लाइफ इन फाइव: संगीता जोगी

इस इंटरव्यू में एक युवा कलाकार ख़ाली वक़्त, 'आधुनिक महिलाओं', और शिक्षा पर बात कर रही हैं

संगीता जोगी कलाकार हैं. वे मज़दूरी भी करती हैं. अपने दो बच्चों और परिवार के साथ संगीता राजस्थान के माउंटआबू ज़िले के काचौरी गांव में रहती हैं. हाल ही में तारा बुक्स से प्रकाशित उनकी चित्रात्मक किताब ‘द विमेन आई कुड बी’ पढ़ी-लिखी आज़ाद ख़्याल महिलाओं की कहानी चित्रों के ज़रिए उकेरती है.

मूलत: संगीता का परिवार राजस्थान के बंजारा समुदाय से जुड़ा है. माता-पिता गुजरात के अहमदाबाद में बसे हैं. उनके रास्ते ही चित्रकारी का शौक संगीता तक भी पहुंचा. उनकी मां जानी-मानी  चित्रकार तेजू बेन और पिता गणेश जोगी हैं, जिन्होंने अपनी चित्रकारी से देश और दुनिया में नाम कमाया है. प्रकाशक गीता वोल्फ का कहना है कि उनके चित्रों की शैली को ‘शहरी लोक’ कहा जा सकता है.

संगीता के चित्रों में आधुनिक महिलाएं और उनके जीवन का चित्रण बहुत आकर्षक तरीके से दिखाई देता है. अपने चित्रों की दुनिया से बिल्कुल विपरीत जीवन जीने वाली संगीता ख़ुद को उन महिलाओं में देखती हैं और 4 नंबर के रोटरिंग पेन से उन्हें कागज़ पर जीवित कर देती हैं.

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संगीता, आप अपने चित्रों को क्या नाम देती हैं? आप इन्हें किस शैली के चित्र मानती हैं?

इन चित्रों का कोई नाम नहीं है. मैंने अपने पापा से चित्र बनाना सीखा है. वे बहुत सुंदर और बारिक चित्र बनाते हैं. एक पेंटिंग पर वे 6- 6 महीने लगाते है. उनकी पेंटिंग्स में पानी के दृश्य बहुत होते हैं. ज़्यादातर वे गांव का चित्र बनाते हैं. उनके चित्रों को देखने में बहुत मज़ा आता है.

लेकिन, मैं किसी की नकल नहीं करना चाहती थी और न ही उनकी तरह पेंटिंग बनाना चाहती थी. मैं सबसे अलग पेंटिंग बनाना चाहती हूं, सबसे अलग.

आपकी मां (तेजू बेन) भी तो बहुत सुंदर पेंटिंग बनाती हैं…

हां, वो भी अच्छी चित्रकारी करती हैं. लेकिन मेरी पेंटिंग उनसे बहुत अलग है. मैं किसी को देखकर पेंटिंग नहीं बनाती. मैं तो मन से बनाती हूं. मैं सोचती हूं और मेरे अंदर ख़्याल आता है कि अगर मैं इसे ऐसे बनाउंगी तो कितना ख़ूबसूरत दिखेगा.

मैं ड्राइंग करने के बारे में बहुत सोचती हूं, हां, यही सच है. ससुराल आने के बाद भी मैं ये काम नहीं छोड़ पाती हूं. यहां घर का इतना काम होता है, बच्चों को संभालना भी होता है फ़िर भी जब भी टाइम मिलता है, दोपहर या रात को बारह बजे-एक बजे, मैं चित्र बनाने बैठ जाती हूं. मुझे एक पेंटिंग को बनाने में तीन-चार दिन लग जाते हैं.

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आपकी पेंटिंग में बहुत अलग-अलग तरह की औरते हैं. आपने कब सोचा कि आप औरतों के बारे में ही पेंटिंग बनाएंगी?

मैं अपनी मम्मी के साथ दिल्ली में प्रदर्शनियों में जाया करती थी. दिल्ली हाट और भी दूसरी जगहों पर इतनी ख़ूबसूरत और प्यारी-प्यारी औरतें आया करती थीं. मैं उनको देखकर खुश हो जाती. कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियां या काम करने वाली औरतें सब इतनी ख़ूबसूरत होती हैं. वो सभी खुश लगती थीं.

आपको उनमें क्या अच्छा लगता था?

वो बहुत खुश और फ्री लगती हैं. उनको देखकर लगता है कि वो एकदम फ्री हैं, वो दुनिया की कुछ परवाह नहीं करतीं. दिल्ली हाट और कमला हाट में जो लड़कियां आती हैं वो सब मिस इंडिया होती हैं.

आपने मिस इंडिया को कहां देखा है?

मैंने मिस इंडिया को नहीं देखा और न ही मेरे ससुराल में टीवी है. लेकिन, मुझे लगता है कि जो भीतर मन से सुंदर है वो मिस इंडिया ही होगी न!?

किताब में जो लड़कियों की तस्वीरें हैं वो तो पढ़ी-लिखी लड़कियां लगती हैं. आपने कहां तक पढ़ाई की है?

मैं तो सिर्फ़ दूसरी कक्षा तक पढ़ी हूं. अगर पढ़ी-लिखी होती तो मैं शादी ही नहीं करती! (हंसते हुए)

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शहरों की लड़कियों और औरतों को देखकर आपको कैसा महसूस होता है?

ये जो लड़कियां और औरतें हैं मेरी किताब में, मैं भी इनकी तरह ही हूं यही सोचकर मैंने ये तस्वीरें बनाई हैं. जैसे ये सब मैं ही हूं. इन पेंटिंग के ज़रिए ही मैंने अपना सपना पूरा कर लिया है.

वो पैंट्स पहनती हैं. हैट लगाती हैं. मैं उनकी तरफ़ देखती हूं और मुझे लगता है कि मैं उनकी तरह ही हूं.

आपकी पेंटिंग में सभी ने खूबसूरत रंगों के कपड़े पहने हुए हैं. कहीं लोग नाच रहे हैं, पार्टी कर रहे हैं. इन पेंटिंगस के पीछे क्या सोच थी?

मैं अक्सर सोचती हूं कि शहरों में लोग पार्टियों में जाते रहते हैं. सभी अलग-अलग तरह के रंगों के कपड़े पहनते हैं, डांस करते हैं वो सब कुछ बहुत चमक-दमक जैसा होता है.

आप पार्टी में क्या पहन कर जाती हैं?

(हंसते हुए) मैंने तो कभी कोई पार्टी देखी ही नहीं. घर का काम और दिहाड़ी मज़दूरी के बीच में कभी पार्टी में जाने का मौका ही नहीं मिला.

वैसे, आपको क्या पहनना पसंद है? त्योहारों पर क्या पहनती हैं आप?

मेरा मन तो करता है कि मैं पंजाबी कपड़े पहनूं, वो जो शरारा जैसा होता है, मुझे बहुत पसंद है. लेकिन मुझे ससुराल में ये सब पहनने नहीं देते. यहां तो मैं घाघरा, चोली और ओढ़नी ही पहनती हूं.

आप किस तरह की दिहाड़ी मज़दूरी करती हैं?

मैं कडिया का काम करती हूं. कडिया मतलब जहां मकान या बिल्डिंगें बनती हैं वहां काम करती हूं. जब भी कोई काम मिलता है तो मैं अपने पति के साथ जाती हूं. वहां मैं ईंट और सिमेंट इधर से उधर पहुंचाती हूं. तो, मैं घर का काम करती हूं, मज़दूरी करती हूं और उसके बाद भी मैं ये पेंटिंग बनाती हूं. (हंसते हुए) मैंने कहा न कि ये काम मुझसे छुटता ही नहीं.

आपके पति को कैसा लगता है कि आपकी किताब छपी है?

मेरे पति बहुत खुश हैं. मैंने उन्हें भी सिखा दिया है कि कैसे पेंटिंग करते हैं. अब वो भी मेरे साथ पेंटिंग बनाते हैं. उन्हें भी काम मिलने लगा है.

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आपने अपनी किताब में बहुत जगहों पर अमेरिका का ज़िक्र किया है?

मुझे अमेरिका बहुत पसंद है. मैं हमेशा से अमेरिका जाना चाहती हूं. मुझे लगता है कि वहां हवा बहुत साफ़ होती है. मैं बहुत मेहनत करूंगी ताकि मैं एक दिन अमेरिका जा सकूं.

आपको क्या लगता है कि वहां की औरतों में और आप जहां रहती हैं उन औरतों में क्या फ़र्क़ है?

वहां की लड़कियां कभी बिन्दी नहीं लगातीं. वे छोटे-छोटे कपड़े पहनती हैं. यहां कि औरतों को पूरे दिन काम रहता है, मैं किसी औरत को नहीं जानती जिसके पास खाली समय होता है. लेकिन मुझे लगता है अमेरिका में लड़कियां पढ़ाई करने के बाद बहुत मस्ती करती हैं. वहां की औरतों के पास बहुत समय होता है. वे घूमने जाती हैं.

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पेंटिंग के अलावा आपको क्या करना अच्छा लगता है?

मुझे तो तब सबसे अच्छा लगता है जब मैं अपने बच्चों का पेट भर पाती हूं.

आपको खाना बनाना पसंद है?

असल में जब मैं अपने बच्चों के सामने अच्छा खाना परोस पाती हूं तो मुझे अच्छा लगता है. क्योंकि मैंने इतनी तकलीफ़ें देखी हैं कि पूछो मत. लॉकडाउन के समय हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था. मैं काम करने के लिए जाती थी लेकिन मुझे उसके पैसे भी नहीं मिलते थे. वो बहुत ज़्यादा तकलीफ वाला समय था. मैं अपने बच्चों को चावल में पानी मिलाकर खाने को देती थी.

क्या ये पहले लॉकडाउन के समय था?

हां. मैं अब ऐसी ज़िन्दगी वापस नहीं जीना चाहती, मैं कभी अपनी बेटियों को ऐसे दिन नहीं देखने दूंगी.

आप कैसे करेंगी ये?

मैं इनको खूब पढ़ाउंगी. जहां मैं रहती हूं यहां सभी की सोच है कि लड़कियां पढ़कर क्या करेंगी, लेकिन मेरा मानना है कि लड़कियां पढ़ेंगी तो वो अपना ध्यान खुद रख लेंगी.

बिलकुल. आपके नाम पर तो किताब भी छपी है…

हां, बिल्कुल. इसलिए मैं अपनी बेटियों को ऐसे नहीं छोडूंगी. वो पढ़ेंगी और अपना रास्ता ढूंढेंगी. पता नहीं, लेकिन हो सकता है कि भविष्य में मैं अपनी पेंटिंग के ज़रिए उनकी पढ़ाई का खर्चा पूरा निकाल सकूं.

आगे आप क्या करना चाहती हैं, संगीता?

मुझे अपना घर बनाना है.

संगीता जोगी की किताब ‘द वीमेन आई कुड बी’ तारा बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है. इसे सभी मुख्य किताब घरों और प्रकाशक की वेबसाइट से खरीदा जा सकता है.

द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.
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