टीम

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.

दिप्ता भोग

हेड ऑफ़ रिसर्च, इनोवेशन एंड पार्टनरशिप्स

दिप्ता भोग पिछले तीन दशकों से जेंडर और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर काम कर रही हैं. पत्रकारिता से अपना लंबा सफर शुरू करते हुए दिप्ता ने गांवों की महिलाओं पर अध्ययन और काम करने की ओर कदम बढ़ाए। वे दिल्ली स्थित निरंतर संस्था की भी सह-संस्थापक रही हैं. महिला साक्षरता, व्यस्क एवं किशोरियों की शिक्षा तथा ग्रामीण पत्रकारिता के प्रोग्राम डिज़ाइन, क्रियान्वयन, नीति निर्धारण और उसके प्रभाव को आंकने में भी उनका लंबा अनुभव है.

टेक्स्टबुक रेजीमस शीर्षक से प्रकाशित, पांच राज्यों के अध्ययन का संयोजन दिप्ता ने किया है. इस अध्ययन में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर स्कूली पाठ्य पुस्तकों का नारीवादी नज़रिए से विश्लेषण किया गया है. हाल के वर्षों में, उनका शोध कार्य गांव के इलाक़ों और छोटे शहरों की ग़ैर-सरकारी संस्थाओं को नेतृत्व प्रदान करने वाली महिलाओं पर केंद्रित रहा है. दिप्ता दक्षिण एशिया और पूर्वी अफ़्रीका में क्रिया के ‘इंस्टीट्यूट ऑन फ़ेमिनिस्ट लीडरशिप एंड मूवमेंट बिल्डिंग’ (FLAMBRI) की पुनर्रचना की; और फ़िलहाल, आप ऐसी ही नेतृत्व बढ़ाने की गतिविधियों से जुड़ी हैं.

2002 में निकाले गए अख़बार, खबर लहरिया की शुरुआत में भी दिप्ता का योगदान रहा है. ग्रामीण पत्रकारों की टीम को ट्रेनिंग देने के काम से भी जुड़ाव रहा है.

युवा किशोरियों और उनके संगठन को लेकर आपके शोध का नतीजा बर्डबॉक्स में नज़र आता है. जो बाइस्कोप के आकार का एक ऑडिओ-वीडियो उपकरण है. इस उपकरण पर भोपाल, लखनऊ और कर्वी की युवा लड़कियों की बातचीत को देखा-सुना जा सकता है. इन संवादों के विषय कामुकता, प्रेम, शर्म और आज़ादी, इत्यादि से संबंधित हैं. दिप्ता को अपने प्यारे कुत्तों को टहलाते हुए समंदर के किनारे बसने का सपना देखना अच्छा लगता है.

शबानी हसनवालिया

संपादक

शबानी एक लेखिका और फ़िल्मकारा हैं. वे नॉन-फ़िक्शन लेखन करती हैं; शबानी 2001 से, आवाज़ और आकृतियों का इस्तेमाल मीडिया के अलग-अलग मंचों से कर रही हैं. उन्होंने सामाजिक-आर्थिक सच्चाइयों को बदलने की दिशा में और बदलते भारत में विस्फोटक सब-कल्चर और अंतरंग जाति इतिहासों पर भी काम किया है. दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद वे जामिया मिलिया के मास कम्यूनिकेशन रिसर्च सेंटर से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की. शबानी की बनाई फ़ीचर डॉक्यूमेंटरियों में बीइंग भाईजान (2014), गली (2017) और आउट ऑफ़ थिन एयर (2009) शामिल हैं. वे इनलैक फ़ेलो हैं; और द सनडांस इंस्टिट्यूट, लास एंजेलिस तथा डॉक्यूमेंटरी फिल्ममेकर ग्रुप, लंदन, की भी फ़ेलो रह चुकी हैं. दिल्ली से निकलने वाली पत्रिका फर्स्ट सिटी के संपादकीय मंडल में शबानी एक दशक से भी अधिक समय तक रहीं. उन्होंने डिजिटल कहानी पाठ के ज़रिए सामाजिक बदलाव पर, ग्रामीण इलाक़ों में किशोरियों और युवतियों के साथ भी बड़े पैमाने पर काम किया है. शबानी को मेज़ पर सजाने वाली कलाकृतियों को जमा करने का शौक़ है; और बकमाल (cutting edge) स्क्रीनसेवर के लिए आपसे संपर्क किया जा सकता है.

रुचिका नेगी

सह संपादक

रुचिका नेगी एक फ़िल्मकारा और शिक्षिका हैं. शैक्षणिक पद्धतियों की आलोचना और रचनात्मकता में वे गहरी दिलचस्पी रखती हैं. रुचिका की बनाई फ़िल्मों में टू ऑटोमन्स इन विशार्गो (एयू)डी), एवरी टाइम यू टेल अ स्टोरी, मालेगांव टाइम्ज़ और ML 05 B 6055 शामिल हैं. रुचिका ने साउंड और टेक्स्ट आधारित विधाओं पर भी काम किया है. वे खोज स्टूडियो, दिल्ली, पार्को आर्ट विवेंट एक्सपेरिमेंटल सेंटर फॉर कंटेम्परेरी आर्ट, ट्यूरिन और सेंटर फ़ॉर कटेंपरेरी आर्ट, उजाज़दोवसकी, वार्सो में आर्टिस्टिक रेसीडेंसी भी प्राप्त हुई है. रुचिका को 2016 में चार्ल्ज़ वालेस इंडिया ट्रस्ट की अल्पकालिक फ़ेलोशिप भी प्राप्त हुई थी. 2015-19 के बीच श्री अरबिंदो सेंटर फ़ॉर आर्ट्स एंड कम्युनिकेशन, नई दिल्ली में रुचिका ने क्रियेटिव डॉक्यूमेंटरी कोर्स पढ़ाया है. वे समय-समय पर सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी में भी फ़िल्म कोर्स का अध्यापन करती हैं. अंतिम नतीजों की बनिस्पत रुचिका को प्रक्रियाएं, पद्धतियां और माध्यम ज़्यादा भाते हैं.

निशा सुसान

परामर्श संपादक, डिजिटल स्ट्रेटजी और पार्टनरशिप्स

निशा सुसान एक लेखक और संपादक हैं. वे भारत, नाईजीरिया और ओमान में पली-बढ़ीं और अब बंगलोर में रहती हैं. वे दो पुरस्कार प्राप्त मीडिया कंपनियों ‘द लेडीज़ फिंगर’ और ‘ग्रिस्ट मीडिया’ की सह-संस्थापक हैं – वे आजकल मिंट लाउंज के लिए युवा (millennials), समय और धुन (obsessions) पर चीप थ्रिल्स नाम का कॉलम लिख रही हैं. वे ‘तहलका’ पत्रिका के लिए फीचर्स एडिटर और याहू ओरिजनल्स के लिए कमीशनड एडिटर रह चुकी हैं. उनके लेख (non-fiction) संस्कृति, जेंडर और राजनीति पर केंद्रित हैं. उनके द्वारा लिखी कहानियां (fiction) n+1, कारवां, पेंगुइन आदि में प्रकाशित हुई हैं. ये कहानियां ज़्यादातर उस निकटता और अजनबीपन पर केंद्रित हैं जो इंटरनेट अपने साथ भारत लाया है. लघु कथाओं का उनका पहला संकलन ‘द वोमेन हू फॉर्गॉट टु इनवेंट फ़ेसबुक एंड अदर स्टोरीज़’ अगस्त 2020 में प्रकाशित हुआ.

सादिया सईद

टेकनिकल हेड, संपादकीय संयोजक

सादिया लाइब्रेरी एंड इंफ़ोरमेशन साईंस में स्नातकोत्तर हैं. वे 2002 में निरंतर से लाइब्रेरियन के रूप में जुड़ीं. समय के साथ सादिया ने निरंतर प्रकाशन का कार्यभार भी अपने ऊपर ले लिया और प्रकाशनों के डिज़ाइन के साथ-साथ उनमें लेखन व संपादन से लेकर अनुवाद व प्रूफ़रीडिंग तक सभी काम करने लगीं. स्व-अध्ययन द्वारा कैसे नई नई क्षमताएं प्राप्त की जा सकती हैं कोई सादिया से सीखे. सादिया की नई, उभरती तकनीक में गहरी दिलचस्पी है. उन्हें हमेशा अलग−अलग सॉफ्टवेर और फॉन्ट से प्रयोग करते देखा जा सकता है. किसी भी फ़ूड डिलीवरी एप्प की वे शायद सबसे पसंदीदा ग्राहक हैं.

सुमन परमार

सीनियर कंटेंट एडिटर, हिन्दी

किताबों के चस्के की वजह से डीयू से लिट्रेचर में एमए करके आईआईएमसी से जनर्लिज्म किया. बातों के शौक की वजह से बिग एफएम रेडियो से करियर की शुरुआत की. दैनिक भास्तक के साथ जुड़कर फ़िल्म, कला और सामाजिक मुद्दों पर लगातार लिखती रहीं. रेडियो और प्रिंट में काम करने के बाद बीबीसी हिन्दी में डिजिटल मीडिया का ककहरा सीखा. राजकमल प्रकाशन में काम करते हुए किसी ख्याल को किताबों का अमली जामा पहनाना सीखा.

कई बेस्टसेलर किताबों का अनुवाद एवं संपादन किया है जिसमें देवदत्त पटनायक की किताब मेरी गीता और मेघना गुलज़ार की किताब वो जो हैं शामिल है. समय मिलने पर अपने यूट्यूब चैनल पर कहानियां सुनाना औऱ किताबों पर बातें करना सुहाता है. जेंडर, कल्चर और एजुकेशन से जुड़े मुद्दों पर काम करना अच्छा लगता है.

माधुरी अडवाणी

पोडकास्ट प्रोड्यूसर

माधुरी को कहानियां सुनाने में मज़ा आता है और वे अपने इस हुनर का इस्तेमाल महिलाओं के विभिन्न समुदायों और पीढ़ियों के बीच संवाद स्थापित करने के माध्यम के रूप में करती हैं. जब वे रिकार्डिंग या साक्षात्कार नहीं कर रही होतीं तब माधुरी को यू ट्यूब चैनल पर अपने कहानियों का अड्डा पर समाज में चल रही बगावत की घटनाओं को ढूंढते और उनका दस्तावेज़ीकरण करते पाया जा सकता है. समाज शास्त्र की छात्रा होने के नाते, वे हमेशा अपने चारों ओर गढ़े गए सामाजिक ढांचों को आलोचनात्मक नज़र से तब तक परखती रहती हैं, जब तक कॉफ़ी पर चर्चा के लिए कोई नहीं टकरा जाता.

शिवम् रस्तोगी

वीडियो प्रोड्यूसर, इमेज एडिटर   

शिवम एक फॉटोग्राफर और फिल्ममेकर हैं, वे लगातार कैमरा के पीछे से दुनिया और इसके विभिन्न रंगों को समझने की कोशिश करते रहते हैं. उन्होने इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से जर्नलिज़्म और मास कम्यूनिकेशन में स्नातक की डिग्री और जामिया मिलिया के मास कम्यूनिकेशन रिसर्च सेंटर से स्नाकोत्तर डिग्री हासिल की है. शिवम ने फिल्म कमपेनियन और मेमेसयस कल्चर लैब के साथ काम किया है. आप उन्हें इंस्टाग्राम पर अपनी रोज़मर्राह की खींची तस्वीरों को आर्काइव करते पा सकते हैं. उन्हें अपने बारे में थर्ड पर्सन में बात करना पसंद नहीं.

आस्था बाम्बा

शोधकर्ता और फ़ील्ड फैसिलिटेटर

हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक आस्था बाम्बा, लेडी श्रीराम कॉलेज के विमेन डेवलेप्मेंट सेल की कोर्डिनेटर भी रह चुकी हैं. आस्था ने, सीएसजीएस (CSGS), अशोका यूनिवर्सिटी, संगत – नारीवादी नेटवर्क और फेमिनिस्म इन इंडिया के साथ लेखक एवं शोधकर्ता के रूप में काम किया है. लगातार बिगड़ रही केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की हालात और नवउदारवादी बाज़ार के आगे घुटने टेकती हमारी शिक्षा नीतियों को देखते हुए, एक स्टूडेंट होने के नाते आस्था सभी के लिए समान अवसर एवं बराबरी की कल्पना करती हैं. आस्था, न्याय की कठोरता के विपरीत, सुधार और सामुदायिक जवाबदेही का अभ्यास करने के परिवर्तनकारी और नारीवादी तरीके सीखने में विश्वास रखती हैं. एक शोधार्थी होने के नाते वे न केवल नए विचारात्मक शोध में व्यस्त रहती हैं बल्कि आप उन्हें रसोई में भी प्रयोग करते देख सकते हैं.

रिज़वाना फ़ातिमा

हिंदी डेस्क, परफॉरमेंस आर्टिस्ट

रिज़वाना दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की छात्रा हैं. वे महिलाओं के लेखन पर उनके द्वारा किए जा रहे सफर के प्रभाव को समझने का प्रयास कर रही हैं. वे ‘रसचक्र’ का हिस्सा हैं – यह एक संगठन है जो महिला लेखन की पाठात्मक प्रस्तुतियां करता है. इसके तहत उन्होंने ‘हम ख़वातीन’, ‘हक़ीक़त और ख़्वाब’, ‘मोहब्बत ज़िंदाबाद’, ‘हर क़तरा तूफान’ की प्रस्तुतियां की हैं.

इसके अलावा केअर संस्था के साथ पाठ्य सामग्री निर्माण में सहायक संपादक के रूप में भी कार्य कर चुकी हैं. उनके लेख समय समय पर अलग-अलग पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

निरंतर में   

अर्चना द्विवेदी

निदेशक, निरंतर ट्रस्ट

अर्चना को जेंडर और शिक्षा के क्षेत्र में 18 साल का अनुभव है. वे निरंतर के नेतृत्व के अलावा, नारीवादी दृष्टिकोण से महिला सशक्तीकरण एवं युवाओं की शिक्षा के मुद्दों पर शोध और लेखन कार्य से भी जुड़ी रही हैं. अर्चना ने निरंतर द्वारा स्वयं साहित्य समूहों और शिक्षा पर राष्ट्रस्तरीय अध्ययन पर काम किया, जो एक अग्रणी अध्ययन था. रास्ट्रीय शिक्षा नीति और किशोरियों की शिक्षा नीति पर सरकार और सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर उन्होंने कार्य किया है. कमज़ोर तबक़ों की महिलाओं और लड़कियों के साथ ज़मीनी काम ने अर्चना के काम को मज़बूती प्रदान की है. वे ज़मीनी संगठनों तक शोध की पहुंच बनाने में यक़ीन रखती हैं; इस तरह, उनके इस यक़ीन से प्रशिक्षकों, ज़मीनी कार्यकर्ताओं और संगठनों के परे भी ट्रेनिंग तथा पाठ्य सामग्री पहुंचाना संभव हुआ.

निरंतर बोर्ड

रेणुका मिश्रा

रेणुका मिश्रा को दिल्ली विश्वविध्यालय से सोशल वर्क में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त है. इंग्लैंड में मानसिक रोगियों के साथ सामाजिक कार्य करने के बाद रेणुका राजस्थान विश्वविध्यालय के प्रोढ़ शिक्षा विभाग में अध्यापन कार्य किया. 1976 में उन्होंने विकास संबंधी मुद्दों पर द्विभाषीय पत्रिका ‘हाउ’ निकाली. ‘हाउ’ के प्रकाशन के दौरान आपने देश भर के ग़ैर सरकारी संगठनों से व्यापक संपर्क साधा. यूनिसेफ़ के लिए सेंडिट के सहयोग से रेणुका ने महिलाओं एवं सशक्तिकरण पर 12 एपिसोड वाला सीरियल बनाया. ‘एक्शन इंडिया’ के लिए एक दशक से भी ज़्यादा समय तक , दिल्ली के मेहरौली क्षेत्र में पत्थर खदानों और खेतिहर मज़दूरों को संगठित करने का काम रेणुका ने किया. वे महिला समाख्या कार्यक्रम में प्रशिक्षक रिसोर्स पर्सन एवं मूल्यांकनकर्ता के रूप में जुड़ी रही हैं. वे निरंतर की फाउंडर मेंबर हैं और नव साक्षर औरतों के लिए ब्रॉडशीट्स विकसित करने, कंटीन्यूइंग एजुकेशन में नए-नए प्रयोग और ग्रामीण सीखने सिखाने वालों के लिए स्वास्थ्य पाठ्यक्रम बनाने के काम से नज़दीकी से जुड़ी रही हैं.  फ़िलहाल वे वैदिक ग्रंथों संबंधी अपनी समझ बढ़ाने और इस विषय के संस्कृत विद्वानों से संपर्क मज़बूत कर रही हैं.

सरोजिनी नादिमपल्ली

सरोजिनी नादिमपल्ली पिछले तीन दशक से सार्वजनिक स्वास्थ्य और महिला स्वास्थ्य के मुद्दों पर काम कर रही हैं. वे सार्वजनिक स्वास्थ्य, मानव अधिकार और पार्शवीकरण पर काम करने वाले समा रिसोर्स ग्रुप फॉर वीमेन एंड हेल्थ की संस्थापकों में से एक हैं. सरोजिनी जन स्वास्थ्य अभियान की राष्ट्रीय सह-संयोजक तथा जेंडर जस्टिस सर्कल ऑफ़ पीपुल्स हेल्थ मूवमेंट ग्लोबल की संयोजक भी हैं. उन्होंने पिछले दो दशकों के दौरान स्वास्थ्य व्यवस्था, मेडिकल और प्रजननीय तकनीकी पर कई अध्ययनों, जांच-रिपोर्टों, परामर्श, पहलों, संघर्ष एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य, दवाइयों तक सभी की पहुंच बनाने और क्लिनिकल रिसर्च में नैतिकता तथा हाल ही में कोविड-19 और कमज़ोर तबक़ों पर इसके प्रभाव की पहलों को नेतृत्व प्रदान किया है. फ़िलहाल सरोजिनी राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति का हिस्सा हैं. यह समिति कोविड-19 महामारी का मानव अधिकार और भविष्य की प्रतिक्रिया पर प्रभाव का आकलन कर रही है.

मालिनी घोष

मालिनी घोष निरंतर की संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. वे क़रीब तीस वर्षों से शिक्षा एवं महिला अधिकारों के क्षेत्र में विभिन्न भूमिकाओं में काम कर रही हैं, जैसे – ज़मीनी कार्यकर्ता, ट्रेनर, पाठ्यक्रम व पाठ्य सामग्री विकासक, शोधकर्ता और एक्टिविस्ट. मालिनी ने महिलाओं के लिए कई नायाब शिक्षा कार्यक्रम डिज़ाइन और लागू किए हैं. सरकार के कार्यक्रमों की समीक्षा करती रही हैं तथा ग़ैर सरकारी संस्थाओं को ‘शिक्षा के अधिकार’ के विषय में जेंडर और शिक्षा को लेकर सुझाव भी दिए हैं. वे महिला समाख्या कार्यक्रम के लिए नेशनल रिसोर्स ग्रुप की सदस्या होने के साथ-साथ 2005 से 2008 के बीच एनसीआरटी की (मिडिल और सेकेंडरी स्कूल) पॉलिटिकल साइंस टेक्टबुक्स पाठ्य पुस्तक लेखन समिति का भी हिस्सा रही हैं. उनके लेख इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीक्ली, द इंटेरनेशनल रिव्यू ऑफ़ एजुकेशन एंड जेंडर और डेवेलपमेंट में छपते रहे हैं. फ़िलहाल मालिनी यूनिवर्सिटी ऑफ़ गोटिंजन, जर्मनी से पीएचडी कर रही हैं.

सारदा बालागोपालन

सारदा बालागोपालन रुगर्स यूनिवर्सिटी, केमडन में चाइल्डहुड स्टडीस में सहायक प्रोफ़ेसर हैं. सारदा शिक्षा और मानव शास्त्र में प्रशिक्षित हैं. वे कमज़ोर तबक़ों के बच्चों के जीवन को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष में देखती हैं और इस तरह बचपन को लेकर प्रभुत्वशाली समझदारी और सामाजिक रूप से वर्जित धारणाओं के तर्कों को चुनौती देती हैं, जो अक्सर मानवतावादी हस्तक्षेप के गर्भ में छिपा होता है. सारदा का शोध मोटा-मोटी उत्तर औपनिवेशिक बचपन पर केंद्रित है. यह शोध हाशियों पर जीवन बसर कर रहे बच्चों के अनुभवों के इर्द गिर्द घूमता है. उनका शोध का फोकस अनिवार्य स्कूली शिक्षा, श्रम, कौशल विकास और नागरिकता की शैक्षणिक पद्धति और बच्चों के अधिकारों पर हैं. भारत में प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव लाने के लिए हस्तक्षेप करना भी सारदा के शोध का मक़सद है. 2005 से 2008 के बीच सारदा भारत सरकार के मिडिल स्कूल की ‘सोशल एंड पॉलिटिकल लाइफ’ (पहले सिविक्स) पाठ्य पुस्तकों के लिए मुख्य सलाहकार थीं. वे इनहैबिटिंग चाइल्डहुड: चिल्ड्रेन, लेबर एंड स्कूलिंग इन पोस्टकोलोनिअल इंडिया (पालग्रेव, 2014) की भी लेखिका हैं. कई पत्र−पत्रिकाओं में जैसे चाइल्डहुड, चिल्ड्रनस ज्योग्रफ़िज़, कंटेम्पररी एजुकेशन डायलोग तथा फ़ेमिसिट थियोरि, इत्यादि में भी वे प्रकाशित होती रही हैं. फ़िलहाल वे चाइल्डहुड पत्रिका की संपादक हैं. रुगर्स यूनिवर्सिटी जोईन करने से पहले वे बतौर एसोसियेट फ़ेलो नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलेपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के साथ जुड़ी हुई थीं.

इंटर्नशिप, कुछ कदम हमारे साथ

द थर्ड आई का इनटर्नशिप कार्यक्रम नारीवादी नज़रिए से कला, लेखन, सीखने-सिखाने के तरीकों के विकास की प्रक्रिया को नज़दीक से दिखाता है. इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कम से कम 3 महीने की प्रतिबद्धता ज़रूरी है. किसी भी उम्र और शैक्षिक योग्यता के व्यक्तियों/फोल्क्स का स्वागत है.

हमारे इनटर्न

सिरिजा यू, आर्या पाठक, नम्रता मिश्रा, नंगसेल शेर्पा, आचल दोदिया, अनिशा, चैताली पंत

इस लेख का अनुवाद राजेन्द्र नेगी ने किया है.

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