द थर्ड आई अपनी नारीवादी कथा-संकलन श्रृंखला के अंतर्गत हरिशंकर परसाई की कहानी “एक लड़की पांच दीवाने” प्रस्तुत कर रही है क्योंकि किसी स्त्री के जीवन और उसके चुनावों में दिलचस्पी लेने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि वह व्यक्ति स्वयं को नारीवादी कहे.
पहली नज़र में यह कहानी एक ऐसी युवती के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है, जिसके प्यार में डूबे पांच दीवाने उसका ध्यान पाने की होड़ में लगे हैं. हम उस युवती को उन्हीं पुरुषों की नज़रों से देखते हैं—वह बालकनी में खड़ी दिखाई देती है, और उसके परिवार से होने वाली उनकी छोटी-मोटी बातचीत के ज़रिए हमारे सामने आती है लेकिन वह किसी राजकुमार के आकर उसे अपने साथ ले जाने का इंतज़ार नहीं कर रही. वह अपना रास्ता स्वयं चुनती है—एक ऐसा रास्ता, जिसकी कल्पना हमने पाठक के रूप में भी उसके लिए नहीं की थी. क्या यह संभव है कि प्रेमियों की लगातार उस पर टिकी निगाहों ने ही उसे ऐसा निर्णय लेने का साहस दिया हो, जिससे वे सभी नफरत करेंगे?
शायद हम सिर्फ उन प्रेमियों की नज़रों से ही उसे देखकर संतुष्ट थे लेकिन जब परसाई हमसे पूछते हैं कि आखिर हमें ऐसा देखने में इतनी सहजता क्यों महसूस हुई, तभी पहली बार हम दुनिया को उस युवती की आंखों से देख पाते हैं—और वह सचमुच कहानी के केंद्र में आ खड़ी होती है.
हरिशंकर परसाई आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख व्यंग्यकार और हास्यकार थे. यह कहानी वर्ष 1973 में राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कहानी-संग्रह “एक लड़की पांच दीवाने” में पहली बार प्रकाशित हुई थी.
निर्माण: जूही जोतवानी
आवाज़: सीमा दहिया
कवर चित्रांकन: शिराज़ हुसैन
यौनिकता और नारीवादी दृष्टिकोण से जुड़ी और भी कहानियों तथा लेखों के लिए द थर्ड आई के “मज़ा और खतरा” संस्करण को ज़रूर देखें.

