“मुझे लगा वो शर्मीली है, मगर उसने तो शिकायत दर्ज कर दी”

क्या कार्यस्थलों पर सहमति की संस्कृति की शुरुआत की जा सकती है? शॉर्ट फिल्मों की यह शृंखला एक रोचक शुरुआत प्रस्तुत करती है.

मेरा ये मतलब नहीं था
एक हेयरस्टाइलिस्ट हक्का बक्का रह गया जब उसके साथ काम करने वाली एक युवा लड़की ने उसके ख़िलाफ़ उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करते हुए नौकरी छोड़ दी. जबकि अपनी नज़र में उसने सिर्फ एक शर्मीली लड़की को ‘पटाने’ की कोशिश की थी. एक लैब टैकनीशियन हैरान रह गई जब उसको महसूस हुआ कि उसके साथ काम करने वाले खुशमिजाज़ लड़के को यह ग़लतफहमी हो गई कि वे दोनों रिश्ते में हैं, वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि दोनों लंबी लंबी व्हाट्स एप्प चैट करते थे. ये सिर्फ 2 कहानियां हैं ‘अनबोक्सिंग कनसेंट’ से. ‘अनबोक्सिंग कनसेंट’ 11 छोटे और रोचक वीडियो का सेट है. यह वीडियो अभिनेताओं के ज़रिए कार्यस्थल पर होने वाले वास्तविक यौनिक उत्पीड़न के मामलों में मौजूद दुविधाओं को दर्शाता है. यह वीडियो शृंखला 2018 में दिल्ली स्थित स्वयं सेवी संस्था ‘पार्टनरस फॉर लॉ एंड डेव्लपमेंट’ ने बनाई थी. इस वीडियो शृंखला को बनाने का उद्देश्य सहमति और यौनिक उत्पीड़न पर चल रहे संवाद को गहराई प्रदान करना था. मधु मेहरा ने द थर्ड आई से भावनाओं की उस दुनिया के बारे में बात की जिसकी बहुत कम छानबीन की गई है, मगर जो सहमति पर चल रही कानूनी चर्चाओं के साथ मौजूद रहती हैं. साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि इन वीडियो को किस तरह बनाया गया है.

अंबोक्सिंग कनसेंट एंड रिजेक्शन, PLD द्वारा बनाई गई एक वीडियो शृंखला

समाज लोगों के मिलने जुलने की जगह है चाहे वह काम की जगह हो, रहने की जगह या स्कूल कॉलेज. ये सभी रिश्ते और जगहें असमान शक्ति संबंधों से भरी हैं. मगर यही सामाजिक प्रक्रियाएं और जगहें लोगों के बीच विभिन्न रिश्तों और करीब आने के मौके भी देते हैं.

एक तरफ, महिला समूह, ताकतवर लोगों द्वारा किए यौनिक उत्पीड़न की गुमनाम सूचियां और ‘मीटू’ अभियान हमें दिखाते हैं कि जो लोग आर्थिक और भावनात्मक दोनों रूप से असुरक्षित हैं उन्हें हर तरफ, हर समय नुकसान पहुंचाया जाता है. इस तरह की नाज़ुक स्थितियों में मौजूद औरतों और आदमियों का शारीरिक और भावनात्मक रूप से फायदा उठाया जाता है. उनके लिए यौनिक अपराधों को दर्ज (रिपोर्ट) कराना नामुमकिन सा हो जाता है. अगर वे आगे आते भी हैं, तब भी उन पर भरोसा नहीं किया जाता. 

दूसरी ओर, जैसा कि PLD की मधु मेहरा बताती हैं, चाहत को बताने के लिए और समझने के लिए शब्दावली का अभाव होने से भी शोषण होता है. शब्दों के अभाव में हमारे लिए चाहत को स्वीकारना, इसके मापदंडों को निर्धारित करना या अपनी असुविधा को बता पाना मुश्किल हो जाता है.

इसकी वजह से हम शोषण के सामने कमज़ोर पड़ जाते हैं. मगर ये ऐसी सामाजिक संरचनाओं को भी बनाए रखता है, जिनमें उपलब्ध विवरण लड़ाकू, एक−दूसरे के प्रति शक्की, गुस्से में और दंड देने वाले होते हैं. 

चाहतों के आदान-प्रदान, जहां नुकसान सबसे अधिक होता है, उलझे हुए होते हैं. इनके लिए व्यक्ति में अपने अंदर झांकने की असाधारण क्षमता, समान अनुभूति और बात को प्रभावी ढंग से कह पाने की योग्यता चाहिए होती है.

ऊपर दिए वीडियो में, वास्तविक दुनिया की  कहानियां, सहमती को कड़े ‘हां’ और ‘नहीं’ के दायरों से निकालती हैं और अलग-अलग परिस्थितियों में रख कर देखती हैं. जिससे इसके मनोवेज्ञानिक कारणों, अस्वीकृति की सामाजिक सच्चाई और हिंसक परिणाम के कारणों पर प्रकाश डाला जा सके. इन वीडियो का लक्ष्य, इसका इलाज या फिर ‘नुस्खा’ देना नहीं बल्कि ‘रोकथाम’ है – ताकि सहमति की एक गहरी संस्कृति की नींव रखी जा सके, जो किसी भी तरह के सामाजिक न्याय के लिए बहुत ज़रूरी है.

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत कैसे हुई?

2013 के बाद से हमें कई जगहों पर बुलाया गया, संस्थाओं को सलाह देने के लिए, नीतियां बनाने के लिए, मार्गदर्शन के लिए और आई मुश्किलों को दूर करने के लिए – मगर हमें लगा इस सारी चर्चा में यौनिकता और यौनिक अभिव्यक्ति को उत्पीड़न और अतिक्रमण के दायरे में रखकर ही देखा जा रहा है. जबकि हमें पता है कि शैक्षिक संस्थानों और कार्यस्थलों में लोग सबसे ज़्यादा अपने करीबी, सेक्सुअल पार्टनर से मिलते हैं.

एक कानूनी संस्था होने के नाते, यौनिकता और चाहत पर बात करने के लिए हम सबसे अच्छी संस्था नहीं हैं, बशर्ते, ये किसी तरह कानून से जुड़े हों. और अगर हम इन्हें (वीडियो को) चर्चा शुरू करने के साधन के रूप में देख रहे हैं, तो हम पहले से ही लोगों को चेता देना चाहते हैं– ‘सुनो, समाज में कानून व्याप्त है’. कुछ व्यवहारों के आपराधिक और दंडनीय नतीजे होते हैं’. मगर हमारी पूरी प्रतिक्रिया और ताकत सिर्फ यही कहने की नहीं हो सकती कि ‘सुनो, ये अतिक्रमण है, वो अतिक्रमण है, हाथ लगाना, यौनिक भाषा का इस्तेमाल उलंघन है.’ क्योंकि अपने आप में न तो हाथ लगाना और न ही यौनिक भाषा का इस्तेमाल उलंघन  है.

और, ICCs (आंतरिक शिकायत समिति) के अलावा, जहां आप नुकसानदेह व्यवहार को दर्ज करने जाते हैं, हमें लगता है इसके बारे में बात करने के लिए और जगहें भी होनी चाहिए. हमें नहीं लगता कि ICC के सदस्य आपके लिए मनोवैज्ञानिक रूप से उपचारक का काम कर सकते हैं. वे फैसला लेने का हुनर रखते हैं. (अगर वे हुनरमंद होते हैं). आपके व्यक्तिगत अनुभव पर न्यायपूर्ण निर्णय लेने में मददगार हो भी और नहीं भी हो सकते हैं, मगर फिर भी आपको उनके बारे में बात करनी होती है. कुछ हुआ और वो आपके लिए बहुत तकलीफदेह था – हो सकता है कि आप  इसकी रिपोर्ट करवाना चाहें या न भी करवाना चाहें. मगर वो क्या होगा जो आपको अपने खुद के बारे में जागरूक बनाएगा. 

मुझे लगता है ये वीडियो यौनिकता को बेहतर समझने में हमारी मदद करते हैं. वे ऐसे अनुभवों के बारे में स्पष्टता देते हैं, जिनके बारे में आप संदेह में हैं. और यह एक ऐसा माध्यम हैं जिसमें आपको अपने आप को सामने लाने की ज़रुरत नहीं होती, मगर आप पहचान सकते हैं कि ‘ओह, ये पूजा वाला केस तो मेरे बॉयफ्रेंड के साथ हुआ था.’ ये एक सुरक्षित दूरी है. मगर आप खुद के लिए आलोचनात्मक हो सकते हैं या ख़ुदका बेहतर विश्लेषण कर सकते हैं.

ये एक ऐसा विशेष हस्तक्षेप है जो निवारण पर ज़ोर देता है. हमें उस की ओर ले जाता है. कुछ जानकारी दी गई है मगर साथ ही आगे बढ़ने के लिए सुझाव भी दिए गए हैं. कार्यशाला करके सहमति की संस्कृति बनाई जा सकती है, ताकि सहमति और असहमति को व्यापक तौर पर समझा जा सके, न कि सिर्फ ‘हां’ या ‘न’ के रूप में या अतिक्रमण होने या न होने के रूप में. ये अपने व्यवहार और सोचने के तरीके का विश्लेषण करने से  संबंधित है. और साथ ही दूसरों को समझने से जुड़ा है.

इतने सारे कथानक जो आपको दिखाई देते हैं, वे संवाद के टूट जाने का नतीजा होते हैं.

मगर वो चाहत का भी अक्स होते हैं… ज़्यादातर, चाहत की बहुत अधिक समझ हमें  ख़ुद नहीं होती. जैसे, हम ऐसी  आत्मियता को बढ़ाने में अपनी भूमिका की कटौती कर देते हैं जो आज तकलीफदेह हो गई है, या जिसे हम अब नहीं चाहते.

पितृसत्तात्मक या फिर मुख्यधारा की शब्दावली कहती है कि तुम औरतों ने ही उसे बहकाया था या ऐसा इशारा किया होगा कि तुम रूचि रखती हो.

हमें एक नारीवादी शब्दावली चाहिए, ताकि अपने बारे में सजग रहें. जो कहे कि अगर आपको किसी की अब इच्छा है, जो पहले नहीं थी, पहले कोई इच्छा थी जो अब नहीं है, अगर कोई आपको चाहता था, जो अब नहीं चाहता –तो इन सभी स्थितियों में आपके साथ किसी और की भी भावनाएं और सीमाएं जुड़ी हैं जो शायद इतनी स्पष्ट न हों जितनी आपकी अपनी भावनाएं हैं, या मामला इससे उल्टा हो.

इसका मतलब है कि हम जितना सफाई से भावनाएं व्यक्त कर सकें, करें. मगर साथ ही हम इस बात को भी मानें कि गड़बड़ तो होगी. और विरोधी चाहतों की वजह से किसी का नुकसान करना सही प्रतिक्रया नहीं है.

तो, हमें ऐसे विवरण चाहिए जो इस चीज़ को लेकर बहुत स्पष्ट न हों कि कैसे कोई एक समय तक आनंद ले सकता है और फिर अचानक चीज़ें बदल जाती हैं. क्योंकि इसी तरह के मामले हम [PLD] दर्ज कर रहे हैं. जो ज़्यादातर हम देखते हैं वे ऐसे मामले हैं जिनमें लोगों को पता नहीं होता कि ग्रे एरिया को डील कैसे करना है. इसके अनुपात में बड़े- बड़े हिंसक मामले दुर्लभ होते हैं.

सेक्स और यौनिकता को अपराध बना देने से किस तरह के नुकसान हो सकते हैं?

एक उदाहरण तो पोस्को कानून है, जो 18 साल से कम व्यक्तियों में यौनिक गतिविधियों को अपराध मानता है. इससे युवाओं के साथ इन विषयों पर बातचीत की मनाही की धारणा और मज़बूत ही होती है. अब अगर आप युवा व्यक्ति हैं तो कभी न कभी आप अपनी यौनिकता को लेकर  प्रयोग करेंगे ही, आपमें जिज्ञासा होगी. मगर  यौनिकता और चाहत को लेकर ऐसी कोई भी जानकारी आपको प्राप्त नहीं होगी जिससे आप अपने आप को, अपनी ज़िंदगी को, अपने रिश्तों को समझ सकें.

आपके ऊपर बस पॉपुलर कल्चर (फ़िल्में, गाने आदि) और दोस्तों की अपेक्षाओं को थोपा जाएगा. यह ज़रूरी है कि 10 साल की छोटी उम्र से ही लोगों से उनके शरीर के बारे में बात की जाए. क्योंकि अगर हम उनसे शरीर के बारे में बात नहीं करेंगे, उनकी पसंद-नापसंद नहीं पूछेंगे तो अचानक 18 साल का हो जाने पर उनसे ये उम्मीद करना कि ‘नहीं का मतलब नहीं’ और ‘हां का मतलब हां’ है, इस बात को वे समझेंगे, बेमानी और अवास्तविक होगा.

किस तरह की जगहों पर इन वीडियो को ले जाया गया है? क्या कभी आपको किसी मौके पर बहुत अचरज हुआ?

इन वीडियो को लेकर इंस्टाग्राम, ट्विटर, फेसबुक पर ‘यूथ की आवाज़’ और ‘फेमिनिस्म ऑफ़ इंडिया’ के साथ ऑनलाइन कैंपेन की गईं. इस कैंपेन के द्वारा इनके प्रति लोगों की प्रतिक्रियाओं को जांचा गया, कौन सा वीडियो उन्हें सबसे ज़्यादा अच्छा लगा, किससे उन्होंने बहुत जुड़ा हुआ महसूस किया आदि. उनसे कई सवाल किए गए जैसे- आपमें से कितनों को लगा कि आप किसी को ये संकेत नहीं दे रहे हैं कि आप उसमें रूचि रखते हैं, मगर उन्हें लगा आप ऐसा कर रहे थे? या “पॉपुलर कल्चर कैसे आपके प्यार, अभिव्यक्ति और सीमाओं की समझ को प्रभावित करता है?”

फिर इन वीडियो को कॉलेज, यूनिवर्सिटी, कम्युनिटी सेंटरों में ले जाया गया. पिछला मौक़ा ब्रेकथ्रू के साथ था. उनके पास हरियाणा कॉलेजों के कई मामले हैं, जिनमें लड़के, लड़कियों द्वारा  नामंज़ूर किया जाना बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने लड़कियों पर तेज़ाब फेंक कर हमला कर दिया.

इसके अलावा इन वीडियो को लखनऊ, गुजरात के तीन शहरों, क़ानून के विद्यार्थियों, पर्यटन, मीडिया, न्यूट्रीशन आदि की व्यवसायिक पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों, दिल्ली विश्वविद्यालय, कॉर्पोरेट्स, वास्तुकला के विद्यार्थियों, इंजीनियरों, IIT आदि तक भी ले जाया गया है. इन्हें कम्युनिटी सेंटर्स तक पहुंचाया गया है, जहां हमने 18 साल से कम उम्र के लोगों से बात की है.

क्या आप कुछ प्रतिक्रियाओं के उदाहरण दे सकती हैं? किस तरह के सवाल पूछे गए थे?

एक लड़के ने कहा, ‘मुझे अपनी गर्लफ्रेंड से बहुत प्यार है, हम कॉलेज में थे और शारीरिक संबंध बना रहे थे, उसने मुझे रोका. मुझे लगा उसे शर्म आ रही है इसलिए वह मुझे रोक रही है, हम फ्लो के साथ जाएंगे. और मैं फ्लो के साथ बढ़ता रहा, उसने मुझे तीन बार, अलग-अलग वक्त पर रोका. क्या मैंने उसे सताया है?  क्या मैंने उस पर हमला किया है? उसने मुझसे उसके बाद से बात नहीं की है’. और ‘क्या औरतों से उनकी तारीफ़ करना ग़लत है?’

कुछ कॉलेज छात्रों, ख़ासकर लड़कियों ने कहा है, ‘कुछ लड़के हमारे दोस्त हैं, जिन्होंने दूसरी लड़कियों के साथ अपनी सीमाएं पार की हैं – उनके इस व्यवहार के बारे में लोगों को बताने की ज़िम्मेदारी किसकी है?’

ऐसे मौके भी आए हैं, जब लोग आगे आकर बोले हैं, ‘मेरे साथ ग़लत हुआ और हम लोग आपस में बात करके उस मुद्दे का हल ढूंढ पाए.’

दिल्ली और बंबई के सार्वजनिक कार्यक्रमों में युवा लड़कियां बता रही थीं, कि जब वे कम उम्र की थीं, उन्हें पता नहीं था कि न कहने में कोई हर्ज नहीं है. अगर आपकी अपनी छवि एक आज़ाद ख़याल व्यक्ति की है, तो क्या आप मना भी कर पाएंगी? ऐसी औरतें जिनकी अच्छी शिक्षा और संसाधनों तक पहुंच है, अपने रहन-सहन और बरताव में सशक्त हैं, उन्हें पता नहीं है कि वे न कह सकती हैं. फिर इसका दूसरा पहलू भी है: औरतें जो ये बताती हैं कि उनके लिए हां कहना बहुत मुश्किल है.

एक और भी प्रतिक्रिया थी, जो क्वीयर (queer) लड़कों ने हमसे साझा की. जिससे हमें ध्यान आया कि क्वीयर लड़कों के लिए शारीरिक सुंदरता के मानक, औरतों से कहीं ज़्यादा ऊंचे हैं. औरतों ने शरीर का राजनीतिकरण कर लिया है. इस मुद्दे पर नारीवादी सोच बहुत मज़बूत है मगर लड़कों के लिए ऐसा नहीं है.

इसके बारे में हमने अभी बात तक करनी शुरू नहीं की है. हम समलैंगिकता के ही अपराधीकरण को ख़त्म करने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं कि क्वीयर  और ट्रांसजेंडर लोगों के सताए जाने के मुद्दे पर ध्यान ही नहीं दे पाए हैं… तो यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर और तवज्जो देने की ज़रूरत है.

एक और बात, इन वीडियो के ज़रिए हम जेंडर स्टीरियोटाइप और यौनिकता पर बात कर पाए हैं. काफी लड़कों ने कहा है कि अस्वीकार किए जाने ने मेरे आत्मविश्वास को पूरी तरह कुचल दिया. और मुझे मेरे दोस्तों ने यह कहकर गुस्सा दिलाया कि इस बात को लेकर मैं अभी तक आक्रामक  क्यों नहीं हूं? इस तरह के स्टीरियोटाइप की वजह से ही लोग एक‍‌‍−दूसरे की सीमाओं की इज़्ज़त नहीं करते और अक्सर उन्हें तोड़ बैठते हैं.

अस्वीकृति पर अक्सर बात नहीं की जाती है. क्या आप विस्तार से बता सकती हैं कि इस मुद्दे को किस प्रकार की चर्चाएं सामने लाईं?

हमने पाया कि बहुत से मामले अस्वीकार्यता से जुड़े थे. हमने यह भी पाया कि उनपर कोई नारीवादी चर्चा नहीं होती. अस्वीकारा जाना हमें बहुत तोड़ देता है क्योंकि जीवन के किसी भी मोड़ पर हम इससे निपटने के लिए तैयार नहीं होते. हम अपनी असफलता को लेकर बहुत शर्मिंदा होते हैं.

आपके पास कितना पैसा है? आप क्या कपड़े पहनते है? क्या भाषा बोलते हैं? – इन सबमें एक तरह का पास-फेल है. और जिन ‘युवाओं’ की हम बात कर रहे हैं, उनके आसपास मौजूद सैकड़ों साथी उनके अस्वीकृत होने के अनुभव को और अधिक विशाल और असहनीय बना देते हैं.

हमें यह भी पता है कि कुछ ख़ास तरह के लोगों को ज़्यादा नापसंद या अस्वीकार किया जा सकता है. बॉडी शेमिंग का मुद्दा है ही, आपका रंग कैसा है वह भी एक मुद्दा है. आप छोटे शहर से आए हैं, कितनी बेधड़क अंग्रेज़ी- हिंदी बोलते हैं, उससे भी फर्क पड़ता है. कई बार अंग्रेज़ी बोलना बहुत फायदेमंद साबित होता है. और मुझे लगता है कि यह काफी तेज़ी से बदल सकता है कि आप कैसे माप रहे हैं कि ‘क्रीप’ या फिर ‘अजीब’ कौन है. आप किसको हां बोलते हैं और किसे ‘क्रीपी’ या अजीबो ग़रीब कहते हैं क्योंकि किसी ऐसे व्यक्ति से तारीफ़ सुनना या उसके द्वारा देखा जाना जो आकर्षक हो या जिसकी तरफ आप आकर्षित हों, बहुत सुखदायी हो सकता है

तो, हम  अस्वीकार्यता  को केंद्र में रखना चाहते थे, क्योंकि सहमति का आधा भाग अस्वीकृति होती है.

हर बार जब भी आप किसी के सामने प्रस्ताव रखते हैं, उसके द्वारा अस्वीकार किए जाने की संभावना 50% होती है. और ऐसा होने पर बहुत अधिक दुःख भी होता है. चाहे वह दूसरों को  नुकसान पहुंचाना हो, या अपनेआप को. इस मुद्दे पर सिर्फ सज़ा देने की जगह इसे समझने की ज़रुरत है. इसलिए हमें ये छोटी-छोटी फ़िल्में (vignettes) बनाने का विचार आया, जो इन मुद्दों पर बात कर पाएंगी. हमें सज़ा से आगे देखना होगा.

कार्यशाला

दिन 1

चर्चा के सवाल: यौनिक उत्पीड़न क्या है? ICC क्या है? रिपोर्ट दर्ज करने और जांच पड़ताल की क्या प्रक्रिया है, इसके क्या परिणाम या प्रभाव हो सकते हैं? आप पश्चाताप और डर को कैसे संभालेंगे? (ध्यान रखें: शिकायत दर्ज करने का डर; शिकायत दर्ज करने का पश्चाताप; अस्वीकृति या रिजेक्शन का पश्चाताप)

गतिविधि 1:जोड़ों में बंट जाएं. एक−दूसरे को बताएं कि आपको सबसे अधिक डर क्या लगता है? और किस का आपको पश्चाताप है?

संदर्भ: उत्पीड़न होता है जब जिस व्यक्ति से निवेदन किया जा रहा है उसे ये स्वीकार्य नहीं होता, और उसकी चाहत के न होने या दिखाए जा रहे विरोध को अनदेखा किया जाता है. उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बातचीत ज़रूरी है. ‘आपको क्या चाहिए?’ ‘मुझे यह चाहिए’. ‘क्या तुम्हें यह चाहिए?’ ‘हां. क्या मैं ले लूं?’ ‘नहीं, मुझे यह नहीं चाहिए, रुको’. ‘इससे मैं असहज महसूस कर रही/ रहा हूं. मुझे सुरक्षित महसूस नहीं हो रहा है.’

अपनी चाहत की अभिव्यक्ति अपराध नहीं है. यह एक स्वस्थ, ज़िम्मेदारी और उदारता से जुड़ी क्रिया है. मगर यह पता होना चाहिए कि व्यक्ति कितनी और कैसी सत्ता का इस्तेमाल कर रहा है. क्या आप किसी को रिझा रहे हैं कि वह आपको चाहे या फिर आप उन पर ज़ोर डाल रहे हैं? या  क्या आप ऐसे रिश्ते में हैं, जहां चाहत की घोषणा करना एक बोझ होगा रिश्ते पर? आपके लेने-देने की क्या प्रकृति है? आत्मीयता के क्या प्रकार हैं? कौन कमज़ोर है, और किस तरह?

गतिविधि 2: फिल्म प्रदर्शन: अनबॉक्सिंग कंसेंट – राज, मैरी ऐनी, निरंजनी, प्रिया, काव्या, साहिल

अनबॉक्सिंग कंटेंट पर 6 वीडियो देखें.

चर्चा के सवाल: हर वीडियो में क्या हो रहा है? बातचीत कहां असफल हो रही है? क्या आपको कभी ऐसी बातचीत की असफलता का सामना करना पड़ा है? क्या हुआ था? यह कैसे सुलझा?

गतिविधि 3: जोड़ों में बट जाएं. अपने साथी को एक ऐसा मौका बताएं जब आपके सामने किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा प्रस्ताव रखा गया या उसके साथ एक मज़बूत संपर्क महसूस हुआ (या उसके सामने प्रस्ताव रखने का मन किया) जिसके जेंडर के प्रति पहले कभी आपने आकर्षित महसूस नहीं किया था. आपने या उन्होंने कैसी प्रतिक्रिया दी? अपने साथी से पूछें उन्हें क्या लगता है, उस व्यक्ति ने कैसा महसूस किया होगा?

चर्चा के सवाल: क्या आप हां कहना चाहते/चाहती थीं मगर कह नहीं पाए? क्या आप ना कहना चाहते/चाहती थीं मगर कह नहीं पाए? क्या आपको हमेशा साफ़−साफ़ पता होता है कि आपको क्या चाहिए? क्या आपकी चाहत में कभी बदलाव आया है? क्या कभी ऐसा पल आया है, जब आपको लगा कि आपकी चाहत को समझा, स्वीकार या सम्मानित नहीं किया जा रहा? क्या आपको लगा है कि आपको ग़लत समझा जा रहा है या आप पर हमला या आपका उत्पीड़न किया जा रहा है? क्या आप किसी भी (प्रेम प्रसंग युक्त या अन्य) संबंध में अपने साथी के बारे में इन सवालों का जवाब दे सकते/सकती हैं? आप उनसे कैसे पूछेंगी/पूछेंगे?

गतिविधि 4: पहले दिखाए गए PLD के वीडियो में से कोई भी एक वीडियो लें. हर एक वीडियो में एक व्यक्ति, किसी अन्य व्यक्ति के साथ हुए अपने अनुभव को बता रहा है, आपको उस अन्य व्यक्ति की तरफ से वीडियो के दर्शक को पत्र लिखना है.

चर्चा के सवाल: जब सब पत्र लिख लें, तो एक-एक करके प्रतिभागियों को उन्हें सब के सामने पढ़ने को कहें और निम्न सवालों पर चर्चा करें: आपको वीडियो का वक्ता ज़्यादा विश्वसनीय लगा या पत्र लिखने वाला? दोनों में से कौन पीड़ित लगा? और क्यों? किसी को कौनसी बातें विश्वसनीय बनाती हैं? क्या कोई देखने में कैसा है इसका असर हमारे निर्णय पर पड़ता है? क्या व्यक्ति के पारस्परिक भीतरी संबंधों में सच हमेशा व्यक्ति से संबंधित होता है?

गतिविधि 5: दो समूह बनाएं. पहला समूह बैठा रहे, दूसरा समूह खड़ा हो जाए.

अब दूसरे समूह से एक-एक करके प्रतिभागी पहले समूह के एक प्रतिभागी के पास आएं और गुज़ारिश करें कि वह उन्हें अपनी जगह पर बैठने दें. पहले समूह के प्रतिभागियों को निर्णय लेना है कि वे खड़े होंगे या नहीं.

यही गतिविधि समूह बदल कर दोहराएं. चर्चा करें.

चर्चा के सवाल: कभी हां, कभी न: एक ऐसी स्थिति साझा करें जब आपको नहीं पता थे कि आपको क्या चाहिए. आपने कैसे इसका पता लगाया? इसमें किससे मदद मिली? क्या बाधा बना? दिन की शुरुआत पर वापस जाएं: कौन से रिश्ते में आपको डर लगा है? आपको किस चीज़ का डर लगा? क्यों? आप डर से कैसे निपटते हैं? अगर आपने इससे निपटने की कोशिश नहीं की, तो आगे जाकर क्या आपको इसका पछतावा रहा? अगर आपने निपटने की कोशिश की, तो क्या इस बात की आपको खुशी है?

ग्रहकार्य गतिविधि: किसी ऐसे व्यक्ति को पत्र लिखना है जिसकी आप चाह रखते थे, मगर यह बात उसे बता नहीं पाए. इसे इस तरह लिखने की कोशिश करें, जिससे वे बंधा हुआ न महसूस करें और सच्चाई के साथ आपकी बात का जवाब दे पाएं. साथ ही सुरक्षित भी महसूस करें.

दिन 2

शुरुआती गतिविधि: जिस व्यक्ति को आपने पिछली रात पत्र लिखा था, उसने आपके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है. आपको कैसा लग रहा है?

गतिविधि 1: फिल्म प्रदर्शन: हैंडलिंग रिजेक्शन – अशोक, पूजा, कबीर, राजीव, और सोनल

चर्चा के सवाल: क्या आपको कभी लगा है कि जिस व्यक्ति ने आपको अस्वीकार किया है उसे इस बात का पछतावा होना चाहिए? क्या आपको कभी लगा है कि जिस व्यक्ति ने आपको अस्वीकार किया है, वह ऐसा करने में सही था?

गतिविधि 2: तीन-तीन के समूहों में बंट जाएं. हर व्यक्ति को, अस्वीकार्य हो जाने की एक कहानी बतानी है (ज़रूरी नहीं रोमानी हो) दूसरे 2 लोगों को, अगले 10 मिनट में उसका दुख कम करने की कोशिश करनी है. और इसका सामना करने की एक योजना बनानी है.

चर्चा के सवाल:
भाग 1: क्या कभी आपकी नौकरी या दाखिले के लिए दी गई दर्ख़्वास्त या कोई आर्टवर्क अस्वीकार्य हुई है? आपने क्या किया? क्या आप इस अस्वीकृति को स्वीकार कर पाए?

भाग 2: ऐसे कौन से कारण रहे हैं जिनसे आपने लोगों को अस्वीकार किया है? (अंतरंग जोड़ीदार (intimate partners), भाई-बहन, दोस्त, साथ काम करने वाले, बिज़नस पार्टनर, माता-पिता…) क्या आपके द्वारा किसी व्यक्ति को अस्वीकार किए जाने और इन वीडियो में दिखाए गए कारणों में कुछ समानता है?

सन्दर्भ: अस्वीकार किए जाने की अनगिनत घटनाएं हमारे आस−पास चलती ही रहती हैं. हम इन्हें अपनी ज़िंदगी का एक भाग ही मानते हैं. तो फिर हम ऐसा ही रोमानी तौर पर अस्वीकार (romantic rejection) किए जाने पर क्यों नहीं करते. कौन सी भावना या दबाव या जानकारी हमें ऐसा करने से रोकती है?

गतिविधि 3: रोल प्ले: आपमें से हर कोई वह व्यक्ति है जिसे आपने अस्वीकार किया है. सबको बताएं कि क्या हुआ था और आपको कैसा लगा?

चर्चा के सवाल: अगर हमें अस्वीकार किया जाए तो हमें गुस्सा क्यों आता है? किस चीज़ पर हमें अपना हक लगता है? हमें ऐसा क्यों लगता है? किस तरह की हकदारी के बारे में (साफ़ तौर पर या इशारों में) हमारे माता−पिता, समाज, आस पास के लोग हमें बताते हैं? कार्यकर्ता समन्वयक को यह कोशिश करनी है कि प्रतिभागी अपनी हकदारियों की एक सूची बना लें: क्या प्रतिभागी याद कर सकते हैं, जब उन्हें बताया गया था कि प्यार, इज़्ज़त, देखभाल किए जाने पर उनका हक है?

क्या वे याद कर सकते हैं कि कब उन्हें प्यार, इज़्ज़त, देखभाल दिए गए, बिना उनके यही चीज़े सामने वाले को दिए या बिना उनके मांगे? बिना किसी के साथ बराबर और पारस्परिक लाभ के? ख़ासकर जेंडर, वर्ग और जाति और सामाजिक हैसियत के संदर्भ में)

गतिविधि 4: पांच समूहों में बंट जाएं. हर समूह को एक वीडियो का विश्लेषण करना है. एक टाइमलाइन बनाएं कि कब, क्या हुआ? और कहां संवाद पूरी तरह ख़त्म हो गया? एक विकल्प बताएं जिसका प्रयोग कर जिसे अस्वीकार किया गया है, वह चीज़ों को बेहतर तरह से संभाल सकता था. एक और विकल्प अस्वीकार करने वाले के परिवार वालों के लिए बताएं, जिससे वे स्थिति को ख़राब होने से बचा सकते थे.

कार्यशाला समापन : एक गोले में बैठ जाएं और इस कार्यशाला के दौरान क्या नया सीखा, सांझा करें.

उर्वशी वशिष्ट एक स्वतंत्र शोधकर्ता, टीचर, लेखक और संपादक हैं. वे दिल्ली में रहती हैं. उन्होंने विश्वविद्यालयों, प्रकाशन, और विकास क्षेत्र में काम किया है और इन दिनों वे जानवरों के अधिकारों, घरेलू हिंसा, और नॉन कमफरमेटिव जेंडरनेस पर काम कर रही हैं.

इस लेख का अनुवाद सादिया सईद ने किया है.

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