवाल के जवाब में, जो विशेष रूप से नारीवाद और उनकी जीवन इच्छाओं के बीच संबंध के बारे में था, उन्होंने लिखा:
कई जवाबदाताओं ने, जो खुद को नारीवादी मानते थे, जोर देकर लिखा कि नारीवाद ने उन्हें अपनी चाहतों की खोज करने में सक्षम बनाया. डी, की पहचान एक महिला की है. उन्होंने लिखा कि नारीवाद ने उसे “अपने शरीर, पहचान, इच्छाओं के साथ और ज्यादा सहज होने की इजाज़त दी…” सी ने बताया कि कैसे नारीवाद ने उन्हें अपनी चाहतों के नए रास्तों और इच्छा की नई राजनीति तलाशने में मदद की, जिसमें चाहत को समझने और उससे संबंधित अमल करने का एक अलग तरीका शामिल था. उसने लिखा,
तो क्या वास्तव में यौन फंतासियों और नारीवाद के बीच कोई संघर्ष है?
अब समय है उस बड़े सवाल का सामना करने का क्या नारीवाद और यौन फंतासियों के बीच, जो इसके मूल्यों से टकराते हैं, कोई संघर्ष है?
इस सवाल के बारे में सोचने में, जवाबदाता एफ मदद कर सकती हैं. अपनी साझा की गई फंतासियों— एक जहां वह अपनी घरेलू सहायिका को यौन रूप से चाहती थी और दूसरी जहां वह खुद यौन रूप से किसी के अधीन थीं —के बारे में अपनी भावनाओं के संबंध में, उन्होंने कहा, “वास्तव में, मुझे कोई टकराव महसूस नहीं होता. हालांकि मुझे यकीन है कि मेरी फंतासियां अपमानजनक हैं, मुझे नहीं लगता कि यह मेरी राजनीति से कहीं टकराती है. शायद, क्योंकि ये सिर्फ फंतासियां हैं, जो मेरे दिमाग के सुरक्षित घेरे में चलती है.”
ठीक यही बात है, वे फंतासियां हैं, हकीकत नहीं. एफ हमें यह देखने में मदद करती है कि फंतासियों को शाब्दिक रूप से नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि फंतासियों और वास्तविकता के बीच कोई परस्पर संबंध नहीं है. सपनों की तरह, अवचेतन की फंतासियों में एक मजबूत भूमिका होती है. बलात्कार की फंतासी का मतलब यह नहीं है कि मैं असल जीवन में किसी का बलात्कार करना चाहती हूं या बलात्कार का शिकार होना चाहती हूं.
फंतासियां, सपनों की तरह, शाब्दिक रूप से नहीं पढ़ी जा सकतीं.
फंतासियों और सपनों के बीच समानता रोज़मर्रा की भाषा में जाहिर होती है जब ‘फंतासी’ और ‘दिवास्वप्न’ शब्दों का कभी-कभी परस्पर उपयोग किया जाता है. जबकि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारक हमारे सपनों और फंतासियों की अंतरवस्तु पर असर डालते हैं, वास्तविकता के साथ इस कड़ी का मतलब यह नहीं है कि सपने या फंतासियां हमारी असल जिंदगी में भी घटेंगी.
फंतासियां दूसरों की सहमति के साथ रोल प्ले के रूप में पूरी हो सकती हैं, लेकिन यह वास्तविकता में, गैर-सहमति के साथ, किसी अन्य व्यक्ति के साथ यौन फंतासी को अमल में लाने से मौलिक रूप से अलग है. और यही वो कूंजी है जो इस मिथक को तोड़ने का काम करती है कि इसका नारीवादी के साथ कोई संघर्ष है.
यौन एवं अन्य प्रकार की हिंसा के प्रतिरोध में नारीवादी आंदोलनों के इतिहास और उनके संघर्ष को देखें तो यहां सहमति का उल्लंघन करने के खिलाफ एक स्प्ष्ट निषेध है. नारीवादी आंदोलनों ने हमेशा से उन ताकत केन्द्रित शक्तियों की पहचान की है और उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी जो ऐतिहासिक और संरचनात्मक रूप से उन पुरुषों के पास रही है जो विशेषाधिकार से भरपुर हैं. और इसके साथ उनके खिलाफ जो सामाजिक-आर्थिक वर्ग श्रेणी में ऊंचे पायदान पर खड़े हैं. यही वजह है कि नारीवादियों ने आपसी सहयोग, सम्मान, अधिकारों और स्वायत्तता पर जोर दिया है.
बेशक ऐसे भी कई मामले हैं जहां बलात्कारी और बाल यौन शोषक अपनी यौन फंतासी पर अमल करते हैं, दूसरे की सहमति का उल्लंघन करते हैं. लेकिन किसी को अपराध करने के लिए यौन फंतासी से कहीं ज्यादा की ज़रूरत होती है.
यौन फंतासी अकेले यौन हिंसा का न तो पर्याप्त और न ही विश्वसनीय कारण है.
जबकि वर्जित फंतासियां आम हैं, ज्यादातर लोग उन पर कभी अमल नहीं करते. आपराधिक काम करने लिए आमतौर पर दूसरे कारकों की दरकार होती है, जिसमें इरादतन और पीड़ितों को अमानवीय बनाने वाली मानसिकता से पैदा होने वाला वजूद शामिल है.
फंतासियों और नारीवाद के बीच कोई टकराव न होने का एक और कारण है. इसके लिए हमें मनोविश्लेषण के उस नियम पर वापस जाना होगा जहां ‘मनाही कामोत्तेजक बनाती है’. अगर हम इस बात को ध्यान रखें कि तो यह साफ हो जाता है कि एक नारीवादी के रूप में जब हम अपनी फंतासियों में इसके मूल्यों: पारस्परिकता, गरिमा, और अधिकार, का उल्लंघन करते हैं तब हो सकता है कि इसमें किसी तरह की कामुकता का अहसास हो. क्या किया जाए हमारे अवचेतन का ऐसा ही उलटा-पुलटा व्यवहार है!
अनुमति और मनाही के ढांचे में, अगर मनाही कामोत्तेजक बनाती है, तो निश्चित रूप से यह ठीक है क्योंकि उल्लंघन यौन फंतासियों के क्षेत्र में हो रहा है, असल जिंदगी में नहीं (कहीं आप भूल न जाएं, सिर्फ इसलिए कि मेरी फंतासी में बलात्कार है इसका मतलब यह नहीं है कि मैं बलात्कार का शिकार होना चाहती हूं).
जब वास्तविक जीवन में पारस्परिकता, गरिमा, अधिकार और स्वायत्तता के मानदंडों का उल्लंघन किया जाता है, तो इसके नतीजे भयावह होते हैं. जब यौन फंतासियों में इन्हीं मानदंडों का उल्लंघन होता है, तो नतीजे उत्तेजक होते हैं! खुद को या दूसरों को कोई नुकसान नहीं होता, केवल कामुक संतुष्टि होती है.
हमें ठोकर तब लगती है और हम गिर पड़ते हैं जब एम की तरह ही हम यह सोचना शुरू कर देते हैं कि नारीवादी मानदंडों के उल्लंघन की कल्पना करना या फंतासी करना भी नारीवाद का उल्लंघन है. उस वक्त हम फंतासियों को केवल फंतासी की तरह देखना बंद कर देते हैं. फंतासियों को उन लोगों की सहमति की जरूरत नहीं होती जिनके बारे में वह हैं. फंतासियों को हमारी अपनी सहमति की भी जरूरत नहीं होती, और न ही वे इसकी परवाह करते हैं.
इसलिए जवाबदाताओं ने जब अपनी यौन फंतासियों और नारीवाद के बीच जिस आंतरिक संघर्ष को महसूस किया वह न केवल दिल दुखाने वाला है, बल्कि पूरी तरह से गैर ज़रूरी भी है.
यह संभावना कि नारीवाद और यौन फंतासियों के बीच कोई संघर्ष नहीं होना चाहिए, ई द्वारा व्यक्त की गई थी, जिसने अपनी फंतासी के बारे में अपनी भावनाओं पर सोचते हुए, उसने लिखा, “पूरी तरह समर्पण कर देने की मेरी यौन इच्छाएं मेरे आजाद नारीवादी दिल से ही निकलकर आती है.”
अगर नारीवाद और फंतासियों के बीच कोई वास्तविक संघर्ष नहीं है, तो क्या यह मुमकिन है कि नारीवाद, बिग अदर के रूप में, हमें उन वर्जनाओं को छूने की इजाज़त दे, इसमें वे वर्जनाएं भी शामिल हैं जिन्हें नारीवाद बहुत कीमती मानता है?
भारतीय संदर्भ में, जो कुछ एक आवाज़ें हैं जो मज़ा (प्लेज़र) और नारीवादी के संबंधों को आलोचनात्मक नज़रीये से देखती हैं वह है मनोविश्लेषक और लेखिका अमृता नारायणन. अपनी किताब, विमेन्स सेक्सुअलिटी इन मॉडर्न इंडिया – इन अ रैप्चर ऑफ डिस्ट्रेस, में नारायणन अपने क्लाइंट्स के साथ काम के आधार पर चाहत और नारीवाद के सवालों पर विचार करती हैं.
वह एक ऐसे नारीवाद की मांग करती हैं जो मज़ा के खिलाफ न जाए, जो महिलाओं की इच्छाओं पर पुलिसिंग न करे, जो पितृसत्ता की तरह “सुपर ईगो” के ढंग से काम न करे. हालांकि नारायणन फ्रायडियन “सुपर ईगो” का इस्तेमाल करती हैं और मैं लकां के शब्द “एक दूसरा कोई” का, जो बात मायने रखती है वह यह आशा है कि नारीवाद, निषेध करने के बजाय, उन इच्छाओं के लिए अनुमति देगा जो उसके खिलाफ जाती लगती हैं.
नारायणन पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए उपलब्ध समुदायों के बीच प्रभावी फर्क की भी एक तस्वीर दिखाती हैं. पुरुष अन्य पुरुषों की संगति में यौन हो सकते हैं (हालांकि जटिल तरीकों से नहीं क्योंकि यौन इच्छा की अभिव्यक्ति में विशेष प्रकार की मर्दानगी प्रदर्शित करने का दबाव भी होता है), महिलाओं को अपनी यौन सुख के संबंध में अकेलेपन के लिए मजबूर किया जाता है. भारतीय संदर्भ की विशिष्टता को देखते हुए, नारायणन को लगता है कि नारीवादी समुदाय जो यौन सुख को तरजीह देता है, वह खासतौर पर ज़रूरी है. ऐसे समुदाय कम व्यक्तिवादी होते हैं, और समुदाय को “खुद को अनुभव करने का एक तरीका : एक अलग—थलग व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक समग्र पूर्ण के हिस्से के रूप में” खोजने के लिए ज्यादा महत्व दिया जाता है. महिलाओं के ऐसे समुदायों की गैर हाजिरी में नारायणन को लगता है कि एक चिकित्सक के तौर पर इस अंतर को संबोधित करना उनके द्वारा निभाई गई भूमिकाओं में से एक है.
नारीवाद के बिग अदर से इजाज़त लेकर मैं इस जांच के इस हिस्से को उस अनुमति के साथ खत्म करना चाहूंगी जो हम खुद को दे सकते हैं या नहीं दे रहे होंगे.
उम्मीद है कि इस खुलेपन के साथ इसे समझने में कि नारीवाद और फंतासियां जो गरिमा, पारस्परिकता और अधिकारों का उल्लंघन करती हैं उनके बीच किसी तरह की कोई टकराहट नहीं है. यह एक सहजता का एहसास है.
यह याद रखना कि मनाही कामुकता को बढ़ाती है, यह समझने में भी मदद कर सकता है कि हमारी फंतासियां 'अच्छी नहीं भी हो सकती हैं' - और इस बात से भी कोई हर्ज नहीं है.
इस लेख का अनुवाद पारिजात नौडियाल ने किया है.
पूरी शृंखला यहां पढ़ें.
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जया शर्मा, एक नारीवादी, क्वीयर, किंकी कार्यकर्ता और लेखक हैं. जया ने, जेंडर और शिक्षा से जुड़े मुद्दे पर निरंतर संस्था के साथ लगभग दो दशक से भी अधिक समय तक काम किया है. इस दौरान वे ग्रामीण महिलाओं के साथ काम करने वाले संगठनों के लिए यौनिकता विषय पर ट्रेनिंग के काम से गहराई से जुड़ी रहीं. एक क्वीयर कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने दिल्ली में कई तरह के क्वीयर मंचों की शुरुआत की. वे वॉइसेज़ अगेंस्ट 377 नामक समूह की सह-संस्थापक हैं. जया, किंकी कलेक्टिव (Kinky Collective) की संस्थापक सदस्यों में से एक हैं – यह एक ऐसा समूह है जो बीडीएसएम (BDSM) से जुड़ी जानकारी फैलाने और उस समुदाय को मज़बूत करने का काम करता है. वर्तमान में, जया सेक्सुअलिटी को अवचेतन (psyche) के नज़रिए से समझने और उस पर लेखनी करने की कोशिश कर रही हैं.


