वह चुभते हुए शब्दों में अवहेलना की मुस्कुराहट के साथ उसे जवाब देती है तो वह सुन्न रह जाता है लेकिन जब मुलिया को समझ आता है कि उसके जिस रूप पर चैनसिंह इस कदर फिदा है, वही उसके लिए हथियार का भी काम कर सकता है तब उसके भीतर एक नया आत्मविश्वास जागता है.
कहानी में प्रेम संबंधों के यथार्य का गज़ब का उद्घाटन है जो एक ओर, प्रेम और ढोंग तो दूसरी ओर, प्रेम की निष्ठा का वास्तविक रूप सामने लाता है. इस कहानी में हिम्मत भी है, खुद्दारी भी, वाकपटुता और भावप्रवणता का कौशल भी. प्रेमचंद की इस सरल सहज कहानी में यथार्थ की परतें समाई हुई हैं.
मुंशी प्रेमचंद की कहानी घासवाली सबसे पहले 1929 में हिंदी में प्रकाशित होने वाली पत्रिका माधुरी में प्रकाशित हुई थी. सहमति और यौनिकता पर बात करती इस कहानी को जाति, जेंडर, यौनिकता एवं अन्य संदर्भों में कार्यशालाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है.
‘बोलती कहानियां’ में हर बार हम लेकर आते हैं जेंडर, यौनिकता, सत्ता, जाति, जेंडर आधारित हिंसा जैसे विषयों पर एक नई रोचक कहानी. निरंतर ट्रस्ट के पिटारे के साथ-साथ हिंदी साहित्य के विशाल भंडारे से चुनकर निकाली गई इन कहानियों के कई उपयोग हो सकते हैं. इन्हें जेंडर कार्यशालाओं में सुनाया जा सकता है, जहां गंभीर एवं जटिल विषयों पर बातचीत के लिए ये कहानियां सहायक का काम करती हैं. इन कहानियों को स्कूली विद्यार्थियों, कम्यूनिटी लाइब्रेरी, यूथ ग्रुप्स, प्रौढ़ शिक्षा केंद्र, पुरूषों के चर्चा समूहों में भी संबंधित विषयों पर बातचीत के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जो आमतौर पर उनके विमर्श के केंद्र से बाहर ही रहते हैं. निरंतर ट्रस्ट ने खुद इन कहानियों का इस्तेमाल फील्ड वर्कशॉप्स में किया है और इनसे वहां कभी गहरी, कभी रोचक और कभी चौका देने वाली चर्चाएं निकलकर सामने आई हैं.
प्रोडक्शन द्वारा सादिया सईद
प्रस्तुति द्वारा निहारिका तिवारी
आवरण चित्र: समीक्षा खेरदे
ये कहानी हमारे संस्करण ‘मज़ा और खतरा’ का हिस्सा है.
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सादिया सईद द थर्ड आई में टेकनिकल हेड और संपादकीय संयोजक हैं.

