क्या आप एक कलाकार की नज़र से दुनिया को देखना सीख सकते हैं?

हम ये जानते हैं कि सामाजिक संकट के समय में कलाकार दिल को छू जाने वाली प्रतिक्रियाएं देते हैं. गौरव ओगाले आपको बता रहे हैं कि कैसे आप उनमें से एक हो सकते हैं.

‘टुगेदर वी कैन’ फिल्म से एक चित्र। फोटो साभार: instagram/@patranimacchi

गौरव ओगाले ने लॉकडाउन के दौरान अन्य कलाकारों के साथ मिलकर 12 शॉर्ट फिल्मों की शृंखला बनाई है. ‘टुगेदर वी कैन’ इसी शृंखला का हिस्सा है. इसके लिए राजकुमार राव ने अपनी आवाज़ दी है और परितोष त्रिपाठी ने इसकी स्क्रिप्ट लिखी है. “ये इतनी छोटी है कि इंस्टाग्राम पर अगर आपने पलक भी झपकाई तो शायद इसे देखने से चूक जाएं. इतनी छोटी कि आपकी तेज़ी से स्क्रोल करती उंगलियों से स्पर्धा कर सकती है.” ये आज वाइरल हो चुकी है, बड़ी संख्या में लोग इसे साझा कर रहे हैं.

हमने गौरव से उनकी कार्यविधि के बारे में बताने को कहा. साथ ही हमने उनसे कहा कि वे TTE के फील्ड फैलोज़ को समझने में सहायता करें कि किस तरह वे जो भी देख रहे हैं उसमें एक खास नज़रिया विकसित कर सकते हैं.

वह कौन-सी एक भावना थी जिसे आप लोगों तक पहुंचाना चाहते थे? या कोई एक ऐसी मुख्य चीज़ जो इस शृंखला को देखने वाले अपने साथ ले जा सकते हैं?

मेरे ज़हन में जो विचार चल रहे थे वे प्रवासी संकट के चलते, किसी एक ख़ास चीज़ के बारे में नहीं थे. मुझे लगता है जब आप किसी विशेष जगह पर रहते हैं, आप सिर्फ उस जगह का ही हिस्सा नहीं होते बल्कि लोगों, जगह, संस्कृति, राजनीति, भाषा – उन सब का हिस्सा होते हैं. और उसका भी जो भी इन्हें परिभाषित करता है, सिर्फ शारीरिक रूप से नहीं बल्कि भावनात्मक और बौद्धिक रूप से भी. जब आप अचानक उस जगह से अलग हो जाते हैं या आपको वह जगह छोड़ने के लिए बोल दिया जाता है या आप उस जगह को छोड़ने का फैसला लेते हैं तो आप उससे जुड़े होने का एहसास (sense of belonging) भी खो देते हैं जिसे आप अपने लिए या अपने समुदाय के लिए सालों से बुन रहे थे. यह एहसास कुछ ऐसा था जो मेरे साथ रह गया.

‘टुगेदर वी कैन’ फिल्म से एक चित्र। फोटो साभार: instagram/@patranimacchi

मैं चाहता था कि लोग इसे समझें और महसूस करें कि जब ये जुड़े रहने का एहसास नहीं रहता है तो कैसा लग सकता है.

प्रवासी संकट के दौरान ऐसी कौन-सी पहली तस्वीर थी जो आपको याद रह गई? कुछ ऐसा जो इस शॉर्ट फिल्म को बनाने के दौरान बार-बार आपको याद आता रहा हो?

एक तस्वीर है जो हमेशा मेरे साथ रहेगी. वह तस्वीर एक छोटे बच्चे की है जो सूटकेस पर सो रहा है. मेरे दिमाग़ में प्रवासियों की जो छवि है वो लाखों पैरों की है जो लक्ष्यहीन चले जा रहे हैं. उन्हें पता नहीं वे कहां जा रहे हैं क्योंकि हर किसी के पास वापस जाने को घर भी नहीं है.

कितनी ही तस्वीरें हैं जिनमें लोग चल रहे हैं. एक-दूसरे को कंधे पर उठाए हैं या कई ऐसे परिवार थे जो दिनों महीनों तक पैदल चले वहां पहुंचने के लिए जहां वे जाना चाहते थे. इस स्थिति में दो तरह की चीज़ें लगातार आपके दिमाग़ में चलती रहती हैं. एक,

आपके दिमाग़ में है कि आप अपने घर वापस जा रहे हैं मगर साथ ही यह भी है कि जो आपने यहां बनाया था उसे पीछे छोड़ दिया. तो एक तरह से आप घर की सही परिभाषा समझने की कोशिश कर रहे हैं.

ये कुछ ऐसा है जो हम सब करने की कोशिश में हैं. सिर्फ प्रवासी नहीं, हम सब. हममें से ज़्यादातर अलग शहरों में रहते हैं, हम अपनी आजीविका दूसरे शहरों में कमाते हैं. जब हम वहां वापस जाते हैं जहां हम पैदा और बड़े हुए, जहां हमारी ज़्यादातर यादें बसी हैं तो ज़रूरी नहीं कि वहां हमें घर जैसा लगे. क्योंकि यह महसूस करना घर को लेकर हमारे नज़रिए पर निर्भर करता है.

ये भी देखें: आशुतोष पाठक द्वारा लिखित, निर्देशित और एनीमेट की गई फिल्म ‘तस्वीर’ @daffymonk

जो चित्रकारी या तस्वीरों के ज़रिए खुद को अभिव्यक्त करते हैं या विश्व की व्याख्या करते हैं वे चीज़ों को और बारीकी से देख सकें इसके लिए आप उन्हें क्या सलाह देंगे?

व्यक्तिगत रूप से, अगर मैं किसी चीज़ को देखता हूं, चाहे वे पुरानी तस्वीरें हों या कुछ ऐसा जिसे मैंने पहले न देखा हो तो मैं उसे एक परिदृश्य में देखने की कोशिश करता हूं. जैसे अगर मैं मग को देख रहा हूं तो मैंने इसे कहां से खरीदा था? क्या इसे किसी ने मुझे दिया था? पहली बार कब मैंने इस मग को देखा था? क्या इससे जुड़ी कोई कहानी थी? क्या ये मुझसे कुछ कहता है? ये इस ख़ास रंग का क्यों है और मेरे घर में इतने सालों से क्यों है? क्या इसका कुछ सांस्कृतिक या भावनात्मक महत्त्व है? आप जितना विश्लेषण करेंगे उतनी ही गहराई तक जाएंगे.

जो आपको स्वाभाविक रूप से आता है उससे आपको हमेशा जुड़े रहना चाहिए. अस्ल में यह एहसास या अनुभव सबसे साधारण चीज़ों और परिस्थितियों के बारे में कहानियां सुनाने से जुड़ा है क्योंकि वही हैं जो लोगों को सबसे अधिक छू जाते हैं. कला ताल्लुकात ढूंढने से जुड़ी हुई है – इन्हें अपने नज़रिए से देखना और एक परिभाषित बक्से में न रखना ही कलाकार की सबसे बड़ी ईमानदारी है.

कार्यशाला

1. ये बाहर खुले में की जाने वाली सामूहिक गतिविधि है. समूह को कोई ख़ास विषय या शब्द दें. उनसे कहें कि वे चीज़ों में संबंध ढूंढें. समूह को कहें कि वे आपको एक वस्तु लाकर दें जो उन्हें एक ख़ास एहसास दिलाती है या उस कहानी के अनुरूप है जिसे आप विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं. जैसे– अगर आप पूछें कि उन्हें आशा कहां दिखाई देती है, किस वस्तु में? हो सकता है कि कोई कुछ भी न लाए या अलग-अलग लोग कंकड़, पंख, फूल या पत्तियों समेत डालियां लेकर आएं. वस्तुओं को ख़ासियतें देना बहुत ज़रूरी है. ये मेरे लिए कहानी सुनाने की शुरुआत की तरह है.

2. अब, उन्हें 10 वजहें लिखने को कहें कि वे उन वस्तुओं को क्यों लेकर आए हैं? जैसे कोई ख़ास फूल, उसका रंग, उसकी बनावट उन्हें कैसा महसूस कराती है? अगर वह चीज़ उस परिदृश्य से निकाल दी जाए, तो वह और कहां सही बैठ सकती है? जब आप चीज़ों को उनकी जगह से हटा कर कहीं और रखना शुरू करते हैं, और फिर आप इनके चारों ओर नए विवरण गढ़ना शुरू करते हैं तब कला को नज़दीक से समझने के क्रम में होते हैं.

3. आप सबको किसी जगह की तस्वीर लेने को बोलें. इसे बड़े स्क्रीन पर दिखाएं और सबसे बोलें कि इस जगह का कोई काल्पनिक व्यक्तित्व रचें. उस जगह पर कौन रह रहा है? उस व्यक्ति का रोज़गार क्या है? वह व्यक्ति क्या करता है? उसके शौक क्या हैं या क्या करने में उसे मज़ा आता है? उनसे कहें कि उस तस्वीर से एक चीज़ उठाएं और उस पर कहानी बनाएं. वे उस जगह के बारे में विभिन्न विवरण बनाते रहें और अंत में आप वह तस्वीर लेने वाले से कहें कि उस जगह की वास्तविक जानकारी सबको दें. वास्तविक और काल्पनिक के अलग होते और मिलते बिन्दु एक मज़ेदार चर्चा की शुरुआत कर सकते हैं.

4. जानी पहचानी चीज़ें अजीब दिखाई दें, इससे संबंधित गतिविधि करें. समूह से कहें कि वे इस तरह वीडियो बनाएं कि आम चीज़ें, जगहें अलग दिखाई दें. जैसे, अगर आपने एक पेड़ का वीडियो बनाने का निश्चय किया है तो पहले बहुत करीब जाएं, उसकी बनावट से शुरुआत करें, फिर धीरे- धीरे पीछे हटते हुए वीडियो के अंत में पूरे पेड़ को दिखाएं. ये गतिविधि तस्वीरों की एक शृंखला के साथ भी हो सकती है. जिसमें अंतिम तस्वीर पूरी चीज़ को दिखाए.
 
5. सभी प्रतिभागियों को एक गोले में बिठाएं. हर एक से कहें कि एक लोक गीत का अंश गाकर या बोलकर सुनाएं. वे कोई भी भाषा और धुन चुन सकते हैं. जब सब प्रतिभागी गीत की 2-2 पंक्तियां गा चुके हों तो उनसे कहें कि वे किसी और के गीत की प्रतिध्वनि (resonance) खोजें. एक बार जब वे गीतों के बीच धारावाहिकता (एक क्रम) खोज लेंगे तो गीतों को एक-दूसरे से जोड़ पाएंगे चाहे वे अलग-अलग बोलियों में ही क्यों न हों. इस गतिविधि से उनमें साथ काम करने की समझ विकसित होगी. साथ ही उन्हें समझ आएगा कि कैसे सुनने और संबंध बिठाने का काम किया जाता है. इस तरह वे मिलकर एक ऐसा गीत बना पाएंगे जिसकी कोई ख़ास भाषा या धुन नहीं है. 
 
6. हर प्रतिभागी अपने घर से ऐसी पांच चीज़ें लेकर आए जो उसकी जगह को परिभाषित करती हों – कप, प्लेट, बर्तन, दुपट्टा, शीशा, छोटा सजावट का समान आदि. अब वह इन्हें एक संरचना की तरह सजाए, जैसे – एक उल्टा रखा कप और उसपर दुपट्टा. जब सब ऐसा कर लें तो पूरे समूह को हर संरचना के सामने जाना है और उसे नीचे दिए नज़रियों से देखना है:
 
  • कौन सा ऐसा रंग है जो अन्य रंगों पर हावी है?
  • इस घर में किस तरह की रंग योजना या पैलेट है?
  • क्या इससे उस परिवार के लोगों के या उनके व्यक्तित्व के बारे में पता चलता है? प्रतिभागियों से कहें कि वे उस संरचना का गहराई से अध्ययन करें. हमारा व्यक्तिगत इतिहास ये जानने के लिए महत्त्वपूर्ण है कि हम कहां से आए हैं, क्या बने और क्या करते हैं? क्योंकि हमारा सफर हमारे अंदर से ही शुरू होता है. कला हमेशा हमारे अंदर से आनी चाहिए.
  • अब संरचना से एक चीज़ हटा दें और सोचने की कोशिश करें कि अगर ये चीज़ यहां न होती, तो और कौन-सी संरचना में ये आसानी से ठीक बैठती है. फिर समझने की कोशिश करें कि क्यों वह चीज़ वहां उपयुक्त बैठ रही है और कैसे चीज़ों की खूबसूरती को संस्कृति और भाषा से अलग करके देखा और समझा जा सकता है.
शिवम् रस्तोगी द थर्ड आई में वीडियो प्रोड्यूसर और इमेज एडिटर हैं. वे एक फॉटोग्राफर और फिल्ममेकर हैं. वे लगातार कैमरा के पीछे से दुनिया और इसके विभिन्न रंगों को समझने की कोशिश करते रहते हैं. उन्होने इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से जर्नलिज़्म और मास कम्यूनिकेशन में स्नातक की डिग्री और जामिया मिलिया के मास कम्यूनिकेशन रिसर्च सेंटर से स्नाकोत्तर डिग्री हासिल की है. शिवम ने फिल्म कमपेनियन और मेमेसयस कल्चर लैब के साथ काम किया है.

इस लेख का अनुवाद सादिया सईद ने किया है.

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