असम का यह स्कूल युवाओं को डाक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माताओं में बदल रहा है

द थर्ड आई ने फ़िल्म निर्माता रीता बैनर्जी से असम के तेजपुर में स्थित ग्रीन हब संस्था एवं उसके काम के बारे में बात की.

चित्र साभार: ग्रीन हब

दिसंबर 2014 से असम के तेजपुर शहर में स्थित ‘द ग्रीन हब’ संस्था ने यहां के शिक्षकों, वन संरक्षकों, फ़ुटबॉल खिलाड़ियों, गाइडों, छात्रों और आसपास के राज्यों से आए युवाओं को डाक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माताओं में बदल दिया है. इनके लिए कैमरा एक ज़रिया बन गया है अपने लोगों, समुदायों को आसपास की प्रकृति, वन्य जीवों से जोड़ने तथा उसके प्रति सम्मान एवं संरक्षण की भावना को विकसित करने का.

इस विषय में विस्तार से जानने के लिए द थर्ड आई ने फ़िल्म निर्माता एवं द ग्रीन हब संस्था की निर्देशक रीता बैनर्जी से बात कर इस अनोखी पहल को करीब से समझने का प्रयास किया. पिछले सात साल से यह संस्था युवाओं में अपने इलाके को जानने समझने का नज़रिया पैदा करने में मदद कर रही है. उनकी यह पहल कैसे गांवों और कस्बों से शहरों की ओर पलायन को प्रभावित कर रही है तथा समुदायों को अपने प्राकृतिक इतिहास एवं वर्तमान से जोड़ने का काम कर रही है, पढ़िए इस लेख में.

टीटीई टीम के सहयोग के साथ

आपने पर्यावरण से जुड़े गंभीर मुद्दों पर बात करने के लिए फ़िल्मों को ज़रिया बनाया. पिछले तीन दशकों से आप पर्यावरण और वन्य जीवों पर फ़िल्में बना रही हैं. आपने कब और कैसे फ़िल्मों को समुदायों को शिक्षित करने के लिए सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के रूप में देखना शुरू किया?

मेरे काम की वजह से मैं कई सालों तक सिर्फ़ घूमती ही रही. भारत को लेकर मेरी समझ – यहां रहने वाली अलग-अलग प्रजातियों/ नस्लों को बचाने, एक समुदाय के लिए उसका क्या महत्त्व है, और ये सब आपस में कैसे घुले-मिले हैं – ये मेरे भीतर फ़िल्म बनाने के दौरान ही विकसित हुई है.

अपनी यात्राओं के दौरान मैं पर्यावरण और लोगों से सम्बंधित कई मुद्दों से वाकिफ हुई और मैंने जाना कि किसी भी चीज़ को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता. मै जो फ़िल्में बना रही थी, उनपर काम करते हुए मुझे दो बातों का अहसास हुआ- पहला कि इन फ़िल्मों को ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे लोग एवं स्वयं सेवी संस्थानों (NGO), सरकारी संस्थानों और ख़ुद समुदायों द्वारा प्रभावकारी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है. दूसरा, ये फ़िल्में ख़ुद बदलाव का स्रोत बन सकती हैं.

उसी दौरान व्यक्तिगत रूप से मैं बहुत बेचैन रहने लगी. मुझे लगने लगा था कि फ़िल्में बनाना ही काफ़ी नहीं हैं, ज़मीनी हालात को बदलने की ज़रूरत है. पर्यावरण के संरक्षण को और बढ़ाना अब बहुत आवश्यक है.

फ़िल्में बहुत मज़बूत माध्यम हैं अपनी बात रखने का. क्या इन्हें संरक्षण बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है?

तो मैंने इसी दिशा में सोचना शुरू किया.

आपकी वो कौन सी फ़िल्में हैं जिनका ‘ग्रीन हब’ के विचार की योजना पर गहरा असर पड़ा?

माइक पांडे की फ़िल्म ‘द लास्ट माइग्रेशन’ (1994) मेरी शुरुआती फ़िल्मों में से एक थी जो हाथियों के एक झुंड के पकड़े जाने पर थी. इन हाथियों ने लगभग 19 लोगों को मार दिया था. यह फ़िल्म इंसान और जानवर के बीच के संघर्ष को सामने लाती है (बड़ी मात्रा में पेड़ों का काटा जाना हाथियों के इंसानी बस्तियों में आने का मुख्य कारण है). यह पहली भारतीय फ़िल्म थी जिसने ‘ग्रीन ऑस्कर’ पुरस्कार जीता था.

साल 2000 में हमने ‘शोर्स ऑफ़ साइलेंस’ फ़िल्म बनाई. ये फ़िल्म वेल-शार्क मछलियों के मारे जाने पर थी. उस समय इस हक़ीक़त पर कोई विश्वास भी नहीं करता था कि, भारत में वेल शार्कों का उनके लीवर (जिगर) के लिए शिकार किया जाता है. शार्क के लीवर का इस्तेमाल नावों को पानी में डूबने से बचाने के लिए किया जाता था और इसके गोश्त को निर्यात किया जाता था. फ़िल्म का यह असर हुआ कि वेल-शार्क को मारे जाने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई और इसे वन्यजीव सुरक्षा क़ानून के अंदर डाल दिया गया.

2007-08 में हम ‘वाइल्ड मीट ट्रेल’ फ़िल्म पर काम कर रहे थे जो भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में चल रहे शिकार पर आधारित है. हम दो तरह के शिकार के बारे में जानने को उत्सुक थे – पहला, बिना इजाज़त होने वाला वन्य जीवों का शिकार जिसे अंग्रेज़ी में पोचिंग कहा जाता है. इसके लिए दुनिया में एक विशाल नेटवर्क है जहां बाघों की हड्डियां, गेंडों के सींग, भालू का पित्त अच्छे दाम पर बेचे जाते हैं. इस नेटवर्क की रहनुमाई कई वैश्विक ताकतों द्वारा की जाती है. दूसरा, वह शिकार था जो घरों के स्तर पर होता है, जहां आप खाने के लिए शिकार कर रहे हैं. ठीक? हमारा सवाल था कि क्या दूसरी तरह का शिकार वन्य जीवन के लिए हानीकारक है? और 5 साल तक फ़िल्म बनाने के बाद, अपने सारे पैसे ख़र्च करने के बाद जवाब मिला – हां.

एक ख़ास क्षेत्र में सैकड़ो चिड़ियाएं एक दिन में मार दी जाती हैं. गन्ध बिलाव (सीविट कैट), हिरण, धनेश (हॉर्नबिल) चिड़िया, मतलब हर तरह के जानवरों का शिकार किया जा रहा है और बाज़ारों में बेचा जा रहा है. यह शिकार कुछ सांस्कृतिक है, कुछ दिखावे के लिए है, कुछ मर्दानगी और इज़्ज़त के विचार से जुड़ा है और कुछ आर्थिक है. फ़िल्म के दौरान मुझे लगा कि अगर आपको वाकई बदलाव चाहिए तो समुदायों के साथ काम करना ही होगा. मैं पूरी तरह से मानती हूं कि फ़िल्मों में बदलाव लाने की ताकत है, पर इसके साथ ही आगे बढ़कर थोड़ा और काम करने की ज़रूरत है.

कई सालों की मेहनत, लोगों के भीतर जंगल और पर्यावरण को लेकर समझ विकसित होना, उनके व्यवहार में बदलाव आए - यही था जिसमें मेरी रूचि थी.

संगठन: शेरगांव वन प्रभाग और सिंगचुंग बुगुन ग्राम समुदायिक रिज़र्व (SBVCR). ग्रीन हब फेलो: शालीना फ़िन्या (2018-19). यह फिल्म दुनिया में सबसे अधिक जैव-विविधता वाले समुदायिक भंडार क्षेत्र से हमारा परिचय करवाती है. इस जंगल क्षेत्र की देखभाल, भारत के अरुणाचल प्रदेश में रहने वाले बुगुन जन समुदाय और भारतीय वन विभाग द्वारा साथ मिलकर की जाती है. यहां की फॉरेस्ट पेट्रोलिंग टीम एसबीवीसीआर (SBVCR) दरअसल सिंगचुंग के बुगुन समुदाय के युवाओं का ही संगठन है. इसके ही एक सदस्य शालीना द्वारा यह फ़िल्म बनाई गई है. 

‘द ग्रीन हब’ की संरचना के बारे में हमें बताएं.

‘द ग्रीन हब’ भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (NEP) में एक साल की फेलोशिप देता है जिसमें स्टूडेंट्स को एक साथ रह कर सीखने का मौका मिलता है. इसके अलावा उनके लिए वैकल्पिक आजीविका के मौके पैदा करने में मदद मिलती है. साथ ही यह संस्था उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में जैव विविधताओं के संसाधन केन्द्र एवं उनके संग्रह का भी काम करती है.

हमारी कोशिश है कि हम ज़्यादा से ज़्यादा दूर दराज़ के इलाकों में पहुंच पाएं, ऐसे इलाके जहां हम अभी तक नहीं पहुंच पाए हैं. 2014 में सोशल मीडिया और दूसरे संचार माध्यमों के ज़रिए फेलोशिप की जानकारी मिलने के बाद हमें 180 आवेदन पत्र मिले थे जिनमें से हमने 20 चुने. चयन प्रक्रिया में – द नॉर्थ ईस्ट नेटवर्क (NEN) संस्था भी इसका एक हिस्सा है.

चूंकि ये आवासीय फेलोशिप है इसलिए पहले के तीन महीने सभी फेलोज़ आपस में एक साथ मिलकर रहते हैं. इस वजह से बहुत दिक्कतें भी होती हैं. अलग-अलग सांस्कृतिक पहचान, भाषा और जाति के होने की वजह से उनके बीच आपसी संघर्ष भी होते हैं. इस बिन्दु पर हस्तक्षेप करते हुए हम कोशिश करते हैं कि उन्हें इस पाठ्यक्रम के मूल सिद्धांतों के बारे में समझा सकें – जो तुम्हारे बाहर है, उसका सम्मान करो – यही एक तरीका है जिससे हम प्राकृतिक पर्यावरण को समझ सकते हैं, बराबरी पर उसका सम्मान कर सकते हैं.

यह आपस में लड़ने-भिड़ने की जगह नहीं है, जहां लोग सिर्फ़ अव्वल आने की होड़ में रहते हैं. यह सहयोग और एक-दूसरे से सीखने की भावना पर टिकी है. यहां संवेदना है, एक-दूसरे के लिए इज़्ज़त है और सबसे मूल्यवान ये है कि वे एक-दूसरे को समझना शुरू कर देते हैं. एक-दूसरे के इलाकों को समझते हैं. एक-दूसरे की फ़िल्में देखते हैं. एक-दूसरे के समुदायों पर फ़िल्में बनाते हैं.

इन सीमाओं को मिटता देखना, इन दीवारों को गिरता देखना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का मेरा सबसे पसंदीदा हिस्सा है.

‘द ग्रीन हब’ के पाठ्यक्रम के पीछे क्या सोच मौजूद रही है?

हमें यह हमेशा से मालूम था कि हमारा अंतिम उद्देश्य उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के युवाओं के भीतर संरक्षण की सोच को बैठाना है और उसके लिए हमारा औज़ार वीडियो था और तरीका फ़िल्में. क्योंकि फ़िल्में बनाने (और बहुत सारी फ़िल्में देखने) के ज़रिए ही मैंने पर्यावरण को जाना और यही चीज़ मैंने पाठ्यक्रम में भी डालने की कोशिश की है.

हम वीडियो डॉक्युमेंटेशन को इस पाठ्यक्रम की रीड़ मानते हैं और इसके मूलभूत सिद्धांतों को समझने पर ज़ोर देते हैं. शुरुआत एकदम बुनियादी स्तर से होती है. जैसे – आपको फूल का वीडियो बनाना है या कोई प्राकृतिक दृश्य (लैंडस्केप) विकसित करना है तो आप उसे फ्रेम कैसे करेंगे – पास से, थोड़ी दूर से, बहुत दूर से? ये समझना कि आप उसे ऐसा क्यों फ्रेम करेंगे? यानी एक चित्र का उद्देश्य निर्धारित करना.

अगला कदम संपादन या कहानी कहने की कला है. हमारे कई अनुभवी साथी इस विषय पर हमारे साथ जुड़कर फेलोज़ से बात करते हैं.

कहानी कैसे बताएं? और इसे सिर्फ़ ‘मुद्दे’ के स्तर पर लाकर, वहीं न छोड़ दें, यह सबसे बड़ी चुनौती होती है.

इसके बाद अभ्यास आता है. कड़ी मेहनत वाला अभ्यास. ये वैसा ही है जैसा गाड़ी चलाना सीखना. आप जब गाड़ी को कई बार चला लेते हैं तो ये क्रिया ‘मांसपेशीय स्मृति’ बन जाती है और इतनी सहज की फ़िर दिमाग़ को इसे करने में अधिक सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती और तब, आप आसपास के नज़ारों को देखना शुरू कर देते हैं.

तो क्या ये ‘देखना’ भी सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का हिस्सा है?

हां, मगर आप तभी ‘देख’ सकते हैं जब आपकी जड़ें बहुत मज़बूत हो और जड़ों से मेरा मतलब सिर्फ़ वीडियो बनाने और उसे संपादित करने से नहीं है, बल्कि सोचने से भी है. सोचना एक कौशल है.

हमें एक बाघ या कीड़े को देखने से आगे बढ़कर उसके बारे में सोचना है. यह ध्यान लगाना अभ्यास के साथ आता है. शुरुआत अपने आस-पास से होती है. हम पत्तियों को देखते हैं, चिड़िया, मेंढक को देखते हैं. फिर हम सोचना शुरू करते हैं कि स्थानीय पर्यावरण में इस चिड़िया की क्या भूमिका है? मेरे रोज़ के खाने से क्या रिश्ता है?

आपको ये अहसास होता है कि वह चिड़िया आपकी फसल का परागण करती है. और इसी से आपको खाना मिलता है तो शायद आपको इस चिड़िया को नहीं मारना चाहिए. इसी तरह कैसे मेंढक का होना हमारे पर्यावरण के लिए फायदेमंद है और मेंढकों का अत्याधिक शिकार होने से पर्यावरण को क्या नुक्सान हो सकता है? क्या-क्या मिटने की कागार पर आ सकता है?

इसलिए ग्रीन हब का पाठ्यक्रम मूल सिद्धांतों में गहराई तक जाने को बढ़ावा देता है और फ़िर हर फ़ेलो अपने क्षेत्र, अपने इतिहास के आधार पर इन सिद्धांतों को आत्मसात करता है, समझता है और इन्हें आगे बढ़ाता है.

इस चिंतन की गहराई में जाने के लिए, कैमरा कैसे मदद करता है?

दरअसल, अगर आप स्टूडेंट्स को इस चिंतन प्रक्रिया तक पहुंचा पाने में कामयाब होते हैं तो कैमरे की भूमिका जादूई हो जाती है. जैसे ही आप अपने जंगल को, अपने इलाके को कैमरे से देखना शुरू करते हैं आपका सारा ध्यान उस एक जगह पर केन्द्रित हो जाता है. मान लीजिए आप एक चिड़िया का वीडियो बना रहे हैं. आपका सारा ध्यान इस चिड़िया पर केंन्द्रित हो जाता है. उसके पंख कैसे हैं, वो किस रंग की हैं, किस प्रजाति की है? जैसी तमाम बातें आपके ज़ेहन में घूमने लगती हैं. ये आप सिर्फ़ उस एक चिड़िया के बारे में सोच रहे है, बाकि चिड़ियों के बारे में नहीं.

इसी तरह जब आप किसी प्राकृतिक दृश्य का टाइम लेप्स वीडियो बनाते हैं, (जिसमें लंबे समय में बनाया गया वीडियो तेज़ी से दिखाया जाता है ताकि धीरे-धीरे हुई चीज़ें जल्दी-जल्दी होती दिखाई दें.) तो आप एक ही प्राकृतिक दृश्य को तीन घंटे तक देखते रहते हैं, उस जगह पर बदलती रौशनी, या किसी हरकत को आप ग़ौर से देखते हैं. इस तरह आप उस जगह से गहराई से जुड़ने लगते हैं क्योंकि आप इसे अपने कैमरे में कैद कर रहे हैं. आप थोड़ी देर के लिए जाते हैं, फ़िर लौट कर आते हैं, फ़िल्म को देखते हैं, उसकी समीक्षा करते हैं फ़िर आगे रिकॉर्ड करते हैं.

यह अहसास कि वह दृश्य आपने ख़ुद रिकॉर्ड किया है, आौर हर कोई जो उसे देख रहा है वह बहुत उत्साहित हो रहा है क्योंकि आपने उसे इतनी खूबसूरती से रिकॉर्ड किया है… मुझे लगता है कहीं न कहीं इससे आपके भीतर प्रकृति के प्रति सम्मान बढ़ता है और गाढ़ा होता है. समय के साथ ये सब कहानियों में बदल जाते हैं और ऐसी चीज़ों में बदल जाते हैं जिन्हें आप करना चाहते हैं. आप अपने समुदाय, अपने बचपन को पलटकर देखने लगते हैं. ऐसी कितनी ही चीज़ें सामने आने लगती हैं जिन्हें देखकर भी आपने कभी उस तरह नहीं देखा था, जिनपर आपने नज़र तो डाली थी मगर सोचा नहीं था.

‘द ग्रीन हब’ से जाने के बाद इन फेलोज़ की किस तरह की यात्रा रही है?

फेलोशिप को अब तक सात साल हो चुके हैं और 88 के करीब छात्र यहां से पढ़ाई पूरी करके जा चुके हैं. इनमें से कई अपने समुदायों के साथ संरक्षण के मुद्दों पर काम कर रहे हैं. वे कैमरे का भी प्रयोग करते हैं साथ ही वे समुदाय के साथ सीधे तौर पर संरक्षण पर काम कर रहे हैं और जंगलों को दोबारा उगाने और मौजूदा जंगलों को बचाने पर बातचीत के तरीके ढूंढ रहे हैं. कुछ फ़िल्में बना रहे हैं, और कुछ स्वंय सेवी संस्थाओं के साथ कार्यरत हैं.

किसी फेलो ने कोई ऐसी चीज़ की जिसने आपको चौका दिया?

चौंका देने वाली तो नहीं मगर खुश कर देने वाली ज़रूर है. हमारे पहले बैच में एक स्टुडेंट था वानमई. वो नागालैंड के दूरस्थ क्षेत्र के कुन्या समुदाय का लड़का है. वीडियो बनाने और संपादन में उस्ताद था. ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उसने तीन अन्य लड़कों के साथ मिलकर एक कंपनी खोली – Genesis 4. ये सभी अलग-अलग राज्यों से हैं. नॉर्थ-ईस्ट क्षेत्र में ये अपने आप में एक अच्छी बात है क्योंकि यहां के राज्यों और समुदायों के बीच संघर्ष और हिंसा का पुराना इतिहास रहा है.

वानमई के समुदाय में अफीम का सेवन 90 के दशक से ही एक बड़ी समस्या है. उसने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर अफीम की लत में जकड़े लोगों के लिए पुनर्वासन केंद्र (रीहैब सेंटर) बनाए हैं, लोगों द्वारा अफीम बेचे जाने के खिलाफ़ जुर्माने की व्यवस्था भी की है. वानमई इन सारी चीज़ों का दस्तावेज़ीकरण भी करता है. पिछले साल उसने छः अन्य युवाओं के साथ मिलकर एक ‘बायोडाइवर्सिटी कमिटी’ की शुरुआत भी की. ताकि उन जंगलों को वापस लगाया जा सके जिन्हें झूम खेती* की वजह से खो दिया गया है. उसके ये कदम, ये पहलकदमियां उस समझ की वजह से ही हैं जो उसकी ‘ग्रीन हब’ में बिताए समय के दौरान संरक्षण को लेकर बनी थी.

हमारा लक्ष्य ज़ाहिर है, बड़ी तादाद में ऐसे फेलो तैयार करना ताकि एक विशाल नेटवर्क बन सके. जिससे हर ब्लॉक, हर ज़िले में आपका एक फेलो मौजूद हो ताकि महत्त्वपूर्ण बदलाव हो सकें. सिर्फ संरक्षण में ही नहीं बल्कि, सोच में भी. और वह, मैं कहूंगी, नेटवर्क की पहली ताकत होगी, हम वहीं पहुंचना चाहते हैं.

आप भारत के दूसरे हिस्सों में मौजूद शिक्षकों से उनके पाठ्यक्रम में पर्यावरण के प्रति चेतना शामिल करने को लेकर क्या कहना चाहेंगी?

संरक्षण का मतलब सिर्फ़ वन्य जीवन या पर्यावरण को अलग-थलग करके देखने से नहीं जुड़ा. मुझे वाकई लगता है कि यह एक समुदाय, बल्कि हम सभी के सतत न्यायसंगत जीवन की नींव है. अगर आज हममें से कोई भी अपनी ज़िंदगी को पलट कर देखे और आगे के बारे में सोचे तो पाएगा कि हमारा भविष्य, दोनों, ग्रामीण और शहरी इलाकों में, पर्यावरण या हमारे आस-पास की पारिस्थितिक सुरक्षा पर ही निर्भर है. अंत में पानी ख़त्म होने वाला है, खाना ख़त्म होने वाला है और ये कोई अब दूर, भविष्य की कल्पना नहीं रह गई है. ये सब आज हमारे सामने हो रहा है. हमारे पास कोई बचाव का तरीका नहीं है, सिवाय इसके कि संरक्षण के काम को कई गुना बढ़ाया जाए और संरक्षण की सोच को हर तरफ समान रूप से लागू किया जाए.

द ग्रीन हब पाठशाला

छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य-प्रदेश और राजस्थान से जुड़ने वाले फेलोज़ के साथ ग्रीन हब अब भारत के केन्द्रिय राज्यों तक फैल चुका है, जिसका सेंटर भोपाल में है. इन राज्यों के गांवों और आदिवासी इलाकों से जुड़े 21 स्टुडेंस वाले पहले बैच में नॉर्थ-ईस्ट इलाके के पूर्व स्टूडेंट्स, परामर्शदाता के बतौर जुड़े हैं. यहां ग्रीन हब के साथी संस्थानों में डस्टी फूड्स और महाशक्ति सेवा केन्द्र शामिल है.

*झूम खेती – इसमें पहले पेड़ों को काटकर उन्हें जला दिया जाता है और साफ की गई भूमि पर बीज बो दिये जाते हैं. जब तक मिट्टी में उर्वरता रहती है इस भूमि पर खेती की जाती है. इसके बाद इस ज़मीन को छोड़ दिया जाता है जिस पर दोबारा पेड़-पौधे उग आते हैं. 

कार्यशाला

अपने घर, इलाके, दोस्तों या समूहों के साथ करें:

  • अपना फोन कैमरा निकालें और घर या अपने आस-पास की प्रकृति पर नज़र डालें. ये एक पेड़, पत्ती, चिड़िया, क्षितिज या पानी पर पड़ते प्रतिबिम्ब हो सकते हैं. उस एक ही फ्रेम का दिन के तीन अलग-अलग समय पर वीडियो बनाएं (अगर चिड़िया उड़ जाए तो उस डाल का वीडियो बनाएं जिस पर वह बैठी थी.) ये तीन समय हैं: सूर्योदय, सूर्यास्त और दोपहर. हर बार आपका जिन चीज़ों या बदलावों पर ध्यान जाए उन्हें लिख लें.

 

  • अपने आस-पास के पौधों, जानवरों और पेड़ों के फोटो लेकर एक इंस्टाग्राम पेज शुरू करें. अपने आस-पास मौजूद वयस्कों से इनसे जुड़ी कहानियां पूछें और इंस्टाग्राम पोस्ट लिखें.

 

  • स्थानीय स्तर पर समान रूचि रखने वाले युवाओं के साथ बैठक करना शुरू करें और उन्हें अपने घरों और दफ्तरों के आस-पास मौजूद प्राकृतिक चीज़ों का दस्तावेज़ीकरण करने को कहें. इन चित्रों और वीडियो को जमा करके स्थानीय पुरालेख/संग्रह तैयार करें – प्रकृति की ऐसी चीज़ें जो आपकी दादी के ज़माने से धीरे-धीरे गायब हो रही हैं और वे भी जो आज तक मौजूद हैं.
उर्वशी वशिष्ट एक स्वतंत्र शोधकर्ता, टीचर, लेखक और संपादक हैं. वे दिल्ली में रहती हैं. उन्होंने विश्वविद्यालयों, प्रकाशन, और विकास क्षेत्र में काम किया है और इन दिनों वे जानवरों के अधिकारों, घरेलू हिंसा, और नॉन कमफरमेटिव जेंडरनेस पर काम कर रही हैं.

इस लेख का अनुवाद सादिया सईद ने किया है.

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