तोरणमाल के जंगल से आया एक प्रेमपत्र -1

एक पर्यावरण कार्यकर्ता का सवाल है कि जंगल में जीने वाले बच्चे ’जंगल-बुक’ पढ़ने वाले बच्चों की रेस में कैसे उतरेंगे?

फ़ोटो साभार: प्रकाश रणसिंह

प्रकाश रणसिंह, द थर्ड आई सिटी संस्करण के ‘ट्रैवल लोग’ फैलोशिप का एक हिस्सा हैं. शहर को देखने की हमारी इस यात्रा का एक बड़ा हिस्सा हमारे 13 ट्रैवल फेलो हैं जिनके ज़रिए हम भारत के अलग-अलग कोने से शहरों, कस्बों और गांवों के उनके अनुभवों एवं नज़रियों को जानने और समझने की कोशिश कर रहे हैं. 

महाराष्ट्र के नन्दुरबार ज़िले के पहाड़ी क्षेत्र में बसे जंगलों में घूमते हुए प्रकाश ने वहां के लोगों के साथ जिस जीवन को करीब से देखा और जिसे वहां के रहने वालों के साथ जिया उसे एक ख़ूबसूरत सी चिट्ठी में अपने शब्दों के ज़रिए हमारे सामने जीवंत कर रहे हैं.

प्रिय…,

यह ख़त जब तुम्हें मिलेगा तब सुबह होगी, शाम, या दोपहर – पता नहीं, लेकिन जब भी मिलेगा तब अपनी गैलरी में जो टहनी आती है, उसके नीचे आकर बैठ जाना. आगे बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें होंगी, बस्तियां होंगी, शहर के विकास के बैनर होंगे, सिग्नल होंगे. वह टहनी मेरी बात, मेरी जंगल वाली बात, तुम तक पहुंचाने में शायद मददगार साबित होगी.

मेरी हमेशा से एक चाहत थी कि जंगल को जीना चाहता था. मैं जंगल का अनुभव लेना चाहता था. उसके सहजीवन को महसूस करना और वहां के जो मूल्य हैं उनको अपनाने की कोशिश करना चाहता था. अब मैं इन सबके किनारे पर खड़ा हूं…

जैसे कि तुम्हें पता ही है, पिछले कुछ महीनों से मुझे नंदुरबार जिल्हे में स्थित तोरणमाल और उसके आसपास के लगभग 12 गांव में काम करने का मौका मिला है. हां, वही तोरणमाल जो एक हिल स्टेशन और वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी भी है. अगर, गूगल पर तोरणमाल लिखो तो ये जानकारी आसानी से मिल जाएगी.

फ़िलहाल में इस वातावरण में घुल-मिल रहा हूं. यहां बहुत ठंडी हवा चलती रहती है. सुबह पूरा कोहरा भरा रहता है. मेरे लिए यह सब नया है. और मैं भी इस वातावरण और यहां के लोगों के लिए अजनबी हूं… लेकिन आदत हो जाएगी! शुरुआती दिनों में मैंने ख़ुद को यहां उपरा समझा – मैं इधर का नहीं हूं, मैं यहां घुलमिल नहीं सकता, ऐसी भावना हर वक़्त मेरे दिमाग में रहती है. लेकिन जब मैं साग के झाड़ से एकाध पत्ता टूट कर ज़मीन पर गिरता देखता हूं, तब मेरी यह भावना भी चली जाती है.

मैं थोड़ा-थोड़ा जंगल को समझने लगा हूं. आप जंगल को जितना जानोगे उतना ही जंगल के लोग समझ आते जाएंगे. तुम्हें याद है, हम बस में नागपुर से वर्धा जा रहे थे? तब साग का जंगल दिखाई दे रहा था. हरा साग! कितनी शांति थी वहां... वही शांति यहां भी है. हां, ये सफ़र थोड़ा अलग है.

रास्ते से गुज़रते हुए तुम्हारी याद तो बहुत आई. सोचा तुम सफ़र में साथ नहीं हो, लेकिन मैं तुमको मेरा सफ़र शब्दों में तो बता सकता हूं. तो मैं तुम्हें पहले जंगल के गांव में ले चलता हूँ.

अप्रैल का महीना था जब मैं पहली बार नंदुरबार से होते हुए शहादा आया और शहादा से तोरणमाल पहुंचा. वैसे नंदुरबार जिल्हा गुजरात, मध्य प्रदेश, और महाराष्ट्र – इन तीनों राज्यों की सीमा पर है. महाराष्ट्र में जैसे ही उत्तर नासिक, धुले पार करते ही नंदुरबार जिल्हे की शुरुआत होती है तो दूर से ही सतपुड़ा पर्वत की पर्वतमाला दिखाई देती है. नंदुरबार का ऊपर वाला हिस्सा सतपुड़ा से घिरा हुआ है, और नर्मदा नदी इस पर्वतमाला से गुज़रते, गुज़रते जाती है. हां, वही “नर्मदा बचाओ आंदोलन” वाली नर्मदा!

तोरणमाल उसी सतपुड़ा की पर्वतमाला और नर्मदा के परिसर का हिस्सा है. रास्ता जंगल से गुज़रते हुए ऊपर पहाड़ियों पर तोरणमाल की ओर जाता है. रास्ते के दोनों तरफ़ घना जंगल है. साग, बांबू, खैर का जंगल. चारों ओर हरियाली है लेकिन जैसे-जैसे साग के पत्ते गिरने लगते हैं, वैसे-वैसे जंगल के अंदर की बस्तियां दिखाई देने लगती हैं. इस हरियाली के अंदर, बंजर बस्तियां रहती हैं. रास्तों पर उजाला और अंदर घना अंधेरा है. इसी अंधेरे से, किसी नाटक की तरह, पात्र निकलकर, एक-एक कर मेरे सामने आने लगे…

लोग रास्तों पर आ रहे हैं. लोग समूहों में रास्ते के किनारे बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं. अपने सर से लकड़ियों का बोझ रास्ते के किनारे पर रखकर, महिलाएं आती-जाती गाड़ियों को गौर से निहार रही हैं. साथ में खाने का सामान बंधा हुआ है. पुरुष साथ बैठे चर्चाएं कर रहे हैं. यह सारे काफिले किधर निकले होंगे?

कुछ गांवों के पाड़ों पर कारभारी से पूछा तो पता चला कि आजकल सारे लोग मध्य प्रदेश, गुजरात, और पूना, नाशिक जैसे शहरों में काम के लिए स्थलांतर कर रहे हैं. शहर से कुछ लोग आते हैं और लाखों लोगों को गाड़ियों में बिठाकर मज़दूरी के लिए ले जाते हैं. काम किसी भी प्रकार का हो सकता है. ज़्यादातर गन्ने की खेती में ही काम होता है. लोग हर साल नवंबर में निकलते हैं और मार्च में होली के लिए घर आते हैं क्योंकि पूरे आदिवासी तबके में होली का त्योहार बड़े जश्न और धूम-धाम से मनाया जाता है. तोरणमाल के इस इलाके में पावरा आदिवासी जमात के लोग हैं, तो होली के दिन नाचना, गाना, बजाना सब होता है.

नवंबर से मार्च के दौरान पूरी बस्तियां, पाड़े, गांव खाली नज़र आते हैं. एकाध घर के सामने, घर के बूढ़े-बुज़ुर्ग दिखाई देंगे. इसी विषय पर मैंने संदीप से बात की. संदीप यहां लोगों के कुछ कागज़ी काम करता है, इसलिए संदीप की हर बस्ती और पाड़े में पहचान है. मैंने संदीप से पूछा “ये सब लोग काम के लिए बाहर क्यों जाते हैं? इतना जंगल है. हरियाली भरी ज़मीन है.”

तो संदीप बोला, “सर, जंगल लोगों का था, अब नहीं रहा. अब जितना सरकार से वनपट्टा मिलेगा सिर्फ उतना ही हमारा है. उसमें भी सुधार नहीं ला सकते हैं. और ज़मीन है भी तो कैसी है! पहाड़ी के उतार-चढ़ाव पर है सब, जहां न अच्छी फसल लगती है, न फसल को ठीक से पानी दे पाते हैं.

इसी कारण काम के लिए घर छोड़ना पड़ता है. और अभी तो यह जंगल मज़दूरों का अड्डा बन गया है, जहां से ठेकेदार उन्हें ले जाते हैं.”

तुम्हें बताऊं अभी मैं इस प्रोसेस को नज़दीक से देख रहा हूं. इस ठेकेदारी में महिलाओं पर बहुत बुरा असर होता है. उनको दोहरे काम का ज़िम्मा उठाना पड़ता है. ठेकेदार ने पति और पत्नी दोनों के पैसे दिए होते हैं. तो काम की जगह खुद को एडजस्ट करना, फिर घर के काम करना और फिर ठेकेदार का काम करना – इस तरह दो-तीन भूमिकाएं महिलाओं को निभानी पड़ती है. अगर वे गर्भवती भी होती हैं, तो भी उनको काम के लिए बाहर जाना पड़ता है. इसी कारण उनको कई महीनों किसी भी तरह की स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलती है.

मैं किसी बस्ती से गुज़रता हूं, तो कोई कुपोषण से घिरा बच्चा घर के सामने धूप में खटिया पर पड़ा होता है. तब लगता है हमारी अन्न सुरक्षा कहां घूम रही है? किसी महानगर में या भारत-पाक की सीमा पर? क्या कभी अन्न सुरक्षा यहां तक पहुंच पाएगी? तुम्हें सच बताऊं उन बच्चों को देखकर यहां से भागने का मन करता है. तब लगता है यह दुनिया जैसी भी हो जल्द से जल्द बदल देनी चाहिए. अब दुनिया बदलने के तरीक़े भी अलग-अलग हो सकते हैं. जैसे मुझे लगता है यह चित्र बदलना चाहिए, किसी और को नहीं भी लग सकता है. जैसा कि तुम हमेशा कहते हो – हर बात सब्जेक्टिव होती है! ठीक वैसे ही.

मैं जब फ़ॉरेस्ट ऑफिसर से मिला तो उसका कहना था – यह लोग अनपढ़ हैं. इनको जंगल को बचाना ज़रुरी नहीं लगता. जंगल में खेती करते हैं. झाड़ तोड़ते हैं. मुझे समझ नहीं आ रहा कि जो लोग जंगल को अपना घर समझते हैं, अपना धर्म समझते हैं, उनके बारे में ऐसा क्यों बोला जा रहा है? बाकी लोग तो पेड़ों को काटकर कंपनियां खड़ी करते हैं. वे देश को तरक्की की तरफ ले जा रहे हैं, ऐसा कहा जाता है. इसके विपरीत अगर आदिवासी कुछ ज़मीन खेती करने के लिए जोह रहा है, तो वह अशिक्षित है! गज़ब सोच है यहां की.

जो लोग सिर्फ जंगल में रहकर पेट भरते हैं, और अभी से नहीं बल्कि पुरखों से यहां रहते आए हैं, उनसे जंगल और पर्यावरण को ख़तरा है? अपने पुरखों की ज़मीन अपने नाम कराने के लिए, वनपट्टा के लिए, एक पूरी पीढ़ी खत्म हो रही है. ज़रूरी कागज़ात के लिए चक्कर लगाते-लगाते किसी की पूरी उम्र गुज़र गई. अब उनकी आगे की पीढ़ियां चक्कर लगा रही हैं.

उनको भी इस बात की ख़बर नहीं कि ज़मीन मिलेगी या फिर एक और उम्र बीत जाएगी. ऐसी हालत है. मैं यह सभी बातें देखकर हैरान हूं, परेशान हूं. कभी-कभी मन करता है कि इनकी सारी परेशानियां एक पल में ख़त्म कर दूं, लेकिन अगले ही पल खुद को बेबस पाता हूं. और यही बात अंदर ही अंदर मन को कुरेद रही है…

यहां रहकर मुझे एक बात समझ आई कि बहुत सारे बच्चे स्कूल नहीं जाते. इसके अलग-अलग कारण हैं. स्थलांतर की वजह से स्कूल छोड़ने का प्रमाण भी हद से ज़्यादा है. और चौंकाने वाली बात तो यह है कि सरकारी दफ़्तरों में उनकी अनुपस्थिति नहीं दिखाई जाती. मतलब कानूनी रूप में सभी बच्चे हर रोज़ स्कूल जाते हैं. जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है. इस प्रकार की हालत यहां की शिक्षण व्यवस्था की है. मेरा बस यही एक सवाल है कि कैसे जंगल में जीने वाले बच्चे ’जंगल-बुक’ पढ़ने वाले बच्चों की रेस में उतरेंगे? ऐसे ही बहुत सारे सवालों का जंगल मेरे सामने है और मैं सिर्फ प्रश्नों को निहार रहा हूं…

ये खूबसूरत पहाड़ी, अब खूबसूरत नहीं लगती. ये सारे झरने, तालाब, नदियां प्रश्नों से भरे हुए लगते हैं. सूर्यास्त भी अब कटघरे में खड़ा दिखाई देता है.

हम हमेशा बहुत सारी विचारधाराओं पर चर्चा करते थे. हमारे बहुत सारे मतभेद रहे. पर अभी राशन के लिए, बच्चे को छाती से लगाकर, एक पूरा पहाड़ चढ़ती औरतों को देखता हूं तो सारी विचारधाराएं शून्य लगती हैं. और मैं सिर्फ दर्शक बन कर रह जाता हूं.

कभी-कभी सोचता हूं, ये लोग इतनी पीड़ा सहन करके भी यहीं क्यों रहते हैं? लोग पहाड़ को नहीं छोड़ते. उनका धर्म और कर्म पहाड़ हैं. अगर देशभक्ति मिट्टी के प्यार पर मापी जाती, तो ये लोग सबसे ऊपर होते. देशभक्ति इस तरह से नापने की संकल्पना यहां नहीं है, यह बड़े दुख की बात है.

मैं भी धीरे-धीरे पहाड़ चढ़ना, उतरना, जंगल घूमना, सीख रहा हूं. लोग बड़े प्यारे हैं. मैं उनके साथ घुलमिल रहा हूं. तोरणमाल के एक तरफ घना जंगल है और दूसरी तरफ बंजर ज़मीन. मैं अब बंजर ज़मीन पर आशाएं लेकर खड़ा हूं. शायद जंगल में कोई परिवर्तन का बीज उग आएगा.

आपकी बहुत याद आती है. जल्द ही आपसे मिलना है.

प्रकाश.

तोरणमाल के जंगल से.

दूसरा पत्र यहां पढ़ें.

प्रकाश रणसिंह पूना में सावित्रीबाई फूले यूनिवर्सिटी से अंगेज़ी साहित्य के छात्र हैं. हाल ही में उन्होंने मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र की सीमा से लगे एक गांव, तोरणमल में एक प्रोजेक्ट पर काम ख़त्म किया है. प्रकाश, हिन्दी और मराठी भाषा में लेखन करते हैं और सप्ताह के अंत में गांव के आस-पास की प्राकृतिक सुन्दरता को कैमरे में क़ैद करना पसंद करते हैं.

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