होमाय व्यारावाला

पहली महिला पत्रकार पर फोटो आलेख, जिन्होंने फोटोग्राफी को काम के रूप में स्वीकार किया, अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाया.

होमाय व्यारावाला

होमाय व्यारावाला भारत की पहली महिला प्रेस फोटोग्राफर थीं. सबीना गैडियोक, जो एक फिल्मकार, लेखक, फोटोग्राफर और संग्राहक (curator) हैं, ने 9 साल होमाय व्यारावाला के साथ गुज़ारे.

होमाय ने तस्वीरें लेने की शुरुआत 1931 में की और 1960 में 57 साल की उम्र में अचानक ही तस्वीरें लेना बंद कर दिया. ऐसा कहा जाता है कि होमाय को, भारतीय इतिहास के सबसे यादगार पलों की तस्वीरें लेने के बाद ऐसा लगने लगा था कि अब कोई उनकी तस्वीरों में रूचि नहीं रखता है.

उन्होंने अपने ज़्यादातर नेगेटिव एक बक्से में रखे, जो बाद में किसी यात्रा में खो गया. कुछ अन्य नेगेटिव और तस्वीरों को उन्होंने जला दिया. “एक ऐसे देश में जहां गांधीजी जैसी महान हस्ती को भी भुला दिया गया, भला मैं क्यों किसी को याद रहूंगी.”

एक दिन एक दिल्ली आधारित फोटोग्राफर का ध्यान पत्र सूचना कार्यालय (Press information Bureau) में दर्ज उनके नाम पर गया. आदमियों के नामों की लंबी सूची में एक वही औरत थीं. उसने होमाय के बारे में पूछताछ की और इत्तेफ़ाक से उसकी मुलाक़ात उनसे दिल्ली में कैमरा की दुकान में हो गई.

सबीना की मुलाक़ात होमाय से उनकी डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘तीन महिलाएं और उनका कैमरा’ (Three Women and a Camera) बनाते समय 1997 में हुई. इस मुलाक़ात के दौरान उन्होंने भारतीय राष्ट्र निर्माण के नारीवादी इतिहास को जाना, जिसे अभी तक कम लोगों ने देखा या सुना था. इस इतिहास को बहुत ही प्रेम से अपनी किताब Camera Chronicles of Homai Vyarawalla में सबीना गैडियोक ने समेट कर हमारे सामने रखा है.

होमाय के गुज़र जाने के बाद सबीना ने बताया, “होमाय ने  23 साल तक शांत सेवानिवृत्त जीवन जिया. उन्होंने अपनी सफलता को उसी नज़र से देखा था जिससे अपनी गुमनामी (anonymity) को देखा.”

सबीना आगे बताती हैं “यह फिल्म होमाय के साथ मेरे लंबे सफ़र की शुरुआत थी. हमने एक-दूसरे को पत्र लिखे. मैं हर कुछ महीने में बड़ोदा जाती थी ताकि उनके द्वारा खींची गई तस्वीरों को देख सकूं और इन्हें लेने वाली व्यक्ति को जान सकूं.

मैं उनके फोटो का संग्रह कर उन पर टिप्पणियां, उनके बेपनाह अनुभवों के आधार पर लिख रही थी, जो हिन्दुस्तान के इतिहास की लगभग एक सदी में फैले थे.

उनकी याददाश्त बहुत तेज़ थी. मेरी थोड़ी कोशिश पर ही वे अनगिनत किस्से, कहानियां मुझे सुना देती थीं. जैसे-जैसे सालों साल हमारी दोस्ती बढ़ी, मुझे एहसास हुआ कि वे एक अद्भुत महिला हैं जिन्होंने पूरी तरह आत्मनिर्भर जीवन जिया है. उन्होंने अपना फर्नीचर खुद बनाया था, अपने कपड़े खुद सिए थे, वे बिजली से जुड़ी चीज़े खुद ठीक कर सकती थीं और नलसाज़ी भी खुद करती थीं. यहां तक कि घर के काम करने के लिए उन्होंने कुछ मशीनें भी तैयार की थीं.

वे अक्सर कहा करती थीं कि वे एक ऐसे आदमी की तरह हैं जो अकेले टापू पर रहता है. उनका टापू बड़ोदा स्थित उनका घर था जहां उन्होंने अंत तक कुछ पौधों और चुनिंदा निजी तस्वीरों के साथ आत्मनिर्भर ज़िंदगी गुज़ारी.”

द थर्ड आई प्रस्तुत करता है, महिला और काम पर, ऐतिहासिक और निजी तौर पर होमाय व्यारावाला के विचार, सबीना गैडियोक के शब्दों में:

मैं आपको एक मज़ेदार बात बताती हूं. मुझे राष्ट्रपति भवन में एक बड़े कार्यक्रम की तस्वीरें लेनी थीं. इसके लिए मैंने अपना एक ब्लाउज़ सिला. इस ब्लाउज़ की आस्तीनों को मैंने हाथ से सिला था मगर उसके बाद मशीन से सिलना भूल गई. जिस वक़्त मैं बैंक्वेटहॉल (खाने का कमरा) में तस्वीरें ले रही थी, मैंने ऊपर के एंगल से तस्वीर लेने के लिए हाथ उठाया तो आस्तीन की सिलाई उधड़ गई. वहां बैठी एक-दो औरतें ये देखकर हंसने लगीं. क्या आपको पता है मैंने क्या किया? मैंने वो आस्तीन खींच कर अलग कर दी जो फट गई थी. फिर दूसरी आस्तीन के साथ भी यही किया. इन्हें बैग में रखकर मैं दोबारा तस्वीरें लेने लगी.

-एक साक्षात्कार में होमाय व्यारावाला

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सबीना गैडियोक कहती हैं- “अगर हम कैमरा पकड़े होमाय की तस्वीरों को देखें तो पाएंगे कि वे बहुत ही ज़बरदस्त तस्वीरें हैं, क्योंकि वे हूबहू वही दिखाती हैं जो कैमरा ने उनकी जैसी महिला को करने की स्वतंत्रता दी. ताकि वे अपने अंदर देख सकें और बाहर की दुनिया को भी जांच सकें. वे बेझिझक और बेपरवाह घूम सकें और अपने कैमरे की खिड़की से देखते हुए शहर का नक्शा खींच सकें. वे ख़तरों से भरे अनुभव ले सकें और ऐसी चीज़ों का सामना करने की खुशी और अनिश्चितता को महसूस कर सकें जिनकी कभी कल्पना न की हो.”

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“हम अपनी माली हालत के मुताबिक मुंबई में एक घर से दूसरा घर बदलते रहे… हम पांच लोग एक कमरे में रहते थे. हमारी रसोई और नहाने की जगह भी इसी कमरे में थी…

जब किराए बहुत बढ़ने लगे तो हम मुंबई के अंधेरी इलाके में रहने आ गए. वहां से मैं स्कूल जाने के लिए सुबह 6.30 बजे ग्रांट रोड की ओर जाने वाली ट्रेन पकड़ती थी. मुझे अपना ज़्यादातर घर का काम इससे पहले ही ख़त्म करना होता था क्योंकि मेरी मां को अस्थमा की बीमारी थी.

मैं और मेरा भाई अग्नि मंदिर (होमाय पारसी थीं. उनके धर्म में उनके पूजा के स्थान को अग्नि मंदिर कहा जाता है.) के आंगन में बने कुएं से बाल्टी में पानी भर कर लाते थे. टॉयलेट के लिए हमें पहाड़ी की ढलान पर चढ़ कर जाना होता था.

शुरू में हमारे पास अलमारी भी नहीं थी. हम फकीरों की तरह, जाने वाले पलंगों और ट्रंकों के साथ रहते थे. बाद में जब मैंने और मानिकशां (पति) ने कमाना शुरू किया तो धीरे-धीरे घर की चीज़ें जुटाईं . ” Camera Chronicles में होमाय व्यारावाला.

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“होमाय की मुख्य पहचान एक व्यवसायिक या उनके शब्दों में ‘कामकाजी महिला’ की थी,” लेकिन उन्हें एक छोटे बच्चे के साथ घर भी चलाना होता था. उनके श्रम में घर का कामकाज भी शामिल था. अधिकतर महिलाओं की तरह उन्हें भी घर और बाहर के कामों में ताल-मेल बैठाना पड़ता था. इस किताब में इससे संबंधित कई मज़ेदार किस्से मिलते हैं कि कैसे वे अपने डार्क रूम में होती थीं और रसोई से कुछ जलने की बदबू आती थी या किस तरह वे फिल्म विकसित करते हुए रसायनों को नापकर नहीं बल्कि अंदाज़े से ही डाल लेती थीं – जैसा कि अक्सर कोई रसोई में करता है.

सबीना गैडियोक बताती हैं, “मुझे नहीं लगता कि होमाय ने घरेलू काम से जुड़े अपने श्रम और व्यवसाय के बीच अंतर किया था. वे दोनों को ही ज़रूरी समझती थीं. उन्होंने इनके बीच दर्जाबंदी नहीं की. यह उनके लिए बहुत सामान्य था कि वे कनॉटप्लेस (Connaught place) से साइकिल चलाती एक लंबे दिन के बाद घर आएं, कपड़े बदलें और खाना बनाना शुरू कर दें. ऐसा लगता था कि उन्होंने काम को एक तरह के खेल में बदल दिया है और शायद इसमें उनके परिवार के बीच मौजूद संबंधों ने काफी मदद की.”

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Camera Chronicles में सबीना गैडियोक बताती हैं- “होमाय की शुरू की तस्वीरों में औरतें गृहणी के रूप में दिखाई देने के साथ-साथ सार्वजनिक जीवन में भाग लेती भी नज़र आती हैं. इससे उस समय के जेंडर आधारित संबंधों और उनके लिए स्वीकार्य भूमिकाओं के बारे में जानकारी मिलती है.

दिनांक 11 मई, 1941 के the Illustrated Weekly of India साप्ताहिक में ‘भारतीय महिलाओं के लिए पेशे’(Careers for Indian Women) शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ. इस लेख में औरतों की शिक्षा को ‘पति की मित्र और प्रेरक सहायक’ के रूप में वर्णित किया गया. इसमें अधिकतर पेशों को मनोरंजन का साधन बताया गया, जिनसे उनकी गृहणी की भूमिका को बनाए रखने में मदद मिलेगी. गृह विज्ञान का विषय औरतों को अच्छी गृहणी बनने के लिए तैयार कर रहा था. (इन तस्वीरों में से कुछ बाद में 1946 में लेडी इरविन कॉलेज, दिल्ली में ली गईं.)

होमाय द्वारा ली गई मुंबई की औरतों की कुछ तस्वीरों को देखकर लगता है कि उनके लिए नए विकल्प खुल रहे थे, जैसे- वास्तुकला, दुकान की प्रदर्शन कला (window dressing) और विज्ञापन प्रणाली.

ज़ाहिर है कि इन्हें साप्ताहिक के “गृह अनुभाग (Home Section)” में ख़ास तौर पर दर्शाया गया था.

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Camera Chronicles में सबीना गैडियोक बताती हैं कि “उनकी शुरुआती तस्वीरों में अंग्रेज़ी शासन के अंतर्गत 1941 में मुंबई में बचाव गतिविधियों का प्रशिक्षण प्राप्त करती पारसी औरतें मुख्य रूप से दिखाई देती हैं. दूसरे विश्वयुद्ध के कारण पैदा हुई मांग ने कुछ औरतों को घर से निकलने के लिए प्रेरित किया. सार्वजनिक क्षेत्र में कदम रखने का उनका यह फैसला, युद्ध की उन ख़ास परिस्थितियों का नतीजा था, जिन्होंन ऐसे क्षेत्रों का निर्माण किया जिनमें औरतों की ज़रुरत थी.”

इसी बात को आगे स्पष्ट करते हुए उन्होंने हमें बताया, “बॉम्बे का पारसी समुदाय ऐसे विकास के कार्यों से गहराई से जुड़ा था, जिनसे दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों के एजेंडा को सहयोग मिले. इसे होमाय ने “युद्ध के दौरान प्रयासों” का नाम दिया. कुछ भारतीय नेताओं को छोड़कर, गांधी सहित अधिकतर ने जनता से अनुरोध किया कि वे अंग्रेज़ी शासन का सहयोग करें.

होमाय की तस्वीरों में आप देखते हैं कि महिलाएं हवाई हमलों के दौरान बरती जाने वाली बुनियादी सावधानियों से जुड़ी क्षमताएं प्राप्त करने का अभिनय कर रही हैं. हमउम्र होने के कारण वे अधिकतर इन औरतों को जानती थीं. कुछ उनकी दोस्त भी थीं.

कलकत्ता में शो के दौरान एक बुज़ुर्ग महिला हमारे पास आईं थीं. उन्होंने इन तस्वीरों में खुद की तरफ इशारा करते हुए हमें बताया था कि वह इनमें मौजूद हैं.

ज़्यादातर तस्वीरों में पारसी औरतों को दिखाया गया था. शायद इसलिए क्योंकि संस्कृति और शिक्षा पर पारसियों में दिए जाने वाले ज़ोर के कारण इन औरतों को अंग्रेज़ी भाषा तक पहुंच बनाने का अधिक मौका मिला.

इसके अलावा पारसियों का सार्वजनिक स्थलों पर औरतों की मौजूदगी को लेकर अधिक खुला नज़रिया भी था.”

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“1942 तक होमाय मां बन चुकी थीं. मर्दों की दुनिया में अकेली औरत होने के दबाव बहुत थे. उन पर लोगों की निगाह कहीं अधिक रहती थी. ऐसे में काम के क्षेत्र में टिके रहने के लिए जहां आदमी ही आदमी थे, होमाय ने अपनी यौनिकता को पूरी तरह दरकिनार कर दिया. उन्होंने अपने सहकर्मी द्वारा दिए गए “मम्मी” नाम का स्वागत किया.

होमाय ने सोच-समझ कर कार्यस्थल पर नैतिक रूप से सही छवि का निर्माण किया और खादी साड़ी (या शलवार कमीज़) पहनना शुरू किया. इससे उन्हें जो सुरक्षा प्राप्त हुई उसका प्रयोग करके उन्होंने बंधन रहित जीवन जिया. इस छवि की वजह से वे शाम में अकेले निकल पाईं और अकेले सफ़र कर पाईं. उस समय एक प्रेस फोटोग्राफर होने की वजह से एक ख़ास तरह के स्त्रीत्व को दर्शाना (इसे हम ‘अच्छी लड़की’ की छवि कह सकते हैं) होमाय के इस व्यवसाय में बने रहने के लिए ज़रूरी था.

अब, जब मैं उनके साक्षात्कारों को सुनती हूं, तो मुझे पहचान की पेचीदगियों और एक फोटोग्राफर होने के नाते शहर में गुमनामी की ज़रुरत के और सुराग मिलते हैं.”

सबीना गैडियोक ने बताया- “मेरी किताब में होमाय द्वारा बताया एक किस्सा है, जब वह काम करने घर से बाहर निकलती थीं तब उनकी पुराने खयालातों वाली मां, उन्हें अपने धर्म की निशानियां पहनने के लिए मजबूर करती थीं. लेकिन होमाय घर से निकलते ही अपने माथे से मथुबना (सर पर ओढ़ने का कपड़ा) हटा देती थीं और सद्र (छोटा सफ़ेद रंग का कुरता जिसमें सामने जेब होती है, इसे कपड़ों के नीचे पहनते हैं) को अपने ब्लाउज़ के अंदर करके छिपा देती थीं.”

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Camera Chronicles में सबीना गैडियोक बताती हैं, “गांधी को कभी-कभी होमाय के कैमरे के सामने आना बिलकुल पसंद नहीं आता था, क्योंकि उन्हें फ़्लैश से नफरत थी. वो उनकी मृत्यु का समय ही था, जब होमाय द्वारा उनकी सबसे ज़्यादा तस्वीरें ली गईं.

गांधी को वे बहुत ज़्यादा पसंद करती थीं. 30 जनवरी, 1948 को होमाय को महात्मा की बिरला हाउस में प्रार्थना सभा के दौरान तस्वीरें लेनी थीं. कलरमूवी कैमरा हाथ में लिए वे दफ्तर से निकली ही थीं कि उनके पति मानिकशां ने उनको वापस बुला लिया. उन्होंने कहा कि वे होमाय के साथ अगले दिन स्टिल कैमरा लेकर चलेंगे. इस निर्णय की उनको भारी कीमत चुकानी थी. “कुछ समय बाद वे वापस आए, उनका चेहरा बिलकुल सफ़ेद था” मैंने पूछा, “क्या हुआ?” उन्होंने जवाब दिया, “गांधी जी की हत्या कर दी गई है!” ये संभवतः सबसे महत्त्वपूर्ण तस्वीर थी, जिसे खींचने का मौक़ा उन्होंने खो दिया.”

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“एक तरह से देखें तो इतने सारे आदमियों के बीच में होमाय इकलौती औरत थीं: एक प्रेस फोटोग्राफर, राष्ट्रीय राजनीति के अखाड़े में, जिसमें अधिकतर आदमी ही थे. उन्होंने अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए ‘आदमियों की दुनिया’ में दखल किया वह भी अपनी शर्तों पर. उन्होंने साड़ी तो ज़रूर पहनी मगर साथ ही सादगी बनाए रखी.

होमाय समझदार थीं, उन्हें मीन मेख निकालने की उनकी बिलकुल आदत नहीं थी. वे किसी से भी बेकार की बात नहीं सुनती थीं. मगर अपने व्यवसाय और घर की मांगों के बीच, उन्हें परिवार के अलावा और लोगों से घुलने-मिलने का समय कम ही मिल पाता था.

उन्होंने एक बार यह बात मानी थी कि औरतें हमेशा ज़ेवरों, कपड़ों और मेकअप की ही बातें करती रहती हैं इसलिए उनसे उन्हें थोड़ा डर ही लगता है.

1969 में उनके पति मानिकशां का अचानक देहांत हो गया. होमाय काम छोड़कर, अपने बेटे के पास पिलानी, राजस्थान चली गईं. यह पहली बार था कि जब होमाय औरतों से घुली मिलीं, उनसे बातचीत की. उन्होंने यकीन करना सीखा और दोस्त बनाए. वे अपनी सबसे नज़दीकी दोस्तों को यहीं मिलीं और उन्होंने वे सभी ‘औरताना’ चीज़ें कीं जिनको करने का अभी तक उन्हें समय नहीं मिला था. जैसे- शो और नाटक आयोजित करना या बेकिंग और फूलों की सजावट की प्रतियोगिताएं आयोजित करना. वे अक्सर कहा करतीं थीं कि ये उनकी ज़िंदगी का एक अलग चरण था.”

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1956 में नाथुला पास से भारत आते हुए युवा दलाई लामा
1956 में नाथुला पास से भारत आते हुए युवा दलाई लामा

‘Camera Chronicles of Homai Vyarawalla’ किताब 2006 में प्रकाशित हुई. इसके बाद तीन भारतीय शहरों में, NGMA में 2010 और 2011 में उनके काम की प्रदर्शनियां आयोजित की गईं. “हर बार होमाय व्यारावाला खुद प्रदर्शनी स्थल पर गईं और खुद खड़े होकर वहां का प्रबंध देखा. इन प्रदर्शनियों के बारे में ये बात रुचिकर थी कि इन्होंने होमाय का अपने ऐसे काम से दोबारा परिचय करवाया, जिसे उन्होंने दशकों से नहीं देखा था.

जैसे-जैसे प्रदर्शनी ने दिल्ली से मुंबई और फिर बैंगलोर सफ़र किया, होमाय के शब्दों में उनकी “महत्त्वपूर्ण तस्वीरों” के लिए (जो राष्ट्र निर्माण के प्रतिष्ठित मौकों से संबंधित थीं) जगह कम होती गई. इसके विपरीत रोज़मर्रा की ज़िंदगी और साधारण पलों की तस्वीरें महत्त्वपूर्ण होती गईं.

जब हम इन प्रदर्शनियों के बाद वापस आए तो न्यूयॉर्क के रुबिन म्यूज़ियम के संग्रहाध्यक्ष का निवेदन होमाय का इंतज़ार कर रहा था. वे होमाय का काम प्रदर्शित करना चाह रहे थे. ‘क्या वे जुलाई में न्यूयॉर्क का सफ़र करना चाहेंगी?’ उन्होंने मुझे SMS पर जो जवाब भेजा, वह था : ‘प्रिय सबीना, देर से जवाब देने के लिए माफी चाहती हूं. न्यूयॉर्क जा सकती हूं अगर वे हम दोनों का इंतज़ाम कर दें. बीतते दिनों के साथ ज़िंदगी और मुश्किल होती जा रही है. इस सबसे कुछ दिन छुटकारा पाना चाहूंगी. प्यार सहित.’

90 साल से अधिक की उम्र में होमाय व्यारावाला ने मोबाइल इस्तेमाल करना सीखा.

2008 में 96 साल की उम्र में अटलांटिक महासागर के पार उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा की.

9 दिसंबर, 2011 को उनका 98वां जन्मदिन था. यह पहली बार था कि जब मैं उनके जन्मदिन पर उनके साथ कुछ दिन बिताने जा रही थी. ये दिन मेरे उनके साथ बिताए दिनों में सबसे यादगार और प्यार भरे साबित हुए. जन्मदिन के अगले दिन उन्होंने अपने ज़िद्दी और बीमार शरीर का ज़िक्र किया, जिसे उन्होंने ‘टूटा हुआ घर’ कहा. उन्होंने कहा कि जो बंदी इसमें रहती है वह अब भी जवान है.

एक महीने बाद वे चल बसीं. मगर हमेशा वे असाधारण और सदा युवा होमाय व्यारावाला मेरी यादों में रहेंगी.”

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92 साल की उम्र तक, होमाय 16 साल अकेले रह चुकी थीं. “उनका कहना है कि उनकी ज़िंदगी जहां से शुरू हुई थी, वहीं वापस आ गई है. वे अपने आप को “कुंवारी लड़की” कहती हैं.

होमाय सब कुछ करती हैं. वे खाना बनाती हैं, सफाई करती हैं, कार चलाती हैं, घर का सामान खरीदती हैं और अपने हाथों से अद्भुत चीज़ें बनाती हैं. वे बढ़ई, नलसाज़, बिजली का काम करने वाली, वास्तुकार आदि खुद ही हैं. इन सब हुनरों में वे खुद ही आविष्कारक, अभिकल्पकार (designer) और चीज़ों की संग्राहक हैं. वे खुद को “होमाय कबाड़ीवाला” कहती हैं और कभी कोई ऐसी चीज़ नहीं फेंकती, जो किसी भी तरह प्रयोग में लाई जा सकती है.

होमाय के घर का ज़्यादातर सामान और फर्नीचर, उन्हीं ने तैयार किया है. वे अपने कपड़े खुद बनाती हैं, अपनी चप्पलें ठीक करती हैं और अपने बाल काटती हैं. वे सोफे पर गद्दी लगा सकती हैं, दीवारों पर पेंट कर सकती हैं और फर्नीचर बना सकती हैं.”

“मेरे जीवन में एक भी पल उबाऊ नहीं रहा है. मैंने अपने आप को कभी नहीं बोला है, ‘मैं बोर हो गई हूं’ अगर मेरे पास पढ़ने के लिए कुछ ना हो तो मैं उस पेपर को ही पढ़ने लग जाती हूं, जिसमें घर की सब्ज़ियां और किराना का सामान आया है.”

ये सभी तस्वीरें सबीना गैडियोक द्वारा लिखित ‘Camera Chronicles of Homai Vyarawalla’ में प्रकाशित हुई थीं, इस किताब के प्रकाशक Parzor Foundation और Alkazi Foundation for the Arts हैं.

तस्वीरें HV Archive/ The Alkazi Collection of Photograph के सौजन्य से

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.

इस लेख का अनुवाद सादिया सईद ने किया है.

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