पत्रकार मेनका राव स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करती हैं. पुलित्जर से मिले ग्रांट पर काम करते हुए मेनका ने कानून, स्वास्थ्य, महिलाओं की परिस्थितियों एवं विकलांगता के नज़रिए से भारत में गर्भपात की स्थिति को समझने की कोशिश की है. अपने शोध के दौरान वे ऐसी कई महिलाओं से मिलीं जो जिन्हें गर्भपात करवाने के लिए अपमान, दुख, अकेलापन और कई तरह की अन्य कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. मेनका ने अपने शोध में कोर्ट के द्वारा दिए गए उन निर्णयों की भी पड़ताल की जो यह तय करते हैं कि किस महिला को गर्भपात का अधिकार है, किसे नहीं. कानून के साथ-साथ उन्होंने वकीलों, एनजीओ कार्यकर्ताओं से भी बात की जो गर्भपात के मुद्दे पर काम करते हैं. अपने काम के ज़रिए मेनका उन सामाजिक-कानूनी पहलुओं को खोलने की कोशिश करती हैं जो गर्भपात करवाने की इच्छा रखती महिला के सामने खड़े होते हैं.
क्या हैं वे परिस्थितियां? कैसे कानून गर्भपात करवाने की इच्छा रखने वाली महिला को अच्छी और बुरी महिला के खांचे में बांटने की कोशिश करता है? राज्य की नज़र में मातृत्व, यौनिकता और महिला स्वास्थ्य का क्या महत्त्व है? वे इसे किस नज़रिए से देखता है? ऐसे कई ज़रूरी सवाल हैं जिनपर मेनका राव ने अपने इस पॉडकास्ट में खुलकर बात की है.
शोध, इंटरव्यू, स्क्रिप्ट और आवाज़: मेनका राव
प्रोड्यूसर और एडिटर: माधुरी आडवाणी
हिन्दी अनुवाद: सुमन परमार
चित्रांकन: आशनी सिंह


