अब तो यह कहानी काफी मशहूर हो चुकी है. एक दिन दोपहर के समय, मशहूर बंगाली लेखक मनोरंजन ब्यापारी दक्षिण कोलकाता के बिजॉयगढ़ में ज्योतिष राय कॉलेज के पास अपना रिक्शा लिए सवारी का इंतज़ार कर रहे थे. तभी एक बुज़ुर्ग महिला कॉलेज से बाहर निकलीं और उनके रिक्शे पर बैठ गईं. तब ब्यापारी नहीं जानते थे कि रिक्शा पर बैठने वाली महिला कोई और नहीं, बल्कि मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी हैं. हां, यह ज़रूर पता था कि वह कॉलेज में पढ़ाती हैं. इसलिए उन्होंने उनसे बंगाली शब्द ‘जिजीबिषा’ का मतलब पूछा.
“जीने की अदम्य इच्छा.” महिला ने जवाब देते हुए पूछा, “इस शब्द के बारे में तुम कैसे जानते हो?”
“यह एक किताब में है जिसे आजकल मैं पढ़ रहा हूं,” ब्यापारी ने जवाब दिया.
“तुमने कहां तक पढ़ाई की है?” महाश्वेता ने उससे पूछा.
“मैं असल में कभी स्कूल नहीं गया,” उन्होंने कहा.
“लेकिन तुम तो किताबें पढ़ते हो?” महिला ने ज़ोर देते हुए कहा.
“मैंने खुद से ही पढ़ना-लिखना सीखा है,” उसने जवाब दिया.
“कुछ किताबों के नाम बताओ, जो तुमने पढ़ी हैं?” महाश्वेता ने पूछा.
ब्यापारी ने 8-10 किताबों के नाम बताए, जिनमें से आधी किताबें महाश्वेता देवी की ही लिखी थीं. वह 1970 का दशक था, उस ज़माने में महाश्वेता देवी काफी चर्चित हो चुकी थीं जिसका सबसे बड़ा श्रेय उनके उपन्यास ‘1084 की मां’ को जाता है. पर वो उनका अगला उपन्यास था ‘अरण्येर अधिकार’ (जंगल के दावेदार) जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया था.
रिक्शा से उतरते हुए महाश्वेता देवी ने अपना परिचय देते हुए कहा, “मैं एक पत्रिका निकालती हूं जिसमें आप जैसे लोग ही लिखते हैं, जिनके पास कोई खास डिग्री नहीं है. क्यों न आप भी इसमें लिखें!”
ब्यापारी याद करते हुए कहते हैं कि तब मैंने कहा था, “मैंने कभी कुछ लिखा नहीं. लेकिन हां, मैं पढ़ता बहुत हूं.”
महाश्वेता ने पूछा, “तो फिर लिखते क्यों नहीं?”
कहानी का अगला हिस्सा थोड़ा कम मशहूर है. ब्यापारी का पहला लेख, जिसका शीर्षक था–‘रिक्शा चलाई’ (मैं रिक्शा चलाता हूं), बोर्तिका के 1981 के जुलाई-सितंबर अंक में प्रकाशित हुआ था. 1983 में उनका दूसरा लेख ‘विद्याधोरी चौरेर उपोकौथा’ (विद्याधोरी टीले की कहानी) नाम से छपा. जब मैंने कोलकाता स्थित महाश्वेता देवी संग्रहालय में काम शुरू किया, तब जो सामाग्री मुझे सबसे पहले देखने को मिली वो बोर्तिका के पुराने अंक थे. मेरी इच्छा थी कि मैं सबसे पहले ब्यापारी के लेख तलाश करूं. हफ़्तों की मेहनत के बाद कहीं मुझे उनका लेख मिल सका. लेख के शीर्षक में रिक्शावाला लिखा था, इसी वजह से मैं पहचान भी पाई कि यह लेख ब्यापारी का है, क्योंकि लेखक के नाम की जगह पर मदन दत्ता लिखा था. पर लेख को पढ़कर स्पष्ट था कि यह उनका ही लिखा हुआ है. ऐसा उनके बेबाकी के साथ सबकुछ सीधे-सीधे लिख देने के उनके प्रभावशाली तरीके की वजह से नहीं बल्कि लेख की सामाग्री में जो लिखा था उसकी वजह से था.
“मुझे कभी स्कूल जाने का मौका नहीं मिला. चूंकि मेरे पिता शरणार्थी थे और उन्होंने दंडकारण्य (जहां पूर्वी बंगाल से आनेवाले निम्न जाति के शरणार्थियों के लिए सरकारी कैंप बनाया गया था) जाने से इनकार कर दिया था. इस वजह से उन्हें सरकारी मदद भी नहीं मिली. जिस उम्र में मुझे स्कूल जाना चाहिए था, मैं तीन रुपये के मेहनताने पर काम कर रहा था जिसमें मुझे, कुल 13 बकरियां और 4 गायें चराने होते थे ताकि मैं अपने परिवार का पेट पाल सकूं….जब थोड़ा बड़ा हुआ तो कभी चाय की दुकान पर काम किया, कभी घरेलू नौकर बना, तो कभी राजमिस्त्री का हेल्पर.
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जो लोग यह कहते हैं कि गरीबी पढ़ाई में रुकावट नहीं बनती, उन्होंने मेरे जीवन की यात्रा को नहीं देखा है. मैं अब तक 40-45 तरह के काम सीख चुका हूं, जबकि अभी मैं महज 31 साल का हूं. मैं कार चला सकता हूं, लॉरी ड्राइवर का हेल्पर भी रहा हूं, लेकिन पैसे की कमी के चलते ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनवा पाया. लेकिन काम के बीच-बीच में, जब भी समय मिलता है, मैं किताबें पढ़ता हूं. शुरू-शुरू में तो हिज्जे करके पढ़ पाता था, अब आसानी से पढ़ लेता हूं. मुझे कहानियां अच्छी लगती हैं. मैं सवारियों के बीच भी पढ़ लेता हूं. मैंने बांग्ला के लगभग सभी बड़े लेखकों को पढ़ा है, और मैंने बांग्ला में अनूदित विश्व साहित्य भी पढ़ा है. लेकिन मुझे विशेष रूप से उन किताबों को पढ़ने में ज़्यादा मज़ा आता है, जिनमें मेरे जैसे आम लोगों की ज़िन्दगी की कहानी होती है, क्रांतिकारी सोच होती है, अन्याय के खिलाफ़ खड़े होने वाला नज़रिया होता है, सिस्टम की फ़ौलादी ज़ंजीरों को तोड़कर कामयाबी हासिल करने का जज़्बा होता है. जैसे मैक्सिम गोर्की की मां, स्पार्टाकस, अरण्येर अधिकार, अराफ़ात और फिलिस्तीनी कमांडो. मैंने बहुत सी फ़िल्में देखी हैं, लेकिन जिन फ़िल्मों का मेरे दिल पर असर हुआ, वह हैं—कलकत्ता 71, पदातिक, दौड़ और संसार सीमांते.”
(ब्यापारी की किताबों में सबसे मशहूर उनकी आत्मकथा माई चांडाल लाइफ: एन ऑटोग्राफी ऑफ ए दलित (मेरी चांडाल जिंदगी: एक दलित व्यक्ति की आत्मकथा) है जो 1979 में पश्चिम बंगाल में तत्कालीन लेफ्ट फ्रंट की सरकार के समय हुए मरीचझापी नरसंहार के बारे में कई ज़रूरी सवाल पूछती है. इस सरकार को तत्कालीन पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से आए शरणार्थियों के प्रति सहानुभूति रखने वाला माना जाता था. इस पुस्तक और अपने अन्य लेखन में ब्यापारी ने दिखाया है कि वाम मोर्चा सरकार का उच्च जातियों और निम्न जातियों के शरणार्थियों के प्रति रवैया स्पष्ट रूप से अलग-अलग था.)
मनोरंजन ब्यापारी ने बातचीत के दौरान फोन पर बताया कि “उस पहले लेख पर मिली प्रतिक्रिया से मुझे वह सबकुछ मिला, जिसकी ज़रूरत एक लेखक बनने के लिए होती है. लेख छपने के बाद जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्र, यहां तक कि प्रोफ़ेसर भी मुझसे मिलने आए. वह तसल्ली करना चाहते थे कि लिखने वाला सच में एक रिक्शावाला ही है! ‘जुगांतर‘ [अख़बार] में बोर्तिका के उस अंक की जो समीक्षा छपी थी, उसमें भी मेरे लेख का ज़िक्र किया गया था. उसके बाद बहुत सी पत्रिकाओं से मुझे लिखने का ऑफ़र मिला, और मैंने मदन दत्ता, जिजीबिषा जैसे कई छद्म नामों से लिखा भी. हालांकि उस समय मेरे मन में एक डर भी बना रहता था. मैं कई बार जेल जा चुका था और इसी कारण अपने असली नाम का इस्तेमाल करने से बचता था.
उस समय मैं खाना बनाने का काम भी करता था. मुझे लगता था कि कोई भी एक लेखक को रसोइए को काम पर नहीं रखना चाहेगा.”
कमाल की बात यह है कि उस समय बंगाली में ऐसी कुछ पत्रिकाएं छप रही थीं, जो दलित मंच होने का दावा करती थीं. सन् 2007 में इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के लिए मीनाक्षी मुखर्जी के साथ मिलकर ब्यापारी ने एक लेख लिखा था, जिसमें 20वीं सदी की शुरुआत में बंगाली मतुआ आंदोलन के दौरान निकलने वाली दलित पत्रिकाओं के इतिहास का उन्होंने ज़िक्र किया था. उस आंदोलन के समय नामशूद्र सुहृद और पताका जैसी पत्रिकाएं छपा करती थीं. लेकिन इनके पाठकों की तादाद बहुत कम थी और साहित्यिक चर्चाओं में भी इनकी कोई विशेष पैठ नहीं थी. ब्यापारी का मानना है कि बंगाली आंदोलन, दरअसल, मराठी दलित लेखन आंदोलन के लगभग दो दशक बाद शुरू हुआ. मराठी दलित लेखन आंदोलन का सन् 1958 के बाद तेज़ी से विस्तार हुआ. पहली बार 1958 में ही, मराठी दलित लेखन शब्द का इस्तेमाल हुआ था. इस सबके बावजूद, बंगाल के पहले बेस्टसेलर दलित लेखक ब्यापारी के लेखन की शुरुआत किसी दलित पत्रिका से नहीं हुई थी जैसा कि अदल बदल के एडिटर बिमल विश्वास का कहना था.
“मुझे इन पत्रिकाओं के बारे में बहुत बाद में, 20वीं सदी के अंतिम दशक में पता चला, जब मैंने भारत में दलित लेखन आंदोलन के बारे में जाना-समझा. बोर्तिका की पहचान दलित नहीं, बल्कि सबाल्टर्न पत्रिका की थी. इसके अलावा, इससे महाश्वेता देवी का नाम भी जुड़ा हुआ था. दलित पत्रिकाएं लंबे समय तक मेरे प्रति असहज रहीं क्योंकि मैं खुद को पहले मार्क्सवादी और बाद में दलित मानता था. इन दोनों के बीच आपसी नापसंदगी का रिश्ता ही रहा है. बोर्तिका का दरवाज़ा विभिन्न पहचान वाले निम्न वर्ग के सभी लोगों के लिए खुला था. अब जबकि मैं खुद को दलित पहचान से जोड़ता हूं, तो मुझे लगता है कि मार्क्सवादी मंच मेरे लिए उतना खुला नहीं है.”
स्पीवाक-महाश्वेता संवादः क्या सबाल्टर्न बोल सकता है?
सन् 1985 में नारीवादी आलोचक गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक ने एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था—’कैन द सबाल्टर्न स्पीक’ (क्या सबाल्टर्न बोल सकता है?). यह मानविकी अध्ययन की दुनिया में आज भी सबसे ज़्यादा कोट किए जाने वाले तर्कों में से एक है. इंटरनेट पर मौजूद लिंक्स के मुताबिक जून 2026 तक, इस आलेख को 47,839 बार कोट किया जा चुका है. स्पीवाक के इस महत्वपूर्ण तर्क को लेकर मेरी समझ यह है कि सबाल्टर्न या जो अधीन, दबा हुआ है यह तबका बोलता तो है, पर बुद्धिजीवी तबका (जो विमर्श को आकार देता है) उसकी बातों को सुनता नहीं है. या यह भी कह सकते हैं कि सुनने वालों में उनकी बातों को समझने की सलाहियत नहीं है. यही कारण है कि बुद्धिजीवी, ऐसे समूह जिसमें खेतिहर मजदूर शामिल हैं की ओर से बोलते हैं और उनकी बातों को अपने नज़रिये से पेश करते हैं. अमीन, सुहृद और टोडी (2022-2025) के हालिया शोध का मानना है कि एक आदमी जिसने सबाल्टर्न की बातें सुनी, उन्हें बजाब्ता नोट किया और अपने राजनीतिक संगठन का आधार बनाया, वह थे चंपारण में महात्मा गांधी. 1917 में महात्मा गांधी, भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और गांधीजी के अन्य वकील साथियों द्वारा हाथ से लिखे यह नोट्स आज भी भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद हैं. इन्हीं नोट्स की मदद से औपनिवेशिक बिहार में नील की खेती के तरीके में बदलाव का आधार तैयार किया गया. (और द थम प्रिंटेड वॉल्यूम्स की सामाग्री भी) हो सकता है कि इससे पहले भी गांधीजी ने हाशिए पर जीनेवालों की बातें सुनी हों, लेकिन गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक वह पहली सिद्धांतकार थी जिन्होंने आवाज़ और सत्ता के बीच के इस रिश्ते को स्पष्ट रूप से हमारे सामने रखा.
सबाल्टर्न स्टडीज़ खण्ड V में स्पीवाक ने इस तर्क को एक नयी दिशा दी. उन्होंने सबाल्टर्न नैरेटिव का विस्तार इतिहास में ही नहीं बल्कि साहित्य से भी जोड़ा, विशेष रूप से महाश्वेता देवी की रचनाओं से. उन्होंने लिखा “जो लोग साहित्य पढ़ते या लिखते हैं, वह भी उतने ही कम सबाल्टर्न हैं, जितना कि इतिहास पढ़ने या लिखने वाले लोग.” इतिहास में भी कल्पना से काम लिया जा सकता है और साहित्य में भी शोध की गुंजाइश हो सकती है. इतिहास और साहित्य, दोनों में कल्पना और शोध के तत्व समान रूप से मौजूद होते हैं. उन्होंने महाश्वेता देवी की कहानी ‘स्तनदायिनी’ का अनुवाद किया और इसे उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए तर्क दिया कि यह कहानी सबाल्टर्न की आवाज़ को उतनी ही प्रामाणिकता के साथ सामने लाती है, जितना कि कोई इतिहासकार अभिलेखों से मिली जानकारी के आधार उन किसानों की कहानी बयान करता है जिन्हें अंग्रेजों ने नील की खेती करने पर मजबूर किया था.
इस तरह, कहा जा सकता है कि सबाल्टर्न संबंधी स्पीवाक की सोच को कुछ हद तक महाश्वेता देवी की रचनाओं से भी आकार मिला था.
यह पूछना कि किसने किसको ज़्यादा प्रभावित किया, या यह विचार सबसे पहले किसने सामने रखा, बेवकूफ़ाना और बेमतलब का सवाल लगता है. सांस्कृतिक समीक्षक और अनुवादक समिक बंद्योपाध्याय ने बताया कि महाश्वेता और स्पीवाक की मुलाक़ात 1970 के दशक के आखीर में हुई थी. तब हजार चौरासीवें की मां छप चुकी थी. यह मुलाक़ात समिक ने ही करवाई थी. वह यूनिवर्सिटी में स्पीवाक के सहपाठी रहे थे और महाश्वेता के सहकर्मी और दोस्त थे. सच तो यह है कि बोर्तिका और स्पीवाक के लेखों से यह साफ़ पता चलता है कि दोनों ही ने एक-दूसरे के विचारों को आकार दिया.
महाश्वेता का मानना था कि सबाल्टर्न को सुना जाना ही नहीं चाहिए, बल्कि उन्होंने उन्हें माइक भी थमा दिया ताकि उनकी आवाज़ दूर तक पहुंचे. और वह माइक थी–बोर्तिका.
“आप अपनी कहानियां खुद लिखें. बोर्तिका आप ही के लिए खुला है.” साहित्य अकादेमी द्वारा उनके ऊपर बनाई गई एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म (फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है) में महाश्वेता देवी यही कहती हैं. उन्होंने विज्ञापन के लिए जो मजमून तैयार किया था, उसमें भी लिखा है कि यह पत्रिका “आदिवासियों, किसानों, संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के जीवन और अनुभवों पर केन्द्रित है.” बोर्तिका में छपने वाली कहानियों की सूची देखना, जैसे सामाजिक न्याय के सपने को सच होता देखना हैः सूची में लोधा समुदाय (जिसे अंग्रेजी राज में आपराधिक जनजाति की सूची में रखा गया था) की चुन्नी कोटल या कोई सबर जो खेरिया सबर समुदाय, जो एक विमुक्त समुदाय की श्रेणी में आता है का नाम प्रो. गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक या प्रो. गणेश देवी या खुद महाश्वेता के लेख के साथ लिखा है या किसी कोई फर्जी नाम से मनोरंजन ब्यापारी का लेख है.
क्या सवर्ण महाश्वेता ने, जिनका संबंध आधुनिक भारत के एक बहुत ही प्रभावशाली और प्रसिद्ध परिवार से था, आदिवासियों से उनकी माइक नहीं छीन ली थी?
इन आरोपों के पक्ष में मौजूद सबूत देखें तो: प्रसिद्ध फिल्मकार ऋत्विक घटक उनके चाचा थे और इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली पत्रिका निकालने वाले सचिन चौधरी उनके मामा. उनके एक और मामा शंखो चौधरी आधुनिक भारत के मशहूर और प्रभावशाली मूर्तिकारों में गिने जाते थे, जिन्होंने बड़ौदा स्थित महाराजा सयाजी यूनिवर्सिटी ऑफ़ फाइन आर्ट्स में मूर्तिकला विभाग की स्थापना की थी. हो सकता है कि 1970, 1980 और 1990 के दशक में यह सवाल न पूछा गया हो, लेकिन आज यह सवाल ज़रूर पूछा जाता, क्योंकि मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद तैयार हुई अंबेडकरवादी और पेरियारवादी पीढ़ी अब बड़ी और बुलंद हो चुकी है. यहां बोर्तिका महाश्वेवता का उनके लिए इसका बहुत अच्छा जवाब है: उन्होंने सबाल्टर्न लोगों के लिए यह मंच तैयार किया, ताकि वह अपनी बात ठीक उनके बगल में रख सकें.
ये गांधी के चंपारण में किसानों किए गए अभ्यासों से अलग है: उन्होंने जो किसानों की बातों को सुनने का काम किया था वो सार्वजनिक लोगों तक पहुंच के लिए नहीं था. बल्कि इसका काम आंतरिक समझ बनाना और साक्ष्य इकट्ठा करना था ताकि चंपारण आंदोलन को आकार दिया जा सके और अंग्रज़ी सरकार पर नीतियों को बदलने का दबाव डाला जा सके. वहीं महाश्वेता देवी द्वारा प्रकाशित कहानियां सीधे जनता से संवाद कर रही थी, न कि एक्टिविस्ट और उन अधिकारियों से जो सरकारी कामकाज को दिशा देते हैं और जिनका उद्देश्य एक अलग तरह के सामाजिक प्रभाव को हासिल करना होता है.
यह भी हो सकता है कि बोर्तिका का महत्व इससे कहीं ज़्यादा रहा हो. संभव है कि महाश्वेता को इस लेखन से अपनी रचनाओं को सही तरीके से आकार देने की प्रेरणा मिलती हो. इन अनुभवों को आधार बनाने से नहीं मगर उन्होंने समझदारी के साथ इनका रचनात्मक उपयोग किया हो, ठीक वैसे ही जैसे किसी भी रचनात्मक काम पर पहले से मौजूद चीज़ों का असर पड़ता है. महाश्वेता को इससे अधिक और वास्तविक सामाग्री मिली ह, जिसको उन्होंने अपनी ज़मीनी रिपोर्टिंग के साथ जोड़ दिया.
पुरुलिया की खेरिया सबर जनजाति, आदिवासी इलाकों में डायन के नाम पर होने वाली हिंसा, लोधा सबर जनजाति की चुन्नी कोटल की आत्महत्या, तेलंगाना आंदोलन में महिलाओं की भूमिका, और बंद पड़ी फैक्ट्रियों व फैक्ट्रियों के बंद होने का मज़दूरों पर पड़ने वाला असर जैसे विषयों पर बोर्तिका का विशेषांक निकला करता था. इनमें से कुछ अंकों में तो डाटा चार्ट के माध्यम से ज़िले के लोगों का पूरा ब्यौरा भी दिया गया था, जैसे कि शिक्षा, परिवार का आकार, आय और ऐसे ही अन्य सामाजिक-आर्थिक आंकड़े, जो नीति बनाने और लागू करने के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं. ऐसी अहम जानकारियां जो आज इंटरनेट के ज़माने में भी भारतीय राज्य शायद ही कभी जारी करते हैं. इस लिहाज़ से देखें तो बोर्तिका का प्रकाशन प्रतिरोध का साधन था. यह वो काम कर रही थी जो सरकारी विभागों को करना चाहिए था. मैत्रेय घटक के शब्दों में कहूं तो ‘महाश्वेता देवी अपने आप में एक मुकम्मल संसाधन केंद्र थीं.’ मैत्रेय ने ही महाश्वेता देवी की रिपोर्टों के अंग्रेज़ी संग्रह ‘डस्ट ऑन द रोड’ का संपादन किया था, 2003 में उनकी मौत के बाद पत्रिका की रफ़्तार धीमी पड़ती गई, हालांकि इसका छिटपुट प्रकाशन कुछ वर्षों तक होता रहा.
बोर्तिका में मैंने जो पहला लेख पढ़ा, वह चुन्नी कोटल का लिखा निबंध था. यह पहली बार सन् 1982 में छपा था, जिस साल उसने दसवीं की परीक्षा पास की थी. फिर चुन्नी कोटल की याद में जब 1992 में बोर्तिका का विशेष अंक प्रकाशित हुआ, तब उसमें इस लेख को दोबारा छापा गया. वह पुरुलिया के विमुक्त मानी जाने वाली लोधा समुदाय की पहली लड़की थी जिसने दसवीं, इंटर करने के बाद विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री हासिल की.
“हमारे पास कागज़, कलम और स्याही खरीदने के पैसे नहीं थे. दस पैसे में स्याही की टिकिया मिलती थी, जिसको पानी में घोलकर हम स्याही बनाते और उसी से लिखते थे. हम अपने बोड़दा (बड़े भैया) की पुरानी कॉपी में खाली पन्ने ढूंढते और उस पर लिखा करते थे. कभी-कभी मां या बोड़दा हमारे लिए कागज का जिस्ता ला देते थे, जिसे मैं और छोटा दा आपस में बांट लेते थे. इस तरह मुश्किल से जुटाए कागज पर जब हम लिखकर स्कूल ले जाते तो मास्टर साहब हमारी कॉपी उठाकर फेंक देते थे. मैं गणित के छोटे सवाल अपनी स्लेट पर हल करती थी. हमारे घर के एक कमरे का फर्श सीमेंट का था, तो जो सवाल बड़ा होता था, उसको मैं उसी फर्श पर हल किया करती थी. घर के फर्श हल किए गए सवाल मैं स्कूल में नहीं दिखा सकती थी, इस तरह मुझे सज़ा के तौर पर अक्सर क्लास के दौरान बेंच पर खड़ा कर दिया जाता था.
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आखिरकार मैंने इसका तोड़ भी निकाल ही लिया. मैं अपने रात के खाने को दो हिस्सों में बांट लेती, आधा रात में खाती और आधा सुबह के लिए रख देती. इस तरह नाश्ते का पैसा बच जाता था. पांच दिन के नाश्ते का पैसा बचाकर कागज खरीदा करती थी. लेकिन मेरे छोट दा (छोटे भैया) ने मुझे ऐसा करते देख लिया. वह मुझे अपना आधा खाना छुपाते बिल्कुल पालतू बिल्ली की तरह देखता, और अगली सुबह मैं पाती की खाना गायब है.”
16 अगस्त 1992 को चुन्नी कोटल ने आत्महत्या कर ली. विद्यासागर विश्वविद्यालय में एमए में दाखिले के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन और पश्चिम बंगाल सरकार के रवैये ने उसे तोड़ दिया था.
वह मेदिनीपुर में दलित और आदिवासी लड़कियों के लिए बने सरकारी हॉस्टल की सुपरिंटेंडेंट थी.
महाश्वेता देवी ने इस घटना पर इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में लिखा और वाम मोर्चा सरकार पर डीनोटिफाइड समुदाय के प्रति बेपरवाही और भेदभाव का आरोप लगाया. चुन्नी की आत्महत्या की खबर अखबारों की सुर्खियाँ बनी (शायद महाश्वेता देवी के दखल के कारण) और यह घटना उस पश्चिम बंगाल में लोगों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर गई, जिसे उच्च जाति के बंगालियों ने जातिविहीन समाज घोषित कर रखा था.
उसी साल 1992 के जुलाई-दिसंबर में बोर्तिका का विशेष अंक ‘चुन्नी कोटल की याद में’ छपा (संभव है कि बोर्तिका जैसी छोटी पत्रिका अक्सर समय से पीछे चलती रही हो.) इस अंक में चुन्नी कोटल का एक लेख और उसके भाई शंकर का भी एक-एक लेख छपा था. कहना न होगा कि शंकर का लेख बहुत ही मार्मिक था.
“सरस्वती पूजा के दिन, विद्यार्थी सुबह-सुबह उठने के बाद फूल और बेल के पत्ते इकट्ठा करते थे, अपने घर से चावल और फल लाते और मंडप में जाकर चढ़ाते थे. पूजा के बाद, पुजारी देवी को चढ़ाई गई हर थाली में थोड़ा सा प्रसाद वापस कर देते थे. चुन्नी को लगता था कि अगर वह भी देवी को चावल और फल चढ़ाएगी तो उसे बहुत सारा आशीर्वाद मिलेगा. हमारी मां से जितना बन पड़ा उतना उन्होंने उसे दिया—250 ग्राम चावल, दो अमरूद, एक पका हुआ केला और घर के पेड़ से तोड़ा हुआ एक पपीता. चुन्नी यह थाली लेकर गई और मंडप में रख दिया, और फिर वहीं इधर-उधर घूमने लगी. इससे पहले कभी तथाकथित नीची मानी जाने वाली जाति के किसी भी व्यक्ति ने पूजा मंडप में भोजन नहीं चढ़ाया था. इससे पहले कभी तथाकथित नीची जाति का कोई व्यक्ति प्रसाद चढ़ाने या लेने के लिए पूजा मंडप में नहीं गया था.
जब पूजा संपन्न हुई और प्रसाद बांटा जाने लगा, तब मैं मंडप में गया, थोड़ा सा प्रसाद लिया और मंडप से कुछ दूर एक पेड़ की छांव में खाने चला गया, क्योंकि मुझे डर था कि अगर वहीं मंडप में खाऊंगा तो लोग कहेंगे कि अपवित्र कर दिया. तब मैं शायद 12 या 13 साल का रहा होऊंगा और चुन्नी 10 या 11 साल की.
तभी अचानक मुझे शोर सुनाई दिया. मैंने जल्दी से प्रसाद खत्म किया और वहां गया जहां पर शोर हो रहा था. मैंने देखा कि हमारे गांव का एक आदमी चुन्नी को धक्का देते हुए बार-बार कह रहा था, “यह प्रसाद घर ले जाने के बजाय मंदिर के अंदर ही खा रही थी!” मैंने देखा कि वह उसे मंदिर से बाहर धकेले जा रहा था. जब चुन्नी ने मुझे देखा, तो वह दौड़ती हुई मेरे पास आई और कहने लगी कि “छोट दा, हमारी प्रसाद की थाली अभी भी अंदर ही है. वापस ले आओ न प्लीज़.”
मैंने थोड़ी दूर से ही गांव के एक दूसरे जान-पहचान वाले आदमी को आवाज़ दी कि वह हमारी थाली वापस कर दे. वह आदमी तुरंत अंदर गया और हमारी छोटी कांसे की थाली लेकर बाहर आया और बोला, ‘लो, ये लो अपनी थाली.’
इससे पहले कि मैं उसके हाथ से थाली लेता, उसने थाली मेरी तरफ फेंक दी. थाली कुछ दूर जाकर, एक करकश सी आवाज़ के साथ ज़मीन पर गिर गई, मां सरस्वती का प्रसाद ज़मीन पर बिखर गया. उस समय मेरा दिल यही कर रहा था कि जितनी ज़ोर से उन्होंने हमारी थाली फेंकी है, मैं उतनी ही ज़ोर से उनका मंदिर तोड़ दूं. लेकिन उस दिन हमने अपना वह अपमान सह लिया और धूल से सने प्रसाद को लेकर रोते हुए घर आ गए. हमने मन ही मन कहा, हे मां सरस्वती, आप ही इंसाफ करना.”
दोनों भाई-बहन के बयान से पता चलता है कि विमुक्त या अधिसूचित (डीनोटिफाइड) जनजातियों को किस तरह के भेदभावों का सामना करना पड़ता है, विशेष रूप से हमारे जाति आधारित समाज में जहां काफी हद तक जन्म ही यह तय करता है कि दुनिया में हमारी क्या और कहां जगह होगी. गरीबी सिर्फ पैसों की नहीं होती शायद, गहरी चोट सामाजिक अपमान से लगती है.
अगर मैं, उच्च जाति की अंग्रेजी बोलने वाली रिपोर्टर के तौर पर यह कहानी लिखती, तो क्या मैं चुन्नी कोटल की गरीबी की गहराई का अंदाज़ा लगा पाती? हो सकता है कि मैं एक ऐसी घटना की गवाह बनती जैसा शंकर ने बताया है, लेकिन शंकर का अपमान और उसका गुस्सा मैं कैसे महसूस कर पाती? मुझे वे लोग सिर्फ ‘पीड़ित’ नज़र आते, न कि ऐसे इंसान जो अपने अपमान को ताकत और धौंकनी के साथ दिल ही दिल में महसूस कर रहे हों.
उसी लेख में शंकर यह भी लिखते हैं कि वह महाश्वेता से कैसे मिले.
“प्रिय शंकर और चुन्नी,
तुम लोग मुझे नहीं जानते, लेकिन यह जान लो कि मैं तुम्हारी दीदी हूं. जितनी जल्दी हो सके, आओ और मुझसे मिलो.
—महाश्वेता देवी, 18A बल्लीगंज स्टेशन रोड
यह चिट्ठी हाथ में लिए चुन्नी मेरे पास दौड़ती हुई आई और बोली—‘छोट दा, ये महाश्वेता देबी कौन हैं?’
[महाश्वेता देवी ने चुन्नी कोटल का पहला लेख 1982 में बोर्तिका में छापा था]”
महाश्वेता देवी के बुलावे पर दोनों भाई-बहन कोलकाता गए और कुछ दिन उन्हीं के घर पर रहे.
महाश्वेता ने उनके आने-जाने का किराया भाड़ा उन्हें दिया और उनके लिए खाना भी बनाया (शंकर की नज़र में वह उसकी अब तक की ज़िंदगी में सबसे बेहतरीन खाना था). यह दिल को छू लेने वाला किस्सा है, जिससे यह पता चलता है कि महाश्वेता लेखकों की तलाश के लिए सिर्फ़ बोर्तिका में मुनादी छापने तक ही सीमित नहीं रहती थीं. क्या पता बोर्तिका के अंक रिक्शा चालकों, शिफ्ट में काम करने वाले कामगारों और स्कूल के आदिवासी शिक्षकों के हाथ में पहुंचे या न पहुंचे? महाश्वेता देवी ने उसे भाग्य पर नहीं छोड़ा, बल्कि सुनिश्चित किया. उन्होंने सबाल्टर्न या शोषित आवाज़ों की तलाश के लिए ज़मीनी स्तर पर काम किया.
तो क्या बोर्तिका अपने आप में एक अनोखी पत्रिका है? अंग्रेज़ी न्यूज़रूम के अपने अनुभव से कहूं तो वाकई आज भी इस जैसी कोई दूसरी पत्रिका नहीं है. बीस साल पहले मैं एक अंग्रेज़ी साप्ताहिक में काम किया करती थी. उस ज़माने में संपादकों का ज़ोर ज़मीनी आवाज़ों को बढ़ावा देने पर था लेकिन वह ‘जैसा उन्होंने कहा’ वाले फॉर्मैट पर होता था. क्योंकि ऐसे लेखकों की तलाश करना और उनके लिखे को संपादित करना बहुत मेहनत का काम माना जाता था. इस व्यवहारिक सोच के पीछे यह अहंकार छिपा था कि —मज़दूर वर्ग का व्यक्ति अच्छा लेखक नहीं हो सकता, इसलिए उनकी तरफ से हमें ही लिखना होगा. हालांकि ढूंढते हुए इंटरनेट आपको हिंदी की पत्रिका हंस तक लेकर जाता है जिसे कभी मशहुर लेखक मुंशी प्रेमचंद्र ने शुरू किया था. कुछ कारणवश ये पत्रिका बंद हो गई थी और बाद में इसे लेखक-संपादक राजेन्द्र यादव ने 1986 में दुबारा फिर से नया जन्म दिया. राजेंद्र यादव ने हंस में लिखने के लिए दलित लेखकों की तलाश में खूब पसीना बहाया. हंस को आज भी हिन्दी जगत में सबसे बेहतरीन पत्रिका माना जाता है.
मनोरंजन ब्यापारी ने भी ‘अदल-बदल’ और ‘एखोन-तखोन’ जैसी बंगाली पत्रिकाओं का ज़िक्र किया था, जिनमें से पहली वाली का दरवाज़ा सिर्फ़ दलितों के लिए नहीं बल्कि हाशिये के सभी समुदायों के लिए खुला था. वर्ष 2000 में अरुण सेल्वा, जो एक पत्रकार हैं, चौथी क्लास के बाद उनका स्कूल छूट गया था; ने झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों के अनुभवों और समस्याओं को दर्ज़ करने के लिए स्लम जगत्तु पत्रिका शुरू की थी. यह पत्रिका नियमित रूप से तो नहीं निकल पाती, लेकिन अब भी निकल रही है. संभव है कि कुछ और ऐसी पत्रिकाएं हों, जिनके बारे में मुझे नहीं पता. खैर, इस सबके बावजूद, यही सच है कि महाश्वेता के बोर्तिका की कमान संभालने और यह दिखाने के लगभग 46 साल बाद भी, कि कोई पत्रिका किस तरह से सामाजिक न्याय के लिए काम कर सकती है, हाशिए की आवाज़ को प्रकाशित करने वाली पत्रिकाओं की संख्या आज भी न के बराबर ही है.
क्या बोर्तिका अपने-आप में बिल्कुल परफेक्ट थी? मैं कहूंगी कि हां, काफ़ी हद तक! लेकिन अगर मैं यह न कहूं कि महाश्वेता ने जो काम किया, उसे और बेहतर ढंग से कर सकती थीं, तो यह भी उनके साथ एक तरह से नाइंसाफ़ी ही होगी. हंस की तरह उन्होंने भी हाशिये की नयी आवाज़ों को तलाशा, उन्हें बोर्तिका में लिखने के लिए प्रेरित किया, लेकिन उनकी कहानी-कविता नहीं छापी, जैसा कि हंस ने किया. बोर्तिका में ऐसे लेखकों के केवल निजी अनुभवों पर आधारित लेख और रिपोर्ताज ही छपे. कहानी-कविता भी छपी, लेकिन यह मुख्य रूप से महाश्वेता के परिजनों की ही लिखी हुआ करती थी. ब्यापारी कहते हैं, “और भी लेखक थे जिनकी कहानियां उन्होंने छापी थीं; मुझे अभिजीत सेन याद हैं. जब मैंने अपनी एक कहानी भेजी, तो उन्होंने कहा कि हम रिपोर्ट और विश्लेषण वाले लेख छापते हैं. इसी वजह से मैंने कई सालों तक बोर्तिका में लिखना बंद कर दिया, क्योंकि मैं कहानियां लिखना चाहता था.”
दूसरे शब्दों में कहें तो यहां लोगों में एक तरह की छंटनी की जाती थी, दर्जाबंदी की जाती थी कि किन लोगों की कहानियां छापी जाएंगी और किन लोगों के अनुभव आधारित लेख और रिपोर्ट छापे जाएंगे. संपादकीय नियंत्रण, हमेशा महाश्वेता देवी और उनके संपादकीय सहयोगियों (भाई मैत्रेय घटक और साथी निर्मल घोष) के हाथों में ही रहा. सच कहूं तो प्रगतिशील सोच के बावजूद, बोर्तिका वास्तव में प्रतिनिधित्व की एक परियोजना भर थी. निश्चित रूप से यह परिजोयना बहुत ही बेहतरीन थी, लेकिन सत्ता का नया ढांचा तैयार करना या पुराने को तोड़ना इसका मक़सद नहीं था.
अगर ऐसा होता तो वह मनोरंजन ब्यापारी जैसे किसी जाने-माने व्यक्ति को पत्रिका की कमान सौंपतीं और सही समय पर खुद को अलग कर लेतीं. खैर, भारत में ज़्यादातर संस्थाओं (चाहे वह कोई औद्योगिक समूह हो, स्कूल हो या पत्रिका) के साथ यही समस्या है कि उनके संस्थापक नियंत्रण का मोह नहीं छोड़ पाते. लेकिन यह भी सच है कि अगर किसी से यह उम्मीद की जा सकती थी कि वे उस रास्ते पर चलें जिस पर कम ही लोग चलते हैं, तो वह निश्चित रूप से महाश्वेता देवी ही हो सकती थीं.
इस लेख का अनुवाद अकबर रिज़वी ने किया है.
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सोहिनी चट्टोपाध्याय राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फिल्म समीक्षक हैं और 'द डे आई बिकम ए रनर' किताब की लेखिका हैं. यह पुस्तक खेल के नज़रिए से भारत में महिलाओं की नागरिकता के सवाल को दर्ज करती है. वर्तमान में वे महाश्वेता देवी की जीवनी पर काम कर रही हैं.


