चरवाहों की निगाह में शहर

‘द पैस्ट्रलिस्ट लुक्स एट द सिटी’ एक फिल्म जो चरवाहों और उनके झुंड के साथ खड़े होकर शहर को देखने की कोशिश करती है

क्या आपने अपने शहर में चरवाहों को आते-जाते देखा है? अब तक की ज़िंदगी में उन्हें कहां-कहां देखा है? हम में से बहुत सारे लोगों के लिए इन सवालों का जवाब ‘न’ भी हो सकता है क्योंकि असल में चरवाहों की आजीविका को विकास के एजेंडे में अलग-थलग या अजीब माना जाता है. शहरीकरण की हमारी कल्पना में वे सिरे से गायब दिखाई देते हैं. वहीं चरवाहा समुदाय आज भी अपने पेशे में जुटा हुआ है लेकिन हाल के कुछ वर्षों में समुदाय के कई सारे लोग अपने बच्चों की पढ़ाई औऱ बेहतर सुविधा के लिए शहरों में बसने का फैसला करने लगे हैं. ऐसे में वे न तो पूरी तरह शहर के हो पाते हैं और न जंगल के; शहर में उनकी आवाजाही पर पाबंदियां हैं तो जंगल इंसानी ज़रूरतों के आगे धीरे-धीरे सिमटते जा रहे हैं. तो फिर वे कहां के हैं और कैसे रहते हैं? प्रकृति के तालमेल के साथ जीने वाले समुदायों के तौर पर, वे शहर की अपेक्षाकृत स्थिर जीवनशैली को किस नज़रिए से देखते हैं?

हमारे शहर संस्करण के लिए हमने द पैस्ट्रलिस्ट लुक्स एट द सिटी (चरवाहों की निगाह में शहर) फिल्म बनाई है जो चरवाहों से सवाल करती है कि उनकी निगाह में शहर का क्या अर्थ है?

आमतौर पर हमने चरवाहों को हाईवे पर दौड़ती अपनी गाड़ी के रियर-व्यू शीशे में ही देखा है. हममें से कईयों का ध्यान तो उनकी ओर जाता भी नहीं. हाईवे के कोने पर खड़ा एक आदमी और उसका झुंड, या किसी बड़े शहर के बाहरी इलाके के बाहर अपनी भेड़ों को हांकती एक महिला. उन्हें देखकर हम उस एक बार तो उस दुनिया की कल्पना कर लेते हैं जो कभी सच में हुआ करती थी. द पैस्ट्रलिस्ट लुक्स एट द सिटी (चरवाहों की निगाह में शहर) फिल्म चरवाहों से सवाल करती है कि उनकी निगाह में शहर का क्या अर्थ है – शहर, एक ऐसा जंगल जिसकी सड़कें कॉन्क्रीट की हैं और दीवारें ईंट, सीमेंट, पत्थर की और जहां रहने वाले तमाम तरह के नागरिकों के बीच चरवाहों के लिए कोई जगह नहीं है.

चरवाहे घुमंतू होते हैं और अपने पशुधन जैसे- भेड़, बकरी, ऊंट, गाय, भैंस और याक के साथ झुंड में घूमते हैं. उनका मौजूद होकर भी दिखाई न देना कोई व्यंजना नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड की बातें हैं. हमारी कोई भी योजना चरवाहों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती, इसलिए विकसित समाज की हमारी सोच में वे कहीं शामिल नहीं होते. अभी हाल तक तो इस प्रकार की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं थी कि देश भर में कितने चरवाहे समुदाय रहते और काम करते हैं. किसी का कहना है कि इनकी संख्या 1 से 1.2 करोड़ हो सकती है. 1919 के बाद पहली बार 2024 में भारत में आधिकारिक रूप से चरवाहा समुदायों की संख्या की गिनती शुरू की गई है.

बावजूद इसके चरवाहे हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं, हमारे शहरों का हिस्सा हैं. हमारी अर्थव्यवस्था में दूध और पशुपालन का एक बड़ा हिस्सा (10 फीसदी) और मांस अर्थव्यवस्था का 70 फीसदी पशुपालन पर ही निर्भर है. इसके साथ ही पशुओं से मिलने वाला खाद और ऊन का आर्थिक महत्त्व है और देश में मान्यता प्राप्त पशु नस्लों में से 40 फीसदी का प्रजनन और देखभाल भी इसी से होता है; यह पीढ़ियों से चली आ रही पारिस्थितिकी जानकारी पर आधारित 1.3 लाख करोड़ रुपए का रोज़गार है.

सिर्फ भारत ही नहीं पूरे विश्व में खाद्य और भौगोलिक सुरक्षा को बनाए रखने में चरवाहे बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यह भूमिका इतनी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि 2026 को यूनाईटेड नेशन ने इसे अंतर्राष्ट्रीय चारागाह और पशुपालक वर्ष’ (International Year of Rangelands and Pastoralists – IYRP 2026) घोषित किया है ताकि उन लोगों और इलाकों को वो सम्मान और पहचान मिल सके जिससे लंबे समय से उन्हें वंचित रखा गया था.

हमारे शहर संस्करण के लिए हमने सहजीवन के साथ मिलकर यह फिल्म बनाई है. सहजीवन, एक गैर-लाभकारी संस्था है जो पिछले तीन दशकों से भारत के चरवाहों के इलाकों में काम कर रही है. फिल्म में गुजरात के रबारी, भरवाड और फकीरानी जाट समुदाय की महिलाओं और पुरूषों ने अपने माल (पशुधन) और अपनी पहचान को लेकर खुलकर बातें कीं. उनमें से एक ने कहा, “हम अपने जानवरों की देखभाल करते हैं और हमारे जानवर हमारे बच्चों का ध्यान रखते हैं.”

हर बातचीत में एक चुनाव की स्थिति पैदा होती है जो उनके काम की वजह से उनपर थोपी जाती है: शहर या शहर नहीं. चरवाहों की ज़िंदगी बदलते मौसम के साथ घास और पानी की ज़रूरत के अनुरूप एक जगह से दूसरी जगह निरंतर चलते रहने पर टिकी होती है. वहीं शहर का ढांचा एक अलग तरह की आवाजाही के लिए बना है. यहां अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य को बढ़ावा दिया जाता है, पर ऊंटों की देखभाल के लिए कोई नहीं होता. जो चरवाहे लगातार अपनी जगह बदलते रहते हैं वे शिक्षा के खिलाफ नहीं होते, वे बस ये सवाल करते हैं कि इसके लिए उन्हें अपनी जीवनशैली को छोड़ने की ज़रूरत क्यों है? वे शहर पर ही सवाल उठाते हैं, जो गाड़ियों के लिए हाईवे पर बड़ी-बड़ी चार-पांच-छह लेन की सड़के बनाता है लेकिन चरवाहों की आवाजाही के बारे में नहीं सोचता, जो उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतों का ध्यान रखते हैं.

प्रस्तुति द्वारा द थर्ड आई

लेख द्वारा अनिरुद्ध शेठ (सेंटर फॉर पैस्ट्रोलिस्म)

  • द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.

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