दूसरी लहर में कैसा था गांव का माहौल?

खबर लहरिया के पत्रकारों द्वारा बुंदेलखंड में कोरोना की दूसरी लहर के सच का दस्तावेज़ीकरण

चित्रांकन: निधिन डोनाल्ड (@nidhinshobhana)
लेखन: सुमन परमार

हमारा देश भी अजब-गजब का देश है. कुछ महीने पहले अख़बारों और सोशल मीडिया पर एक 84 साल के बुज़ुर्ग की तस्वीर बहुत दिखाई दे रही थी. कारण उन्होंने 10 महीने में 11 बार कोरोना का टीका लगवाया था और 12वीं बार टीका लगवाने के प्रयास में वो स्थानीय प्रशासन द्वारा पकड़ लिए गए. एक दूसरी ख़बर ये भी है कि उत्तर-प्रदेश में कई ऐसे बुज़ुर्ग सामने आए जिन्होंने कोरोना का टीका 5 से 6 बार लगाया. सभी ने एक ही बात कही कि इस टीके से उनके जोड़ों और गठिए के दर्द में बहुत आराम मिलता है इसलिए वो टीका लगाते रहे.

वहीं ये भी कहा जा रहा था कि गांव में रहने वाले लोग कोविड का टीका नहीं लगा रहे, या घूस देकर नकली सर्टिफिकेट बनवा लेते हैं, या कोविड में भी वो इतनी शादियां क्यों कर रहे हैं, गांव में तो लोग ऐसे ही मर जाते हैं किसी को फ़र्क ही नहीं पड़ता, वहां तो झोला छाप डॉक्टर ही मिलेंगे.

आख़िर उत्तर प्रदेश के गांवों का मृत्यु से क्या रिश्ता है? क्यों यहां सभी ख़तरों के खिलाड़ी बनते रहते हैं? या हालात ही कुछ ऐसे हैं कि उन्हें इस खेल में अपने भरोसे ही रहना है?

अखबार और टीवी चैनलों पर बार-बार यही दिखाई देता है कि वैक्सीन टीम को देख गांव के लोग नदी में कूद गए या उनका मानना है कि कोरोना बीमारी की असली वजह नहीं है बल्कि गांव में लगा टावर है, जिसपर 5जी की टेस्टिंग चल रही है और गांव में मौत का आंकड़ा बढ़ रहा है.

ख़बर लहरिया चैनल से जुड़ी कविता बुंदेलखंडी और दिशा मल्लिक पिछले एक दशक से उत्तर-प्रदेश के गांवों को देख रही हैं. वे समझने की कोशिश करती हैं कि ज़मीनी स्तर पर वे कौन सी वजहें हैं जो गांव के लोगों को यह मानने के लिए मजबूर कर देती हैं कि वे ख़ुद के भरोसे हैं और कैसे शहरी मानसिकता के साथ इन घटनाओं को देखा जाता है. कोविड के दौरान लगातार ज़मीनी स्तर पर काम करते हुए वे बहुत तरह की सच्चाइयों से रूबरू हुईं, और कुछ हमारे सामने भी लेकर आईं.

चित्रकूट जून 2021

श्रेया, जिसकी सेब जैसे गाल हर कोई छू कर निकल जाता था. अपने माता-पिता और दादा-दादी, नाना-नानी की आंखों का तारा, उनका जिगरी खिलौना, अभी तीन महीने ही तो हुए हैं उसे पैदा हुए! कुछ दिनों से उसे खांसी है. वैसे, खांसी तो हर किसी को होती ही रहती है. कोई बड़ी बात नहीं, छोटी बच्ची है हल्की ठंड लग गई होगी. मौसम भी तो बदल रहा है, या बच्ची को कुछ ठंडा खिला दिया होगा. लेकिन, खांसी है कि जाने का नाम ही नहीं ले रही. कई महीने, हफ्ते बीत गए हैं, इतने तो बीत ही गए हैं कि अब याद भी नहीं उसे कब से खांसी हो रही है!

उसकी काली-काली बड़ी आंखें खांसते रहने से थकी-थकी लगने लगी हैं और लाल-लाल गाल भी मुर्झा रहे हैं. खांसी इतनी बढ़ गई है कि उसका सारा शरीर पूरी तरह टूटने लगा है ठीक वैसे ही जैसे उसकी वो गुड़िया जिसके हाथ-पांव टूटकर इधर-उधर बिखरे हुए हैं और जिससे श्रेया अब नहीं खेलती. एक दिन ऐसा भी आया जब खांसते-खांसते उसे सांस लेने में तकलीफ़ होने लगी. बेहाल मां, श्रेया को एक प्राइवेट अस्पताल लेकर गई. डॉक्टर ने कुछ दवाइयां लिख दीं जिससे उस वक़्त उसे थोड़ी राहत मिली.

अब तक पूरे घर, परिवार, दोस्त, रिश्ते-नाते में किसी को नहीं पता चल पा रहा था कि आख़िर खांसी की वजह क्या है. दवाई चल रही है – ये चार शब्द सभी के लिए उम्मीद का सिरा हैं.

दवाई शुरू होने के चार दिन बाद रात के नौ बजे श्रेया की काली आंखें खुली की खुली रह गईं और उसकी सांस ऊपर की तरफ़ अटक कर अचानक रूक गई. परिवार वाले, रोती-बिलखती मां की कोख से श्रेया को खींचकर, अस्पताल की ओर भागे. एक के बाद एक प्राइवेट डॉक्टरों ने इलाज़ करने से मना कर दिया.

अंत में एक सरकारी अस्पताल पहुंचें, वहां भी उन्हें इलाज के लिए मना कर दिया गया.

जवाब दे दिया – ये शब्द हमने कितनी कितनी बार, कितने-कितने घरों में, अस्पतालों में, दफ़्तरों में सुना है. निराशा और हार से भरा ये शब्द कांच से बनी उम्मीद के टूट कर बिखर जाने जैसा है. जब चार या पांच डॉक्टरों ने श्रेया का इलाज करने से मना कर दिया था तो मदद की गुज़ारिश पर एक सरकारी अस्पताल में एक कम्पाउंडर, जो आधे नशे में था उसने श्रेया के मुंह में थोड़ी देर के लिए ऑक्सीजन पाइप लगाकर उसके पहले से मरे हुए शरीर में जान डालने की कोशिश की. लेकिन, अब सबकुछ छूट चुका था- उसकी सांसे, सबकी उम्मीदें.

लोग और परिवार, सरकारी अस्पताल के उस कम्पाउंडर को मदद की एक कोशिश के रूप में देखते हैं जो परिवार की इस तसल्ली के लिए काफ़ी है कि किसी ने मदद की थी, हमने कोशिश की थी. शायद मां के लिए भी ये एक जवाब था जिसे उसने अपने भीतर कहीं सहेज कर रख लिया हो.

कभी-कभी लगता है कि ये सच नहीं है. जैसे ये सब किसी फ़िल्म के रील की तरह है. कहीं कोई गुस्सा नहीं है. कोई चिल्लाहट नहीं है परिवार के किसी सदस्य के भीतर कोई सवाल नहीं है कि श्रेया को सही इलाज़ क्यों नहीं मिला? हफ़्ते भर के भीतर ही श्रेया की मां अपने काम पर वापस लौट आईं. और लोगों ने कहा कि कितनी हिम्मती है क्योंकि ज़िंदगी इसी का नाम है.

चित्रकूट, इलाहाबाद अप्रैल 2021

ज़िंदगी में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं जो हमें बदल देते हैं, गुस्से या दुख से भर देते हैं, जिनके आगे हम अपंग हो जाते हैं, जहां हमारा कोई बस नहीं चलता. इन पलों में हम चीख-चीख कर रोते हैं. गोया ये रोना ही तय करता हो कि हम जिएंगे या मर जाएंगे या दुबारा जन्म लेकर इस धरती पर वापस लौटेंगे. जो भी हो रोना बहुत ज़रूरी है. 

शांति के पिता पुलिस में काम करते हैं, प्रतिष्ठित और रौबदार नौकरी है उनकी. पर कोरोना की वजह से उसकी मां की जान चली गई. शांति ने रोते हुए अपनी कहानी बताई: 

पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले थे. शांति के पिता चुनाव ड्यूटी में वहां तैनात किए गए थे. कुछ समय पहले वे छत्तीसगढ़ में पोस्टेड थे. जब वहां एक हमले में कई पुलिसवालों की जान चली गई थी. मरने वाले पुलिसवालों में अधिकतर उत्तर-प्रदेश के रहने वाले थे. इस घटना की ख़बर टीवी पर देखते हुए शांति की मां बुरी तरह से डर गईं. वे लगातार पिता के मोबाइल पर फोन करती रहीं, लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई. बुरी तरह से परेशान और बेचैन मां ने तब राहत महसूस की जब पिता ने एक वीडियो कॉल कर अपनी सलामती की खबर दी.

लेकिन पश्चिम बंगाल तो काला जादू करने वालों का गढ़ है. क्या पता कोई उनके साथ क्या कर दे! मां, एक बार फ़िर परेशान और बैचेन हो गई थी. रात-रात भर ठीक से सोती नहीं और खाना, खाना भी कम कर दिया है. एक दिन वे उठीं तो उनके शरीर में बहुत ज़्यादा दर्द था. किसी तरह ज़बरदस्ती कर उन्हें अस्पताल ले जाया गया. वे अस्पताल में कई दिनों तक रहीं लेकिन वहां उनकी हालत और ख़राब ही होती गई. ठीक से सांस नहीं ले पा रही थीं और सीटी स्कैन से पता चला कि उनके फेफड़ों में इंफेक्शन है. अस्पताल वालों ने – जवाब दे दिया – उन्हें डिस्चार्ज कर घर ले जाने को कहा.

शांति मां को घर न ले जाकर गाड़ी में बिठा पहले ज़िला अस्पताल लेकर गई लेकिन वहां कोई भी बेड खाली नहीं था. वहां से

वे बांदा मेडिकल कॉलेज पहुंचे जिसे साल 2020 में कोविड अस्पताल में तबदील कर दिया गया था. लेकिन वहां ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं था. शांति की मां की हालत लगातार बिगड़ रही थी और उन्हें अब ऑक्सीजन की सख़्त ज़रूरत थी. किसी ने इलाहाबाद के शंकरगढ़ में जेपी मेमोरियल अस्पताल लेकर जाने की सलाह दी.

जहां किसी तरह आख़िरकार उन्होंने फोन पर एक बेड का इंतज़ाम कर लिया था.

इस बीच दो दिन और बीत चुके थे और बिना इलाज, दवाई और डॉक्टर के शांति की मां की तबीयत और भी ख़राब हो रही थी. अब इलाहाबाद या कानपुर ज़िला अस्पताल ले जाना ही उपाए बचा था. बहुत कोशिश करने पर भी शांति को न तो एम्बुलेंस मिल पा रही थी और न ही मां का इलाज शुरू हो पा रहा था. मां, लगातार यही पूछती रहती कि कोई गाड़ी आएगी क्या जो उसे डॉक्टर के पास ले चले.

शांति के पति ने किसी तरह जुगाड़ कर 50,000 रूपए में एक ड्राइवर का इंतज़ाम किया जो शांति की मां को एक सुविधाओं वाली एम्बुलेंस में लेकर जाने को तैयार हो गया. ड्राइवर ने बताया कि एम्बुलेंस में दो ऑक्सीज़न सिलेंडर हैं, साथ एक डॉक्टर होगा और वो कानपुर में अस्पताल में एक बेड का भी इंतज़ाम कर देगा. ड्राइवर से मोल-भाव कर बात 30,000 रूपए में तय हुई. ड्राइवर ने पैसे एडवांस में देने को कहा वो भी ऑनलाइन गूगल पे के ज़रिए और पैसे ट्रांसफर होते ही उसने अपना फोन बंद कर दिया. एम्बुलेंस का इंतज़ार, हमेशा का इंतज़ार बनकर रह गया और आख़िरकार शांति की मां दुनिया छोड़ कर चली गई.

सरकार ने हाल ही में विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा कि उत्तर-प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई है.

चित्रकूट, सतना, जबलपुर मई 2021

2 मई की दोपहर को मायके में रह रही लक्ष्मी के पास ख़बर आई कि सतना के एक अस्पताल में उसके ससुर की मृत्यु हो गई है. लक्ष्मी, ससुराल वालों से नाराज़ होकर मायके आ गई थी. अपना गुस्सा भूलकर वह उल्टे पांव ससुराल लौटने की तैयारी करने लगी.

लक्ष्मी उस समय डेंगू से जूंझ रही थी (असल में तो वह सिर्फ़ डेंगू का ही टेस्ट कराने पर राज़ी हुई थी, कोविड का नहीं). उसकी बहन ने कहीं से गाड़ी का इंतज़ाम किया और वे दोनों चित्रकूट से मानिकपुर की तरफ़ निकल पड़े ताकि रास्ते से लक्ष्मी के पति को साथ ले सकें. सफ़र में लक्ष्मी को पता चला कि ससुर ने वैक्सीन की एक डोज़ लगवाई थी और उसके बाद उनकी कोविड रिपोर्ट पॉज़िटिव आई. ससुर जी एक सरकारी मुलाज़िम थे इसलिए अस्पताल में एक बेड मिलने में परेशानी नहीं हुई. लेकिन, इलाज मिलने के बावजूद उनकी हालत में सुधार न हो सका और उनकी मृत्यु हो गई.

रास्ते भर फोन की घंटियों का रूकना बंद ही नहीं हो रहा था. उसी एक कॉल से जानकारी मिली की उनकी कोविड रिपोर्ट नेगेटिव आई है. अब क्या, लक्ष्मी के पति ने फौरन रिश्तेनाते के लोगों को फोन कर बुलाना शुरू कर दिया. गांव पहुंचने से पहले पीपीई किट में बंद ससुरजी की लाश से पीपीई किट को हटाकर उन्हें उनके कपड़े पहनाए गए और सम्मान के साथ तैयार कर गांव ले जाया गया.

ख़बर मिलते ही अंतिम विदाई देने रिश्तेनातेदार और दोस्त पहुंचने लगे. सब उनके पैर पकड़ घंटों रोते-बिलखते रहे. असल में, उनकी रिपोर्ट नेगेटिव है ये ख़बर सच है या झूठ इसके बारे में बाहर के किसी भी व्यक्ति को कुछ नहीं पता था. असल सच तो ये था कि रसूखवाले होने की वजह से उनके परिवार वालों ने रिपोर्ट नेगेटिव बनवा ली थी.

कोविड पॉज़िटिव की ख़बर सुनकर कोई पास नहीं फटकता ये परिवारवालों को मंज़ूर नहीं था. क्योंकि बीमारी से ज़्यादा ज़रूरी तो समाज, बिरादरी, भाईचारा, कुल, परंपरा और परलोक की चिंता है. मरना तो सबको है, अभी खड़े-खड़े भी आप या मैं मर सकते हैं, किसी शादी के शामियाने में नाचते हुई छूटी बंदूक की गोली से मर सकते हैं, बारातियों से भरी बस के पलटने से मर सकते हैं या अस्पताल में भर्ती न किए जाने पर उसकी सीढ़ियों पर ही बच्चे को पैदा करते हुए दम तोड़ सकते हैं. ऐसे में चले गए पुन्य आत्मा को अंतिम विदाई देकर न केवल भाईचारा निभाते हैं बल्कि अपनी ज़रूरत पड़ने भर का एहसान भी इकट्ठा कर लेते हैं.

फिलहाल हालात ये हैं कि वैक्सीन का डर लक्ष्मी और उसके पूरे परिवार पर भीतर तक समा गया है. वे इस सदमे से बाहर नहीं निकल पाए हैं. परिवार के सभी सदस्यों ने इसी डर से वैक्सीन लेने से इंकार कर दिया है.

उत्तर-प्रदेश, जुलाई 2021

महोबा, चित्रकूट के साथ-साथ प्रदेश के 44 अन्य जिले भी पूरी तरह से कोरोना मुक्त हो चुके हैं. कम से कम एक दूसरे की पीठ खुजलाने वाले ज़िला मजिस्ट्रेट और पत्रकारों की नज़र में तो ये हो ही चुका है. ख़ुद की रसोई में बननेवाली रसदार सब्ज़ी में गर्म मसाले की ख़ूशबू इतनी तेज़ी से नहीं फैलती जितनी तेज़ी से ये अख़बारों और फ़ेसबुक के ज़रिए फैल चुका है कि कोरोना चला गया.

ख़ैर वैसे भी कोरोना से पहले और बाद में क्या बदला है? पहुंचवाले और पावरवाले लोग अभी भी जिम जा रहे हैं, फ़र्क इतना ही है कि अब वे बंद शटर के पीछे जिम करते हैं. टाईफाइड के केस बढ़ रहे हैं, लोग टाईफाइड से मर रहे हैं जैसे पुराने ज़माने में हुआ करता था. बाकि कुछ नया नहीं है.

अप्रैल 25 से लेकर मई 15 तक नरायणी ज़िले के दिखतवारा कस्बे में 25 लोगों की मौत हुई. मरनेवाले लगभग सभी लोगों को बुख़ार, सर्दी-खांसी और कमज़ोरी के लक्षण थे. लेकिन सरकारी सिस्टम की माने तो उनमें से सिर्फ़ एक व्यक्ति ही कोविड पॉज़िटिव था. बात तब सबके सामने खुली जब गांव के ही कुछ लोगों ने बताया कि गांव में हर घर में एक नहीं बल्कि दो-दो, तीन-तीन सदस्यों की मौत हुई है.

पत्रकार जब गांव पहुंचे तो उन्हें कई ऐसे भी घर दिखे जहां एक भी सदस्य नहीं बचा था और घर पूरा खाली पड़ा था.

स्थानीय स्वास्थ्य कर्मचारियों का कहना है कि गांववाले तो ऐसे ही बढ़ा-चढ़ा कर बातें बना रहे हैं. उनका कहना था कि सिर्फ़ 11 लोगों की मौत हुई है और उनमें भी चार ऐसे थे जो बहुत बूढ़े थे और जिन्हें पहले से ही बहुत तरह की बिमारियां थीं. ये सब कुछ प्रशासन और लोगों की आंखों के सामने हो रहा है. पूरा गांव बीमार है, मौतें हो रही हैं लेकिन कहीं कोई ख़ैर-ख़बर नहीं है.

आख़िर में ज़िला अस्पताल ने स्वास्थकर्मियों की एक टीम भेज दी है मामले की जांच के लिए. टीम, गांव में कैम्प लगाती है, लोगों को साफ-सुथरा रहने के लिए कहती है. कुछ जांचें होती हैं, जिसका परिणाम किसी को नहीं मालूम होता. कुछ लक्षणों के बारे में पूछताछ की जाती है. नालियां साफ करवा दी जाती हैं, थोड़ी दवाइयां बांटी जाती हैं और व्यवस्था अपना काम ख़त्म कर वापस लौट जाती है.

ये 70 सालों का विकास है, ये कोविड की रोकथाम के लिए उठाए गए कड़े कदम हैं, ये अपने नागरिकों की सुरक्षा का सरकारी वादा है, जो भी है ये हमारे आज का सच है! ये ऐसा सच है जहां किसी की जान की कोई कीमत नहीं, उसकी कोई इज़्ज़त नहीं. क्योंकि उनके पास पैसा नहीं है, वे ग़रीब हैं इसलिए वे अभिशप्त हैं विकास के पहिए के नीचे दबे रहने के लिए. यही वजह है कि लोग भी व्यवस्था पर भरोसा नहीं करते.

ख़ैर, लोगों ने बांटी गई दवाइयों को खाने से इंकार कर दिया है क्योंकि उससे उनकी बीमरी ठीक नहीं हो रही. न ही वो नरायणी कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर जाकर अपनी जांच करवाने को तैयार हैं या ज़िला अस्पताल में भर्ती होने को तैयार हैं क्योंकि वहां से कोई लौटकर वापस नहीं आता. वे वैक्सीन का डोज़ भी नहीं लगवाना चाहते क्योंकि सुईं लगाते ही या तो आप इतने बीमार हो जाते हैं कि हफ़्ते भर तक बिस्तर से उठना मुश्किल होता है या फ़िर आपकी जान चली जाती है.

हम जैसे हैं वैसे ही भले, जय राम जी की!

जाति, धर्म, वर्ग, शिक्षा, सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक खांचे में बंटा हमारा समाज ग़ैर-बराबरियों की खान है. व्यवस्था हमें यकीन दिलाने में कामयाब हो जाती है कि इसके लिए हम ही ज़िम्मेदार हैं. पैसा, सत्ता और ताकत के आगे पहले से ही हाशिए पर धकेल दिए लोगों के लिए कोरोना डबल महामारी की तरह है. दुख की बात ये है कि शहरों ने भी पीढ़ियों से चली आ रही इन ग़ैर-बराबरियों को बढ़ावा ही दिया है. 

सुमन परमार द थर्ड आई में सीनियर कंटेंट एडिटर, हिन्दी हैं.

संदर्भ

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