एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ एक ट्रांस मुस्लिम महिला की पहचान के साथ फील्ड पर काम करना कैसा होता है? बदलती कानूनी परिभाषाओं के बीच ट्रांस समुदाय के रोज़मर्रा के संघर्ष क्या हैं? क्या है जो उन्हें एक-दूसरे से जोड़े रखता है? हमारे मन में ऐसे कई सवाल थे जिनका जवाब जानने के लिए हमने सामाजिक कार्यकर्ता और ट्रांस समुदाय के लिए हेल्थ प्लेटफॉर्म की शुरुआत करने वाली अदा से मुलाकात कर उनसे उनके काम और एक समुदाय की पहचान से जुड़े संघर्ष के बारे में जानने की कोशिश की. अदा, मुंबई में पली-बढ़ी और वहीं काम करती हैं और खुलकर ट्रांस समुदाय से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार रखती हैं. पढ़िए इस बातचीत से एक संक्षिप्त अंश.
टीटीई: क्या आप अपने काम के बारे में थोड़ा बताएंगी कि इसकी शुरुआत कैसे हुई?
अदा: मेरी फील्ड मुम्बई में कमाठीपुरा थी. मैं वहां एक सामाजिक संस्था के साथ जुड़ी थी और ट्रांस समुदायों के बीच एचआईवी के मामले में मदद करने का काम करती थी. लोगों को उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देना, बातचीत करना, उनकी प्रॉब्लम सुनना, जो नए बच्चे आ रहे थे उनको समझाना, इस तरह मैंने अपने काम की शुरुआत की.
फील्ड में मैंने देखा, लोग गांव छोड़कर मुंबई काम करने आते हैं, मगर उनको तो किसी चीज़ का कुछ आइडिया भी नहीं होता. उनमें से कितने लोगों का बस यही था कि शनिवार-रविवार सेक्सवर्क कर लिया और निकल गए. तो उनमें से बहुत सारे लोग एचआईवी पॉज़िटिव निकले. बहुत लोकल भी होते थे जो एचआईवी पॉज़िटिव थे. उनसे कनेक्ट करके उन्हें सपोर्ट देने का काम किया मैंने. इस तरह लोगों का मुझपर भरोसा बढ़ा. फील्ड पर मैंने दोस्ताना रिश्ते बनाए. अभी जो मेरा फ्रेंड सर्कल है वो सब उसी वक्त का बना हुआ है. मैंने बहुत बड़ा नेटवर्क बनाया.
टीटीई: एचआईवी पर काम करने पर किस तरह की चुनौतियां सामने आती हैं? और इससे निकलने के लिए आप किस तरह की रणनीतियां बनाती हैं?
अदा: आज भी एचआईवी रोकथाम के काम में बहुत चैलेंज आते हैं. पहली संस्था के बाद जब मैं दूसरी संस्था के साथ जुड़ी तो वहां मेरा काम लोकल मंडल, पुलिस स्टेशन और हॉस्पिटल के बीच कॉन्टैक्ट करना था. साथ में पॉलिटिशियन से भी कनेक्ट करना होता था.
जैसे अगर कोई पॉज़िटिव आया तो मैं उसे लेकर सेंटर जाती, बातचीत करती. पर हॉस्पिटल के ओपीडी वाले सिस्टम में बहुत बार तमाशा होता था. एक बार तो एक तमाशे वाला सीन मेरा पूरा वायरल हो गया था. डॉक्टर देखने से मना कर रहा था. मैंने भी ताली बजाना शुरू कर दिया. मेरे पीछे से मेरा जो स्टाफ था वो भी ताली बजाने लग गए. डॉक्टर पूरी तरह डर गए. मैं लड़ने लग गई थी, “लिख कर दो कि नहीं देखेंगे तभी हटूंगी. आपने लिखा नहीं तो लोगों को बुला कर बिठाउंगी रात भर.”
बहुत बार ऐसा करना पड़ता है नहीं तो वो सुनते ही नहीं. ट्रांस है, हिजड़ा है, कहकर मरीज़ को देखने से इंकार कर देते हैं.
कई बार पुलिस चौकी में भी ऐसा करना पड़ता है. मेरी एक फ्रेंड को पुलिसवाले उठाकर ले गए. मैं नई-नई गई थी, उसके एरिया में रहने के लिए. किसी लड़के ने उसकी बहन, जो कि 22-23 साल की थी, उसको छेड़ा. वो झगड़ा करने गई तो उसी एरिया की औरतों ने आकर उसको मारा और चौकी में उसपर आरोप लगाया कि उसने उनके ऊपर हाथ डाला है. उनमें से एक लड़की मैक्सी वगैरह फाड़कर जाकर खड़ी हो गई थी.
रात के 1.30-2 बज रहे थे. हम सब पुलिस स्टेशन में थे. अभी इस गलत आरोप में उसको बुरी तरह फंसाने वाले थे सभी. मैंने उसको बोला कि,
“तो तू ताली क्यों नहीं बजाई?” वो बोली, “नहीं. मेरे मॉम-डैड हैं. उनके सामने ऐसा कैसे कर सकता हूं मैं.” मैंने कहा, “अब अगर अभी तू ताली नहीं बजाएगी, तो तेरे पर वो बलात्कार वाला केस लगा देंगे और तू अंदर चली जाएगी.”
पुलिस स्टेशन में हम तीन लोग गए थे. पहले तो हमें हमारी फ्रेंड से बात करने नहीं दिया. मैंने बोला, “मैं सोशल वर्कर हूं, आपने उसे क्यों पकड़ा, वो हमारी कम्युनिटी से है… वो इस तरह से हरकतें नहीं कर सकता. आप उसको छोड़ दो…” पर पुलिस वाले ऐसा है, वैसा है, करके बोलने लगे और फिर वो सुनने को तैयार नहीं थे.
बाद में मेरी फ्रेंड अंदर से रोते हुए आई और दिखाया कि उसको कितना ज़ोर का मारा था. मेरा खोपड़ी खसका. मैं ज़ोर-ज़ोर से धनाधन ताली बजाने लग गई. पूरे पुलिस स्टेशन के ऑफिसर बाहर आ गए. मेरे पीछे से मेरी दोनों दोस्त भी इसमें शामिल हो गईं. अब आमने-सामने की बिल्डिंग के लोग खिड़की से झांकने लगे. मैं पूरा तमाशा कर रही हूं. ज़ोर-ज़ोर से, “तुमने मारा कैसे! पहले तुमने इंक्वायरी की? क्या वो आदमी है? क्या हिजड़ा है? तुमने उसको पूछा क्या? तुमने ऐसे कैसे मारा?” उसको टीबी का इन्फेक्शन हुआ था. इसलिए मैं ज़्यादा सीरियस हो गई थी.
मैंने बहुत तमाशा किया. अब उस औरत के साथ लोकल लीडर भी आ गए थे. वो सब आकर बात करने लग गए. बहुत बहस हुई. हम तीनों दोस्तों ने सबको खूब सुनाया. वहां ये सब चल रहा था तभी मेरे पास फोन आया कि एक बुज़ुर्ग हिजड़ा था उसकी डेथ हो गई, उसकी बॉडी लेकर जानी है. हमें जाना था, तो हम ये कहकर वहां से निकले कि हम फिर आएंगे!
टीटीई: पहचान, हिंसा, पुलिस, हॉस्पिटल ये एक चक्र है जिसके धागे ट्रांस समुदाय के हर एक व्यक्ति के साथ जुड़े होते हैं. ऐसे में समुदाय के लोगों के साथ, उनके लिए, काम करने का मतलब क्या है? क्या है जो आपको समुदाय के साथ काम करने के लिए आकर्षित करता है?
अदा: मुझे ये काम करना पसंद है. मैंने हमेशा मेरी कम्युनिटी को हर जगह पर अकेला देखा है. और मैंने ये भी देखा है कि जब अकेले होते हैं, तो फिर अकेले, अकेले मिलकर एकजुट बन जाते हैं.
मैं जानती हूं मेरी फीलिंग्स क्या हैं. मेरी फीलिंग्स मेरे लोग समझ सकते हैं क्योंकि उस कोथी के साथ जो बीत रही थी, उसके लिए कोई आगे नहीं आया, न फैमिली, न समाज, न कोई और. अगर मैं नहीं जाती तो सच में वो अंदर चली गई होती. उस वक्त मुझे लगा कि कहीं न कहीं ये तमाशा करना ज़रूरी होता है और दूसरा मुझे मेरी कम्युनिटी के लिए खड़ा होना ही पड़ेगा ना.
अगर मैं उसको सपोर्ट नहीं करती तो वो किसके पास जाती?
मतलब एक छोटी सी बात बताऊंगी. पहले मैं सोचती थी कि हमें कौन देखेगा, जब तक जवान हैं तब तक कमा रहे हैं. सब चीज़ें तब तक अच्छी हैं. पर एक समय के बाद जहां पर शायद शरीर साथ देना छोड़ दे, या कमज़ोर पड़ जाए, तो एक तो सबसे पहले फैमिली साथ छोड़ देगी, दूसरा हम भाई-बहन पर भरोसा करके नहीं रह सकते क्योंकि उनका अपना परिवार है. वो आकर एक ग्लास पानी पिला देंगे, उतना काफी होगा. अगर आप पार्टनर का सोचोगे तो पार्टनर का भी वैसे ही रहेगा. आज चाहे मैं जिससे जितना भी प्यार कर लूं, वो मेरे से प्यार भी करे, मेरे साथ में भी रहे, पर एक टाइम आएगा उसके बाद उसको लगेगा, ‘अरे ये तो बच्चा नहीं कर सकती, मुझे तो बच्चा चाहिए.’
फैमिली और समाज का जो स्ट्रक्चर है, कहीं न कहीं उस पर वो प्रेशर आएगा. फिर वो चला ही जाएगा. आज नहीं तो कल. उस समय मुझे अकेले ही जीना है. तब मुझे लगता था कि जब हमें अकेले ही जीना है तो क्यों ना तू मेरे लिए खड़ी हो और मैं तेरे लिए खड़ी रहूं.
तब से ही मैंने अपने लोगों को अपने साथ बांधना शुरू किया.
एक तो यह भावना होती है कि हमें किसी और के लिए खड़े होना है. है ना?
टीटीई: आप मुंबई में बड़े होेने और काम के शुरुआती अनुभवों के बारे में कुछ बताएंगी?
अदा: मेरी मां हिंदू है और मेरे पिता मुस्लिम. 2007 में मेरे पिता ने हमारी लैंडलेडी से हमारा घर खरीदा और उसी साल से घर को लेकर हमारा कोर्ट केस चालू हो गया. असल में किसी वजह से लैंडलेडी का मर्डर हो गया था और एक आदमी जो उनके साथ रहता था उसने फर्ज़ी तरीके से हमारे घर के ज़मीनी कागज़ात हासिल कर लिए, और हमें घर से बाहर निकालने के लिए आ गया. मेरी मां, मेरे पिता की दूसरी पत्नी है. उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी गरीबी में बिताई थी. ये घर उनके लिए सब कुछ था. 2011 में जब मेरे पिता की डेथ हो गई, तो मम्मी को कुछ पता नहीं था कि घर को लेकर क्या करना है. मेरी उम्र 14-15 साल की थी. वहीं से कानून के साथ मेरी पहली मुलाकात की शुरुआत होती है.
हमारा चॉल है और वहां कोई 48-49 फैमिली रहती है. हमारा घर अकेला मुस्लिम परिवार है. हमने यही देखा कि एक भी फैमिली ने आकर हमारी मदद नहीं की कि कोर्ट में क्या कैसे होता है, क्या करना चाहिए, क्या पेपर होना चाहिए. अब सब कुछ मेरे ऊपर आ गया. मैं पार्ट-टाइम काम करने लगी क्योंकि हर तारीख पर वकील को पैसा देना होता था. धीरे-धीरे मैं दिन में सोशल सेक्टर में एक फुल टाइम नौकरी करती और बाकी समय में छोटे-मोटे काम करती ताकि हमारा घर चल सके. मैं पुणे भी गई क्योंकि वहां सैलरी अच्छी थी. पर पैसा कहीं बचता ही नहीं था. मैं तारीख के समय पुणे से सुबह की ट्रेन लेती क्योंकि उसका किराया सस्ता होता था. दिन भर कोर्ट के चक्कर लगाती और रात जब घर पहुंचती तो घर में कुछ खाने को नहीं होता. कभी सूजी में करी पत्ते का फोरन डालकर उपमा बनाती और उस दिन कुछ तो पेट में गया, ये सोचकर सो जाती. फिर 2018 में हम ये केस हार गए. अब सवाल यही था कि घर चला गया तो हम कहां जाएंगे? मैं कहां जाउंगी?
मेरा पूरा मामला मशीन जैसा था. काम करो, घर चलाओ, कोर्ट-वकील का पैसा भरो, काम करो. कोई आराम नहीं था. मैं ठहरकर ये भी नहीं सोच पा रही थी कि पैसे कमा रही हूं लेकिन मेरे हाथ में एक पैसा नहीं होता. कभी लगता था कि इतने पैसे जो कोर्ट-कचहरी में दिए, अच्छा होता कानून की पढ़ाई कर लेती तो पैसे बचते! खुद का केस लड़ लेती! बहुत ही स्ट्रगल का समय था वह. 2022 में फिर हम अपना केस हार गए. इस बीच हमारा चॉल सुनसान जगह से एकदम फेमस जगह में तब्दील हो गया था. इसके बगल में मुंबई का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बन गया, पैसे वाले लोग इसके आसपास आकर अपना बंगला बनाने लगे. और हम अपना खरीदा हुआ घर किसी तरह बचाने की जद्दोजहद में लगे थे. कुछ तो अजीब था. मैं सोशल सेक्टर में उन लोगों से मिलती जो ज़िंदगी और सम्मान के लिए लड़ रहे थे, मैं उनके साथ खड़ी होती. फिर लौटकर लगता कि कल, लौटने के लिए ये घर भी होगा कि नहीं. हम अपील करते और केस हारते जाते. आखिरकार 2025 में मैंने लैंडलॉर्ड के साथ सेटलमेंट किया जिसके लिए मैंने बहुत बड़ी रकम चुकाई. अभी भी चुका रही हूं.
टीटीई: कानूनी संघर्ष आपके जीवन में बहुत शुरू से ही शामिल रहा, वो क्या है जो आपको रोज़मर्रा की लड़ाइयों के साथ-साथ अचानक कानूनी अधिकारों में आए बदलाव से जो परेशानियां नए सिरे से खड़ी होती हैं, इन सबसे लड़ने की ताकत देता है?
अदा: मैंने बहुत सारे फ्रेंड्स को देखा है. एचआईवी के कारण बहुत सारे लोग ऑफ हो गए, जिनको प्रॉपर ट्रीटमेंट या इलाज नहीं मिला. तो मुझे लगता था कि हमेशा उनको सपोर्ट करना है. उनको प्रॉपर गाइडेंस देना है, उनके साथ में खड़े रहना है, उनको आगे की ज़िंदगी के लिए अच्छा जीने के लिए मोटिवेट करना है, तो शायद ये कारण हो सकता है.
फिर जब मैं फील्ड पर काम कर रही थी, मुझे बहुत कुछ सुनना पड़ता था. जब भी मैं कोई लोकल मंडल, हॉस्पिटल या पुलिस स्टेशन जाती, वहां सभी लोगों के कॉमन सवाल होते थे: तुम लोग हमेशा सेक्स वर्क ही क्यों करते हो? तुम्हारे लोग हमेशा बेगिंग (मांगने का काम) ही क्यों करते हैं? जब लोग पूछते थे, तो मैं उनके सवालों को हमेशा मज़ाक में उड़ा देती थी, पर ये दिमाग में घर कर गए थे. तभी से मेरे दिमाग में था कि कम्यूनिटी के लिए पैसा जनरेट करना है और लोगों की जो हमारे प्रति मेन्टैलिटी है, उसे थोड़ा सा मैं चेंज करना चाहती थी. कि हां, हम भी काम कर सकते हैं! इसलिए मैंने कम्युनिटी में बहुत सारे लोगों को जॉब के लिए मोटिवेट किया. जॉब पर लगाया. अगर कुछ दिक्कत आई है तो जाके बात की, सॉल्व की है. तो ये एक कारण है.
मुझे हमेशा से ऐसा लगता था कि हमें नौकरी करनी चाहिए.
मुझे बहुत खुशी होती है. मेरी कम्यूनिटी में जो युवा पीढ़ी है, जिनको मैं बच्चे जैसा मानती हूं या बच्चा बोलती हूं, वे अपने काम को सबसे आगे रखते हैं. मेरी एक फ्रेंड बोलो या बच्चा बोलो, जिसको मैं जानती हूं, मेरे सामने ही हिजड़ा बनी. मैंने उसको देखा कि एक तरफ वो एजुकेशन ले रही है और दूसरी तरफ नौकरी कर रही है, और उसने हिजड़ापन भी नहीं छोड़ा. मतलब वो हिजड़ापन भी खेल रही है, पर जॉब करना ज़्यादा पसंद करती है. तो मुझे बहुत खुशी हुई. जब मैं लोगों से मिलती हूं तो बातचीत में वे बोलते हैं कि कहीं न कहीं ये तुमसे सीखा है.
कुछ भी कर लो हिजड़ापन, हिजड़ापन की जगह पर है, जोगतपन, जोगतपन की जगह पर है. पर लाइफ में अपनी जॉब को बनाए रखने के लिए हमें काम करना चाहिए. तो आज जब उनको काम करते हुए देखती हूं तो थोड़ी ज़्यादा खुशी होती है. जो आने वाली पीढ़ी है, वो काम कर रही है और उसकी जो आने वाली पीढ़ी होगी, वो और ज़्यादा मेहनती होगी, कुछ नया स्टार्ट करेगी.
टीटीई: नौकरी और हिजड़ापन? इसके बारे में थोड़ा विस्तार से बताएंगी?
अदा: हिजड़ापन और जॉब इन दोनों में फर्क है. जहां आपको आसानी से पैसा मिल सकता है उसे छोड़कर महीने में एक थोड़ी सैलरी कमाने के लिए काम करना बहुत अच्छी बात है. जैसे मैं सुबह उठकर मांगने जाती हूं, अगर मैं उसी जगह की हूं तो मतलब… वहीं की बच्ची सुबह उठकर घूमेगी तो मेरे हिसाब से चार-पांच हज़ार कमा ही लेगी. फिर भी वो इसे छोड़कर महीने के 12 से 15,000 रूपए में काम कर रही है. फिर अगर वो बहुत सुंदर है तो वो चाहे तो सेक्स वर्क करके भी कमा सकती है. हालांकि करती भी हो बाद में, वो अलग बात है और मांगती है, वो भी अलग है. पर उसने इस सब को दोएम दर्जे पर रखा है. पहले जॉब है, ये चीज़ अच्छी लगती है.
नौकरी या काम करने वालों का नंबर बहुत ज़्यादा नहीं है, पर मुझे पता है कि बहुत सारे लोग ऐसा कर रहे हैं, मुझे इस बात की खुशी है. थोड़ा तो माहौल बदल रहा है, ये बहुत खास है.
टीटीई: वो कौन से पल या कहानियां हैं जिनकी वजह से आपको लगा कि अब मैं समझ रही हूं कि मैं काम क्यों करती हूं?
अदा: हां, याद है. बहुत हैं. मुझे उस वक्त लगा कि ये काम करके मुझे खुशी महसूस हुई जब मैंने किसी की ज़िंदगी बचाई. मेरी बहुत क्लोज़ फ्रेंड है. नाम नहीं लेना चाहूंगी. मुझे फील्ड पर ही मिली. उम्र में मुझसे 15 साल बड़ी है. पर हम अच्छे फ्रेंड्स हैं. वो नई-नई इस फील्ड में आई थी, उसको मैंने वॉलिंटियर के रूप में हमारे ऑफिस से जोड़ा. उस समय उसको पता था कि वो एचआईवी पॉज़िटिव है. उसने शायद 8 साल या 7 साल पहले ही चेकअप करवाया था. पर डर के मारे उसने कभी ट्रीटमेंट नहीं किया.
2012 या 13 के आसपास की बात है. अचानक वो मुझे बहुत ज़्यादा बीमार दिखी. हम साथ काम करते थे तो शायद उसको मुझपर भरोसा हुआ और एक दिन मुझे रोते-रोते उसने कहा, “देख न! मेरी तबीयत बहुत डाउन होने लग गई है. ऐसा है, वैसा है.” मैंने बोला, “तू चेकअप करवाई है न?” इससे पहले तक वो हमेशा झूठ बोलती रही थी. उस दिन कहा, “हां, मैंने करवाया है.”
मैं उसको प्राइवेट हॉस्पिटल लेकर गई, गवर्नमेंट में नहीं क्योंकि उसको लग रहा था कि समाज के सामने आ जाएगा. उसको डर था. वो खुद में हमेशा फाइनेंशियली बहुत स्ट्रांग रही है. पर उस वक्त उसका थोड़ा लो हो गया था. तो हमने उसका बेसिक डॉक्टर कंसल्टेशन करवाया.
उस वक्त डॉक्टर ने 5000 लिए थे. सीटी, एक्स-रे और सब प्राइवेटली टेस्टिंग का अराउंड 12-13000 चला गया. अब सब चीज़ें करके पता चला कि उसको एचआईवी के साथ टीबी भी है. तो उस वक्त मुझे ये हो गया कि – मेरी दोस्त है तो कुछ न कुछ करके उसे बचाना है.
दवाइयां शुरू हुईं और वो थोड़ा बेहतर होने लगी. एक-डेढ़ महीने हमेशा उसके साथ दवाखाने आती रही थी. एक दिन उसने उसकी बड़ी बहन और भाई को हॉस्पिटल बुलाकर बोला, “देख! मेरे को ऐसा-सा बीमारी है और ये मेरी फ्रेंड है, अदा, ये सब मेरा कर रही है.” उसने मुझसे कहा, “कल के दिन मेरी फैमिली तेरे पर उंगली उठा के बात नहीं करना चाहिए.” छह महीने बाद माशाल्लाह बहुत अच्छे से खड़ी हो गई. उसने ऑफिस जॉइन किया.
मैं जितना भी करती गई, उतना मुझे रिटर्न आता गया. पता नहीं कैसे, पर आता गया है. उस वक्त वो मुझे इतना थैंक यू बोलने लग गई, “तू मेरी ज़िंदगी में आई, शायद मेरे घर वाले मेरे लिए इतना नहीं करते. मुझे कब का छोड़ दिए होते.” मैं उसको हर दो दिन में मिलने जाती, जाने के टाइम पर चिकन-मटन कुछ लेकर जाती, कुछ फ्रूट्स लेकर जाती. कुछ मेडिसिन चाहिए, हर दो दिन में मेरा उसके घर में एक चक्कर रहता. साथ में लेकर घूमती, बातचीत करती, उसको मोरल सपोर्ट देती. जब वो खड़ी हुई न, तब मुझे ऐसा लगा कि हां मेरे काम का कुछ तो अच्छा मिला. क्या बोलते हैं उसको, कैसे समझाऊं! मेरे पास वर्ड नहीं.
ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिनको मैंने कनेक्ट किया. यूपी, बिहार से मुंबई में काम करने आते हैं. हमारे कम्युनिटी के लोग हैं, जो सेक्स वर्क करते हैं. फिर एचआईवी होता है. तो उनको भी कनेक्ट कराना.
मैं मदद करती हूं लेकिन नाम कहीं बाहर आने नहीं देती क्योंकि प्राइवेसी बहुत बड़ी चीज़ है. तभी तो हमारा ट्रस्ट बनता है.
में जब भी उनके घर पर जाती हूं, तो मुझे एकदम, जैसे कि मैं बहुत बड़ी सेलिब्रिटी हूं, वैसा ट्रीट करते हैं. उन्होंने जो रिस्पेक्ट दिया, उससे मुझे मेरे काम में वो मोटिवेशन मिला कि हां, मैं कुछ कर रही हूं. तो, बहुत सारे फ्रेंड्स की अलग-अलग स्टोरीज़ हैं. जहां पर ये समझ में आता है कि हमारे लिए कोई नहीं है. तो हमारे लिए हमें ही खड़ा होना है.
टीटीई: क्या कभी कोई ऐसा भी दौर आया जब आपको लगा कि मैं यह काम छोड़ दूं, यह बहुत मुश्किल है?
अदा: लाइफ में एक ऐसा भी दौर आया पूरा मोटिवेशन मेरा डाउन हो गया था. मेरे सब कुछ करने के बाद भी, मैं अपनी दोस्त सलमा को नहीं बचा पाई. तब मैं लिटरली बहुत रोई. तब ऐसा लगा कि मेरा पूरा काम करने का कोई फायदा नहीं है. मैं मंदिर गई, मैं दरगाह गई. उसके लिए प्रार्थना की, दुआ की कि हां, बस बच जाए. मुझे बीच में थोड़ा सा वो घमंड भी आ गया था कि, ‘अरे हां कोई दिक्कत नहीं, मैं देख लूंगी.’ लेकिन सलमा के जाने से वो घमंड पूरा टूट गया.
आप फंडर मीटिंग या कंसल्टेशंस में जाते हैं और वे वहां एक शब्द का इस्तेमाल करते हैं कि आप अपने काम का सक्सेस रेट बताइए. और मैं जिस तरह समुदाय में काम करती हूं, वो कॉर्पोरेट फंडर की भाषा में कभी फिट नहीं हो सकता. उन्हें कभी नहीं समझ आ सकतीं, इसमें सक्सेस रेट और फेलियर रेट की बातें.
आप एक रिपोर्ट में, एक किताब में कैसे बताएंगे कि कैसे और क्या लगता है किसी को एचआईवी से निकालने के लिए? यह कोई एक दिन का काम नहीं है, यह सालों का रिश्ता है.
जब कोई बीमार होता है तो एक वक्त ऐसा आता है, जब लिटरली उसका कॉन्फिडेंस लो होता है, तब आपका भी कॉन्फिडेंस लो होने लग जाता है. मैं उस लेवल तक गई हूं जहां वो मर रहा है और ऐसा लगेगा कि तुम मर रहे हो. अपनी दोस्त सलमा के साथ, मैं इसे नज़दीक से महसूस कर चुकी हूं.
सलमा के घरवालों ने जहां उसे एडमिट किया, वहां से निकालकर मैंने उसे प्राइवेट में एडमिट किया. फिर मैंने वहां के उसके सारे खर्चे उठाए. जितना हो सके मैंने किया. लेकिन एक लिमिट के बाद मेरे पास ही पैसा नहीं बचा. मैंने उसकी मां से कहा, “थोड़ा आप खर्चा उठाओ, बाकी मैं देखती हूं”. पर उसकी मां ने उसे प्राइवेट से निकालकर वापस सरकारी अस्पताल में डाल दिया. वहां फिर से उसका इलाज ज़ीरो से शुरू हुआ क्योंकि गर्वमेंट की ये पॉलिसी है. नए सिरे से टेस्ट करेंगे. प्रोसेस मतलब कम से कम 8 से 15 दिन की देरी और उसकी बॉडी को एक बार गोली स्टार्ट करके फिर स्टॉप करना. नतीजा वो धीरे-धीरे डाउन होने लगी.
उसकी आंखों में मेरे प्रति विश्वास था कि अदा मेरे को इससे निकाल लेगी, मैं उसको फुलफिल नहीं कर पाई, वो इतना तकलीफदेह था. मैं दो दिन के लिए खुद को घर में बंद करके रही क्योंकि मुझे पता था कि अभी जो होगा वो बहुत गंदा होगा. मुझे अंदर से इतना गंदा वाला फीलिंग आ रहा था और दो दिन बाद, रात को, मुझे उसकी फ्रेंड्स का फोन आया, “ये ऐसा-सा बात है सच है क्या?” उसकी सिस्टर ने, उसकी फैमिली ने मुझे फोन करके नहीं बताया.
उसके मरने की खबर सुनकर, मुझे कुछ पता नहीं था कि मैं क्या करूं! मैं ऐसी आधा घंटा बैठी हूं सिर्फ घर के अंदर. उसकी और मेरी पूरी स्टोरी याद आने लगी. किस तरह हम घूमे, खाए-पिए, मज़ा-मस्ती की. पुलिस स्टेशन का झगड़ा, लड़कों के साथ में झगड़ा – जब 12 लड़कों ने हमपर हल्ला किया था, बाल्टियां फेंकी थीं. मुझे वो भी सीन याद है, मतलब इतना कुछ था उसका और मेरा, वो भी सीन याद है तो मतलब पूरा ऐसा आ गया.
जब मैं अंतिम बार सलमा को देखने हॉस्पिटल जा रही थी, तब सड़क पर अपनी एक और दोस्त को देखकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी. रात के 3 बज रहे थे, रास्ते में बाइक वाले, गाड़ी वाले रोककर देखने लगे क्योंकि वो मेरा ही एरिया था, वहां लोग मुझे पहचानते थे, तो आते-जाते लोग पूछने लगे कि क्यों रो रही है इतना? मैंने कुछ नहीं कहा, टैक्सी पकड़ी और हॉस्पिटल गई.
हॉस्पिटल पहुंचकर मैंने सलमा का चेहरा देखा और इतनी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उसके पास कुछ पल भी टिक पाती. उस वक्त मैं ये समझने लग गई थी कि मेरी गलती है, मैं उसको बचा नहीं पाई या मैं उसके लिए कुछ कर नहीं पाई. उसकी फैमिली से मिली, उसकी बहन मुझसे झगड़ा करने लगी कि तेरी वजह से वो हिजड़ा बना, मतलब वही सारी बातें… मैं ज़्यादा झगड़ी नहीं. मेरी दोस्त जो मेरे साथ थी उसने सलमा की बहन से कहा, “तुम्हें समझ में नहीं आया कि तुम खुद के लड़के को संभाल कर रखते, देखभाल करते. वो हॉस्पिटल में एडमिट थी, कितने दिन उसका बाप गया देखने को? उसका भाई गया? कितने दिन बहन गई? उसे देखने के लिए सिर्फ मां जाती और डब्बा छोड़कर चली आती. तुम लोग बोलते हो – मां-बाप, फैमिली होते हैं…” बाद में उसकी बहन ने मुझे सॉरी बोला.
फिर उसकी बॉडी को लेकर झगड़ा होने लगा. उसके घरवालों ने पीछे के दरवाज़े से उसकी बॉडी निकाली. वो अब भी नहीं बताना चाहते थे कि वो हिजड़ा थी. रेश्मा, मुसलमान थी तो घर वाले सीधे कब्रिस्तान में लेकर जा रहे थे. हमने झगड़ा करके कहा कि हमें आधे घंटे के लिए बॉडी दे दो, हम अपना रीति-रिवाज करेंगे और फिर रेश्मा को आपको सौंप देंगे. बहुत लड़ने के बाद हमें रेश्मा की बॉडी मिली. फिर हमने हमारा रीति रिवाज किया, जैसे साड़ी जो हम पहनाते हैं. हमने उसे पहनाया. उसको जिस तरह विदा देना था, वो किया. उसके बाद उसकी फैमिली को बॉडी वापस कर दी.
मतलब ज़िंदा रहते हुए तो परिवार वाले मानते ही नहीं, मरने के बाद भी उसे उसका सम्मान दिलाने के लिए झगड़ा करना पड़ता है.
सलमा की सच्चाई उसकी पूरी फैमिली जानती थी, पूरा खानदान जानता था पर ज़बरदस्ती उसे लड़का बनाने पर तुले हुए थे. उसके साथ जो हुआ, मुझे नहीं लगता कि किसी और के साथ हुआ होगा. वह सो रही थी. उसके बाल लंबे थे. उसके भाई ने उसके बाल काटकर गैस पर रख दिए. मतलब वो लिटरली इतना रोई थी, मेंटली बहुत परेशान रही.
इसके अलावा भी आगे बहुत सारी लड़ाई तो चलती ही रही: कभी टीजी कार्ड के लिए, कभी आधार कार्ड के लिए, कभी इलेक्शन कार्ड, कभी फैमिली की वजह से, तो आए दिन, कुछ न कुछ तो चलता ही रहता है. इसलिए अभी कोई भी चीज़ इतनी हैवी नहीं लगती कि – ओह माय गॉड, ये आ गया तो क्या होगा! इतना नहीं सोचती हूं मैं.
मुझे लगता है कि हर आने वाला दिन कुछ न कुछ लेकर आएगा और कुछ न कुछ झगड़ना ही है. कुछ न कुछ तो होगा और कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा.
टीटीई: आपके अनुसार इस दुनिया में औरत होने का क्या मतलब है? किसी के औरतपन में उसका साथ देना कैसा अनुभव है? और क्या है जो ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है?
अदा: ‘सारे ब्रह्मांड में मैंने खुद से खुद के अंदर की औरत को ढूंढकर निकाला है.’ ये हिजड़ों की कहावत है. जैसे कि हम बोलते हैं कि एक आदमी जब पैदा होता है तो उसको पता होता है कि वो एक मर्द है. एक औरत जब पैदा होती है उसको पता है कि वो एक औरत है. जब हम पैदा होते हैं, तो हम पूरी दुनिया जांचकर, घूमकर, टहलकर, ठोकर लगकर, या जो भी समझ लो आप, एक्सपीरियंस जो भी है, लड़-झगड़ कर, फिर हम खुद के अंदर से खुद की औरत को निकालते हैं.
उदाहरण के लिए, मेरी एक दोस्त है. उसने अभी सर्जरी कराई है. तो सर्जरी का दर्द, फैमिली से झगड़ा, हिजड़पन या फिर जो वो काम कर रही है, इन सब से लड़-झगड़ के आखिर में उसने खुद के अंदर की औरत को बाहर निकाला. रखा उसने अंदर? नहीं रख पाते हैं.
और आप जितना दबाओगे न, उतना ज़्यादा उछलेगा और एक दिन ऐसा उछलेगा कि आप ना चाहते हुए, समाज के सामने ताली बजा दोगे.
ऐसा भी देखा है मैंने.
क्योंकि जब खुद की फैमिली वालों से हम कंट्रोल में ना आ सके, मतलब वो हमारी भावनाओं को दबा नहीं सके, तो सरकार या समाज क्या करेगा? जिसने हमें पैदा किया हम हिजड़ों ने, उनके खिलाफ जाकर, लड़कर, खड़े होकर, खुद का अस्तित्व बाहर निकाला है.
हमें पता है कि लोग हमें किस नाम से पुकारेंगे. कोई बोलता है मामू, तो कोई मीठा चावल बोलता है, गुड़, कैप्टन, और पता नहीं क्या-क्या. इतने सारे नाम मैंने सुने हैं कि आपने सुने भी नहीं होंगे… इतना सब कि जहां हम बैठे हैं, तो वहां से लोगों को उठते हुए जाते देखा है. जो लोग हमारे पैसे से खा रहे हैं, एंजॉय कर रहे हैं फिर भी सामने बैठकर वही लोग हमें कमेंट पास करते हैं, ऐसा भी देखा है. सगी बहनों की शादी होती है, शादी के लिए पूरा पैसा दे रहे हैं, पर शादी में पैर नहीं रख सकते. क्योंकि हम ट्रांस हैं, बहन की शादी टूट जाएगी. खुद की मां की मय्यत में ऐसे नहीं चले जाते… पूरा खानदान बैठा है पास, पर हम जाकर अपनी मां का मुंह नहीं देख सकते. क्योंकि हम हिजड़ा हैं. कभी खुद का बाप उसको हिजड़ा बोल देता है, कभी सगी बहन हिजड़ा बोल देती है.
टीटीई: आप कहते हैं कि पूरे ब्रह्मांड से खुद का औरतपन ढूंढकर खुद से निकाला है. तो जब अदा अपना औरतपन ढूंढ रही थी और अपना औरतपन अंदर से निकाल रही थी, तो आपके साथ कौन था?
अदा: मेरे फ्रेंड्स, मैं झूठ नहीं बोलूंगी.
मेरे फैंड्स थे. बचपन में जैसे सबको टॉर्चर किया जाता है, वैसे मुझे भी किया गया है. हां, दोस्त समाज में सभी ने कहा, “नहीं तू लड़का है. तू ऐसा क्यों है? वैसा क्यों है?” लेकिन आप कितना भी कर लो, आपका मन मानता ही नहीं. कितनी बार मनाने की भी कोशिश कर ली, पर फीलिंग ही नहीं आती.
मुझे अभी भी याद है कि हम कहीं पिकनिक पर गए थे. मेरी फ्रेंड ने मुझे उसकी साड़ी दी पहनने के लिए. वो साड़ी पहन कर जो फीलिंग मेरे अंदर थी न, वो पूरी की पूरी ऐसे बाहर आ गई, मेरे हाव-भाव में. एक ही दिन में चलना, बातचीत करना सब अपने आप आ गया. मुझे किसी को कुछ सिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ी. मुझे कैसे बात करना है या मुझे क्या पहनना है, किस तरह करना है. तो अब समझ आता है कि मैंने अपनी फीलिंग को मेरे दोस्तों के ज़रिए ही समझना शुरू किया. उन्होंने बोला, “तुझे क्या अच्छा लगता है? वो तू बता. मतलब खुद को औरत समझता है या नहीं? खुद को किस तरह एक्सप्रेस करता है, बेड पर?” मुझे हमेशा लड़की की तरह तैयार होना, जैसी लड़कियां बाल बनाती हैं, मेकअप, मुझे हमेशा से पसंद था.
बचपन में वो टिपिकल इंडियन मेंटेलिटी वाला मेरा भी दिमाग था. शादी करना चाहती थी. मुझे एक हस्बैंड चाहिए था, मेरा अच्छा सा परिवार हो, पर जैसे-जैसे बड़ी होती गई, वो सपनों की दुनिया पूरी टूटती गई.
सपनों की दुनिया टूटी, लेकिन औरतपन बरकरार रहा. मैंने खुद को परखा, सीखा, समझा. बहुत सारी चीज़ें थीं भीतर, बहुत ही भीतर. मैं अपना औरतपन ढूंढने लग गई और खुद का औरतपन ढूंढकर बाहर निकाला. फिर सामने वालों ने मुझे उंगली से पकड़ लिया, “अरे, ये साड़ी पहनेगी!” बस पहनने से लेकर, फिर मैं कहां से कहां पहुंची, मुझे भी नहीं पता.
मतलब आपसे बात करते हुए मैं इन बातों को सोच रही थी, नहीं तो अभी तक मैंने इस बात के लिए सोचा नहीं था. ऐसे ही मैंने हमारी एक दोस्त का साथ दिया. मैंने उसे कुछ नहीं सिखाया, बस इतना कहा, “हां! ये अच्छा लगेगा.” उसके बाद वो खुद ही चालू हो गई – मुझे ये पहनना है, मुझे वो करना है. अब वो तैयार होने के लिए साड़ी पिन से लेकर गजरा तक ढूंढ निकालती है. उसने अपने अंदर की औरत को ढूंढना चालू किया, ”मुझे हार्मोन्स लेने हैं, मुझे सर्जरी करनी है, मुझे ड्रेस खरीदनी है…” अब उसकी पूरी भावना बाहर आने लग जाती है.
आपने 18-20 -25 साल तक अपनी फीलिंग्स को दबा के रखा है वो अब पूरी तरह बाहर आना चाहती हैं, जब एक बार वो औरत बाहर आती है तो फिर कभी अंदर नहीं जाती.
टीटीई: बहुत ही खूब! एक बार औरत बाहर आ जाए, फिर कभी अंदर नहीं जाएगी, नहीं दबेगी…
अदा: औरत एक बार बाहर आ गई तो नहीं रुकेगी, किसी के बाप की भी नहीं सुनेगी. फिर चाहे उसके लिए मुझे सेक्स वर्क करना हो या भीख मांगनी हो, फिर भी मैं वो करूंगी. और ऐसा नहीं है कि आप रोज़गार कमाने के लिए ऐसा कर रहे हैं. असल में आप अपने औरतपन को बरकरार रखने के लिए ऐसा कर रहे हैं.
क्योंकि औरतपन लाना इतना आसान नहीं है और इतना सस्ता भी नहीं है. सर्जरी का जो दर्द होता है, वो जब एक मां अपने बच्चे को जन्म देती है, उस तरह का होता है. और उससे बढ़कर वो दर्द सहन करके, मैं खुद बाहर निकल रही हूं. हमें यह दर्द ज़िंदगी भर सहना पड़ता है. आज भी कितने हिजड़ों की कमर दुखती है, पैर में दुखता है. बहुत सारी चीज़ें हैं इसके अंदर. इसलिए हम एक-दूसरे का बहुत ज़्यादा ख्याल रखते हैं.
इसलिए मैंने कोशिश की है कि अपने लोग अच्छे से रहें. यही कारण था कि कंपनी खोली. एक सपोर्ट सिस्टम बनाया कम्युनिटी के लिए. कितने हिजड़ों को मैंने देखा है, सर्जरी के छह घंटे बाद नीचे उतरकर घर जाते हुए. देखकर मेरा दिल ऐसा धक हुआ है. कितनों को देखा है, सर्जरी के तीसरे दिन टांका खुला है और पूरी ब्लीडिंग पर ब्लीडिंग हो रही है. रात को दो बजे दवाखाना लेकर गई हूं. एक-दो घंटे की जर्नी में पूरा सीट ब्लड से भर गया है. समाज को ये पता भी नहीं है कि हम एक औरत बनने के लिए क्या दर्द झेलते हैं. फाइनेंशियली तो छोड़ो, समाज को भी छोड़ो, खुद के शरीर के साथ में भी उसे झेलना पड़ता है.
फिर औरत को आकर बोल दो, “अरे! तूने तो ऑपरेशन करवाया है.” खुदा न ख्वास्ता, अगर तेरे को जिस दिन कराना पड़े, उस दिन तेरे को समझ में आएगा वो दर्द क्या होता है! हार्मोन स्टार्ट करना क्या इतना आसान होता है?
कुछ लोग सर्जरी करके आंध्रा से मुंबई आते हैं या आंध्रा से कोलकाता गए हैं. दर्द के मारे बस में बैठे-बैठे चिल्ला रही है. इतने दर्द के बाद जो औरतपन उनमें आया है, आपको लगता है कि वो जाने वाला है? कोई नहीं, कोई नहीं छीन सकता इस औरतपन को, कोई दिल्ली, कोई राज्य, कोई संविधान, नहीं छीन सकता है. कल भी हम थे, आज भी हम हैं और आगे भी हम रहेंगे.
-
द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.


