शहर की सड़कों पर परचम फहराती लड़कियां

एक शिक्षिका उन मिथकों, किवदंतियों और नायिकाओं को देखती है जो उसकी क्लास में मौजूद होते हैं.

चित्रांकन: प्रियंका पॉल @artwhoring

कोंकणी में हम एक कहावत का इस्तेमाल करते हैं, ‘वह शहर में इतना ज़्यादा घूमी कि उसने गर्दा उड़ा दिया.’ कॉलेज से ग़ायब होने, किसी लड़के की बाइक पर उसके पीछे बैठने और शहर में घूमने पर हमारी मांएं हमें शर्मिंदा करने के लिए यह कहा करती थीं. मैंने इस कहावत के बारे में अक्सर सोचा है. किसी चीज़ का गर्दा उड़ाने या पाउडर बनाने के लिए आप अपने दोनों हाथों का इस्तेमाल करते हैं और शरीर के हर कोने से जितनी ताकत खींचकर आप लगा सकते हैं, वो लगाते हैं. बंगलोर जैसे बड़े शहर के साथ ऐसा करने का मतलब है किसी लड़के की बाइक पर बिताए गए कुछ घंटों में गलियों से सरपट गुज़रना और शहर के पुराने घरों को निहारते हुए मन ही मन कहना कि शहर मेरा है.

क्लासरूम में वैसी लड़कियों को देखना रोमांचकारी होता है, जो देश के विभिन्न हिस्सों से आती हैं और किसी लड़के या उसकी बाइक के साथ या उसके बगैर, इस शहर में गर्दा उड़ा देती हैं.

जब मैं पहली बार अपनी छात्रा किरूबा से मिली, तब हम किरूबा द्वारा लिखे, तिरुनेलवेली की गायों के बारे में एक लेख पर चर्चा कर रहे थे. किरूबा ने बताया कि उसके गांव की गायों का ओहदा अब बढ़ गया है, अपने नामों में तरक्की कर वे अंबिका, श्रीदेवी और लक्ष्मी से नयनतारा तक पहुंच चुकी हैं – जिसने हाल ही में दीपिका पादुकोण को जन्म दिया है.
अपने गांव तिरुनेलवेली के लिए उसका मन तब तड़प उठा जब उसने महसूस किया कि इस शहर की गायों का कोई नाम नहीं है और इस शहर की सड़कों पर कोई खिलखिलाहट नहीं है. उसने महसूस किया कि एक गली में साथ रहते हुए भी लोग एक-दूसरे से बात नहीं करते. इसलिए वह घूमने निकली और तब तक घूमती रही जब तक कि उसे शिवाजीनगर में तिरुनेलवेली नहीं मिल गया. यहां उसने ख़रीदारी की और जमकर खाया और तब तक खाती रही जब तक कि उसने गर्दा (पाउडर) नहीं उड़ा दिया.

अपने कॉलेज के कुछ शुरुआती दिनों में, मेरी स्टूडेंट ईश्वरी खाना खाने के लिए ख़ाली क्लासरूम ढूंढती रहती थी. उसके अधिकांश दोस्त कॉलेज के बाहर के थे – देवसंदरा का दुकानदार, जिसने उसके लिए लेज़ का आखिरी पैकेट बचाकर रखा था, उसके बकबक बंद न करने पर उससे चिढ़कर किसी लालबत्ती पर उसका बैग बाहर फेंक देने वाले बस कंडक्टर और बस स्टॉप पर मिलने वाले फूल बेचने वाले लेकिन उसके सबसे करीबी दोस्तों में वे ऑटो ड्राइवर थे, जो उसकी बस छूट जाने के बाद उसपर दया करके उसे लिफ्ट देने की पेशकश करते, और उसके साथ-साथ बस का पीछा करने को जिन्होंने अपना मिशन बना लिया. 

शहर में इन्हें आगे बढ़ने के लिए क्लासरूम या दोस्तों का साथ नहीं मिलता, जैसा बाकी स्टुडेंट्स को मिलता है और जिसे पाकर वे अपने को ख़ुशकिस्मत समझते हैं. बल्कि कभी ये ख़ुद को आगे बढ़ाती चलती हैं तो कभी पीछे छुट गए घर और उससे जुड़ी यादें उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती हैं. लेकिन, सबसे मज़ेदार बात यह है कि वे शहर को अपने कंधे पर उठाए घूमती हैं.

फिर भी, शहर मुझे सबसे ज़्यादा कॉलेज में दाखिला लेने के समय साक्षात्कार में बैठने के दौरान दिखाई पड़ता है. एक दिन, मैं एक लड़की के पूरे आत्मविश्वास से लबरेज़ माता-पिता से मिली, उन्होंने इस बात का आश्वासन चाहा कि कॉलेज के भाग्य खुलने पर अगर उनकी बेटी यहां एडमिशन ले लेती है तो क्या हम उनकी बेटी को ये आश्वासन दे सकते हैं कि उसे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी मिल जाएगी.

उन्हें शांत हो जाने के लिए कहने के थोड़ी देर बाद ही, एक और लड़की कमरे में दाखिल होती है. उसके साथ उसके पिता हैं जो बेहद घबराए हुए से, इधर-उधर देख रहे हैं कि कहीं उन्हें कोई यहां से चले जाने के लिए तो नहीं कह देगा. जब उनके हस्ताक्षर करने की बारी आई तो उनके हाथ कांपने लगे, फिर लड़की ने उन्हें शांत और स्थिर करने के लिए उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिया. ऐसा लगता था मानो उन्होंने अपनी बेटी के दाख़िले के लिए आज सुबह ही हस्ताक्षर करना सीखा है. बाद में जब वे एक भारी बैग के साथ रवाना हुए, जो एक तौलिए से ढंका था और उसमें से दो संतरे बाहर झांक रहे थे, तब मैंने पाया कि कुछ लोगों के लिए शहर का अनुभव कितना तकलीफ़देह होता है.

दलित कवि, सिद्धलिंगैया ने इस शहर में पैदल तफ़री कर और उसके बारे में लिखकर इसमें जोश भर दिया है. अपने संस्मरण ‘ऊरू केरी’ में, उन्होंने कब्रिस्तान के भीतर पढ़ने और सोने के अपने अनुभवों के बारे में लिखा है. वे कहते हैं कि कब्रिस्तान से बढ़कर शांत जगह पूरे शहर में कहीं नहीं मिलती, और इससे ज़्यादा निजी घर का कोई कोना भी नहीं होता.

जब हम ऑनलाइन क्लास की ओर मुड़े, तो मेरे कुछ स्टुडेंट्स के लिए क्लासरूम में मिलने वाली वो निजता ख़त्म हो गई जो ऑनलाइन से पहले उनके पास थी. घर में परिवार के दूसरे सदस्यों से घिरे कमरे में बैठकर ऑनलाइन क्लास लेते हुए अपनी ‘क्लासरूम की छवि’ को सबके सामने दिखाने का रिस्क वे नहीं ले सकती थीं.

वहीं, कुछ स्टुडेंट्स के लिए, ऑनलाइन में बिना चेहरा दिखाए मौजूद रहने की सुविधा ने उन्हें एक ख़ास क़िस्म की हिम्म्त दी जिससे वे ख़ुद भी अनजान थीं.

एक दिन क्लास में यूनिस डिसूजा की कविता ‘एडवाइस टू वीमेन’ पढ़ते हुए, हम इस बात पर आश्चर्य करने लगे कि डिसूजा हमें घर में बिल्लियों के साथ रहते हुए कैसे मरना चाहिए इसकी सलाह दे रही हैं, न की जीने की. और एक स्टूडेंट जो आमतौर पर ऑफ़लाइन क्लास में ज़्यादा नहीं बोलती है, ने इसका जवाब दिया, “क्योंकि अकेले मरने के बारे में जानने से, हमें अकेले कैसे जीना है- इसके बारे में सीखते हैं”. मुझे नहीं पता कि इस लड़की ने शहर या जीवन के किस अनुभव को आगे बढ़ाया, लेकिन मैं उस सुबह इस कदर मौन हो गई जैसा मैं पहले कभी नहीं हुई थी.

गांवों से शहरों की ओर जाने वाले दलितों के लिए, प्रगति और निजता अजीब तरीके से काम करती है. उपन्यासकार डॉन पॉवेल ने कहा है, ‘प्रगति निजी होती है’. मैं इस कथन से तब तक जूझती रही जब तक कि सिद्धलिंगैया द्वारा सुनाया गया एक दृश्य दिमाग में कौंध नहीं गया. बंगलौर के एक कॉलेज के छात्रावास में उनका सम्मान किया जा रहा था और

जब वे उस सम्मान को ग्रहण करने के लिए मंच पर पधारे, तो उन्होंने अपनी मां को देखा, जो उसी छात्रावास में सफाईकर्मी थीं और हाथ में झाड़ू पकड़े गर्व से छात्रावास की पहली मंज़िल से खुश होकर उनकी हौसला अफज़ाई कर रही थीं. सिद्धलिंगैया कहते हैं कि उन्हें नहीं पता था कि इस सच्चाई का क्या करना है. यह एक शहर की सच्चाई थी,

जिसे सिर्फ एक शहर में ही अनुभव किया जा सकता है, उसमें रहते हुए उससे उभरे अजनबीपन से समझा जा सकता है. शहर में प्रगति को न तो किसी दूसरे को सौंपा जा सकता है और शायद ही उसे साझा किया जा सकता है.

ये बहुत हद तक शहर की उस दोहरी सच्चाई की तरह है जो कॉलेज जाने वाली लड़कियों को मिलती है जिसमें उन्हें घर पर एक अलग चेहरा ओढ़ना पड़ता है और घर से बाहर क्लासरूम में अलग चेहरा. क्योंकि दोनों चेहरों को ओढ़ने की कीमत बहुत भारी हो सकती है. कभी-कभी तो यह कीमत इतनी ज़्यादा होती है कि वे क्लास में ओढ़े हुए चेहरे को भुलाकर घर में दिए गए चेहरे में खुद को छुपा लेती हैं. कभी-कभी वे दोनों चेहरों को एक-दूसरे में डूबो देने के लिए राज़ी हो जाती है, तब तक जब वे भूल नहीं जातीं कि कौन सा चेहरा किसके लिए था.

ईश्वरी की मां उसकी सभी ऑनलाइन क्लास में बैठती है. ख़ासकर लेखन की क्लास में उन्हें तब बहुत मज़ा आता है जब उन्हें अपनी बेटी को कहानी पढ़ते हुए सुनने का मौका मिलता है. कभी-कभी घबराहट में ईश्वरी को म्यूट बटन दबाना पड़ता है क्योंकि उसकी मां उसके पढ़े हुए किसी अंश को सुनकर बहुत ज़ोर से हंसने लगती है.

मैं क्लास की उन लड़कियों के बारे में सोचती हूं जो चलते हुए, पढ़ते हुए, खाते हुए, लिखते हुए अपनी खिलखिलाहट से शहर को ग़ुबार में बदल देना चाहती हैं, अपनी खिलखिलाहट के तले उसे रौंद देना चाहती हैं.

मैं अपनी मां के बारे में सोचती हूं जो शाम के समय किराए के उन सारे घरों की खिड़कियों पर अगरबत्तियां जला दिया करती थीं क्योंकि हमें उन घरों में मछली बनाने की इजाज़त नहीं थी और इस तरह शाम में वह शहर से अपना बदला लेती थीं. वह ऑटो लेकर एक खास रंग की नाइटी; जिसका वो नाम तक नहीं जानती थीं, की तलाश में दूर-दूर तक चली जाती थीं. आमतौर पर शहर की उन लंबी दूरी की यात्राएं वह बार-बार करती थीं. उस दौरान घर चाभी के छेद में मौजूद हवा की तरह हल्का और शांत होता था और मैं चिंता से घुलती रहती थी कि शहर ने उन्हें ज़िंदा तो नहीं निगल लिया, और अब वह लौटेंगी नहीं. यह बात कभी मेरे दिमाग में आई ही नहीं कि दरअसल वह शहर को निगल रही थीं.

विजेता कुमार बंगलोर के सेंट जोसेफ कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाती हैं. वो https://rumlolarum.com/ पर लिखती हैं. लड़कियों के साथ खिलखिलाती हैं और ठुकराए हुए के साथ खड़ी होती हैं.

इस लेख का अनुवाद जितेन्द्र कुमार ने किया है.

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