हम का गाय बैल हैं?

कहानियों के ज़रिए सामाजिक रिश्ते की ख़ूबसूरती और खोखलेपन दोनों को ज़ाहिर करने की कोशिश.

चित्रांकन: आकृति अग्रवाल

पटना में रहनेवाली स्वाती को कहानियां सुनना-सुनाना पसंद है. वे रोज़मर्रा की ठेठ कहानियों को अपने बिहारी तड़के के साथ हमारे सामने ला रही हैं. स्वाती इन कहानियों के ज़रिए कुछ बेड़ियों को टटोलती हैं और उन्हें चुनौती देती हैं.

बिहार में अक्सर जब कोई लड़की ब्याह कर ससुराल आती है तो वो जया, सुषमा, अनीता के नाम से नहीं पहचानी जाती बल्कि वो दरभंगा वाली, मुज़फ्फरपुरवाली, बेगूसराय वाली, पटनावाली जैसे नामों से जानी जाती हैं. सिर्फ़ नाम ही नहीं कई बार मर्ज़ी से बाहर घूमनेवाली औरतों को परकट्टी, बलकट्टी जैसे नामों से नवाज़ा जाता है. संस्कारों और रीति-रिवाजों को न मानने वाली औरतें हमारे समाज में कोई रहस्यमयी गुत्थी की तरह चर्चा का विषय होती हैं.

इन्हीं रहस्यमयी चरित्रों से जुड़े क़िस्सों और चहमीगोईयों के लिए पटनावाली के साथ बने रहिए.

कहानी यहां सुनें : 

कहानी शुरू करने के पहले हम आपको बता दें कि इस कहानी में दो किरदार हैं. एक है रिंकी, दूसरी हैं फूलो चाची. 24 बरस की रिंकी की सबसे ख़ास बात ये है कि वो किसी की भी बात का कोई कर्ज़ा नहीं रखती है. मतलब एक हाथ दे तो दूसरे हाथ ले. लोगों के ज़हर भरे बाण को बिल्कुल उसी अंदाज़ में वापस कर देती है. कहनेवाले कहते हैं कि वो कांटों भरी गुलाब की छड़ी है. उसकी हाज़िरजवाबी के कई लोग क़ायल हैं और कई लोग घायल भी. ख़ुद पढ़ाई-लिखाई से आज़ाद है पर अपने दो बच्चों को पढ़ाने के लिए लोगों के घरों में काम करती है.

इस कहानी की दूसरी किरदार हैं- फूलो चाची. इन्हें गली के हर घर के बारे में जानना ज़रूरी है. ये पता करने के लिए वो हर घर में कान लगाए तो रख सकती नहीं हैं तो उन घरों में काम करने वालियों से पूछताछ करती रहती हैं.

तो हुआ ये कि उस दिन रिंकी घर आई तो कहने लगी, ” जानते हैं दीदी, कल आपके हियां से काम करके निकले न त फूलो चाची भेंटा गई.” यहां रिंकी और चाची के संवाद को हम जस का तस आपके सामने रखते हैं और बुनते हैं:

“आएं रे रिंकी तोहर दीदी के नाम का है?”

“कउन दीदी चाची.”

“उहे जिनकर हियां काम करती हो.”

“ऊ sss सवाती.”

“पूरा नाम न बताए का चाही. पूरा नाम का हय?”

“पूरा नाम! का जाने गए चाची सब्भे कोई कच्छप कश्यप..अइसे ही कुछ बोलता है.”

“कश्यप! आ ऊ मुसलमान हो गई!”

“हय चाची! हम्मर दीदी मुसलमान काहे हो जाएगी?”

“मुसलमाने न हो गई रे. न सिंदूर लगाती है न बिंदी लगाती है… आ न मंगलोसूत्र पहनती है .. त मुसलमाने न हो गई.”

“ए चाची! मुसलमान हो जाएगी त नाक में कुच्छो पहिनेगी न! उ त नाको में कुच्छो न पहनती है.”

“काहे रे रिंकी! काहे न कुच्छो पहिनती है?”

“सब्भे कोई त हमसे इहे बतवा पूछता है…उ हमरा मकान में एक रोज आई थी. हम बीमार पड़ल थे न तब आई थी. जब उ भेंट करके चल गई तब हुआं के औरत सब दीदी पर हंसे लागी. सब बोले लागी कि कईसन मर्दाना जईसन रहती है. त हम बोले कि हम्मर दीदी कहती है कि अईसन साज सिंगार त गाय-बैल का किया जाता है, हम लोग कोनो गाय आ बैल हैं? इ बतवा सुन के सब्भे औरत फिर से हंसे लागी. पर जौन बूढ़ी नानी है सो बोली—बतवा त सहिए कहती है…कहीं नाक छेदायल है कहिओं कान छेदायल है…आदमी न हैं हम लोग ढोर-डांगर हैं.”

“कहिओ न कुच्छो पहिनती है?

“कहिओ-कभार मन करता है त कान में पहिन लेती है. पर उहो अप्पन मन से… कहती है कोनो बाहर वाला हम्मर मन काहे चलाएगा? ओकरा मन करता है त उ पहने, उ हमको काहे पहनाएगा? कहती है अप्पन मन से कुछ करे का न होता त इ मन हमरा सब के मिलता काहे?”

“मंगलोसूत्र न पहनती है?”

“हमसे एक दिन पूछे लागी कि हम मंगलसूत्र काहे पहनते हैं? हम कहे कि एकरा पहिने से पति का सुरक्षा होता है. दीदी सुन के हंसे लागी. बोली कि

तुमरा पति अप्पन सुरक्षा के लिए अपना गला में खुद्दे काहे न मंगलसूत्र पहनता है? तुमको बंधक काहे बनाया है? आ खाली पति का सुरक्षा जरूरी है? पत्नी का नहीं है?

तुम्हारा सुरक्षा के लिए तुम्हारा पति अप्पन गला में मंगलसूत्र काहे न पहिनता है? औरत सब पूजा का थाल लेके पति का आरती उतारती है. मन्नत मांगती है कि सात जनम तक इहे पति मिले…कौन पति है जी जो थाल लेके अप्पन पत्नी का पूजा करता है? आ इ मन्नत मांगता है कि सात जनम तक इहे बीवी मिले? उ सब त इहे जनम का गारंटी न लेता है…उपवास करल करल पत्नी सब बेदम रहती…आ मान लो उपवास करना बहुते जरूरी है त इ नियम काहे न बना कि 12 घंटा के उपवास में 6 घंटा पति करेगा आ 6 घंटा पत्नी…ओ दिन इ सब बतवा सुन के हम त सोचे लागे थे कि हमहूं इ सब काहे पहनते हैं?”

“करवा चौथ का बरत भी न करती है?”

“उ त उ, हमहूं न करते हैं चाची. एक बार किए थे. ओही दिन इ जूत्ता से हमको मारे थे. हम बोले बक साला हम तुमको भगवान् मान के पूज रहे हैं आ तुम अपना भक्त को मार रहे हो, उ भी जूत्ता से. हम अब कहिओ सहने-फहने का काम न करेंगें. होना त इ चाहिए कि पति पत्नी का आरती उतारे…काहे कि औरत दुर्गा है, लक्ष्मी है…भगवान् है! त ले लोटा तुम भगवाने से पूजा करा रहे हो. काहे?”

"पत्नी उमर में छोट होत है रे रिंकी त उसका पति आरती कईसे उतारेगा?" "ऐ चाची. बड़ा उमर के लड़की से सादी करा दीजिए... सब झंझटे खत्तम...तब पति को पत्नी का पैर छुए में कोनो दिक्कत न न होगा?

आ दूसरा बात इ कि भगवान् का कोनो उमर होता है का? जब भगवान का कोनो उमरे नहीं होता है त बड़ा का आर छोटा का!”

“आएं रे रिंकिया! तुम समाज को पलटे चली हो का?”

” ए चाची. हमनी जइसन से कहियो समाज पलटता है? बाकी ई समाज को पलटे का तो चाहिए न चाची!’

पटना में रहनेवाली स्वाती को कहानियां सुनना और सुनाना पसंद है. इन कहानियों में समाजी रिश्ते के ताने-बाने को, उसकी विविध छटाओं को वे सामने लाती हैं. इन्हें आप मनबताशा ब्लॉग और यूट्यूब चैनल पर भी पा सकते हैं. उनके बिहारी अंदाज़ में ऐसी ही कुछ कहानियां पेश हैं.
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