साक्षात्कार द्वारा शबानी हसनवालिया
“खींचो न कमानों को न तलवार निकालो.
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो”
अकबर इलाहाबादी के शेर को मुकम्मल बनाते हुए शेर सिंह का कहना है कि, “”अगर मज़दूर अपनी कहानियाँ नहीं कहेंगे, तो उन्हें दबा दिया जाएगा।”
शेर सिंह, फरीदाबाद मज़दूर अखबार के सह-संस्थापक और संपादक थे, जिन्होंने 1982 से लेकर लगभग चार दशकों तक इस अखबार को मज़दूरों की आवाज़ बनाने का काम किया. उनका अखबार मुख्य रूप से हरियाणा और आसपास के औद्योगिक इलाकों में काम करने वाले मज़दूरों के मुद्दों पर केंद्रित था. फरीदाबाद, गुड़गांव, नोएडा और दिल्ली के फैक्ट्रियों में काम करने वाले मज़दूरों की समस्याओं, उनके अधिकारों, शोषण के मामलों और हड़तालों को वे अपने समाचार पत्र में प्रमुखता से प्रकाशित करते थे.
उनकी पहचान सिर्फ एक पत्रकार के रूप में नहीं थी, बल्कि वे एक कार्यकर्ता, मार्गदर्शक और श्रमिक आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तंभ भी थे. फरीदाबाद की गलियों में, जहां हर दिन हजारों मज़दूर अपनी आजीविका की तलाश में निकलते हैं, एक आवाज़ चार दशकों तक लगातार उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ती रही.
1982 में जब उन्होंने फरीदाबाद मज़दूर समाचार की शुरुआत की, तब शायद किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि यह अखबार आने वाले दशकों तक भारतीय श्रमिक वर्ग की आवाज़ बनेगा. यह कोई आम अखबार नहीं था, जिसे विज्ञापन और कॉर्पोरेट दबाव चलाते हों, यह एक आंदोलन था—स्वतंत्र, निडर और पूरी तरह से श्रमिकों के लिए समर्पित.
2021 में द थर्ड आई टीम से उनकी मुलाकात हुई जहां हमने श्रम और श्रमिक अधिकारों पर विस्तार से उनसे बातचीत की। बातचीत में औद्योगिक बदलाव, अस्थायी श्रमिकों की स्थिति और यूनियन आंदोलन एवं डिजिटल परिवर्तन पर हमने उनसे चर्चा की. उसकी एक झलक हम आपसे साझा कर रहे हैं:
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एकता बनाओ, बोलो, आवाज़ उठाओ, फिर भी आपको बहलाकर चुप करा दिया जाता है… वर्कर की शिकायत यही होती है कि उसे पूछा ही नहीं जाता. वे मुंह से नहीं बोलते, लेकिन हज़ारों तरीकों से बोलते हैं…
आर्टिकल हैं, हज़ारों तरीके हैं… मेरी बातचीत हुई है, लोग कहते हैं— “हमारी फैक्ट्री में कोई बोलता ही नहीं. सब डरते हैं…” शिकायतें आती हैं कि जो नए-नए मज़दूर बनकर आते हैं, वे भी चुप ही रहते हैं. पर बात रखने के कई और तरीके होते हैं— हंसी-मज़ाक में, व्यंग्य में, आलोचना में. हम लोग आदान-प्रदान की बात करते हैं, संचार और आपसी संवाद की बात करते हैं. और यह सात रत्नों में शामिल हो सकता है, क्योंकि यह हमारी अनिवार्य आवश्यकता है, अगर हमें जीवन को आगे बढ़ाना है, तो.
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1982 के हिसाब से, हम मजदूर समाचार को 25 पैसे में बेचते थे. और हम इसे बेच पाते थे क्योंकि इसमें मज़दूरों के उद्धरण होते थे, फैक्ट्री के उद्धरण होते थे, इसलिए यह बड़ा प्रभावशाली होता था. 1982 और 1984 में यही था, फिर बाद में 1987 में डबल-रूल्ड हुआ, यही आकार था। फिर बाद में हमने इसका आकार बड़ा कर दिया. 2000 के बाद, हमारे पास ¾ पन्ने फैक्ट्री में श्रमिकों से आते थे, श्रमिक लिखते नहीं हैं, वे बस बताते हैं. जब हम अखबार बांटते थे, तब लोग बताते थे. बातें टुकड़ों में आती थीं. मजदूर हमें जो बताते उसे पहले नोट बनाकार बाद में हम उसे विस्तार से लिखते थे. 2000 से पहले हम लोग ही श्रमिकों के पास जाते थे. यह था कि हमारे साथी जो अखबार के दायरे में थे, वे सभी मज़दूर ही थे. कुछ लोग कहानियाँ भेजते हैं, लेकिन हम उसे इस नज़रिए से नहीं देखते कि यह हिंदूवादी है, मुस्लिमवादी है या सीपीएमवादी है। हम बस देखते रहते हैं… अगर कोई ग्रीटिंग कार्ड या गुड मॉर्निंग जैसे मेसेज आते हैं तो उसे हम हटा देते हैं.
कई बार ऐसा होता है कि फैक्ट्री में जो वर्कर होते हैं, वे खुद बताते हैं कि वहाँ क्या-क्या होता है… ये एक तरह से उन्हीं की बातों का शब्दाकार है…
अब इसमें लोग नई किताब तैयार कर रहे हैं, इसके लिए सामग्री बन रही है. यही इसका नया आकार होगा. अब तो बहुत छोटा बिकता है. पहले तो ऐसा लगता था कि हम अखबार लेकर खड़े होते थे, तो लोग अपनी साइकिल रोककर ख़रीद लेते थे…फिर धीरे-धीरे साइकिलें ही गायब हो गईं यहाँ से… पूरे फ़रीदाबाद से…
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नैप्नियो ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स. इसके वर्कर्स से हमारी बातचीत व्यक्तिगत रूप से हुई थी. उन्होंने बहुत सारी बातें बताईं. 2014 में वहां 800 वर्कर्स थे, दो विभाग थे—एक जहां इलेक्ट्रॉनिक्स के पार्ट्स बनते थे ऊपर, और एक नीचे. वहां हर वक्त खटपट चलती रहती थी, तो नीचे के वर्कर्स ग्राउंड पर आकर बैठ गए. ऊपर के वर्कर्स भी आ गए, तो कुल मिलाकर लगभग 800 लोग थे, जिनमें करीब 100 महिलाएं थीं. शाम होते ही महिलाएं अपने कमरों में चली गईं. सुबह वे फिर लौट आईं, खाना लेकर आईं… इस तरह का माहौल था—महिलाएं, लड़कियां, सभी इकट्ठा हुईं. और जब मैं महिलाएं कह रहा हूं, तो मतलब ये कि वे 18, 19, 20, 22 साल की लड़कियां थीं, जो फैक्ट्री के अंदर ही थीं…
तो 2014 में क्या हुआ कि ये स्थिति 7, 8 या 10 दिन तक बनी रही. फैक्ट्री के अंदर लगातार स्त्रियां और पुरुष मौजूद रहे। मनीलेंडर (सूदखोरों) का नियंत्रण हटा दिया गया, सरकार का नियंत्रण भी खत्म कर दिया गया, और फैक्ट्री पूरी तरह मज़दूरों के नियंत्रण में आ गई. युवा लड़के-लड़कियां दिन-रात वहां थे… यही तो रेडिकल सिस्टम बनता है ना? लड़कियां कहां-कहां से आई थीं? कोई ओडिशा से, कोई गढ़वाल से, कोई राजस्थान से… लड़कों में भी अलग-अलग जगहों के थे।
हम इसे “डी-ऑक्युपेशन” कह रहे है.
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लगातार मेहनत चलती रहती है मज़दूरों के नियंत्रण को ढीला करने के लिए। ढीला नियंत्रण ज़्यादा मारुति में था… डी-ऑक्युपेशन वहीं ज़्यादा दिखता था. ये लोग जो “ऑक्युपेशन लिमिट” या “ऑक्युपाई मोड” की बात करते हैं, असल में इसका क्या मतलब है? कई बार “ऑक्युपेशन” का मतलब ही होता है—वापस पुरानी श्रेणियों (hierarchies) में लौट जाना…और “डी-ऑक्युपेशन” का मतलब है कि माहौल को खोलना, मुक्त करना.
तो हमने 2011 में… देखो, यह जो बात है, हमारे साथी ही थे… फैक्ट्री के ही वर्कर थे। उनका यह था कि मारुति पर “कब्जा” करने को उन्होंने मंजूरी दी थी… 2011 में, जून में किया था. लेकिन तब उन्हें “कब्जा” शब्द पर आपत्ति थी—कि इसमें कोई गड़बड़ है. आपस में ही इस पर बहस हुई कि सही किया या नहीं किया. फिर हमने खुद ही इसमें बदलाव किया… हमने कहा कि “कब्जा करना” नहीं, बल्कि “कब्जा हटाना” ज़रूरी है. और मेरे विचार से, यही असल में रेडिकल स्ट्रक्चर है.
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90 के दशक में जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स आए… तो बड़ा व्यापारिक आदान-प्रदान हुआ… पूरी लाइन… इंजीनियरिंग, स्ट्रेचिंगवेयर… श्रमिकों की पुनर्रचना… जहां पहले 90% श्रमिक होते थे, आज वहाँ 90% तकनीकी कर्मचारी हैं… यही संभव था, हड़तालें हुईं, तालाबंदी हुई, यूनियन बढ़ गई…
तो यूनियन के खिलाफ कॉर्पोरेट आया. कॉरपोरेट क्या है? उसके खिलाफ जो तेज़ यूनियनवाद आया था, वह ऑटोमोबाइल मार्क्सवाद की तरह था, लेकिन वह अंतिम प्रकट रूप थे. उसका कोई स्पष्ट अंत नहीं था हमारे पास…हमें बताना चाहिए कि हमारे पास कोई हिस्सेदारी नहीं थी. यह बहस कई बार राष्ट्रीय मंच पर हो चुकी है…बहस यह थी कि हम स्थायी श्रमिकों को वहन नहीं कर सकते…
इसके बाद यह आया कि एक खतरा है… खतरा यह है कि स्थायी श्रमिक कौन होंगे? कंपनी के प्रति वफादार कौन रहेगा?… यह बहस थी, खतरा नहीं था… तो… मतलब अनजाने में ही… 1992 में जापान में यह बहस हुई कि… 2000 तक दुनिया भर में… चाहे अमेरिका हो, यूरोप हो, कहीं भी… जो मशीन निर्माण करने वाली कंपनियाँ थीं, वहाँ आम श्रमिकों की संख्या अधिक थी लेकिन काम ठेके पर दिया जाने लगा…तो इस अस्थायी प्रवृत्ति ने ध्यान आकर्षित किया…
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अखबार का अपना दायरा है… उसके बाद भी देखा कि छपने के बाद भी… लेकिन असली बदलाव तब आया जब फोन! फोन! फोन! इस्तेमाल होने लगा… इसका असर यह हुआ कि मानेसर में, गुरुग्राम में, फरीदाबाद में, नोएडा में, ओखला में, और बाकी जगहों पर, यहाँ तक कि राजस्थान में भी…
इसका मतलब यह हुआ कि अब संपर्क व्हाट्सएप के जरिए हो गया। पहले अखबार में फोन नंबर होते थे… फिर लॉकडाउन के दौर में हमारी दैनिक स्थिति में इससे मिलने-जुलने का ज़रिया बना रहा… लेकिन इसके जरिए संभावनाएँ भी बढ़ गईं।
व्हाट्सएप से जो आदान-प्रदान हुआ, उससे हमने यह समझा कि अब पूरी दुनिया ही एक दायरे में है… जो भी खबरें हम इकट्ठा करते हैं, वह इसी माध्यम से आगे बढ़ती हैं। कुछ लोग कहानियाँ भेजते हैं, लेकिन हम उसे इस नज़रिए से नहीं देखते कि यह हिंदूवादी है, मुस्लिमवादी है या सीपीएमवादी है। हम बस देखते रहते हैं… अगर कोई ग्रीटिंग आती है तो उसे हटा देते हैं।
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75 साल के शेर सिंह का 25 जनवरी 2025 को निधन हो गया. 1 जनवरी 2025 को वाट्सएप्प के ज़रिए भेजे गए मजदूर समाचार पत्र में वे ‘मानेसर मज़दूर डायरी’ की छठी किस्त साझा कर रहे थे जहां वे हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में विस्तार से मजदूरों की परेशानियों के बारे में वे बता रहे थे. किसी को यकीन नहीं था कि उनके द्वारा भेजा गया यह वाट्सएप्प उनका आखिरी मेसेज होगा. लेकिन, उम्मीद की किरण को जगाए रखने की जिद के साथ उनके द्वारा चलाए गए इस अभियान को उनके सहयोगी, मित्रजन इसे आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. आप उनकी वेबसाइट पर जाकर विस्तार से ये खबरें पढ़ सकते हैं.
