कहानी घर घर की

कहानियों के ज़रिए सामाजिक रिश्ते की ख़ूबसूरती और खोखलेपन दोनों को ज़ाहिर करने की कोशिश.

चित्रांकन: आकृति अग्रवाल

पटना में रहनेवाली स्वाती को कहानियां सुनना-सुनाना पसंद है. वे रोज़मर्रा की ठेठ कहानियों को अपने बिहारी तड़के के साथ हमारे सामने ला रही हैं. स्वाती इन कहानियों के ज़रिए कुछ बेड़ियों को टटोलती हैं और उन्हें चुनौती देती हैं.

पटनावाली की तीसरी क़िस्त में स्वाती हमें सुना रही हैं कहानी घर घर की.

मंजू आंटी जब भी हैदराबाद से पटना आती हैं तो अपनी बड़ी बहन संजू आंटी के यहां ठहरती हैं. पटना पहुंचते ही फ़ोन करके हमसे पहला सवाल यही करती हैं, “ तsssब पटना मार्केट कब ले चल रही हो?”

पटना मार्केट की रौनक़ ही कुछ और होती है. घुसते ही चाट की छोटी सी दुकान है. दुकान के दो सिरों पर रखे दो बड़े तवे से आलू टिक्की, समोसे और छोले की ख़ुशबू आती रहती है और सामने होती है – चटोरों की उतावली भीड़! ‘ए, अरे सुनिए ना! खट्टा एकदम्मे नहीं है. थोड़ा चटनी डालिए ना. अरे मिट्ठा वाला नहीं जी, तित्ता वाला.’ ‘तीन प्लेट ना बोले थे जी, दुइए प्लेट काहे पैक किए हैं?’ ऐसी चीख़-पुकार से गुलज़ार दुकान से ज़रा आगे बढ़िए, तो बाएं हाथ पर रौशनी से जगमग चूड़ी गली मिलेगी. वहां की बातों के लच्छे कुछ और ही होते हैं. ‘ले जाइए दीदी, पचासे का तो लगा रहे हैं. सब कुछ तो महंगा हो रहा है लेकिन चूड़ी पुरनके दाम में दे रहे हैं.’ ‘संदीप ब्रांड का कुमकुम ना रखिए है जी? डाला में चढ़ावे ला ना है.’ ये सब आवाज़ किसी को शोर लग सकती है पर हमें तो बहुत सुहाती है. एकदम नशे के जैसी चढ़ती जाती है.

ख़ैर, इस बार भी पहली ही फ़ुरसत में मंजू आंटी और हम पटना मार्केट पहुंच गए. भारतीय वस्त्रालय से हम दोनों ने थोड़ी-बहुत ख़रीदारी की. चूड़ी गली से मंजू आंटी ने सबके लिए चूड़ियां और बाला ख़रीदा. फिर हम चाट की दुकान के सामने चिल्ला-चिल्लाकर अपनी दावेदारी दर्ज करने लगे. थोड़ा खाए, थोड़ा संजू आंटी के लिए पैक करवा लिए. डाक बंगला चौराहे पर स्पेशल लस्सी पिया गया और उसके बाद गुलकंद और मीठी चटनी वाला पान चाब कर केतकी के घर पहुंचे.

केतकी मंजू आंटी की भगिनी है. हाल ही में उसकी शादी हुई है. मंजू आंटी को देखकर वो बेहद ख़ुश हुई. पर हम लोगों को घर लौटने की जल्दी थी सो हम केतकी से गले मिलकर, पानी वानी पीकर दस मिनट में घर की ओर लौट चले. निकलते-निकलते केतकी ने हमें जैविक सत्तू के दो पैकेट थमा दिए.

हड़बड़-दड़बड़ करते हम संजू आंटी के घर पहुंचे पर तबतक चार बज चुके थे. देर हो गई थी इसलिए मंजू आंटी ने बहुत सहमे से अंदाज़ में दरवाज़े पर दस्तक दी. तमतमाती पिनकी हुई संजू आंटी ने दरवाज़ा खोला पर जैसे ही चाट और लस्सी पर नज़र पड़ी, उनके चेहरे का भाव एकदम से रौद्र रस से सौम्य रस में बदल गया.

मंजू आंटी को उनके घर पर छोड़ हम जल्दी से अपने घर के लिए निकले. लेकिन जैसे ही नीचे पहुंचे याद आया कि जैविक सत्तू का मेरा पैकेट तो ऊपर ही रह गया, सो उसे लेने उल्टे पांव ऊपर भागे. अभी पहली ही मंज़िल पर पहुंचे थे कि संजू और मंजू आंटी की तेज़ आवाज़ में हो रही बातचीत सुनाई पड़ी. दरवाज़े तक पहुंचते-पहुंचते तक बातों का बम फूट चुका था. ग़ुस्से के उबाल के उतरने के इंतज़ार में हम दरवाज़े पर ही रुक गए.

संजू आंटी ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रही थीं, “छिः छिः छि राम राम! सब नास कर दी, समूच्चे घर को अपवित्र कर दी. अभिये नहा कर निकले थे, अब फिर से नहाना पड़ेगा. तुमको हिम्मत कैसे हुआ जी कि ऊ मलेच्छन के घर का सामान हमरे घर में ले आई?”

“ओहो दीदी. सत्तू केतकी के घर की कढ़ाही में थोड़े न बना है, गांव से बनकर आया है.”

“उसके घर में था न! त उसके घर का हवा उसको लगा कि नहीं?”

“दीदीsss. हा हा. क्या बोल रही हो तुम?”

“कौन बात पर हंस रही हो जी तुम? अब हमको पूरा घर धोना पड़ेगा.”

“केतकी को अपने गोद में खिलाई हो दीदी.”

‘हां, खिलाए हैं गोद में तो. मुसलमान से बियाह करके ऊ अब मलेच्छ हो चुकी है. अब ऊ अपवित्र और उसके घर का सभ्हे समान अपवित्र है."

“ऐ दीदी, बाज़ार से जो कुछ ख़रीद कर लाती हो तुमको पता रहता है क्या कि उसको कौन बनाया, और कौन छुआ?”

“हां, नहीं पता होता. पर अभी तो पता है! जानते-बूझते हमसे अइसा पाप नहीं होगा. फेंक दो ये सत्तू अभी के अभी.”

“ठीक है दीदी, तो फिर चूड़ी भी दो और बनारसी साड़ी भी. क्योंकि चूड़ी जो बनाया सो वो भी मुसलमान और जो बेचा सो वो भी मुसलमान. और बनारसी साड़ी जो खरीदी हो अभी, बनारस का जुलाहा बुनता है. सब हटा दो. हटा दो सब.”

“देखो मंजू, खाने का सामान और पहिनने के समान में अंतर होगा कुछ? उसके घर में पता नहीं क्या-क्या पकता है.”

“संजू दी, चावल-दाल, साग-सब्ज़ी जात और धरम पूछकर ख़रीदती हो? भूखी मर जाओगी फिर तो?”

“मेरे मरने के बारे में मत सोचो अभी से तुम मंजू. आ फालतू का बकवास मत करो हमसे, समझी! धरम और आस्था में सवाल-जवाब नहीं होता है. जो सही है तो सही है और जो गलत है सो गलत है. अब हम कह दिए तो कह दिए कि ऊ अधर्मी के घर का सामान हमारे घर में नहीं रह सकता तो नहीं रह सकता. फेंको अभी. सत्तू का पैकेट फेंको बाहर.”

“और ये जो चाट और लस्सी है इसको भी फेंक दें ना, दीदी!”

“नहीं, चाट तो तुम लाई हो एतना प्यार से उसको नहीं फेकेंगे. पर ई सत्तू का पैकेट इस घर में नहीं रहेगा.”

“अरे दीदी, हम तुमको ये सत्तू खाने को थोड़ी ना कह रहे हैं! ये केतकी मेरे लिए दी है, हम इसको अपने साथ हैदराबाद ले जाएंगे.”

“न! एकदम्मे न! उसके घर से आया हुआ एक्को सामान मेरे घर में एक मिनिट भी नहीं रह सकता. अभी इसको मेरे घर से बाहर निकालो.”

“फिर तो हम भी उसके घर से आए हैं दीदी, हम भी चले जाएं इस घर से?”

“बाप रे बाप मंजुआ! तुम तो हमको बदनामे कर दोगी. हम बोले तुमको ऐसा एक्को बार?”

"आहा! दीदी! छह कप चाय रोज़ पीती हो. उसमें जो चीनी मिलाती हो न उसकी सफ़ाई जानवर की हड्डी से होती है. जानती हो कि नहीं?" "मेरे घर को अपवित्र करके तुमरा मन नहीं भरा कि मेरे सामने अब जानवर का हड्डी और मांस का बात कर रही हो? इतना तो मान रखती कि इहे कमरे में भगवान् विराजे हुए हैं."

“ठीक है, एकदम सीधा सवाल पूछते हैं तुमसे कि जब दस आदमी से छू-छुआ कर रुपया-पैसा तुम्हारे पास पहुंचता है तब कैसे पवित्र करती हो उसको? रोज़ गंगा जल छिड़कती हो?”

“ऊ मलेच्छ के लिए तुम मेरा मज़ाक उड़ा रही हो?”

” मज़ाक नहीं उड़ा रहे संजू दीदी. एक बात बता दो बस.

हवा में हर कोई सांस लेता है और छोड़ता है, छींकता है, पादता है… हिन्दू भी मुसलमान भी सिख भी और ईसाई भी सब कोई.. इसी में छींकता भी और पादता भी है. तुम छन्नी से छान कर तो हवा नहीं लेते न”

” रे मंजुआ! भगवान जी के सामने तुम छींकने-पादने का बात करती हो! ऊ अधमी से मिलने के बाद तुमको कौनो संस्कार नहीं बचा?”

“और संजू दी तुम! तुम कंटीला संस्कार हो. खाली ढोंग रचती रहती हो.”

इतना सुनना था कि संजू आंटी हत्थे से कबड़ गईं! लगा, जैसे वो हाथ चला बैठेंगी. इस बात का अंदाज़ा शायद मंजु आंटी को हो गया था. वो दरवाज़ा खोलकर फ़ौरन बाहर निकल आई थीं. बाहर आते ही हमको देखकर थोड़ा सकपका गईं. फिर हम दोनों ठठाकर हंस पड़े और भागकर सीढ़ियां उतरने लगे. पीछे से संजू आंटी की ज़हरीली चीख़ें हमारा पीछा कर रही थीं.
तीन-चार घंटे इधर-उधर टहलने के बाद हम फिर से संजू आंटी के घर के सामने की सड़क पर थे. सड़क किनारे लोग फुटपाथ और ठेलों पर खेंदड़ा-गुदड़ी बिछाकर सोने की तैयारी कर रहे थे.

दिन भर की भागम-भाग के बाद घर के बरामदे की शांत छत को मंजू आंटी कुछ पलों के लिए एकटक देखती रहीं. फिर बोलीं, 'कितने मज़दूर लोग मिलकर दीदी का घर बनाए होंगे. उसमें कोई हिन्दू भी रहा होगा, कोई मुसलमान भी रहा होगा. और देखो, सब कोई मिलकर दीदी के लिए एक छत का इंतज़ाम कर दिए."

“जब तक आप पटना में हैं इसी छत के नीचे आपको रहना है, मंजू आंटी.”

इस बात पर हम दोनों फिर से हंस पड़े. अपने-अपने घर के लिए निकलते हुए हम दोनों ने लगभग एक साथ कहा,
आज की मुलाक़ात बस इतनी!

कर लेना बातें कल चाहे जितनी!!

पटना में रहनेवाली स्वाती को कहानियां सुनना और सुनाना पसंद है. इन कहानियों में समाजी रिश्ते के ताने-बाने को, उसकी विविध छटाओं को वे सामने लाती हैं. इन्हें आप मनबताशा ब्लॉग और यूट्यूब चैनल पर भी पा सकते हैं. उनके बिहारी अंदाज़ में ऐसी ही कुछ कहानियां पेश हैं.
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