बिहार की ज़मीन पर आपदाएं नई नहीं हैं. यहां हर साल कभी बाढ़, कभी सूखा, तो कभी बीमारियों का कहर लोगों की ज़िंदगी को झकझोर देता है लेकिन इन आपदाओं के बीच कुछ ज़िंदगियां ऐसी भी होती हैं, जिनकी मुश्किलें सिर्फ प्राकृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी होती हैं. जहां पानी सिर्फ घर को बहाकर नहीं ले जाता, बल्कि पहचान, रिश्ते और सम्मान तक को अपने साथ ले जाता है. आपदाओं और आंकड़ों के बीच लोग होते हैं जो उस घटना को झेल रहे होते हैं, जब पैर ज़मीन पर नहीं टिक पाते और घर के सामान के साथ-साथ, न जाने किन-किन चीज़ों के साथ, आप बस बहते चले जाते हैं. इस त्रासदी से आखिरकार अगर आप बच गए तो फिर सवाल आता है कि आप हैं कौन?
बिहार के कटिहार जिले में रहने वाले मिलन और रानी (बदले हुए नाम) के लिए बाढ़ की त्रासदी को झेलना ही संघर्ष नहीं है बल्कि उस त्रासदी के बाद यह साबित करना कि वे भी इससे उतने ही प्रभावित हैं जितना कोई और, ये भी अपनेआप में संघर्ष है. उन्हें भी मदद की उतनी ही ज़रूरत है जितनी किसी और को, वह भी सम्मान के साथ. बाढ़ के पानी में डूबे गांव से लेकर शहर के अस्पतालों तक, उनकी यात्रा सिर्फ जीवित रहने की नहीं, बल्कि देखे जाने, पहचाने जाने और स्वीकार किए जाने की लड़ाई है. मिलन और रानी से ज़्यादा यह कहानी उन अनगिनत आवाज़ों की है, जो जलवायु संकट और सामाजिक भेदभाव के दोहरे बोझ तले दबकर जीने की कोशिश कर रहे हैं. अदृश्य, लेकिन अडिग.
यह लेख क्वीरबीट और द थर्ड आई के साझा मेंटरशिप कार्यक्रम के ज़रिए तैयार किया गया है. इसका मकसद उन आवाज़ों को सामने लाना है जो हिंदी में ऐसे विषयों पर लिखने की कोशिश कर रहे हैं जिसपर लगभग न के बराबर सामाग्री उपलब्ध है. इमरान खान इस कार्यक्रम का हिस्सा थे और साझा मेंटरशिप के तहत उन्होंने यह लेख तैयार किया है.
मिलन अपनी पहचान एक ट्रांसमैन के रूप में करते है. जन्म से लड़की की जो पहचान उन्हें मिली, मिलन खुद को कभी उस पहचान के साथ नहीं जोड़ पाए. पर बिहार के कटिहार ज़िले के एक छोटे से गांव में पैदा हुए बच्चे के लिए आसान नहीं था यह समझना कि बाकि लड़कियों की तरह उसे सलवार-सूट पहनना क्यों पसंद नहीं और क्यों उसे लड़कों के साथ मैदान में खेलना अच्छा लगता है.
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई वैसे-वैसे गांव में मिलन के साथ कई तरह के उपनाम जुड़ते चले गए. लोग उसे मर्दवा या मउगा कहकर ज़्यादा पुकारते थे. अक्सर यह शब्द उन लड़कियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिनके भीतर मर्दों वाले गुण दिखाई देते हैं. इसके अलावा, और भी कई खराब अर्थ लिए शब्द उनके पुकार के नाम के साथ जुड़ते रहे हैं. कभी मज़ाक, कभी गाली, तो कभी रास्ता रोककर धक्का देना. राह चलते किसी का थप्पड़ मार देना जैसी हरकतें उनके बचपन का हिस्सा रही हैं. स्कूल का भी माहौल कुछ ऐसा था जिसकी वजह से धीरे-धीरे मिलन ने पढ़ाई छोड़ दी. और रानी से शादी के बाद घर भी छोड़ना पड़ा.
रानी, पास के ही गांव की रहने वाली सिस जेंडर लड़की हैं. आर्थिक तंगी और सामाजिक परेशानियों के बीच दोनों एक-दूसरे का सहारा बने.
हर साल लौटती तबाही: मेदिनीपुर की बाढ़ का पैटर्न
मिलन और रानी फिलहाल कटिहार ज़िले के मनिहारी प्रखंड के मेदिनीपुर गांव के बाहरी हिस्से में रहते हैं. नदी और खेतों के बीच बसा यह इलाका हर साल बाढ़ की मार झेलता है. यहां बाढ़ कोई अचानक आने वाली आपदा नहीं, बल्कि एक तयशुदा नियम है. यह इलाका गंगा, कोसी और महानंदा जैसी बड़ी नदियों के संगम का भी इलाका है. यही वजह है कि मानसून शुरू होते ही गंगा और उसकी सहायक नदियों का जलस्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. पहले पानी खेतों में भरता है, फिर कच्चे रास्ते डूबते हैं, और कुछ ही दिनों में पूरा गांव पानी से घिर जाता है. कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि मेदिनीपुर एक छोटे से टापू की तरह अलग-थलग पड़ जाता है, जहां न आने-जाने का रास्ता बचता है, न ही किसी मदद का आसान ज़रिया.
यह भी कारण है कि यहां अधिकांश घर मिट्टी, फूस, तिरपाल और कच्ची ईंटों के बने होते हैं. ये तेज़ बारिश और पानी के बहाव को झेल नहीं पाते. इसलिए बाढ़ यहां सिर्फ पानी भरने की घटना नहीं होती, बल्कि यह घर, सामान, अनाज, कपड़े और रोज़मर्रा की ज़िंदगी सब कुछ बहा ले जाती है. पानी कई-कई दिनों या हफ्तों तक जमा रहता है, जिससे पीने के साफ पानी की कमी हो जाती है और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह ठप पड़ जाती हैं. लोग मजबूर होकर खुले में या दूर-दराज़ के इलाकों में जाने लगते हैं, जिससे संक्रमण और बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
मेदिनीपुर में बाढ़ का एक और तरीका है. धीरे-धीरे बढ़ना, लेकिन लंबे समय तक टिके रहना. यह अचानक आकर चली जाने वाली आपदा नहीं, बल्कि लगातार थकाने वाला संकट है. जब तक पानी उतरता है, तब तक खेत बर्बाद हो चुके होते हैं, काम बंद हो जाता है और लोगों के पास खाने-पीने का भी संकट खड़ा हो जाता है. इसके बाद शुरू होती है बीमारियों की मार.
राहत और बचाव का पैटर्न भी उतना ही असमान है. पक्की सड़कों की कमी और प्रशासनिक पहुंच का सीमित होना इस बात को तय करता है कि मदद कब और कितनी पहुंंचेगी. कई बार राहत देर से आती है, और जब आती भी है, तो वह सरकारी कागज़ों और दस्तावेज़ों के जाल में कुछ इस तरह उलझी होती है कि राहत मिलना दूर की कौड़ी सा दिखाई देता है. यह भी सच है कि यहां बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा हर साल दोहराया जाने वाला एक सामाजिक और मानवीय संकट है, जहां पानी सिर्फ घर नहीं बहाता, बल्कि लोगों की सुरक्षा, सम्मान और पहचान को भी अपने साथ बहा ले जाता है.
अगस्त 2025: जब पानी ने सब कुछ छीन लिया
मिलन और रानी का घर गांव के बाहरी इलाके की तरफ खेतों के किनारे पर है. रानी के साथ शादी के बाद मिलन के घरवालों ने उनके रिश्ते को मानने से इंकार कर दिया क्योंकि इनकी शादी किसी विधीवत रीति-रिवाज से नहीं हुई, दोनों साथ रहने लगे और रानी अपनी मांग में सिंदूर लगाने लगी, बस यही प्रमाण है कि दोनों शादीशुदा हैं. इसलिए भी लोगों की नज़र में न तो ये सामाजिक रूप से वैध है और न ही कानूनी. आर्थिक तंगी और किसी भी तरह की कोई मदद न होने के कारण दोनों ने गांव के बाहरी इलाके में खेतों के किनारे मिट्टी और फूस से अपना घर बनाया.
हर साल बारिश के मौसम के साथ-साथ बाढ़ भी चली आती है लेकिन पिछले साल अगस्त का महीना कुछ और ही था. 12 अगस्त की सुबह से ही लगातार तेज़ बारिश हो रही थी. बिना रूके अगले तीन दिन तक पानी गिरता रहा और गंगा ने अपना रूप दिखाना शुरू कर दिया. मिलन का कहना है, “14 की देर शाम हमारे घर के छप्पर से पानी टपकने लगा. तिरपाल जगह-जगह से पहले ही फट चुका था. जो कुछ मिल रहा था ईंट, बोरा सबकुछ रखकर हम घर में पानी को घुसने से रोकने की कोशिश कर रहे थे. पर देखते-देखते ज़मीन पर रखा सारा सामान पानी में बहने लगा.”
उन्होंने बताया, “हम एक सामान को पकड़ते तो हाथ में पकड़ा दूसरा सामान पानी में गिर पर बहने लगता. पूरी रात यही करते हुए बीती.” वहीं, रानी का कहना है कि बाढ़ हमने पहले भी देखी है, पर इस बार हम दोनों अकेले थे. पानी में सांप के आने का डर भी बहुत ज़्यादा था. रानी कहती हैं, “बस यही सोचते रहे थे कि किसी तरह सुबह हो.”
गांव के सरकारी स्कूल की दूसरी मंजिल और छत पर बैठकर दो दिन काटने के बाद पानी का स्तर कम होता गया और दोनों घर लौटे, पर अब घर की जगह सिर्फ कीचड़ बचा था. जो सामान था सबकुछ कीचड़ में धंसा था. अब असली संकट खाना था. दो दिन से शायद ही किसी ने कुछ खाया था. पानी के अलावा कुछ था भी नहीं. रानी कहती हैं,
“सभी का हाल एक जैसा था. जो राजा है मतलब जिसके पास पैसा है वो अपनी छत पर बैठा पानी के जाने का इंतज़ार कर रहा था और जो गरीब है वो भी. बाढ़ का पानी सबके लिए एक था.”
पर एक चीज़ थी जो सबके लिए एक बराबर नहीं थी. सरकारी राहत शिविर, जहां अनाज और दूसरी ज़रूरी चीज़ें गांववालों को दी जा रही थीं.
मिलन का कहना है कि, “वहां पुरुषों की लाइन अलग और महिलाओं की अलग लाइन थी. पहले तो मुझे पुरुषों की लाइन में लगने नहीं दिया गया. लोग मुझे मउगा, मउगा कहकर लाइन से बार-बार बाहर निकालने लगे.” रानी महिलाओं की लाइन में लगी थी लेकिन बारी आने पर उससे घर के मुखिया का नाम पूछा गया जो लिस्ट में दर्ज हो. वहां दोनों का ही नाम दर्ज नहीं था. थोड़ा हंगामा करने के बाद उन्हें बोला गया कि राशन परिवार के नाम के आधार पर ही दिया जाएगा. उन्हें गांव के सरपंच से अपने नाम की पर्ची लिखवाकर लाने के लिए कहा गया.
दोनों शादीशुदा हैं लेकिन किसी रिकॉर्ड में नहीं. उन्हें भी पता था कि गांव में कोई भी उनके नाम की पर्ची लिखने से मना कर देगा क्योंकि उन लोगों की नज़र में ये कोई रिश्ता नहीं है. रानी का कहना है, “हम परिवार की श्रेणी में नहीं माने गए – न कागज़ों में, न ही राहत देने वालों की नज़र में.” दोनों ने घरवालों से संपर्क कर राशन हासिल करने की कोशिश भी की लेकिन वहां भी मदद करने से इंकार कर दिया गया.
वे बताते हैं, “हमारी मौजूदगी ही लोगों को अजीब लगती है. लोग हमें देखते ही अपने बच्चों को अंदर कर लेते हैं. ऐसे में मदद मांगना भी मुश्किल हो जाता है.”
आंकड़ों से बाहर, इलाज से दूर
मिलन और रानी, गांव के बाहरी इलाके में रहने पर मजबूर थे जो बाढ़ से सबसे ज़्यादा प्रभावित था. दोनों ने ही अपनी पढ़ाई पूरी नहीं की थी और दूसरों के खेतों में मज़दूरी का काम करते थे. रानी, अनाज साफ करने और पशुओं की देखभाल का काम भी कर लेती थी. बाढ़ ने सबकुछ डूबो दिया. अब काम भी नहीं है. दोनों ने कई बार दिल्ली या दूसरे बड़े शहर जाकर काम ढूंढने के बारे में विचार किया है, पर हिम्मत नहीं जुटा पाते लेकिन उन्हें लगता है कि पलायन के अलावा उनका गुज़ारा नहीं चल सकता.
मिलन बताते हैं कि जहां भी वे मदद के लिए गए, वहां पहले उनकी पहचान पर सवाल उठे, बीमारी बाद में देखी गई. अस्पतालों में अक्सर उनका नाम, दिखावट और पहचान व दस्तावेज़ों में दर्ज जेंडर एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे. इसी वजह से रजिस्ट्रेशन और जांच के दौरान उनसे बार-बार निजी सवाल पूछे जाते थे, और कई बार इलाज शुरू होने से पहले उनकी लैंगिक पहचान पर ही चर्चा होने लगती. ऐसे में अस्पताल जाना भी एक संघर्ष बन गया है. और यह हाल पटना जैसे शहरों का भी है.
“ज़िला अस्पतालों में भी ठीक से इलाज न मिलने की वजह से मैं पटना तक गया जहां मेरी चोट में दवा लगाने की जगह डॉक्टर और नर्स - मैं ऐसे क्यूं हूं, ऐसे क्यूं दिखता हूं - जैसी बातें मुझसे पूछने लगे और मेरा मज़ाक बनाने लगे. वे मुझसे मेरे शरीर को लेकर कई तरह के सवाल पूछ रहे थे, जिसका मेरी उस चोट से तो कोई लेना-देना नहीं था.” मिलन बताते हैं.
बिहार में बाढ़ तो हर साल बहुत कुछ बहा ले जाती है, लेकिन मिलन और रानी के लिए यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी. उनका घर तो पानी में बह गया लेकिन राहत व्यवस्था ने भी उन्हें “पीड़ित” मानने से इंकार कर दिया. आपदा के बीच भी उनकी पहचान पर वही सवाल खड़े थे, जो वे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में झेलते आए हैं.
दरअसल, जो लोग पहले से ही समाज के हाशिये पर होते हैं, वे बाढ़ के पानी के साथ थोड़ा और हाशिए की तरफ बहते चले जाते हैं. मिलन और रानी के लिए बाढ़ सिर्फ बेघर होने का संकट नहीं थी. यह उनकी पहचान के और भी अदृश्य हो जाने की कहानी थी.
बाढ़ के बाद कई ऐसे सवाल रह जाते हैं, जिनके जवाब किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं मिलते. हर साल जलवायु आपदाओं में कितने क्वीयर लोग बेघर होते हैं? राहत के दौरान उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है? जाति, गरीबी और अन्य सामाजिक स्थितियां उनके हालात को कैसे और जटिल बनाती हैं? भारत में इन सवालों पर ठोस डेटा लगभग नहीं के बराबर है, और जब डेटा नहीं होता, तो नीतियां भी इन सच्चाइयों को अनदेखा कर देती हैं.
नए कानून, नए बिल सामने आते हैं जो ट्रांस समुदाय के लिए पहचान के सवाल को और ज़्यादा संकटमय कर देते हैं. यह कानून पहचान को मान्यता देने की बजाय उसे प्रमाणों, मेडिकल जांच और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बांध देते हैं, जहां पहले से ही हाशिये पर खड़े क्वीयर लोग और पीछे धकेल दिए जाते हैं. मिलन और रानी जैसे लोग, जो पहले ही सामाजिक अस्वीकृति और जलवायु आपदा की मार झेल रहे हैं, इस कानूनी ढांचे में कहीं दर्ज ही नहीं हो पाते. न राहत सूची में, न शेल्टर में, न स्वास्थ्य सेवाओं में. इस तरह ये कानून केवल कागज़ों पर पहचान देते हैं, लेकिन असल ज़िंदगी में उसे मिटा देते हैं और यही इस पूरे संकट की सबसे गहरी विडंबना है.
यह स्थिति केवल व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित नहीं है, बल्कि नीतिगत और संस्थागत स्तर पर मौजूद खामियों की ओर इशारा करती है. भारत में जलवायु आपदाओं के संदर्भ में क्वीयर समुदाय से जुड़ा विश्वसनीय डाटा लगभग अनुपस्थित है, जिसके कारण उनकी ज़रूरतें नीति निर्माण में शामिल नहीं हो पातीं. इसी तरह, स्वास्थ्य सेवाओं में संवेदनशीलता की कमी और पहचान को लेकर पूर्वाग्रह इलाज तक पहुंच को और कठिन बना देते हैं.
इसलिए आवश्यक है कि आपदा प्रबंधन, राहत कार्य और स्वास्थ्य तंत्र को अधिक समावेशी बनाया जाए ऐसा ढांचा विकसित किया जाए जो विविध लैंगिक पहचानों और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखे. जब तक नीतियां और ज़मीनी अमल इस दिशा में बदलाव नहीं लाते, तब तक मिलन और रानी जैसे लोग हर आपदा में न सिर्फ अधिक नुकसान उठाते रहेंगे, बल्कि अदृश्य भी बने रहेंगे.
उम्मीद की ओर
पिछले कुछ समय से कई एलजीबीटीक्यू+ समुदायों की मदद से इस दिशा में कई तरह की पहल की जा रही है. यहां हम ऐसी ही कुछ वेबसाइट के बारे में जानकारी अपडेट करते रहेंगे:
https://sdma.kerala.gov.in/transgender-disaster-risk-reduction/
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इमरान खान, लेखक हैं और सामाजिक विकास से जुड़े विषयों पर काम करते हैं. उन्होंने फेमिनिज़म इन इंडिया, शी रोज़, तारशी जैसी कई वेबसाइट के लिए लंबे समय तक लेखन का काम किया है. उनका मानना है कि ज्ञान सिर्फ किताबों से नहीं होता, बल्कि बातचीत, एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और जीवन के अनुभवों से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है. उनकी इस बात में खास दिलचस्पी है कि कहानियों, रचनात्मक तरीकों और अपने अनुभवों पर सोच-विचार करने से हम ऐसा माहौल कैसे बना सकते हैं, जहां हर व्यक्ति को सम्मान मिले, सभी को साथ लेकर चला जाए और लोग एक-दूसरे की भावनाओं को समझें.


