शहर जैसे आग का दरिया

एक लड़की जो कल तक व्हाट्सएप्प ग्रुप का हिस्सा थी लेकिन आज वो इस दुनिया में नहीं है.

चित्रांकन: भावना परमार (@nabhawna)

ये कहानी एक प्रेम कहानी है जिसमें तीन किरदार हैं – एक भाई, एक बहन और एक स्मार्टफोन. और एक की मौत हो जाती है.

जिगर मुरादाबादी ने कहा है कि – ये इश्क़ नहीं आसां इतना ही समझ लीजे/एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है… ये कहानी भी ऐसे ही एक दरिया की दास्तां हैं. कहानी में इंटरनेट के शहर, जिसे हमने बनाया है, की कशमकश उसी तरह उधड़कर सामने आती है जिस तरह इस असल शहर से दूर भागने का सच हमारे सामने है.

एक ग्रामीण मीडिया चैनल की ज़मीनी रिपोर्ट से प्रेरित इस लघुकथा में आग और प्रेम का मिथक टकराता है. पुराने फैज़ाबाद की बुनियाद पर खड़ी ये कहानी, उन किंवदंतियों को साथ जोड़ती है जो इसे जीवित रखती हैं, विशेष रूप से हमारे न्यूज़ फ़ीड और हमारे स्मार्टफोन में. इसके जुड़वां बाशिंदे रूहानी और अयूब, एक भाई और एक बहन, जिनकी आत्मा एक-दूसरे के बेहद क़रीब हैं, और व्यवहार एक-दूसरे से बहुत अलग.

अयोध्या शहर, इन दोनों भाई-बहनों की ज़िन्दगी का चश्मदीद गवाह बनता है, लेकिन क्या शहर उनके साथ खड़ा होता है या पल्ला झाड़ आगे बढ़ जाता है…? वो क्या था जिसके बाद बचती है तो एक भाई की आवाज़ और उसके बदले की दास्तान.

आज मैं रवीना टंडन हूं.

फ़िल्म अंदाज़ अपना अपना और कभी लिंकिंग रोड (प्यारी, भोली) वाली नहीं, बल्कि टिप टिप बरसा पानी और चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त गानों (सेक्सी, हॉट, काम्य) वाली। उफ़्फ़, ये फ़िल्मी सितारे भी कमाल के होते हैं! अपने मुख़्तसर से फ़िल्मी कैरीअर में इतने बेशुमार अवतारों को कैसे जी लेते हैं! और हमारे दिलों पर सुपरनोवा जैसा प्रभाव छोड़ जाते हैं — बिल्कुल धमाकेदार!

जैसे मनीषा कोइराला और दिव्या भारती की तरह या फिर मेरी ऑल-टाइम फेवरिट अमीषा पटेल. जब वो उस सुनसान टापू पर शिमी-शेक करती है तो कौन होगा जो “कहो ना प्यार है” कहना नहीं चाहेगा?

ज़ुबैदा खाला एक बार हमारे घर आई थीं और जाते वक़्त अपनी एक बॉलीवुड की फिल्मी गपशप वाली पत्रिका हमारे घर पर ही भूल गई थीं. अम्मी को यह यक़ीन दिलाने के बाद कि इस पत्रिका को पढ़ना अपनी अंग्रेज़ी को बेहतर बनाने का एक अच्छा तरीका है, उसे मैंने अपने पास रख लिया था. मैंने उसमें एक ऐसा वाक्यांश पढ़ा था जो तब से अब तक मेरे ज़ेहन में महफ़ूज़ है; जो न केवल पीली-साड़ी पहने भीगी हुई रवीना की उत्तेजक छवि का वर्णन कर रहा था, बल्कि जीवन, कामना, और जीत का भी. वह वाक्यांश है –

'बला की खूबसूरत और जोश से भरपूर' और मुझे हमेशा यह सोचकर हैरत होती है कि ‘खूबसूरती और जोश’ भला कैसा होगा. प्रतिशोध के मेरे प्रयोग के लिए, जो आज से शुरू हो रहा है, रवीना की बारिश में भीगी उत्तेजक छवि मुझे ठीक लगती है.

लेकिन मैं ख़ुद ही से आगे निकल गया हूं.

सबसे पहले तो आप उससे मिलिए, जिसकी आवाज़ मेरे दिल-दिमाग़ में गूंज रही है, अपनी सारी मिठास में, मुझे पुकार रही है, “अयूब भाईजान” मैं दिल्ली में अपने काम पर हो सकता हूं, या फैज़ाबाद में अपने घर पर, लेकिन वह आवाज़ हमेशा मेरे साथ होती है, मेरा पीछा करती है. शायद इसलिए कि हम जुड़वां हैं, या शायद इसलिए कि रूहानी ऐसी ही है.

GIF साभार: https://ayeshaazeem.ca/
हमारा परिवार उस अत्यंत अप्रिय स्थान के करीब ही रहता है, जिसे मैं साहस करूं तो भयावह कह सकता हूं, ज़मीन का एक टुकड़ा जो लगभग हमेशा ख़बरों में रहता है – अक्सर अख़बार के पहले पन्ने पर सुर्खियां बटोरता है, मानो रक्तबलि मांग रहा हो. ज़्यादा दिन नहीं हुए, जब ये ज़मीन का टुकड़ा, चाय ढाबों पर, पान की दुकानों पर, ट्रेनों और बसों में – लगभग हर जगह गरमागरम बहस का मुद्दा बना हुआ था – एक तरफ़ स्क्रीन पर जहां ज़हर और आक्रोश उगला जा रहा था तो दूसरी तरफ़ उसी स्क्रीन पर दीवाली के अवसर पर जलाए गए दीपों के विश्व रिकॉर्ड संख्या का पूरी कर्मठता और तत्परता से प्रसारण चल रहा था. जिस स्थान पर उन्होंने बहुप्रतीक्षित पूजा स्थल की नींव रखी थी, वह हमारे घर से एकदम सीध में लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर है.

एकदम सीध में - यह उन कई अभिव्यक्तियों में से एक है जो रूहानी ने मुझे सिखाया था. उसने अंग्रेज़ी सीखना जारी रखा, जबकि मैंने हार मान ली. मैं उसे अब भी देख सकता हूं, एक बार फ़िर किसी वीडियो को पॉज़ कर और उसके एक-एक शब्द, वाक्य और मुहावरे को दोहराते हुए, वह धीरे-धीरे एक नई भाषा को सीख-समझ रही है, जो हमारे आसपास के अधिकांश लोगों के लिए अजनबी है.

बाबा लगभग हमेशा उसे डांटते, “यह सब सीखकर तुम क्या करोगी? कहां काम आएगा ये?” और अम्मी अपनी अंग्रेज़ी बोलने वाली बेटी को बुरी नज़रों से बचाने आगे आ जातीं.

यह रूहानी ही थी जिसने मुझे बताया था कि मेरे चेहरे का रंग जितना गहरा है, उससे कहीं अधिक गहरे रंग के चेहरे भी होते हैं. इतने गहरे कि उन्हें काला कहा जा सकता है और जो हमारे यहां के ‘गेहुंआ’ (जो कि अधिक सम्मानजनक शब्द है और जिसका हम बहुधा अक्सर शादी के विज्ञापनों के विवरण में इस्तेमाल करते है)¬ से भी गहरे रंग वाले लोग यूट्यूब पर बिल्कुल ‘शुद्ध अमेरिकी’ बोलते हैं. जब उसने पहली बार मुझे उनमें से कुछ ऐसे पुरुष (और महिलाएं!) दिखाए, जो हमारे जैसे दिखते थे – वे कलाकार थे, जो या तो मंच पर चुटकुले सुनाते थे, या स्टुडियो में न्यूज़ पैनल में बैठते थे, और चुटकुले भी सुनाते थे, आप उनसे बहस कर सकते थे – और फिर उन्होंने ख़ास अमेरिकी लहजे में बात करने के लिए जैसे ही अपना मुंह खोला, मैं लगभग अपनी कुर्सी से गिरते-गिरते बचा था!

यह रूहानी थी जो अक्सर उस इलाके के चारों ओर घूमती पाई जाती थी, जिसे अच्छे दिनों में बदमिजाज़ पुलिस वालों और विभूति-रमाए साधुओं द्वारा घेर लिया जाता था. हनुमान गढ़ी बाज़ार, जो प्रसिद्ध जन्मभूमि मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर है, जहां वह क्लास के बाद अक्सर अपने प्रेमी से मिलने जाया करती थी. वही, भयंकर मोहित. मिलने के बाद अंत में वह चूड़ियां खरीदती और घर वापसी से पहले दोनों बुढ़िया के बाल साथ खाते, और फिर अपने-अपने घर की राह लेते थे. वह समझती थी कि मैं उसका यह राज़ नहीं जानता, जबकि मुझे शुरू से ही पता था. लेकिन मैंने कभी कुछ कहा नहीं. तब भी नहीं जब छुट्टियों में मैं घर आया हुआ था और एक दिन उसने मुझसे खुशामद करते हुए मेरा फोन “सिर्फ एक घंटे के लिए” मांगा था. शायद स्वतंत्रता दिवस, हो सकता है? मुझे याद आता है कि तरुण बाज़ार ब्लॉक जहां हम रहते हैं, वहां कभी घरों और दुकानों के ऊपर और यहां तक कि मोटरसाइकिलों पर कई तरह के तिरंगे झंडे लगे होते थे, लेकिन अब वहां सिर्फ़ भगवा झंडे ही नज़र आते हैं.

तब से, मेरे घर आने पर रूहानी का मुझसे फोन मांगना एक तरह से एक अघोषित रस्म-सा बन गया था, और मैं इस बात से नाराज़ होने से ज़्यादा हैरान होता कि आख़िर कैसे वह इतने लम्बे अंतराल के दौरान बिना फोन, संभवत: बिना वाट्सएप्प अपने रिश्ते को मैनेज करती थी.

मैंने कभी भी उसके राज़ पर से पर्दा हटाने की कोशिश नहीं की क्योंकि वह वास्तव में खुश लग रही थी, जो कि अब्बू, अम्मी या यहां तक कि खुद मेरे लिए भी, मैं जितना कह सकता हूं, उससे कहीं ज़्यादा अहम है. और मेरे दिल्ली में काम करने के कारण, उसने शायद यह मान लिया होगा कि उसके मेहरबान भाईजान को ज़्यादा जानकारी नहीं है. जहां तक मेरा सवाल है, वास्तव में वो केवल मोहित के भेजे कुछ टेक्स्ट मैसेजेज़ और एक मिस्ड कॉल थे – उस रात मुझे घर जाना था लेकिन दुर्भाग्य से जा नहीं सका था क्योंकि अंतिम समय में गुप्ता साहब को अचानक अपने परिवार के साथ एक लम्बे सप्ताहांत पर जाना पड़ रहा था और दूसरा सुरक्षा गार्ड बीमार पड़ा था, उसको स्वाइन फ्लू हो गया था. उधर मोहित ने यह मान लिया था कि फोन इस वक़्त रूहानी के नरम मुलायम हाथों में ही होगा, और भले ही मेरी आधिकारिक तौर पर कोई प्रेमिका नहीं थी, लेकिन मुझे पता था कि इमोजी की उन लड़ियों का क्या मतलब होता है.

अगली बार जब मैं घर पर था और रूहानी मेरे पास आई वही ‘मुझे आपसे एक मदद चाहिए’ वाले जाने-पहचाने भाव के साथ, तब मैंने भी उसका स्वागत एक परिचित सी मुस्कान के साथ किया था. वह एक पल के लिए तो बिल्कुल हक्का-बक्का रह गई थी और फिर उसका मूड बदल गया था – उसकी आंखों ने उसके सारे भेद खोल दिए थे, और मैंने उनमें पहली बार भ्रम और भय के चिह्न देखे थे. मुझे लगता है कि उसने वादे के मुताबिक आधी रात को बहुप्रतीक्षित व्हाट्सएप वीडियो कॉल न कर पाने के लिए ख़ुद को तैयार कर लिया था. दरअसल, उसे अभी तक पता नहीं था कि मैंने उसके लिए क्या खरीदा है. ‘तुम्हारी ईदी’, मैंने उसे एक डब्बा सौंपते हुए कहा, और इससे पहले कि वह प्रतिक्रिया दे पाती, मैंने जोड़ा, ‘क्या तुम इस मोबाइल से मुझे उन अमेरिकियों में से कुछ के वीडियो अपने यूट्यूब पर दिखा सकती हो?’ उसके चेहरे पर एक बेतकल्लुफ़ मुस्कान तैर गई, जिसमें मुझे मेरा अक्स नज़र आया, वह फोन का डब्बा खोल रही थी, और मैं अनजाने ही दक्षिण दिल्ली के अधचिनी स्थित अपने कमरे में जा अटका, उसने जवाब दिया, “हां-हां, क्यों नहीं. रवीना टंडन के कुछ वीडियोज़ देखने के बाद ना?”

तब मैंने उसे अपने छोटे से राज़ के बारे में लगभग बता ही दिया था. मैंने अंतहीन यूट्यूब की दुनिया से परे टाइम पास के लिए एक ऐसी मस्त चीज़ खोज ली थी जिसमें बहुत थोड़ा सा ही, खून का स्वाद भी था.

मुझे दिन-रात गुप्ता निवास के बाहर, उस झक सफ़ेद, दानव जैसे घर की निगरानी, ठीक उसके उलट नीलकमल की फीकी गुलाबी रंग की कुर्सी पर बैठ कर करनी थी, यही मेरी ज़िम्मेदारी थी. घर को हर साल दिवाली के मौक़े पर जुगनू वाले झालरों से सजाया जाता था, जो हम रात के चौकीदारों को उन 24×7 चलने वाले माता की चौकी जैसे लोकप्रिय धार्मिक आयोजनों की स्वप्निल अनुभूति देता था, बस फ़र्क इतना था कि उन धार्मिक रतजगों में होने वाले भजन-कीर्तन के शोर की जगह यहां सिर्फ़ मौन था.

मैं घंटों फेसबुक और व्हाट्सएप पर फर्ज़ी प्रोफाइल वाले लड़कों को लड़की होने का नाटक करके चिढ़ाया करता था. उनमें से कुछ तो अपने फैज़ाबाद के ही थे जिन्हें मैं जानता था.

मुझे बिल्कुल भी हैरत नहीं हुई, जब उन सभी ने ‘नेहा’ के सिम कार्ड पर सबसे ज़्यादा डीएम (डायरेक्ट मैसेज जो सोशल मीडिया जगत में ख़ूब प्रचलित है) भेजे. मैंने उन्हें अनमोल अमीषा पटेल की डीपी अर्पित की थी.
चित्र साभार: Wired.com

जिस चीज़ ने मुझे थोड़ा ही सही लेकिन विचलित किया था, वह थी लड़कों द्वारा भेजे गए संदेशों की तासीर. हालांकि उनमें से ज़्यादातर ‘दोस्ती करना’ चाहते थे, और कुछ वास्तविक जीवन में मुझसे मिलने की ख़्वाहिश रखते थे, सभी पुरुषों ने मेरी शारीरिक बनावट पर बहुत सी टिप्पणियां की थीं, जिन्हें वे अपने फोन में बेझिझक टाइप किया करते थे. इनमें कामुकता भरी तारीफ़ों से लेकर अधिकार जताने वाले प्रेमी की सलाह तक, सब कुछ हुआ करता था. ‘आपके रोज़-पिंक चीक्स को कहीं नज़र ना लग जाए, कसम से’ ‘माय गर्ल रॉक्स इन शलवार-कमीज़ ओनली’, ‘थोड़ा आराम से. आप भोली हैं, आपको नहीं पता लड़के आजकल ऑनलाइन में क्या कर रहे हैं.’ 

यह आख़िरी वाला मैसेज लगभग मेरी उम्र के ही एक लड़के ने भेजा था, वह मेरा स्कूल का साथी था. हम दोनों ने पूरे तीन साल तक एक ही स्कूल में पढ़ाई की थी; उसकी मोबाइल मरम्मत की दुकान थी जो उसे अपने पिता से विरासत में मिली थी, लेकिन उसने अभी तक अपने दुकान की बागडोर नहीं सम्भाली थी, इसके बजाय वह स्थानीय राजनीति में अपनी क़िस्मत आज़मा रहा था. यह ज़्यादा आसान था और मुनाफ़ेदार भी, लेकिन इसके लिए हिम्मत की ज़रूरत होती है.

***
जब यह हादसा हुआ तो परिवार और हमारे ‘शुभचिंतकों’ सभी ने मुझे ही दोषी ठहराया. मुझे उन शाश्वत सत्यों के हवाले से ज़लील किया गया, जिन्हें हर कोई अपनी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा मान लेता है और कभी सवाल नहीं करता.

बड़े भाई का फ़र्ज़ अपनी छोटी बहनों की हिफ़ाज़त करना होता है, उन्हें अनुशासन में रखना होता है, तम्बीह करना होता है, हिदायत देना होता है. ज़रूरत पड़ने पर उन्हें सज़ा देनी होती है, सबक़ सिखाना होता है. और इस अयूब को देखो, इसने तो उल्टे उसको फोन ख़रीद कर दे दिया! अरे, उसे कोठे पर ही बिठा दिया होता!

क्या तुम मोहित को जानते हो? अम्मी मुझसे बार-बार पूछ रही थीं. लेकिन मैं क्या जवाब देता? सच तो यह था कि मैं उसे नहीं जानता था, लेकिन मैं उसके बारे में जानता था.

कहानी के जितने भी संस्करण मैंने तब से सुने हैं, उनमें से एक जो पूरी तरह खांचे में फिट होता है उसमें मोहित को खलनायक के रूप में पेश किया गया है. या शायद खलनायक नहीं, क्योंकि वह उसे संजीदगी ही देता है.

नहीं, मोहित की हरकतें, अगर आप उन्हें हरकतें कह सकते हैं, तो वे पूरी तरह से कायराना थीं. क्या वह रूहानी से बात नहीं कर सकता था? हम सभी जानते थे कि मस्जिद पर कभी भी फैसला आ सकता है. उस महीने उनके पसंदीदा हैंगआउट (मुलाक़ात की स्थाई जगह) वाली गलियों में पुलिस वालों की भीड़ लगी हुई थी और हर दिन जीप में भर-भर कर दंगारोधी दस्ते के दर्जनों लोग हथियारों और दूसरे उपकरणों से लैस होकर आते रहते थे. ‘कौन जानता है, शायद वे आपातकाल की घोषणा कर दें, और पूरे राज्य को सील कर दें?’ किसी ने घबरा कर कहा. रूहानी बुदबुदाई थी, “फिर भी कम से कम हम एक राज्य में तो रहेंगे”. अब्बू ने उन दिनों जब पुलिस के दंगारोधी दस्ते का जमावड़ा बढ़ता देखा तो कई दिनों तक घर से बाहर तक नहीं निकले.

“यह एक दर्दनाक नज़ारा है, जो पहले भी मैं देख चुका हूं”, उन्होंने कहा था. उनसे बात करते हुए आपको सचमुच ऐसा महसूस होगा, गोया 90 का दशक अभी कल ही गुजरा हो! मैं उनका दर्द समझ सकता हूं, उस वक़्त उन्हें अपनी बीवी और बेटी की सलामती के लिए अपनी दुकान बंद कर भागना पड़ा था. तब सिर्फ़ नज़मा बाजी ही पैदा हुई थीं और वे भी उस वक़्त बहुत छोटी थीं. जब वे लौटे थे तो एक बार फिर से उन्हें तिनका-तिनका जोड़ना पड़ा था. लेकिन कभी-कभी मेरा दिल करता है कि उनसे कहूं कि अब्बू जो हुआ उसको भूल जाइए! लेकिन फिर भी, अब्बू का डर असली है, जबकि मोहित को उस ज़िन्दगी का वास्तविक अनुभव नहीं था. क्या वह भागने के बजाय अपना बहुसंख्यक कार्ड नहीं खेल सकता था?

अगर मैं ईमानदारी से कहूं तो मैं उसे दोष देने के बजाय चीज़ों को बेहतर जानता हूं. अम्मी जैसा चाहें वो कह सकती हैं, बेटी को फिर से खोने को लेकर वे अपनी छाती पीटेंगी, और वह पूरी तरह से समझ नहीं पा रही थीं कि उनसे मिलने आई रिपोर्टर क्या सुझाव दे रही थी.

मैं यह अच्छी तरह से देख सकता था कि उस रिपोर्टर के दिमाग़ में कौन सी सनसनीखेज़ या भड़काऊ हेडलाइन घूम रही है - सामाजिक बुराइयों के कारण एक मां ने अपनी बेटियों को खो दिया, एक को तीन तलाक की वजह से, एक को लव जिहाद में.

भले ही वह अम्मी को दिलासा देने का नाटक कर रही थी, उसने काला चश्मा अपने सिर के ऊपर लगा रखा था, बिल्कुल वैसे ही जैसे वे अमेरिकी भाषी लोग लगाया करते थे, जिन्हें रूहानी यूट्यूब पर देखा करती थी.

मोहित की गलती नहीं थी.

अगर रूहानी ने किसी चीज़ को लेकर अपना मन बना लिया है, तो दुनिया की कोई भी ताक़त उसको बदल नहीं सकती थी. उसके ज़िद्दी स्वभाव के कारण अब्बू कई बार परेशान होकर उसके जन्म और अपनी किस्मत को कोसने लगते थे. अच्छे दिनों में वह उसे 'आफ़त' कहा करते तो बुरे दिनों में 'शैतान की बेटी.'

उसने सिविल सेवा परीक्षा में बैठने का फैसला कर लिया था. उसका तर्क था कि ‘महिला पुलिस को पदोन्नति नहीं दी जाती और उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया जाता’. इस तरह उसने बड़े ही स्पष्ट लहजे में अपना करियर और मक़सद ज़ाहिर कर दिया था. उसने कहा, ‘प्रशासनिक अधिकारी बनने का अपना अलग रुतबा होता है.’ उसने मुझे बताया कि 2019 के फैसले से पहले एक शाम हनुमान गढ़ी में उसपर कुछ लोगों ने भद्दी टिप्पणियां की थीं और जिससे उसको सिविल सेवा की प्रेरणा मिली थी.

“हर कोई इसे धर्म से जोड़कर देखता है, लेकिन हक़ीक़त में यह शासन-व्यवस्था का मसला है, है ना?”, उसने कहा था. अगर आप सिस्टम को अंदर से ठीक कर सकते हैं, तभी उम्मीद को ज़िंदा रखा जा सकता है, ऐसा उसका मानना था.

एक प्रयोग के तौर पर, उसने नकली पहचान वाले कुछ स्थानीय व्हाट्सएप ग्रुपों में ख़ुद को जोड़ रखा था, जिनके सदस्य राम लला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड में होने वाली नवीनतम घटनाओं पर समाचारों और विचारों का आदान-प्रदान किया करते थे, और चुटकुलों की आड़ में भड़काऊ हेट स्पीच के अंश अक्सर फॉरवर्ड किया करते थे. वे स्थानीय वेतनभोगी कर्मचारी, वकील, ज़िला स्तर के कनिष्ठ अधिकारी, छोटे-छोटे व्यवसायी और दुकानदार थे, जो सीज़न में मंदिर के सामान बेचने वाली दुकानें चलाते थे, ऑफ सीज़न में गोल्ड फेशियल सलून चलाते थे और ‘यो यो हनी सिंह’ कट बाल बनाया करते थे. आप चाहें तो इन्हें अयोध्या के चालबाज़ कह सकते हैं, हालांकि इनके व्हाट्सएप ग्रुपों के नाम हमेशा महत्त्वपूर्ण होते थे – पत्रकार बंधु, युवा संगठन, जय श्री राम, जस्ट गुड फ्रेंड्स. वे सभी पुरुष थे.

वह इन ग्रुपों में सीता थी - निश्चित रूप से यह एक सियासी पसंद थी, लेकिन यह इसलिए भी कि वह जानती थी कि ऑनलाइन दुनिया में उसकी धार्मिक पहचान उसकी लैंगिक पहचान की तुलना में कहीं ज़्यादा बड़ा बोझ और ख़तरा साबित हो सकती थी - स्व-नियुक्त फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई बताने वाली जो फर्ज़ी वीडियोज़ की पहचान करने के लिए वीडियो ट्यूटोरियल का ऑफ़र भी देती थी.

वह अपने विवेक और तर्कबुद्धि और सद्भावना के दम पर इस हुल्लड़बाज़ी और शोर को ख़त्म करना चाहती थी और इसके लिए बाज़िद थी.
साभार: Hanna Barczyk

रूहानी की हत्या के बाद के उस स्तम्भित कर देने वाले हफ्ते में मोहित के एक चचेरे भाई से मेरी मुलाकात हुई थी, उसने मुझे बताया था कि कैसे युवकों की भीड़ मोहित के दरवाज़े पर देर रात अचानक इकट्ठा हो गई थी, और मांग कर रही थी कि वह अपना फोन उन्हें सौंप दे. वे नशे में धुत थे और उसके भावी जीवन साथी के चयन को लेकर क्रोधित भी. ‘आर या पार का समय आ गया है, तू किस तरफ है?’, वे चीख रहे थे. लेकिन मोहित को जिस बात ने भयभीत कर दिया था, जैसा कि उसके चचेरे भाई ने मुझसे कहा, वह यह था कि भीड़ में मौजूद ज़्यादातर पुरुष उसके दोस्त और परिचित थे, जिन्हें वह अच्छी तरह जानता-पहचानता था लेकिन उस वक़्त उनकी आंखों में इस जान-पहचान का लेशमात्र संकेत भी नज़र नहीं आ रहा था. झुंड के नेता ने तुरंत मोहित का व्हाट्सएप खोला और मैसेजों की जांच करने लगा और इस तरह उसने रूहानी-सीता की पहचान की पुष्टि कर दी.

इसके तुरंत बाद मोहित अपनी जान बचाकर वहां से भाग निकला था. वह शहर जहां उसने भविष्य में किसी दिन, और किसी दुनिया में, शायद रूहानी के साथ अपने रिश्ते के परवान को देखकर ही, अपना खुद का एक छोटा सा बिजनेस शुरू करने का सपना देखा था.

अब मैं मोहित के बारे में सोचता हूं- सरयू को विदा कहते हुए, घाटों पर सोच में डूबे हुए… हालांकि उसने शायद ऐसा न किया हो. उसके चचेरे भाई के हिसाब से, सुबह-सुबह जो बस खुलती है, वह उसी से शहर से निकल गया होगा, इस बात का ध्यान रखते हुए कि कहीं कोई उसे देख न ले. उस समय शायद यह सोच रहा हो कि वह कौन सा फ़ोन खरीदेगा, उसकी जेब में एक नया सिम कार्ड था. बस में चढ़ने से ठीक पहले अधेरे में शायद उसने अपनी आंखों में छलक आए आंसू पोंछे होंगे.

रूहानी-सीता के लिए, हालांकि, उसने सूरज की रौशनी में अपने सत्य की अग्नि परीक्षा दी लेकिन, उसका सत्य की आग पर चलना अंततः अक्षम्य ही साबित हुआ. इसने उसे ज़िंदा नहीं छोड़ा.

और न ही इसने मुझे ज़िंदा छोड़ा. एक नासमझ इंसान के रूप में जो कभी भी किसी भी चीज़ के लिए खड़ा नहीं हो सकता था और जिसने उस छोटे से शहर से बाहर निकलने का विकल्प चुना. जिसने सभी को कुचला, सिर्फ़ देश की राजधानी के पॉश इलाकों और अमीरों के लिए गार्ड भैया की भूमिका निभाने के लिए. जो वास्तव में अपनी बहन को वही गिफ्ट देता है जो उसे चाहिए, एक स्मार्टफोन, जो कि सामूहिक विनाश के किसी हथियार से कम नहीं. अपनी बहन के जलने के निशान भी हमेशा अब मेरे साथ ही रहेंगे.

और आज मैंने तय किया है कि मैं उसकी विरासत को संभालूंगा, उसको आगे बढ़ाऊंगा.

मैं उसकी याद में उसकी ओर से सीता का एक और संस्करण बनूंगा. मैं सीता का किरदार निभाना जारी रखूंगा. मुझे पता है कि वे क्या चाहते हैं, और मैं उन्हें वही दूंगा. मैं हमेशा वासना (यौनाकर्षण) का रस टपकाता रहूंगा.

डीपी के लिए, मैं रवीना टंडन को चुनूंगा. पानी ने आग लगाई…

पूजा पांडे एक लेखक और संपादक हैं जिन्हें विभिन्न मीडिया आउटलेट्स में काम करने का 17 साल से अधिक अनुभव है. इनमें कला और संस्कृति पर मशहूर पत्रिका फ़र्स्ट सिटी शामिल है, जहां उन्होंने संपादक के रूप में काम किया था. उनकी किताबों में ‘रेड लिपस्टिक’ (पेंगुइन रैनडमहाउस, 2016), ट्रांसजेंडर अधिकार एक्टिविस्ट लक्ष्मी की जीवनी और ‘मॉमस्पीक’ (पेंगुइन रैनडमहाउस, 2020), भारत में मातृत्व के अनुभव पर एक नारीवादी खोज शामिल हैं. अंतरानुभागीय (intersectional) यानी अलग-अलग सामाजिक वर्गों द्वारा किए जाने वाले नारीवादी आंदोलनों के लिए उनका लगाव 2017 में उन्हें खबर लहरिया ले आया. जहां उन्होंने संपादकीय, पहुंच, साझेदारी, से संबंधित विभागों में काम किया. फिलहाल वे, यहां चंबल मीडिया की कार्यनीति प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं.

इस लेख का अनुवाद अकबर रिज़वी ने किया है.

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