तोरणमाल के जंगल से आया एक प्रेमपत्र – 2

पुरुषों का देश, पुरुषों का गांव, पुरुषों का शहर और घर भी पुरुषों का ही है फिर महिलाओं का क्या है?

फ़ोटो साभार: प्रकाश रणसिंह

प्रकाश रणसिंह, द थर्ड आई सिटी संस्करण के ‘ट्रैवल लॉग’ फैलोशिप का एक हिस्सा हैं. शहर को देखने की हमारी इस यात्रा का एक बड़ा हिस्सा हमारे 13 ट्रैवल -फलो हैं जिनके ज़रिए हम भारत के अलग-अलग कोने से शहरों, कस्बों और गांव के उनके अनुभवों एवं नज़रीये को जानने और समझने की कोशिश कर रहे हैं. महाराष्ट्र के पहाड़ी क्षेत्र में बसे जंगलों में घूमते हुए प्रकाश ने वहां के लोगों के साथ जिस जीवन को करीब से देखा उसे अपने शब्दों के ज़रिए हमारे सामने जीवंत कर रहे हैं.

प्रिय….

तोरणमाल के उत्तर में, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर, सिंदीदिगर गांव है. यह गांव तोरणमाल से 15 किलोमीटर की दूरी पर बसा है. यहां पहुंचने के लिए कई छोटे-बड़े घाटों को पार करना पड़ता है. इन्हीं दो राज्यों की सीमा से होते हुए एक छोटी सी नदी झलकर भी बहती है. असल में गांव के लोग मानते हैं कि इस नदी की वजह से ही यहां दो सीमाएं स्थित है, या बनी हुई हैं.

मोटरसाइकिल से सिंदीदीगर जाना बहुत ही मुश्किल है. मैं तो एक-दो बार जाते वक्त गिर भी गया था, लेकिन अच्छी बात यह है कि मुझे ज़्यादा चोट नहीं पहुंची. ग्राम पंचायत के आंकड़ों के अनुसार गांव की लोकसंख्या 1800 के आसपास होगी. पांच-छह तबकों को मिलाकर यह एक गांव बना है.

वैसे तो इस गांव की अपनी स्वतंत्र पंचायत नहीं है, तोरणमाल में ही सब पंचायतों के काम होते हैं. यहां के गांववालों का कहना है कि सिंदीदिगर के लोग मध्यप्रदेश से आकर यहां बसे हुए हैं. उनका यहां आने का मकसद सिर्फ काम था. वे जंगल से पेड़ काटने के लिए यहां आते थे, और वापस पैदल अपने गांव जाने में उन्हें दो-चार दिन लग जाते थे. तो बस इसी वजह से वे धीरे-धीरे यहीं रुकने लगे, फिर यहां खेती करने के लिए जमीन भी हासिल की और यहीं बसेरा करने लगे.

मुझे पता है तुम यही सोच रही होगी कि इस गांव के बारे में मैं तुम्हें इतना क्यों बता रहा हूं! तुम क्या करोगी यह सब जानकर! तो, मामला यह है कि हमने एक बार मिलकर एक कल्पना की थी – एक अलग देश की. अब सोचो देश के दो भाग होंगे तो? यानी देश के टुकड़े नहीं, बस दो हिस्से. हां…तो बात यह है कि हमने एक प्रांत की बात की थी, जिसमें एक हिस्सा सिर्फ महिलाओं का होगा और दूसरा सिर्फ पुरुषों का होगा. कुछ याद आया? कितना हास्यास्पद है ना! उस वक्त हम कुछ भी सोचते थे, बोलते थे… ये दो हिस्सों वाली बेतुकी बात मैंने ही की थी. याद है तुमको?!

लेकिन यही बात मुझे अब सिंदीदिगर में दिखाई दी.

मैंने देखा यहां सिर्फ़ पुरुषों का वर्चस्व है. पुरुषों का देश, पुरुषों का गांव, पुरुषों का शहर और घर भी पुरुषों का ही है. दिल को अस्वस्थ करने वाली बात यह है कि, महिलाओं का न गांव दिखा, ना शहर, और ना ही घर. महिलाओं का यहां पर किसी भी क्षेत्र में कोई भी नामोनिशान नहीं है.

पहले दिन जब मैं सिंदीदिगर पहुंचा तो, मुझे आंगनबाड़ी जाकर वहां आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से मिलना था. गांव में रास्ते के किनारे पर कुछ घर थे. मैंने एक घर के बाहर से आवाज़ लगाई, “घर में कोई है?” मेरी आवाज़ सुनकर एक अधेड़ उम्र की महिला चेहरे पर घूंघट लिए दरवाज़े की चौखट तक आई. मैंने पूछा, “यहां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता का घर किधर है? मुझे उनसे मिलना है.” वह महिला कुछ भी ना कहते हुए बस खड़ी रही. मैंने मन ही मन सोचा कि शायद मेरी हिंदी उनको समझ नहीं आई. इसलिए मैंने फिर से मराठी में पूछने की कोशिश की. लेकिन उस औरत के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला. वह वैसे ही अंदर चली गई. सोचा घर में से किसी को बुलाकर लाएगी, इस उम्मीद से मैं थोड़ी देर दरवाज़े पर इंतजार करता रहा, लेकिन ऐसी हलचल न देख मैं वहां से चला गया.

फिर थोड़ी दूर चलने पर मैंने फिर एक घर के सामने आंगन में मशेरी लगाते हुए बैठी एक औरत को देखा, जिनके आसपास चार-पांच बच्चे खेल रहे थे. मैं उनके पास गया और पूछा कि मुझे आंगनबाड़ी में जो ताई होती हैं उनसे मिलना है. क्या आप बता सकती हैं कि उनका घर किधर है? उन्होंने घूंघट हल्का सा सरकाया, मुंह में जो मशेरी थी, उसको थूकते-थूकते एक बच्चे को गोद में उठाया, और अंदर चली गईं. अंदर से सिर पर गमछा बांधे हुए एक आदमी बाहर आया. शायद महिला ने उसको बताया होगा कि दरवाज़े पर कोई आया है. फिर मैंने उनसे पूछा कि मुझे आंगनबाड़ी में काम करने वाली ताई से मिलना है, क्या वे बता सकते हैं कि उनका घर कहां है? उसने कहा, “आगे जाने पर आपको कारभारी बस्ती मिलेगी उधर मुखिया से पूछना वह आपको ज़रूर बता देगा.” उसका आभार व्यक्त करते हुए मैं कारभारी बस्ती की तरफ चल पड़ा. 

कारभारी बस्ती की ओर जाते वक्त मेरे दिमाग में बस यही बात चल रही थी कि उन दोनों महिलाओं ने मेरे साथ बात क्यों नहीं की? यह बात तुम भी सोचना… सोचते-सोचते मैं कारभारी बस्ती पहुंच गया. मुझे यह बात बाद में पता चली कि गांव का कारोबार देखने वाले का घर जिस बस्ती में होता है उस बस्ती को कारभारी बस्ती कहते हैं. मैं मुखिया के घर पहुंचा. मुखिया घर के बाहर आंगन में खटिया पर बैठा था. मुखिया ने मुझे देख कर राम-राम किया, बदले में मैंने भी उसको प्रणाम किया और हम दोनों बात करने लगे. उसके बाद मैंने अपने काम के बारे में उसको समझाने की कोशिश की.

जवाब में मुखिया ने कहा, “आंगनबाड़ी कार्यकर्ता तो अभी नहीं मिलेगी, क्योंकि वह मध्य प्रदेश गई हुई है. आप मुझे बोलो, मैं आपको कुछ जानकारी देने की कोशिश करता हूं.” मैंने कहा, “नहीं, नहीं दरअसल मुझे कुछ आंकड़े चाहिए थे और वह आपके पास नहीं होंगे. आप मुझे इतना बता दीजिए कि गांव में सब के पास आधार कार्ड, बैंक अकाउंट और राशन कार्ड है क्या?”

मुखिया ने कहा, “हां सबके पास है. लेकिन

ज़्यादातर महिलाओं के बैंक अकाउंट नहीं है और आधार कार्ड भी नहीं है.” मैंने पूछा क्यों नहीं है? मुखिया ने बहुत सोचकर कहा, "उनको इसकी कोई ज़रुरत नहीं है. इसलिए नहीं बनवाए. वैसे भी उनका कहां बाहर आना-जाना होता है.”

इसी बीच मुखिया की लाड़ी घर की चौखट तक चाय लेकर आई. मुखिया ने उठकर चाय के गिलास लाकर मेरे सामने रख दिए.

चाय पीकर मैंने मुखिया से राम-राम कहा और उसी दिन कारभारी बस्ती से वापस तोरणमाल, मेरे कमरे पर आ गया. उस रात मेरी आंखो के सामने घूंघट लिए,चौखट पर खड़ी, वहां से घर के अंदर जाती हुई औरतों की तस्वीर ही आती रही. मैं सोचता रहा

चौखट में खड़ी हुई स्त्री, आंगन में मशेरी लगाती हुई औरत, मुखिया की लाड़ी इनके पास घर, गांव, खेत, नदी या तालाब किनारे या फिर किसी झरने पर क्या ऐसी कोई जगह होती होगी जहां ये बहुत सी मुलाकातें और ढेर सारी बातें कर सकती हैं.

वो कौन सा समय होता होगा जब पीछे छूट जाती होंगी चौखटें, चौका, आंगन,… और अगर ऐसा कोई समय या जगह नहीं होगी तो क्या फिर वे इंतज़ार करती होंगी? बारह साल में एकबार बनाए जानेवाले त्योहार इंदल का!

अगले दिन गांव के पाटिल से मिलना था. उस दिन सीधे मुखिया से पूछ कर पाटिल की बस्ती पर चला गया – ‘पाटिल बस्ती’. मोटरसाइकिल नाले के बाज़ू में खड़ी थी, नाले के उस पार टेकड़ी पर पाटिल का घर था. घर के बाहर एक 17-18 साल का लड़का खड़ा था. उसके साथ तीन औरतें भी थीं. जिनमें से एक की उम्र शायद 16 साल की हो. 16 साल की लड़की को मैं औरत कह रहा हूं, ताज्जुब है! और बची दो अधेड़ उम्र की थीं. मैंने वहां खड़े लड़के से पूछा, “पाटिल जी घर पर हैं?” लड़के ने कहा- “हां हैं, खेत में गेहूं बो रहे हैं.” लड़के ने अधेड़ उम्र की औरत से कहा, “जाओ बुलाकर ले आओ. उस लड़के के बगल में 12 साल का एक दूसरा लड़का भी खड़ा था. मैंने पूछा, “यह कौन है तुम्हारा?” तो वह बोला, “यह मेरा भाई है. मैं पाटिल का लड़का हूं.” 

इसी बीच एक औरत ने उसके हाथ में एक बच्चा थमा दिया और अंदर चली गई. मेरे यह पूछने पर की ये बच्चा किसका है, उसने जवाब दिया, “यह मेरी लड़की है.” इतनी देर में पाटिल आ गए. मैंने पाटिल के साथ कुछ बातचीत की और उसके बाद पाटिल नाले के किनारे तक मुझे छोड़ने आया. रास्ते से जाते वक्त बहुत सी महिलाएं पानी भरते हुए दिख रही थीं. यह पानी उन्हें कोसों दूर से लाना पड़ता है. घूंघट को संभालते, स्टील का घड़ा सिर पर उठाकर टेकड़ी उतारना-चढ़ाना बड़ा कठिन काम होता है.

उस दिन अपने कमरे पर लौटते हुए मैं लालसिंह के घर पर रुक गया. लालसिंह ने बी.ए. तक की पढ़ाई की है. वह अकेला ही गांव में सबसे अधिक पढ़ा लिखा है. उसने मुझे अंदर बुलाया, चाय के लिए पूछा. चाय के साथ थोड़ी बातचीत होने के बाद, मैंने मेरे मन में जो कुछ भी चल रहा था, जो कुछ मैंने पिछले दो-तीन दिनों में देखा था, उसके बारे में उससे कुछ मालूमात करने की कोशिश की.

मैंने पूछा, “लालसिंह यहां पर क्या आप अकेले ही पढ़े-लिखे हो? आपकी तरह कोई लड़की पढ़ी लिखी नहीं है क्या?” जवाब में लालसिंह ने कहा, “सर! हमारे

पावरा समाज में लड़कियों की शादी बहुत ही कम उम्र में की जाती है. इसलिए लड़कियां और लड़के भी ज़्यादा पढ़ते नहीं है. अगर शादी जल्दी नहीं की तो वे भागकर अपने मनचाहे लड़के या लड़की के साथ शादी कर लेंगे. यहां पर यह परेशानी कोई भी मोल नहीं लेना चाहता.”

मैंने कहा, “परेशानी! कैसी परेशानी? अगर कोई लड़का और लड़की सच्चे मन से किसी को अपना जीवन साथी चुनते हैं, तो इसमें परेशानी वाली क्या बात है.”

लालसिंह कहने लगा… “‘बिरयानी’ जाति में शादी न हो यह परेशानी है सर.” “बिरयानी! यह क्या है…?” मैंने पूछा. लालसिंह ने बताया कि

बिरयानी मतलब अपनी जात छोड़कर दूसरी जाति की लड़की या लड़के से शादी करना. जो भी ऐसा करता है वह ‘बिरयानी’ का हो जाता है. और इसके बाद गांव का कोई व्यक्ति उसे किसी भी मदद के लिए सहयोग नहीं करता.

उनके पूरे कुटुंब के साथ अलग बर्ताव किया जाता है. उन्हें अलग से खाना परोसा जाता है. और उनका समाज में कोई भी मान सम्मान नहीं रखा जाता. चाहे वह लड़का हो या लड़की, यह दोनों के लिए उतना ही कठोर है.

“ज़्यादातर शादियां मध्य प्रदेश में होती हैं या महाराष्ट्र में?”इसके जवाब में लालसिंह ने बताया, “मध्य प्रदेश की लड़कियां शादी करके यहां लाई जाती हैं, और सर हम शादी के लिए दहेज भी देते हैं, लड़की के बाप को. अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार, कोई 30,000 तो कोई 40,000 रुपए, दहेज में देते हैं. किसी लड़की का बाप उन पैसों का इस्तेमाल गहने बनाने के लिए करता है, तो दूसरा शादी में मदद के लिए करता है. और कोई-कोई तो ऐसे भी नमूने होते हैं, जो उन पैसों को शराब में उड़ा देते हैं.”

मेरे सवाल बढ़ते ही जा रहे थे… मैंने लालसिंह से पूछा, “यह बताओ यह सभी महिलाएं घूंघट क्यों ओढ़ती हैं?” “सर, हमारे समाज में अपने से बड़ा आदमी, या बाहर के आदमी के सामने औरत को घूंघट लेना पड़ता है. समझो अभी मैं घर में बड़ा हूं, तो मेरे भाई की लाडी मेरे सामने घूंघट लेगी. और यह होना भी चाहिए, क्योंकि यह सम्मान की बात होती है. है ना सर?” लालसिंह ने कहा.

उसकी इस बात का मैं कुछ भी जवाब न दे सका, उलटे उससे कहा, “मुझे और एक बात पूछनी थी?” लालसिंह ने कहा- “पूछो ना सर!” “जब मैं गांव में रोज़ थोड़ा-थोड़ा घूमता था तो मुझे हर घर में दो-चार बच्चे नज़र आते थे, हर महिला के बगल में या आसपास चार-पांच बच्चे होते ही थे. तो वे लोग इतने बच्चे क्यों होने देते हैं?” 

लाल सिंह ने कहा, “सर हमारे समाज में शिक्षा की तो कमी है ही, और कोई सुनता भी नहीं. यहां पावरा के अलावा भी और दो चार जातियां हैं, इनके बीच झगड़े भी बहुत होते हैं. इसके चलते लोग अपनी जाति की संख्या बढ़ाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं.” मैंने कहा, “लेकिन ज़मीन तो ऐसी जगह पर है जहां ज़्यादा उत्पन्न भी नहीं होता है और इसमें महिलाओं को तकलीफ भी होती है! है ना?” लालसिंह मेरे हां में हां भरते हुए चुप हो गया.

उसके घर में एक बहुत बड़ा ढोल रखा हुआ था. इतने में लालसिंह बोल पड़ा, “यह ढोल मेरे पिताजी बजाते हैं, होली के वक्त ही उनका सम्मान रहता है.” “होली में महिलाएं भी जाती हैं?”, मैंने पूछा. “हां-हां जाती हैं ना, लेकिन जिन महिला के मां-बाप मर गए हैं उनको होली की पूजा का मान नहीं रहता.”

अच्छा-अच्छा, यह कहते हुए मैं लालसिंह के घर से बाहर निकला. उसकी मां घर की दीवार को मिट्टी से पोत रही थीं. उनको देखकर मुझे मेरी मां की याद आई, वह भी दिवाली के वक्त घर की दीवार को इसी तरह संवारती हैं.

एक और बात बताऊं, जब भी मैं सिंदीदिगर जाता हूं, मुझे महिलाएं या तो बच्चों को लेकर खड़ी दिखाई देती हैं, या कहीं जंगल से चूल्हे के लिए लकड़ियां लाती हुए दिखाई देती हैं. कुछ कमर पर या सिर पर पानी का घमेला लिए नज़र आती हैं.

मेरी आंखों को कहीं भी, कोई भी महिला दुकान में नहीं दिखाई दी, और ना ही किसी जागृति सभा में. वनपट्टा (ज़मीन) के कागज़ात लिए हुए फॉरेस्ट ऑफिस में नज़र आना तो बहुत दूर की बात है. वह ना ही तो कार्यभारी होगी ना ही पाटिल होगी. अगर वह कहीं मिलेगी तो बस आंगनबाड़ी में! और तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि मैंने बहुत ही कम बार, लगभग ना के बराबर, यहां पर किसी महिला की आवाज़ सुनी है.

जिधर देखो उधर बस पुरुष ही पुरुष हैं. इसलिए मैंने कहा था यह सिर्फ पुरुषों का गांव है. पुरुष भी, जैसे पहले से चले आ रहे हैं, वैसे ही चल रहे हैं. गांव में ना किसी के घर में टिव्ही है, ना ही मोबाइल का नेटवर्क, न बिजली, न खेती से कोई कमाई होती है. और उन्हें कोई उम्मीद भी नहीं है.

मेरे मन में अभी भी बहुत सारे सवाल हैं. गांव में महिलाओं को लेकर जो ये विषमतावाले विचारों की चौखट है इसे कौन तय करता है? इस चौखट का चौकीदार कौन है? कितने-कितने गांवों या शहरों में, कितनी-कितनी औरतें इस चौखट में कैद होंगी? हमें इन चौखटों का पता करना चाहिए और चौकीदार का भी…और मैं जानता हूं ज़रूर मिलेगा… शायद इतिहास के पन्नों में, राजा के दरबार में, संस्कृति के प्रवाह में जहां परंपराएं किसी किताब के अलावा भी टिकी रहती हैं, और अगली पीढ़ी में आ जाती हैं. असल में इस चलती परंपरा के मालिक भी वही हैं और मालिकाना व्यवस्था भी वही होगी. जो न राजा की है और न जनता की! ये तीसरा मालिक कौन है?

अरे, चिट्ठी लंबी हो गई, ये तो तब है जब मैंने तुम्हें बहुत ही थोड़ा सा बताने की कोशिश की है. जब तुम यहां आओगी तो मैं तुम्हें वहां ले चलूंगा. तब तुम अपनी आंखों से देखना सीमाओं के अंदर सीमाएं और सीमाएं और सीमाएं… और ढूंढना सीमाओं के गढ़ और मठ…

इंतजार रहेगा,
प्रकाश.
तोरणमाल के जंगल से.

पहला पत्र यहां पढ़ें.

प्रकाश रणसिंह पूना में सावित्रीबाई फूले यूनिवर्सिटी से अंगेज़ी साहित्य के छात्र हैं. हाल ही में उन्होंने मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र की सीमा से लगे एक गांव, तोरणमल में एक प्रोजेक्ट पर काम ख़त्म किया है. प्रकाश, हिन्दी और मराठी भाषा में लेखन करते हैं और सप्ताह के अंत में गांव के आस-पास की प्राकृतिक सुन्दरता को कैमरे में क़ैद करना पसंद करते हैं.
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